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रॉबेन द्वीप: निर्वासन की जगह से स्वतंत्रता के प्रतीक तक

रॉबेन द्वीप: निर्वासन की जगह से स्वतंत्रता के प्रतीक तक

गति

परिचय

रॉबेन द्वीप, टेबल बे के ठंडे, स्लेटी पानी से यूँ उभरता है जैसे समुद्र की सतह पर कोई चपटा-सा ज़ख्म हो। लगभग अंडाकार आकार का यह द्वीप करीब 5.07 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला है और दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन से मात्र 6.9 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में स्थित है — फिर भी सदियों तक यह एक बिल्कुल अलग दुनिया में रहा — एक ऐसी जगह जहाँ पहुँचना मुश्किल था, जहाँ से मदद नहीं मिलती थी, और जो यहाँ भेजे गए अनेक लोगों के लिए उम्मीद से परे थी। आज यह अफ्रीकी महाद्वीप के सबसे अधिक देखे जाने वाले स्थलों में से एक है — एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल और एक जीवंत संग्रहालय, जहाँ हर साल लाखों सैलानी आते हैं। लेकिन इसका महत्त्व पर्यटन से कहीं आगे जाता है। रॉबेन द्वीप मानवीय पीड़ा और मानवीय दृढ़ता का एक अनमोल भंडार है — एक ऐसी जगह जहाँ चूने और पत्थर की दीवारों के भीतर बीसवीं सदी के अफ्रीकी इतिहास की कुछ सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाएँ घटीं, और जहाँ दक्षिण अफ्रीका के लोकतंत्र के बीज अथक परिश्रम और अविश्वसनीय संघर्ष के साथ बोए गए।

इस द्वीप का नाम भी इतिहास की एक झलक है। "रॉबेन" डच भाषा के उस शब्द से आया है जिसका अर्थ है सील — और शुरुआती डच नाविकों तथा बसने वालों को यहाँ की चट्टानी तटरेखा और आसपास के पानी में केप फर सील बहुतायत में मिली थीं। वे सील आज भी यहाँ हैं — चट्टानों पर आराम फरमाते हुए और अटलांटिक महासागर के केल्प जंगलों में तैरते हुए — उनके इर्द-गिर्द सदियों से चली मानवीय उठा-पटक के प्रति बिल्कुल बेपरवाह। यह द्वीप समतल है, जो अपने सबसे ऊँचे बिंदु पर भी शायद ही समुद्र तल से तीस मीटर ऊपर उठता हो। इसके परिदृश्य में झाड़ीदार फ़िनबोस वनस्पति, लगाए गए चीड़ के जंगल, खुले मैदान और इसके कई ऐतिहासिक कालखंडों की बनाई संरचनाएँ शामिल हैं — पत्थर की इमारतें, सैन्य बंकर, अधिकतम सुरक्षा वाली जेल की दीवारें, एक लाइटहाउस, एक चर्च। केप टाउन के विक्टोरिया एंड अल्फ्रेड वॉटरफ्रंट से सैलानियों को ले जाने वाली फेरी से देखने पर, रॉबेन द्वीप टेबल बे के नीले विस्तार में छोटा और लगभग शांत दिखता है, और दक्षिणी क्षितिज पर शहर के पीछे टेबल माउंटेन उठता नज़र आता है। यह शांत दिखावट बेहद भ्रामक है। अफ्रीका में इतने छोटे भू-भाग पर इतनी सोची-समझी मानवीय क्रूरता और अंततः मानवीय आत्मा की इतनी उदात्त झलक शायद ही कहीं और देखने को मिली हो।

कैद और निर्वासन के स्थान के रूप में इस द्वीप का इतिहास लगभग चार सौ साल पुराना है, जिसमें डच औपनिवेशिक निर्वासित, युद्धबंदी, कुष्ठरोग के मरीज़, मानसिक रोगी और अंततः, आधुनिक दक्षिण अफ्रीका की त्रासद और असाधारण कहानी को परिभाषित करने वाले रंगभेद के युग में, अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस, पैन अफ्रीकनिस्ट कांग्रेस और अन्य मुक्ति आंदोलनों के राजनीतिक कैदी शामिल रहे। रॉबेन द्वीप को समझना दरअसल दक्षिण अफ्रीका को ही समझना है — उसकी औपनिवेशिक हिंसा की परतों को, उसकी नस्लीय ऊँच-नीच को, आज़ादी के लिए दशकों तक चले संघर्ष को, और न्याय तथा मेल-मिलाप की उस अधूरी, जारी यात्रा को।

भूगोल और प्राकृतिक पर्यावरण

टेबल बे, जिसमें रॉबेन द्वीप स्थित है, दक्षिण अटलांटिक महासागर की प्रचलित हवाओं और लहरों की पूरी ताकत को झेलती है, और गर्मियों के महीनों में भी केप टाउन से यहाँ की समुद्री यात्रा उबड़-खाबड़ हो सकती है। वी एंड ए वॉटरफ्रंट से लगभग तीस मिनट में पूरी होने वाली यह फेरी यात्रा उन पानियों से गुज़रती है जो पाल-युग में बदनाम रूप से खतरनाक थे, और केप पेनिनसुला की चट्टानी तटरेखा तथा पास के द्वीपों पर कई जहाज़ तबाह हुए। इस प्राकृतिक विषमता ने रॉबेन द्वीप को नज़रबंदी के लिए एक आदर्श स्थान बना दिया था — बहुत पहले, जब किसी ने एक भी जेल की दीवार नहीं खड़ी की थी। समुद्र खुद ही पहली और सबसे दुर्जेय बाधा था।

इस द्वीप की भूविज्ञान संरचना अपेक्षाकृत सरल है। यह प्रीकैम्ब्रियन कायांतरित चट्टान की परत पर स्थित है, जिसके ऊपर रेतीली मिट्टी और कई क्षेत्रों में नीले स्लेट के भंडार पाए जाते हैं। इसकी समतल भूआकृति इसे कृषि के लिए अत्यंत उपयुक्त बनाती थी, और अपने इतिहास के विभिन्न कालखंडों में यहाँ फ़सलें उगाई गईं, पशु चराए गए और बागबानी की गई। इस द्वीप पर भूमध्यसागरीय जलवायु पाई जाती है — गर्मियों में शुष्क और गर्म, तथा सर्दियों में ठंडी और बरसाती — हालाँकि यहाँ की हवाएँ शायद ही कभी सौम्य होती हैं। केप डॉक्टर, यानी वह शक्तिशाली दक्षिण-पूर्वी हवा जो गर्मियों में केप पेनिनसुला को झकझोर देती है, इस द्वीप पर भी पूरी ताकत से बहती है, और सर्दियों में उत्तर-पश्चिमी आँधियाँ कहर बरपा सकती हैं।

पारिस्थितिकी की दृष्टि से रॉबेन आइलैंड असाधारण रूप से समृद्ध है। इसके आसपास का समुद्री क्षेत्र दुनिया के सबसे उपजाऊ समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों में से एक है, जो दक्षिणी अफ़्रीका के पश्चिमी तट के साथ उत्तर की ओर बहने वाली ठंडी और पोषक तत्वों से भरपूर बेंगुएला धारा से पोषित होता है। स्वयं इस द्वीप पर पक्षियों की लगभग 132 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें अफ़्रीकी पेंगुइन की एक बड़ी कॉलोनी भी शामिल है — वैज्ञानिक नाम Spheniscus demersus — जो तटरेखा के किनारे घोंसला बनाती है। अफ़्रीकी पेंगुइन एक संकटग्रस्त प्रजाति है, और रॉबेन आइलैंड पर मौजूद उनकी कॉलोनी दक्षिण अफ़्रीकी तट पर स्थित उन कई कॉलोनियों में से एक है जिन्हें संरक्षणवादी बचाने में जुटे हैं। इस द्वीप पर क्राउंड कॉर्मोरेंट और ब्लैक क्राउंड नाइट हेरॉन की कॉलोनियाँ भी हैं, और प्रवास के मौसम में विभिन्न प्रकार के जलपक्षी तथा शिकारी पक्षी यहाँ से गुज़रते हैं। स्थलीय वन्यजीवों में स्प्रिंगबोक, ईलैंड, बॉन्टेबोक और कछुए की तीन प्रजातियाँ शामिल हैं — ये सभी जानवर अलग-अलग समयों में द्वीप पर लाए गए थे और खुले मैदानों में इनकी स्थिर आबादी बन चुकी है। केप फ़र सील, जिनकी उपस्थिति ने इस द्वीप को इसका नाम दिया, अब भी चट्टानों पर आकर बैठते हैं, और द्वीप के आसपास के पानी में डॉल्फ़िन, प्रवास के मौसम में व्हेल, तथा मछलियों और समुद्री अकशेरुकी जीवों की समृद्ध विविधता पाई जाती है।

रॉबेन आइलैंड की कहानी में यह पारिस्थितिक समृद्धि महज़ संयोग नहीं है। जब से इसे एक संग्रहालय और प्रकृति आरक्षित क्षेत्र के रूप में खोला गया है, तब से द्वीप के प्राकृतिक पर्यावरण का संरक्षण इसके प्रबंधन का एक तेज़ी से महत्वपूर्ण होता पहलू बन गया है। जैव विविधता को सुरक्षित रखने और हर साल लाखों पर्यटकों के निरंतर दबाव को संभालने के बीच का यह तनाव रॉबेन आइलैंड म्यूज़ियम के सामने एक सतत चुनौती है। विशेष रूप से पेंगुइन के घोंसला बनाने वाले क्षेत्रों की सावधानीपूर्वक सुरक्षा ज़रूरी है, और फ़ेरी घाट तथा पर्यटक मार्गों को इस तरह तैयार किया गया है कि वन्यजीवों को कम से कम परेशानी हो।

आरंभिक इतिहास: निर्वासन का एक डच औपनिवेशिक साधन

पुर्तगाली नाविक Bartolomeu Dias 1488 में इस द्वीप के पास से होकर गुज़रे थे, और यह शुरुआती पुर्तगाली नक्शों पर भी दिखता है, लेकिन रॉबेन आइलैंड का यूरोपीयों द्वारा पहला निरंतर उपयोग डच लोगों के साथ शुरू हुआ। डच ईस्ट इंडिया कंपनी, जो अपने डच संक्षिप्त नाम VOC से जानी जाती थी, ने 1652 में Jan van Riebeeck के नेतृत्व में केप ऑफ़ गुड होप पर एक रसद केंद्र स्थापित किया, और उस बस्ती के शुरुआती वर्षों से ही रॉबेन आइलैंड निर्वासन और नज़रबंदी के लिए एक सुविधाजनक स्थान के रूप में काम आने लगा। VOC एक अत्यंत शक्तिशाली व्यापारिक साम्राज्य था जिसके क्षेत्र और व्यापारिक केंद्र पूरे एशिया में फैले हुए थे, और यह अपने उपनिवेशों पर व्यावसायिक गणनाओं और क्रूर बल के मिश्रण से शासन करता था। जिन विरोधियों को सीधे मृत्युदंड नहीं दिया जा सकता था — क्योंकि उनका रुतबा, उनके संपर्क या तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियाँ उन्हें मारना असुविधाजनक बनाती थीं — उन्हें केप भेजा जा सकता था, ज्ञात दुनिया के एकदम छोर पर स्थित एक दूरदराज़ की चौकी पर, जहाँ वे घर से कोसों दूर और व्यावहारिक रूप से शक्तिहीन हो जाते थे।

डच औपनिवेशिक शासन के विरोधियों में से जो पहले उल्लेखनीय राजनीतिक निर्वासी रॉबेन द्वीप भेजे गए, वे पूर्वी इंडीज — यानी आज के इंडोनेशिया — में डच शासन के विरुद्ध लड़ने वाले लोग थे। इनमें सबसे अधिक सम्मानित हैं Sheikh Yusuf of Macassar, जिन्हें दक्षिण अफ़्रीका की सामूहिक स्मृति में, और विशेष रूप से केप मुस्लिम समुदाय की याद में, अत्यंत आदरणीय स्थान प्राप्त है। वे आज के इंडोनेशिया के दक्षिण सुलावेसी प्रांत में स्थित गोवा सल्तनत के एक प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वान और सैन्य नेता थे। Sheikh Yusuf ने डच औपनिवेशिक विस्तार का दृढ़तापूर्वक विरोध किया था और कई वर्षों तक VOC के विरुद्ध प्रतिरोध का नेतृत्व किया, जब तक कि उन्हें बंदी नहीं बना लिया गया। 1694 में, डच अधिकारियों ने उन्हें उनके परिवार के सदस्यों, अनुयायियों और शिष्यों के साथ केप कॉलोनी में निर्वासित कर दिया। उन्हें केप फ्लैट्स में एक फ़ार्म पर रखा गया, जो आज के Macassar शहर के निकट है — इस शहर का नाम उनकी मातृभूमि की स्मृति में रखा गया है। अपने अंतिम वर्षों में वे वहीं रहकर शिक्षा देते, उपदेश करते और अनुयायियों का एक समुदाय बनाते रहे। 1699 में उनका निधन हो गया, और 1704 में उनके अधिकांश परिजनों और अनुयायियों को बटाविया वापस लौटने की अनुमति दी गई। Sheikh Yusuf को दक्षिण अफ़्रीका में इस्लाम की नींव रखने वाले प्रमुख व्यक्तित्वों में से एक माना जाता है, और उनकी कब्र को एक क्रमाह — यानी एक पवित्र मुस्लिम दरगाह — के रूप में मान्यता प्राप्त है।

Rajah of Tambora का मामला VOC द्वारा निर्वासन के उपयोग के एक अलग पहलू को उजागर करता है। राजा, इंडोनेशियाई द्वीप सुम्बावा पर स्थित छोटे से राज्य Tambora के शासक थे, जिन्हें डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने उनके कथित दुर्व्यवहार के आरोप में केप भेज दिया — यह विवरण लगभग निश्चित रूप से डच वाणिज्यिक और राजनीतिक मांगों के प्रति उनके प्रतिरोध को ही दर्शाता है। उन्हें दो बार केप में निर्वासित किया गया — पहली बार 1697 से 1710 तक, और दूसरी बार 1713 से 1719 तक। उनका दूसरा निर्वासन उस काल से एक साथ पड़ता है जब Sheikh Yusuf की एक बेटी भी केप में थी, और ऐतिहासिक अभिलेख इन दोनों निर्वासितों के बीच विवाह के ज़रिए एक पारिवारिक संबंध का संकेत देते हैं। Sheikh Yusuf, Rajah of Tambora और केप में रहे अन्य एशियाई राजनीतिक निर्वासितों की कहानियाँ यह महत्वपूर्ण याद दिलाती हैं कि रॉबेन द्वीप का इतिहास औपनिवेशिक दंड के स्थान के रूप में रंगभेद से नहीं शुरू हुआ। राजनीतिक दमन के एक साधन के रूप में इस द्वीप की भूमिका दक्षिण अफ़्रीका में डच उपनिवेशवाद की नींव के समय से ही चली आ रही है।

VOC ने रॉबेन द्वीप का उपयोग Khoikhoi नेताओं और उन अन्य मूलनिवासी लोगों को रखने के लिए भी किया, जिन्होंने औपनिवेशिक प्रशासन का विरोध किया या उसके लिए परेशानी खड़ी की। Autshumato, जिन्हें Harry the Strandloper के नाम से भी जाना जाता है, एक Khoikhoi व्यक्ति थे जो शुरुआती डच बसने वालों के लिए दुभाषिया और मध्यस्थ का काम करते थे। Jan van Riebeeck के साथ विवाद के बाद 1658 में उन्हें रॉबेन द्वीप पर निर्वासित कर दिया गया। माना जाता है कि वे द्वीप पर रखे गए पहले कैदी थे और ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, वे नाव से वहाँ से भाग निकलने में सफल हुए — ऐसा करने वाले बिरले लोगों में से एक। कैद और निर्वासन के ये शुरुआती उदाहरण एक ऐसे चलन की नींव थे, जो तीन सदियों से भी अधिक समय तक निरंतर और क्रूर रूप से जारी रहा।

केप में ब्रिटिश औपनिवेशिक काल, जो 1806 में ब्रिटिश कब्ज़े से शुरू हुआ, के दौरान भी रॉबेन द्वीप को नज़रबंदी के स्थान के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा। युद्धबंदी, सेना से भागे हुए सैनिक और आपराधिक दोषी वहाँ रखे जाते थे। केप सीमा पर हुए विभिन्न संघर्षों के दौरान, जिनमें ब्रिटिश सेनाओं और Xhosa सरदारों के बीच के युद्ध शामिल हैं, कभी-कभी पकड़े गए Xhosa नेताओं को द्वीप पर निर्वासित किया जाता था। Makana, जिन्हें Nxele के नाम से भी जाना जाता है — एक करिश्माई Xhosa सैन्य और धार्मिक नेता, जिन्होंने 1819 में ब्रिटिश बस्ती Grahamstown पर एक बड़े पैमाने का हमला किया — उन्हें पकड़े जाने के बाद रॉबेन द्वीप भेजा गया। 1820 में एक भरी हुई नाव से भागने का प्रयास करते समय वे डूब गए। उनकी मृत्यु, रॉबेन द्वीप के इतिहास की बहुत-सी अन्य घटनाओं की तरह, वहाँ बंद लोगों की बेबसी और अधिकारियों की उनके भाग्य के प्रति निर्मम उदासीनता को उजागर करती है।

कुष्ठ रोगियों की बस्ती और मानसिक शरणगाह: 1846 से 1931

उन्नीसवीं सदी के मध्य में Robben Island के इतिहास में एक नया दौर आया — जो अपने घोषित इरादों में मानवीय था, लेकिन व्यावहारिक हकीकत में अक्सर क्रूर साबित हुआ। 1846 में Cape की औपनिवेशिक सरकार ने इस द्वीप पर एक कुष्ठ रोगी बस्ती स्थापित की, और अगले कई दशकों तक Robben Island दक्षिणी अफ्रीका में कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों को कैद रखने की प्रमुख जगहों में से एक बन गया — साथ ही उन लोगों के लिए भी जिन्हें मानसिक रूप से बीमार या सामान्य समाज के लिए अयोग्य करार दिया गया था। यह बदलाव उन्नीसवीं सदी के औपनिवेशिक शासन की उस व्यापक सोच का हिस्सा था, जिसमें खतरनाक, विचलित या बीमार समझी जाने वाली आबादी को आम समाज से अलग करके नियंत्रित वातावरण में रखकर उन पर काबू रखा जाता था।

कुष्ठ रोग, जो अब Mycobacterium leprae नामक बैक्टीरिया से होने वाली बीमारी के रूप में जाना जाता है और जिसका एंटीबायोटिक्स से आसानी से इलाज हो सकता है — उन्नीसवीं सदी में एक ऐसी बीमारी थी जिसे लोग ठीक से समझते नहीं थे और जो गहरे सामाजिक कलंक से जुड़ी हुई थी। जिन लोगों को इसका रोगी बताया जाता, उन्हें केवल बीमारी का सामना नहीं करना पड़ता था — बल्कि उन्हें सामाजिक मौत का भी सामना करना पड़ता था। उनके परिवार और समाज उन्हें ठुकरा देते, उन्हें अपने सभी जानने-पहचानने वालों से जबरन अलग कर दिया जाता, और किसी दूरदराज़ जगह पर अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया जाता। Robben Island की कुष्ठ रोगी बस्ती के शुरुआती वर्षों में मरीजों को स्वेच्छा से यहाँ भेजा जाता था, लेकिन 1882 में Leprosy Repression Act पारित होने के बाद यह कैद अनिवार्य हो गई। कुष्ठ रोग से पीड़ित पाए गए व्यक्ति को बिना किसी असली कानूनी सहारे या अपील के उसके घर से उठाकर द्वीप पर भेजा जा सकता था, और वापसी का कोई रास्ता नहीं था।

द्वीप पर कुष्ठ रोगियों का जीवन बेहद कठिन था। हालात सख्त थे, रहने की जगह अक्सर नाकाफी थी, और हमेशा के लिए निर्वासित होने का एहसास हर तरफ छाया रहता था। मरीज न केवल समुद्र के कारण बाहरी दुनिया से कटे हुए थे, बल्कि उन्हें द्वीप के भीतर भी नस्ल के आधार पर अलग-अलग रखा जाता था — यह बात उन रंगभेद नीतियों की झलक देती थी जो बाद में बीसवीं सदी में दक्षिण अफ्रीका की राजनीतिक व्यवस्था की पहचान बनने वाली थीं। काले और रंगीन (coloured) मरीजों को गोरे मरीजों से अलग रखा जाता था और उन्हें घटिया खाना, कपड़े और देखभाल मिलती थी। दक्षिण अफ्रीकी औपनिवेशिक समाज की नस्लीय ऊँच-नीच इस द्वीप पर एक छोटे पैमाने पर फिर से जीवित हो जाती थी — और यह एक ऐसी चिकित्सा सुविधा में, जो सैद्धांतिक रूप से देखभाल और इलाज के लिए बनाई गई थी।

द्वीप पर मानसिक रूप से बीमार घोषित किए गए लोगों को भी रखा जाता था — एक ऐसी श्रेणी जो उन्नीसवीं सदी के दक्षिण अफ्रीका में बड़े पैमाने पर और कभी-कभी लापरवाही से इस्तेमाल होती थी। जिन्हें औपनिवेशिक अधिकारी पागल समझते — चाहे वे सच में किसी मनोवैज्ञानिक बीमारी से पीड़ित हों, या बस इस तरह व्यवहार करते हों जो अधिकारियों को खतरनाक या असुविधाजनक लगता हो — उन्हें बिना किसी ठोस कानूनी प्रक्रिया के द्वीप पर बंद किया जा सकता था। द्वीप का एकांत उस औपनिवेशिक प्रशासन के लिए बेहद सुविधाजनक था जो मुश्किल लोगों को नज़रों से दूर करना चाहता था।

कुष्ठ रोगी बस्ती अस्सी से भी ज़्यादा वर्षों तक चलती रही, और अंततः 1931 में बंद हुई जब अंतिम मरीजों को मुख्य भूमि पर किसी दूसरी सुविधा में स्थानांतरित किया गया। तब तक इस द्वीप पर हजारों लोग रह चुके थे, जिन्होंने Table Bay के बीच एक हवादार टापू पर — अपने परिवारों और समुदायों से दूर — अपनी जिंदगी के साल या दशक जबरन निर्वासन में गुज़ारे थे, और वे एक ऐसी औपनिवेशिक सत्ता के पूरे दबाव में थे जो उन्हें अधिकार और गरिमा रखने वाले इंसानों की बजाय बोझ या खतरा समझकर उन्हें काबू में रखना चाहती थी। कुष्ठ रोगी बस्ती के दौर की कुछ इमारतें आज भी द्वीप पर खड़ी हैं — मशहूर जेल की इमारतों के साथ-साथ — और वे इस द्वीप के जटिल, बहुस्तरीय इतिहास का एक अहम हिस्सा हैं।

द्वितीय विश्व युद्ध और सैन्य किलेबंदी

जब 1939 में दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ, तो रॉबेन द्वीप को एक नई सामरिक अहमियत मिल गई। दक्षिण अफ्रीका, ब्रिटिश राष्ट्रमंडल का सदस्य होने के नाते, मित्र राष्ट्रों की तरफ से युद्ध में उतरा, और केप ऑफ गुड होप की स्थिति — अटलांटिक और हिंद महासागर के बीच प्रवेशद्वार के रूप में — मित्र राष्ट्रों की आपूर्ति श्रृंखला में एक अहम कड़ी साबित हुई। केप टाउन का बंदरगाह मित्र राष्ट्रों के जहाजों के लिए ईंधन भरवाने और रसद लेने का एक ज़रूरी पड़ाव था, खासकर 1940 में फ्रांस के पतन और भूमध्यसागरीय मार्ग पर बढ़ते खतरे के बाद।

दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने केप प्रायद्वीप को धुरी राष्ट्रों के संभावित हमले से बचाने के लिए भारी निवेश किया, और टेबल बे के प्रवेशद्वार पर स्थित रॉबेन द्वीप रक्षात्मक प्रतिष्ठानों के लिए एक स्वाभाविक स्थल था। द्वीप पर बड़ी तटीय तोपखाना बैटरियाँ बनाई गईं, जो टेबल बे में घुसने की कोशिश करने वाले दुश्मन के युद्धपोतों या आसपास के समुद्री क्षेत्र में जहाजरानी को खतरे में डालने वाले जहाजों से मुकाबला कर सकती थीं। तोपों को प्रबलित कंक्रीट के बुर्जों में लगाया गया था, जो हवाई हमले और नौसैनिक बमबारी का सामना करने में सक्षम थे, और ये सुरंगों और संचार अवसंरचना के एक जाल से आपस में जुड़े हुए थे। सड़कें बनाई गईं या उनमें सुधार किया गया, एक बिजलीघर बनाया गया, सैन्य दल के लिए आवास खड़े किए गए, और एक हवाई पट्टी बिछाई गई ताकि विमान द्वीप का आपातकालीन लैंडिंग स्थल के रूप में उपयोग कर सकें।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रॉबेन द्वीप पर लगाई गई बड़ी तोपें कभी युद्ध में नहीं दागी गईं। किसी भी धुरी राष्ट्र की नौसैनिक शक्ति ने टेबल बे में घुसने की कोशिश नहीं की, और पूरे युद्ध के दौरान केप सुरक्षित रहा। लेकिन युद्ध समाप्त होने के काफी बाद भी सैन्य प्रतिष्ठान द्वीप पर बने रहे, और वे इसके पुरातात्त्विक और ऐतिहासिक अभिलेख में एक अलग परत का निर्माण करते हैं। तोप बुर्ज, अपनी विशाल कंक्रीट दीवारों और उन गोलाकार पटरियों के साथ जिन पर तोप की गाड़ियाँ घूमती थीं, आज भी द्वीप पर देखे जा सकते हैं, और ये उन स्थलों में शामिल हैं जो पर्यटन समूहों को दिखाए जाते हैं। ये इस बात की याद दिलाते हैं कि रॉबेन द्वीप को केवल उपनिवेशवाद और रंगभेद की सामाजिक राजनीति ने ही नहीं, बल्कि बीसवीं सदी के वैश्विक संघर्षों ने भी आकार दिया है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद द्वीप का उपयोग दक्षिण अफ्रीकी सेना द्वारा जारी रहा, लेकिन इतिहास का यह अध्याय अपने अंत की ओर बढ़ रहा था। 1948 में सत्ता में आई रंगभेदी सरकार के रॉबेन द्वीप के लिए कुछ और ही इरादे थे।

रंगभेद का दौर: राजनीतिक कैदियों के लिए एक उच्च सुरक्षा कारागार

1948 में नेशनल पार्टी की चुनावी जीत और उसके बाद रंगभेद — संस्थागत नस्लीय अलगाव और श्वेत अल्पसंख्यक शासन की व्यवस्था — के लागू होने ने दक्षिण अफ्रीका को बदल दिया और अनिवार्य रूप से रॉबेन द्वीप को भी। जैसे-जैसे रंगभेदी सरकार ने 1950 के दशक के अंत और 1960 के दशक की शुरुआत में राजनीतिक विरोध को कुचलने के लिए कदम उठाए, उसे गिरफ्तार किए गए लोगों को रखने के लिए जगह की ज़रूरत पड़ी। 1960 के बाद के दौर में राजनीतिक दमन में भारी विस्तार हुआ — मार्च 1960 के शार्पविल नरसंहार के बाद ANC और PAC पर प्रतिबंध लगा दिया गया, और एक नई पीढ़ी के कार्यकर्ता सशस्त्र प्रतिरोध की ओर मुड़ गए। रंगभेदी सरकार की प्रतिक्रिया त्वरित और क्रूर थी।

1961 में दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने रॉबेन द्वीप को आधिकारिक रूप से एक जेल में बदल दिया, शुरुआत में आम अपराधियों और राजनीतिक कैदियों दोनों के लिए। 1964 तक, रिवोनिया ट्रायल के बाद, यह लंबी सजाएँ पाने वाले काले राजनीतिक कैदियों का प्रमुख ठिकाना बन गया था, जिन्हें वहाँ अधिकतम सुरक्षा की परिस्थितियों में स्थानांतरित किया जाता था और एक ऐसी व्यवस्था के अधीन रखा जाता था जिसका मकसद महज उन्हें दंड देना नहीं, बल्कि उनका मनोबल तोड़ना और उनकी राजनीतिक पहचान को मिटाना था। श्वेत राजनीतिक कैदियों को रॉबेन द्वीप नहीं भेजा जाता था, बल्कि उन्हें प्रिटोरिया सेंट्रल जेल में रखा जाता था — यह भेद रंगभेद की नस्लीय तर्क को उन लोगों की सजा में भी लागू करता था जो उसका विरोध करते थे। रिवोनिया ट्रायल में सजा पाने वाले एकमात्र श्वेत अभियुक्त Denis Goldberg को प्रिटोरिया भेजा गया, जबकि उनके काले सह-अभियुक्तों को रॉबेन द्वीप।

1960 के दशक में रॉबेन द्वीप पर जो जेल बनाई गई थी, वह जानबूझकर अपमानजनक बनाई गई एक संस्था थी। इसकी भौतिक बनावट, इसके नियम-कायदे और वहाँ के जेलरों का रोज़ाना का व्यवहार — सब कुछ उन लोगों को नीचा दिखाने और दबाने के लिए तैयार किया गया था, जिन्होंने अपना जीवन अपने देश की मुक्ति के लिए समर्पित कर दिया था। अधिकतम सुरक्षा वाले खंड में, जहाँ सबसे प्रमुख राजनीतिक कैदियों को रखा जाता था, एकल कोठरियों की एक पूरी कतार थी — हर कोठरी छोटी, ठंडी और बिल्कुल खाली। कैदी कंक्रीट के फर्श पर पतली चटाइयों पर सोते थे और ओढ़ने के लिए बस एक कंबल मिलता था। मौसम चाहे जो भी हो, उन्हें निकर और चप्पल ही दी जाती थीं — यह एक सोचा-समझा फैसला था, ताकि उन्हें ढंग के कपड़ों की गरिमा से वंचित रखा जा सके, जिसे बाद में केप की कड़कड़ाती सर्दियों में उन्हें और ज़्यादा अपमानित करने के लिए इस्तेमाल किया गया।

खाने की राशनिंग होती थी और उसमें जानबूझकर भेदभाव रखा गया था। अश्वेत कैदियों को भारतीय या रंगीन कैदियों की तुलना में कम खाना मिलता था, और सभी राजनीतिक कैदियों को सामान्य आपराधिक कैदियों के पहले से ही अपर्याप्त राशन से भी कम मिलता था। रोज़ का खाना एकरस और कैलोरी में कमज़ोर था — पैप, यानी मोटे मक्के का दलिया, जिसके साथ पतले सब्ज़ी के सूप और कभी-कभार मांस के टुकड़े मिलते थे। कुपोषण एक स्थायी समस्या थी और कैदी जब भी मौका मिलता, छोटे-छोटे बगीचों में सब्ज़ियाँ उगाकर और जो भी अन्य तरीके उपलब्ध थे, उनसे अपने सरकारी राशन की कमी पूरी करते थे।

जेल के नियमों के तहत सूचनाओं पर पूरी तरह पाबंदी थी। कैदियों को अखबार लेने या रखने, रेडियो सुनने या बाहरी दुनिया की किसी भी खबर तक पहुँचने की सख्त मनाही थी। परिवार को लिखे जाने वाले और परिवार से आने वाले पत्रों की कड़ी सेंसरशिप होती थी, साल में इनकी संख्या बेहद सीमित होती थी और उन पर भारी काट-छाँट की जाती थी। परिवार से मुलाकात की सख्त पाबंदी थी, मुलाकातें बहुत कम होती थीं और एक शीशे की दीवार के पार होती थीं, जहाँ जेलर कहे जाने वाले हर शब्द पर नज़र रखने के लिए मौजूद रहते थे। कई कैदियों के लिए एक मुलाकात से दूसरी मुलाकात के बीच सालों बीत जाते थे, और परिवार से यह अलगाव कैद के सबसे मनोवैज्ञानिक रूप से तकलीफदेह पहलुओं में से एक था।

रिवोनिया मुकदमा और ANC नेतृत्व का आगमन

रॉबेन द्वीप की राजनीतिक जेल के मानवीय परिदृश्य को सबसे नाटकीय रूप से जिस घटना ने आकार दिया, वह था रिवोनिया मुकदमा, जो 12 जून 1964 को समाप्त हुआ, जब Nelson Mandela, Walter Sisulu, Govan Mbeki, Raymond Mhlaba, Elias Motsoaledi, Andrew Mlangeni और Ahmed Kathrada को तोड़फोड़ और दक्षिण अफ्रीकी सरकार को उखाड़ फेंकने की साजिश के आरोप में उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई। यह मुकदमा उस दमनचक्र की परिणति था जो जुलाई 1963 में शुरू हुआ था, जब दक्षिण अफ्रीकी पुलिस ने जोहानेसबर्ग के उत्तर में स्थित उपनगर रिवोनिया में एक फार्म पर छापा मारा और अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस की सशस्त्र शाखा, Umkhonto we Sizwe, के हाई कमांड के अधिकांश सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया।

Nelson Mandela, जो अगस्त 1962 से ही भड़काने और बिना पासपोर्ट के देश छोड़ने के आरोप में जेल में थे, उन्हें अपने साथियों के साथ मुकदमे में खड़े होने के लिए जेल से लाया गया। सरकार ने मृत्युदंड की माँग की और अभियुक्तों ने यह जानते हुए कि उनकी जान दाँव पर लगी है, महीनों अपना बचाव तैयार किया। Nelson Mandela का कठघरे से दिया गया बयान, जो 20 अप्रैल 1964 को दिया गया था, मानवाधिकारों के इतिहास के महान भाषणों में से एक बन गया। उन्होंने इसे उन शब्दों के साथ समाप्त किया जो दशकों से गूँजते आए हैं: उन्होंने एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक समाज के आदर्श को ऐसा बताया, जिसके लिए वे मरने को भी तैयार थे।

मृत्युदंड नहीं दिया गया। आठों दोषी पुरुष — Goldberg पर अलग से मुकदमा चला था और उन्हें प्रिटोरिया भेजा गया था — रॉबेन द्वीप लाए गए, जहाँ वे अपने जीवन के सबसे निर्णायक वर्ष बिताएँगे। Nelson Mandela जब द्वीप पर पहुँचे तो उनकी उम्र पैंतालीस साल थी। वे तिरसठ साल की उम्र में ही वहाँ से जा सके।

उनके आने से जेल का माहौल पूरी तरह बदल गया। रिवोनिया के मुकदमे के आरोपियों के आने से पहले, रॉबेन आइलैंड में कई संगठनों के राजनीतिक बंदी थे — जिनमें पैन अफ्रीकनिस्ट कांग्रेस के वे सदस्य भी शामिल थे जिन्हें शार्पविल गोलीकांड और उसके बाद फैली राजनीतिक उथल-पुथल के बाद कैद किया गया था। रिवोनिया के लोग अपने साथ ANC नेतृत्व की वैचारिक गहराई और संगठनात्मक अनुभव लेकर आए थे, और उन्होंने तुरंत ही जेल की तमाम कठोर पाबंदियों के बावजूद, एक राजनीतिक सामूहिक की तरह काम करना शुरू कर दिया।

शुरुआत में कैदियों को B सेक्शन में रखा गया था — एकल कोठरियों वाला एक ऐसा आँगन जो खासतौर पर उच्च सुरक्षा वाले राजनीतिक कैदियों के लिए बनाया गया था। हर कोठरी लगभग दो मीटर गुणा ढाई मीटर की थी — इतनी छोटी कि किसी भी दिशा में बस तीन कदम चले जा सकते थे। एक पतली सोने की चटाई, तीन कंबल, एक छोटी मेज, एक स्टूल, और एक सफाई की बाल्टी — बस यही पूरा सामान था। दीवार में ऊँचाई पर एक छोटी सलाखों वाली खिड़की थी, जिससे आसमान का एक छोटा-सा टुकड़ा दिखता था। दरवाज़े पूरी तरह बंद थे, बस एक छोटी-सी झरोखेनुमा झिरी थी जिससे वार्डर कैदियों पर नज़र रख सकते थे।

शुरुआती वर्षों में हालात खासे क्रूर थे। कैदियों को चूने की खदान में काम करना पड़ता था — द्वीप पर वह जगह जहाँ नीली स्लेट निकाली और कुचली जाती थी, और जहाँ सफेद पत्थर से परावर्तित होती तेज़ धूप ने कई लोगों की आँखों को स्थायी नुकसान पहुँचाया। Mandela की आँखों को भी खदान में वर्षों काम करने से स्थायी क्षति हुई, जो उनके जीवन में काफी बाद में ज़ाहिर हुई। कैदियों को कड़ी शारीरिक मेहनत करनी पड़ती थी — कुदाल और फावड़े से पत्थर तोड़ना, मलबा उठाना और उसे दूर ले जाना। काम थका देने वाला था और हालात बेरहम, खासकर गर्मियों में जब खदान में भीषण गर्मी पड़ती थी।

शुरुआती वर्षों में एक खुले आसमान के नीचे की सज़ा भी थी, जिसे कैदियों में जिंक कोर्टयार्ड के नाम से जाना जाता था — एक व्यायाम आँगन जो मौसम की मार से बिल्कुल बेपर्दा था, और जहाँ खराब मौसम में भी कैदियों को समय बिताने पर मजबूर किया जाता था। खाना अपर्याप्त था और नस्ल के आधार पर असमान रूप से बाँटा जाता था। तेज़ धूप से आँखों को होने वाले नुकसान के बावजूद कैदियों को खदान में धूप का चश्मा पहनने की मनाही थी। पढ़ाई-लिखाई शुरुआत में पूरी तरह प्रतिबंधित या बहुत सख्ती से सीमित थी। इन अभावों की सुनियोजित प्रकृति यह साफ कर देती थी कि जेल का यह तंत्र महज हिरासत के लिए नहीं था, बल्कि उन लोगों को जानबूझकर तोड़ने और अपमानित करने के लिए था जिनसे रंगभेद सरकार डरती और घृणा करती थी।

रॉबेन आइलैंड विश्वविद्यालय

अपनी दयनीय परिस्थितियों के बावजूद, रॉबेन आइलैंड के राजनीतिक कैदियों ने कुछ असाधारण किया। उन्होंने चुपचाप और लगातार एक ऐसी शिक्षण संस्था खड़ी की, जो रॉबेन आइलैंड विश्वविद्यालय के नाम से जानी गई। यह कक्षाओं या प्रमाणपत्रों वाली कोई औपचारिक संस्था नहीं थी — हालाँकि बाद में कुछ कैदी पत्राचार के ज़रिए विश्वविद्यालय की डिग्रियाँ हासिल करने में कामयाब भी हुए। अपनी शुरुआत में यह एक ज़मीनी, स्व-संगठित सामूहिक प्रयास था — दिमागों को जीवित रखने का, ज्ञान साझा करने का, और एक ऐसे आंदोलन के राजनीतिक और वैचारिक जीवन को बचाए रखने का, जिसे रंगभेद सरकार पूरी तरह मिटा देना चाहती थी।

चूने की खदान ही मुख्य कक्षा थी। जब वार्डर काफी दूर होते, तो कैदी अपने आराम के वक्त में राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र और दर्शन पर चर्चा करते। Mandela, Walter Sisulu, Govan Mbeki और दूसरे लोग ANC और मुक्ति आंदोलन के इतिहास, मार्क्सवादी सिद्धांत, अफ्रीकी राष्ट्रवाद, पूँजीवाद और समाजवाद की अर्थव्यवस्था, और दुनिया भर के मुक्ति संघर्षों के इतिहास पर संगोष्ठियाँ आयोजित करते। जो युवा कैदी द्वीप पर छात्रों और कार्यकर्ताओं की हैसियत से आए थे लेकिन जिनके पास औपचारिक शिक्षा नहीं थी, उन्हें वरिष्ठ लोगों से ऐसी शिक्षा मिली जिसे कई लोगों ने राजनीतिक सिद्धांत और इतिहास में विश्वविद्यालय की डिग्री के समतुल्य बताया।

ये चर्चाएँ महज़ शैक्षणिक नहीं थीं। ये बेहद व्यावहारिक थीं, जिनका मकसद था इन लोगों को उस वक्त के लिए तैयार करना जब वे आखिरकार रिहा होंगे और मुक्ति संघर्ष में फिर से योगदान दे सकेंगे। इनमें रणनीति पर बहसें होती थीं — इस बात पर कि क्या ANC का सशस्त्र संघर्ष का तरीका सही है, मुक्ति आंदोलन और कम्युनिस्ट पार्टी के आपसी रिश्ते पर, संघर्ष में महिलाओं की भूमिका पर, और रंगभेद के बाद के दक्षिण अफ्रीका में जातीय व नस्लीय अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार पर। ये कोई अमूर्त दार्शनिक कवायदें नहीं थीं, बल्कि जीवंत राजनीतिक सवाल थे जिन पर लोगों के मज़बूत और अक्सर परस्पर विरोधी मत थे, और खदान की बहसें कभी-कभी बड़ी गरमागरम हो जाती थीं।

धीरे-धीरे, जब 1960 के दशक के अंत और 1970 के दशक में द्वीप पर हालात बेहतर होने लगे — जो आंशिक रूप से अंतर्राष्ट्रीय रेड क्रॉस समिति और अन्य संगठनों के दबाव का नतीजा था — तो कैदियों को दक्षिण अफ्रीका विश्वविद्यालय के ज़रिए पढ़ाई करने की इजाज़त दी गई, जो एक दूरस्थ शिक्षा संस्थान था। इससे औपचारिक डिग्रियाँ हासिल करने का रास्ता खुल गया, और कई कैदियों ने द्वीप पर बिताए अपने वर्षों का इस्तेमाल डिग्रियाँ पूरी करने में किया — कुछ ने स्नातक की डिग्री हासिल की, तो कुछ ने स्नातकोत्तर योग्यताएँ। कई ऐसे लोग जो रॉबेन द्वीप पर बिना किसी औपचारिक शिक्षा के आए थे, वे डिग्रियाँ लेकर वहाँ से गए। जेल ने उनके दिमागों को बर्बाद करने की कोशिश की थी; उन्होंने जेल का इस्तेमाल उन्हें निखारने के लिए किया।

द्वीप का बौद्धिक जीवन सांस्कृतिक गतिविधियों तक भी फैला हुआ था। कैदियों ने नाटक मंचित किए, कविताएँ लिखीं, और साहित्य व कला पर बहसें आयोजित कीं। पढ़ने की सामग्री पर पाबंदियों के बावजूद, किताबें धीरे-धीरे मंज़ूर होने लगीं और जेल में एक पुस्तकालय बनता गया। शुरुआत में यह पुस्तकालय छोटा था और इसमें रखी जा सकने वाली सामग्री भी सीमित थी — राजनीतिक सामग्री पर पूरी तरह पाबंदी थी, और यहाँ तक कि साहित्यिक कृतियाँ भी जिनका कोई अंश पहरेदारों को आपत्तिजनक लगता, हटा दी जाती थीं — लेकिन वर्षों में यह बढ़ता गया और उन लोगों के लिए एक अहम साधन बन गया जिनके पास भरने के लिए लंबे-लंबे घंटे थे और उन्हें सार्थक रूप से इस्तेमाल करने की इच्छाशक्ति भी।

Robert Sobukwe और पैन अफ्रीकनिस्ट कांग्रेस के कैदी

रॉबेन द्वीप पर ANC का नेतृत्व ही एकमात्र महत्वपूर्ण राजनीतिक तबका नहीं था। पैन अफ्रीकनिस्ट कांग्रेस के संस्थापक और अध्यक्ष Robert Mangaliso Sobukwe मई 1963 में द्वीप पर पहुँचे, जब वे PAC के 1960 के पास-विरोधी अभियान से जुड़े उकसावे के मामले में तीन साल की जेल की सज़ा काट चुके थे — वह अभियान जो शार्पविले नरसंहार में जाकर खत्म हुआ था। उनकी मूल सज़ा उसी साल खत्म हो जानी चाहिए थी, लेकिन रंगभेदी सरकार उनके प्रभाव और प्रतिरोध को संगठित करने की उनकी क्षमता से इतनी भयभीत थी कि उसने उन्हें बंद रखने के लिए असाधारण कदम उठाए।

1963 का जनरल लॉ अमेंडमेंट एक्ट एक ऐसा प्रावधान लेकर आया जो पूरे दक्षिण अफ्रीका और दुनिया में Sobukwe Clause के नाम से जाना जाने लगा। इस अकेले प्रावधान ने न्याय मंत्री को यह अधिकार दे दिया कि वे किसी भी राजनीतिक कैदी की नज़रबंदी साल-दर-साल बढ़ाते रहें — बिना किसी आरोप के, बिना किसी मुकदमे के, और बिना कोई कारण बताने की कोई बाध्यता के। यह धारा किसी और कैदी पर कभी लागू नहीं हुई। इसे खास तौर पर Robert Sobukwe के लिए बनाया गया था, जो सरकार की नज़र में एक ऐसा अनोखा खतरा थे जो अनोखे उपायों को जायज़ ठहराता था।

Sobukwe को दूसरे राजनीतिक कैदियों के साथ आम जेल आबादी में नहीं रखा गया। इसके बजाय, उन्हें द्वीप पर एक छोटी-सी कॉटेज में रखा गया, जो बाकी कैदियों से अलग थी, और उन्हें लगभग पूर्ण एकांत कारावास की व्यवस्था के तहत रखा गया जो 1963 से 1969 तक चली — जब उन्हें रिहा किया गया, लेकिन तुरंत एक प्रतिबंध आदेश के तहत डाल दिया गया। इस आदेश के तहत वे एक समय में एक से अधिक व्यक्ति से बात नहीं कर सकते थे, किम्बर्ले शहर की सीमा नहीं छोड़ सकते थे, और किसी भी राजनीतिक गतिविधि में हिस्सा नहीं ले सकते थे। 1978 में उनकी किम्बर्ले में फेफड़ों के कैंसर से मृत्यु हो गई — जेल में बिताए वर्षों ने उनके स्वास्थ्य को बुरी तरह नुकसान पहुँचाया था।

रॉबेन आइलैंड पर एकांत कारावास के अपने छह वर्षों के दौरान, Sobukwe को लगभग हर तरह के मानवीय संपर्क से वंचित रखा गया था। उन्हें केवल अत्यंत आवश्यक होने पर इशारों के माध्यम से ही कारागार कर्मियों से संवाद करने की अनुमति थी, बातचीत की कोई गुंजाइश नहीं थी। वे अन्य कैदियों से भी बात नहीं कर सकते थे। पत्र-व्यवहार और मुलाकातों पर कड़ी पाबंदियाँ थीं। रंगभेद सरकार ने उनका एकांत जितना संभव हो सके उतना घना बना दिया था, और इस कारण उन पर जो मनोवैज्ञानिक बोझ पड़ा, उसने उन्हें उनकी सहनशक्ति की आखिरी हद तक आज़माया। फिर भी जो लोग उन्हें जानते थे और उनसे पत्र-व्यवहार करते थे, उन्होंने एक ऐसे इंसान की तस्वीर खींची जिसने अपनी लंबी यातना के दौरान अपनी गरिमा, बौद्धिक जिज्ञासा और नैतिक स्पष्टता को बनाए रखा। उस दौर में लिखे उनके पत्र एक असाधारण साहसी और गहन व्यक्तित्व को उजागर करते हैं, जिसने अपनी परिस्थितियों को अपनी आत्मसम्मान की भावना को कुंद करने नहीं दिया।

रॉबेन आइलैंड पर कैद किए गए PAC के अन्य सदस्यों में वे लोग भी थे जो 1960 की घटनाओं और उनके बाद के हालात में सीधे तौर पर शामिल रहे थे। PAC के सशस्त्र संगठन, Poqo ने 1960 के दशक की शुरुआत में कई हिंसक हमलों को अंजाम दिया था, और इन हमलों के सिलसिले में दोषी ठहराए गए लोगों ने द्वीप पर लंबी सज़ाएँ काटीं। रॉबेन आइलैंड पर ANC और PAC के कैदियों के बीच संबंध अक्सर तनावपूर्ण रहते थे, जो दोनों संगठनों के बीच नस्ल, रणनीति और मुक्ति संघर्ष में गैर-अफ्रीकी लोगों की भूमिका जैसे सवालों पर मौजूद गहरे वैचारिक मतभेदों को दर्शाता था। ANC, जो अपनी औपचारिक विचारधारा में गैर-नस्लीय थी और जिसमें भारतीय तथा श्वेत सदस्य भी शामिल थे, PAC के अधिक स्पष्ट अफ्रीकावादी रुख से बार-बार टकराती थी। ये तनाव जेल के भीतर बहसों, विवादों और कभी-कभी आमने-सामने की झड़पों के रूप में सामने आते थे।

Nelson Mandela: द्वीप पर अठारह वर्ष

रॉबेन आइलैंड से जुड़ी तमाम कहानियों में से किसी ने भी दुनिया की कल्पना को उस तरह नहीं समेटा जैसा Nelson Rolihlahla Mandela की कहानी ने किया है। 1918 में Transkei में जन्मे, वकालत में प्रशिक्षित और अपनी युवावस्था से ही अपने लोगों की मुक्ति के लिए प्रतिबद्ध, Mandela 1964 में Rivonia Trial के बाद रॉबेन आइलैंड पहुँचने से पहले ही वर्षों से राजनीतिक संघर्ष में सक्रिय थे और दो बार दोषसिद्ध हो चुके थे। उन्होंने 1964 से 1982 तक, अठारह वर्ष इस द्वीप पर बिताए — यह वह दौर था जो लगभग ठीक उनकी राजनीतिक परिपक्वता के सबसे गहन और रचनात्मक वर्षों पर आकर ठहरता है।

B सेक्शन में Mandela की कोठरी पूरे संग्रहालय परिसर में सबसे अधिक देखी जाने वाली, सबसे अधिक फोटो खिंचवाई जाने वाली और सबसे प्रतीकात्मक जगह बन गई है। यह एक छोटा-सा कमरा है — मुश्किल से दो मीटर चौड़ा और ढाई मीटर लंबा — जिसमें ऊँची सलाखों वाली खिड़की, कंक्रीट का फर्श और दीवारें हैं जिन पर अब भी रहने के निशान बाकी हैं। एक तहा हुआ कंबल, खाने का एक बर्तन और कुछ निजी सामान उसी तरह रखे हैं जैसे शायद तब रहे होंगे जब Mandela इस जगह में रहते थे। इसकी सादगी चौंका देती है। यह उस इंसान का रहने का ठिकाना था जो बीसवीं सदी के सबसे सम्मानित व्यक्तियों में से एक बनने वाले थे — यहीं वे सोते थे, सोचते थे, पढ़ते थे, लिखते थे और लगभग दो दशकों तक डटे रहे।

Mandela को अपनी पत्नी Winnie Mandela और परिवार को पत्र लिखने की अनुमति थी, लेकिन इन पत्रों की कड़ी सेंसरशिप होती थी और उनके कारावास के शुरुआती दौर में हर साल बेहद कम पत्र भेजने की इजाज़त थी। पत्र भेजे जाने से पहले कारागार कर्मी हर शब्द पढ़ते थे, और जिन अंशों में राजनीतिक विषय-वस्तु समझी जाती, उन्हें या तो काट दिया जाता या पूरा पत्र ही वापस कर दिया जाता। संवाद पर लगी पाबंदियाँ वर्षों के साथ धीरे-धीरे कुछ ढीली हुईं, लेकिन सेंसरशिप कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई। Mandela के रॉबेन आइलैंड काल के जो पत्र आज भी मौजूद हैं, वे उल्लेखनीय दस्तावेज़ हैं — वे एक ऐसे इंसान को उजागर करते हैं जिसने जेल की कठोर बंदिशों के बीच भी अपने परिवार से रिश्ते बनाए रखने, अपनी पत्नी और बच्चों को सलाह और सांत्वना देने, और अपनी भावनात्मक ज़िंदगी को उस व्यवस्थित कोशिश के बावजूद ज़िंदा रखने की कोशिश की जो जेल उसे खोखला करने के लिए कर रही थी।

इस दौरान Winnie Mandela की अपनी तकलीफें बेहद गहरी थीं। प्रतिबंध आदेशों, सुरक्षा पुलिस की प्रताड़ना और निगरानी, खुद कारावास, और एक राजनीतिक तानाशाही के तहत अकेले अपने बच्चों की परवरिश के असह्य बोझ के बावजूद, वे एक सार्वजनिक हस्ती और प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में अपनी उपस्थिति बनाए रखीं। द्वीप पर उनकी मुलाकातें कम और संक्षिप्त होती थीं, कड़ी निगरानी में होती थीं, और शीशे की स्क्रीन के पार होने वाली बातचीत अंतरंगता पर एक पीड़ादायक बाधा थी। लंबे वियोग का दबाव और रंगभेद सरकार द्वारा जानबूझकर Winnie पर डाले गए दबावों ने अंततः उनके रिश्ते में दरार पैदा करने में योगदान दिया, हालांकि उनके बीच की राजनीतिक साझेदारी कारावास के वर्षों और Mandela की अंततः रिहाई तक कायम रही।

Robben Island पर Mandela के समय का एक सबसे चर्चित पहलू वह बगीचा है जिसे उन्होंने B Section के आंगन में उगाया था। कैदियों को अंततः छोटे सब्जियों के बगीचे उगाने की अनुमति दी गई, और Mandela ने अपनी विशिष्ट उद्देश्यशीलता के साथ इस काम में खुद को झोंक दिया। उन्होंने टमाटर, प्याज, मिर्च और अन्य सब्जियाँ उगाईं, और इस उपज का उपयोग अपर्याप्त जेल के खाने की भरपाई के लिए करते थे। लेकिन यह बगीचा एक व्यावहारिक खाद्य स्रोत से कहीं बढ़कर भी था। Mandela ने बाद में अपनी आत्मकथा में इसके बारे में नेतृत्व के अपने अनुभव के एक रूपक के रूप में लिखा — यह सीख कि एक नेता को अपने संगठन की देखभाल उसी तरह करनी चाहिए जैसे एक माली अपने पौधों की करता है, धैर्य, ध्यान और लगन के साथ। यह बगीचा लगभग पूर्ण असहायता की स्थिति में स्वायत्तता का एक स्थान था, एक छोटा-सा दायरा जहाँ Mandela पहल कर सकते थे और अपने परिश्रम का परिणाम किसी जीवित और विकसित होती चीज़ में देख सकते थे।

अंतर्राष्ट्रीय रेड क्रॉस समिति ने Robben Island पर हालात की निगरानी में एक महत्वपूर्ण, भले ही सीमित, भूमिका निभाई। ICRC के प्रतिनिधि समय-समय पर द्वीप का दौरा करते थे और हालात पर रिपोर्टें तैयार करते थे, और उनके दौरे — भले ही दक्षिण अफ्रीकी सरकार द्वारा लगाई गई महत्वपूर्ण पाबंदियों के तहत होते थे — बाहरी जाँच-परख का एक स्तर बनाते थे जिसने समय के साथ कैदियों के साथ व्यवहार में कुछ सुधार सुनिश्चित करने में मदद की। ICRC की रिपोर्टों में भोजन और कपड़ों में नस्लीय असमानताओं, पढ़ाई और संवाद पर प्रतिबंधों, और अन्य दुर्व्यवहारों का दस्तावेज़ीकरण किया गया, और इन रिपोर्टों ने द्वीप के हालात के बारे में अंतर्राष्ट्रीय जागरूकता बढ़ाने में योगदान दिया। दक्षिण अफ्रीकी सरकार अंतर्राष्ट्रीय राय के प्रति संवेदनशील थी, चाहे वह सार्वजनिक रूप से रंगभेद की आलोचना को विदेशी हस्तक्षेप बताकर खारिज करती हो, और अंतर्राष्ट्रीय निंदा के संचित दबाव का वर्षों में द्वीप के हालात पर कुछ असर ज़रूर पड़ा।

1970 का दशक: कैदियों की एक नई पीढ़ी

1970 के दशक में Robben Island पर राजनीतिक कैदियों की एक नई पीढ़ी आई — ऐसे लोग जो Black Consciousness Movement के दौर में छात्र और कार्यकर्ता रहे थे। जून 1976 का सोवेटो विद्रोह, जिसमें सोवेटो टाउनशिप के स्कूली बच्चों ने शिक्षा के माध्यम के रूप में अफ्रीकान्स की अनिवार्य शुरुआत के खिलाफ उठान की, दक्षिण अफ्रीकी राजनीतिक इतिहास में एक转折 बिंदु साबित हुआ। इस विद्रोह और पुलिस द्वारा इसके क्रूर दमन — जिसमें सड़कों पर बच्चों पर गोलियाँ चलाई गईं — ने प्रतिरोध की एक नई लहर और कार्यकर्ताओं की एक नई पीढ़ी को जन्म दिया, जिनमें से कई अंततः Robben Island पहुँचे।

SASO के नौ सदस्य इस दौर के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक कैदियों में से थे। साउथ अफ्रीकन स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन, यानी SASO, की स्थापना 1968 में Steve Biko और अन्य लोगों ने ब्लैक कॉन्शसनेस के दर्शन को आगे बढ़ाने के लिए की थी। इस विचारधारा का मानना था कि मनोवैज्ञानिक मुक्ति — यानी गोरों द्वारा थोपी गई हीनभावना को नकारना और एक सकारात्मक अश्वेत पहचान को स्थापित करना — राजनीतिक मुक्ति की बुनियादी शर्त है। SASO के सदस्यों को 1976 में एक मुकदमे के बाद दोषी ठहराया गया, जिसे रंगभेद सरकार ने ब्लैक कॉन्शसनेस आंदोलन को कुचलने के लिए इस्तेमाल किया, और उन्हें रॉबेन द्वीप पर लंबी सजाएँ सुनाई गईं।

SASO के इन नौ सदस्यों में Strini Moodley भी थे — एक पत्रकार और कार्यकर्ता, जो नेटाल में ब्लैक कॉन्शसनेस के प्रमुख स्वरों में से एक थे — और Saths Cooper भी, जो एक मनोवैज्ञानिक और छात्र कार्यकर्ता थे और बाद में रंगभेद के बाद के दक्षिण अफ्रीका में एक प्रमुख व्यक्तित्व बने। ये लोग रॉबेन द्वीप पर एक अलग वैचारिक पृष्ठभूमि लेकर आए थे, जो उन ANC के दिग्गजों से भिन्न थी जो एक दशक से वहाँ थे। दो पीढ़ियों और दो राजनीतिक परंपराओं के बीच की इन मुलाकातें कभी-कभी बौद्धिक दृष्टि से उपजाऊ रहीं तो कभी-कभी तनावपूर्ण भी। ब्लैक कॉन्शसनेस बनाम गैर-नस्लवाद की बहस, मुक्ति आंदोलन में भारतीय दक्षिण अफ्रीकियों और अन्य गैर-अश्वेत समूहों की भूमिका पर बहस, और उत्पीड़न की प्रकृति तथा उसके उचित जवाब पर बहस — ये सब खदान में और सामूहिक कोठरियों में भी जारी रहीं।

ऐतिहासिक रिकॉर्ड के लिए यह बताना ज़रूरी है कि Steve Biko को कभी रॉबेन द्वीप पर कैद नहीं किया गया था। ब्लैक कॉन्शसनेस के संस्थापक और इसके सबसे चर्चित प्रतीक Biko को अगस्त 1977 में सुरक्षा पुलिस ने हिरासत में लिया और 12 सितंबर, 1977 को पूछताछ और यातना के दौरान लगी मस्तिष्क की चोटों के कारण हिरासत में ही उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मौत प्रिटोरिया में हुई, जहाँ उन्हें पोर्ट एलिजाबेथ से एक पुलिस वाहन में इतनी बुरी हालत में लाया गया था कि वे बच नहीं सके। Biko की मृत्यु से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीव्र आक्रोश फैला और रंगभेद सरकार के खिलाफ प्रतिबंधों की माँग तेज़ हो गई। लेकिन वे उन लोगों में नहीं थे जिन्होंने रॉबेन द्वीप की खास यातना को सहा, भले ही उनके विचार और उनके आंदोलन की मज़बूत उपस्थिति वहाँ उनसे प्रेरित लोगों के ज़रिए बनी रही।

सोवेटो विद्रोह के दौर और ब्लैक कॉन्शसनेस आंदोलन से आए कैदियों को द्वीप पर न केवल ANC के अनुभवी नेतृत्व से सामना करना पड़ा, बल्कि उन्होंने जेल की ऐसी परिस्थितियाँ भी देखीं जो शुरुआती क्रूर वर्षों से कुछ हद तक बदल चुकी थीं। सबसे अहम बदलाव यह था कि पढ़ाई-लिखाई और बौद्धिक गतिविधियों पर लगी पाबंदियाँ कुछ ढीली हो गई थीं, जिससे रॉबेन द्वीप का अनौपचारिक विश्वविद्यालय 1960 के दशक की तुलना में कुछ अधिक खुलकर चल सकता था। सामूहिक कोठरियाँ, जिनमें युवा कैदी एक-दूसरे के साथ रहते थे और B सेक्शन की एकल कोठरियों में बंद लोगों की तुलना में उनमें आपसी मेलजोल अधिक था, तीव्र राजनीतिक शिक्षा और बहस के केंद्र बन गई थीं।

Mandela का स्थानांतरण और कारावास का अंतिम दौर

अप्रैल 1982 में Nelson Mandela, Walter Sisulu, Raymond Mhlaba, Andrew Mlangeni और Oscar Mpetha को रॉबेन द्वीप से मुख्य भूमि पर केप टाउन के उपनगर टोकाई स्थित पोल्समूर जेल में स्थानांतरित कर दिया गया। यह स्थानांतरण अप्रत्याशित और अस्त-व्यस्त करने वाला था। ये लोग अठारह से बीस साल के बीच द्वीप पर रह चुके थे, और उस जगह की तमाम भयावहता के बावजूद वह एक तरह का घर बन गई थी — या कम से कम एक ऐसी जानी-पहचानी दुनिया, जिसकी अपनी व्यवस्था और अपनी लय थी। पोल्समूर अलग था। कोठरियाँ बड़ी थीं और शारीरिक दृष्टि से परिस्थितियाँ कुछ कम कठोर थीं, लेकिन माहौल दूसरे तरीकों से अधिक प्रतिबंधात्मक था, और रॉबेन द्वीप के सामूहिक जीवन से कटने का दर्द बहुत गहरा महसूस हुआ।

दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने इस स्थानांतरण के कारण सार्वजनिक नहीं किए, लेकिन इतिहासकारों ने इसके पीछे कई संभावित कारण सुझाए हैं। एक कारण यह था कि ANC के वरिष्ठ नेतृत्व को द्वीप पर बंद युवा पीढ़ी के कैदियों से अलग किया जाए, ताकि उस पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली राजनीतिक शिक्षा को बाधित किया जा सके जिसे Robben Island University के नाम से जाना जाता था। एक और कारण यह था कि Mandela को ऐसी जगह रखा जाए जहाँ गुप्त वार्ताएँ — जिन पर रंगभेद सरकार के भीतर कुछ लोग पहले से विचार कर रहे थे — अधिक सहूलियत और कम नज़रों के साथ आयोजित की जा सकें।

Pollsmoor में Mandela ने अपने राजनीतिक जीवन का एक नया अध्याय शुरू किया, जो अंततः वर्षों की गुप्त बातचीत के ज़रिए उन वार्ताओं तक पहुँचा जिन्होंने रंगभेद का अंत किया। 1985 में, राष्ट्रपति P. W. Botha के नेतृत्व में रंगभेद सरकार ने सार्वजनिक रूप से Mandela को रिहा करने का प्रस्ताव रखा, लेकिन इस शर्त पर कि वे सशस्त्र संघर्ष का त्याग करें और शांतिपूर्ण तरीकों के प्रति प्रतिबद्धता जताएँ। Mandela ने इनकार कर दिया और Soweto में एक बड़ी जनसभा में अपनी बेटी Zindzi के माध्यम से एक बयान दिया, जिसमें उन्होंने यह अधिकार जताया कि वे उन लोगों की ओर से यह शर्तें अस्वीकार कर सकते हैं जिनकी आज़ादी छीनी जा चुकी थी। यह इनकार एक राजनीतिक कुशलता का बेजोड़ नमूना था जिसने उनकी नैतिक प्रतिष्ठा को फिर से स्थापित किया और सरकार के प्रस्ताव की बदनीयती को उजागर किया।

दिसंबर 1988 में Mandela को एक बार फिर स्थानांतरित किया गया, इस बार Cape Winelands में Paarl शहर के बाहर स्थित Victor Verster Prison में। वहाँ उनके लिए जेल परिसर के भीतर एक आरामदायक मकान की व्यवस्था की गई थी, जो Robben Island या Pollsmoor — दोनों से बिल्कुल अलग माहौल था। यह बदलाव जानबूझकर किया गया था और इसका खास महत्व था। उस समय तक दक्षिण अफ्रीकी सरकार Mandela के साथ गुप्त वार्ताओं में गहराई से जुड़ी हुई थी, और वरिष्ठ खुफिया अधिकारी Victor Verster के उस मकान में उनसे नियमित रूप से मिल रहे थे। यह आरामदायक आवास कुछ हद तक इस बात की स्वीकृति थी कि उनकी रिहाई संभावित है और उन्हें एक विश्वसनीय वार्ताकार के रूप में सामने आना होगा, और कुछ हद तक 1988 में तपेदिक के निदान के बाद उनके स्वास्थ्य को संभालने का प्रयास भी।

1986 के बाद से जो गुप्त वार्ताएँ शुरू हुईं — पहले खुफिया अधिकारियों के साथ, फिर Kobie Coetsee और बाद में Niel Barnard जैसे सरकारी मंत्रियों के साथ — वे असाधारण थीं। Mandela ने ये वार्ताएँ अकेले कीं, अपने जेल में बंद साथियों की जानकारी या औपचारिक अनुमति के बिना — यह बात उनके कुछ साथियों को खलती थी और जिसे उन्होंने बाद में खुलकर स्वीकार भी किया। लेकिन इन वार्ताओं ने अंततः — फरवरी 1990 में Mandela की रिहाई और ANC पर से प्रतिबंध हटने के बाद — उन औपचारिक वार्ताओं की नींव रखी जिनसे दक्षिण अफ्रीका का लोकतांत्रिक संविधान बना और अप्रैल 1994 में ऐतिहासिक चुनाव हुए।

जेल का बंद होना: 1991 और परिवर्तन की राह

रंगभेद युग के अंतिम वर्षों में Robben Island को एक उच्चतम सुरक्षा वाली राजनीतिक जेल के रूप में धीरे-धीरे बंद किया जाने लगा। फरवरी 1990 में Mandela की रिहाई के बाद ANC और National Party सरकार के बीच वार्ताएँ आगे बढ़ने लगीं, राजनीतिक संगठनों पर से प्रतिबंध हटा, राजनीतिक कैदियों को रिहा किया गया और सशस्त्र संघर्ष निलंबित हुआ — इन सब घटनाओं से दक्षिण अफ्रीका का समूचा राजनीतिक परिदृश्य बदल गया और Robben Island के राजनीतिक जेल के रूप में अस्तित्व का कोई औचित्य नहीं रहा।

अंतिम राजनीतिक कैदियों को 1991 में Robben Island से रिहा किया गया और जेल को औपचारिक रूप से 1996 में बंद कर दिया गया। राजनीतिक जेल के रूप में इसका उपयोग समाप्त होने और इसे आधिकारिक रूप से संग्रहालय व प्रकृति आरक्षित क्षेत्र घोषित किए जाने के बीच के वर्षों में यह द्वीप एक जटिल और कभी-कभी विवादास्पद संक्रमण काल से गुज़रा। इसके भविष्य को लेकर सवाल तुरंत उठने लगे। कुछ लोगों ने इमारतों को ध्वस्त करने की माँग की, यह तर्क देते हुए कि ये उस दमनकारी शासन के स्मारक हैं जिसे दक्षिण अफ्रीका को पीछे छोड़ना है। वहीं दूसरों का तर्क था कि इस द्वीप को एक स्मारक, एक शैक्षिक संसाधन और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक चेतावनी के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए — इस बात की याद दिलाते हुए कि इंसान किस हद तक एक-दूसरे पर अत्याचार करने में सक्षम है।

द्वीप को संरक्षित करने और एक संग्रहालय स्थापित करने का निर्णय सही था, और यह उस व्यापक सोच को दर्शाता था जिसे नए दक्षिण अफ़्रीका ने, Mandela के राष्ट्रपतित्व में, सुलह और स्मृति के प्रति अपनाने की कोशिश की। रॉबेन द्वीप संग्रहालय की औपचारिक स्थापना 1997 में की गई, जिसे शुरुआत में कला, संस्कृति, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा संचालित किया गया, और बाद में इसे अपनी स्वतंत्र शासी संस्था को सौंप दिया गया। द्वीप को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया, और इसे एक संग्रहालय स्थल के रूप में विकसित करने का कार्य गंभीरता से शुरू हुआ।

यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा: 1999

1 दिसंबर, 1999 को संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन ने विश्व धरोहर समिति के तेईसवें सत्र के दौरान रॉबेन द्वीप को औपचारिक रूप से अपनी विश्व धरोहर सूची में शामिल किया। इस दर्जे ने द्वीप के असाधारण सार्वभौमिक महत्व को स्वीकार किया, और इसे एक ऐसे स्थल के रूप में मान्यता दी जो दमन पर मानव आत्मा की विजय और संस्थागत अन्याय पर स्वतंत्रता तथा लोकतंत्र की शक्ति की मुखर गवाही देता है।

यूनेस्को के दर्जे ने अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और ध्यान तो दिलाया ही, साथ ही संसाधन और दायित्व भी लाए। विश्व धरोहर स्थलों की यूनेस्को और अंतरराष्ट्रीय स्मारक एवं स्थल परिषद द्वारा निरंतर निगरानी और मूल्यांकन किया जाता है, जो यह आंकते हैं कि जिस असाधारण सार्वभौमिक मूल्य के लिए स्थल को सूचीबद्ध किया गया था, उसकी पर्याप्त सुरक्षा हो रही है या नहीं। दक्षिण अफ़्रीकी सरकार और रॉबेन द्वीप संग्रहालय को स्थल के प्रबंधन, इमारतों की स्थिति और संरक्षण तथा पर्यटक पहुँच के बीच संतुलन को लेकर इन संस्थाओं की समय-समय पर जाँच-परख का सामना करना पड़ा है।

यूनेस्को के उद्धरण ने रॉबेन द्वीप को मानव आत्मा, स्वतंत्रता और दमन पर लोकतंत्र की जीत के प्रतीक के रूप में वर्णित किया। यह प्रस्तुतीकरण, जो केवल पीड़ा के बजाय विजय पर ज़ोर देता है, सोच-समझकर चुना गया था। यह द्वीप केवल उन लोगों के साथ जो किया गया उसका स्मारक नहीं है जिन्हें वहाँ कैद किया गया था। यह उतना ही उन कैदियों की उपलब्धियों का स्मारक है — जिस तरह से उन्होंने अपनी गरिमा बनाए रखी, अपना सामूहिक बौद्धिक जीवन गढ़ा, अपनी राजनीतिक दृष्टि को जीवित रखा, और टूटकर नहीं बल्कि उस स्वतंत्रता की तलाश में पहले से कहीं अधिक दृढ़ होकर बाहर निकले, जिसके लिए उन्होंने सब कुछ कुर्बान कर दिया था।

संग्रहालय और पूर्व कैदी गाइड

आज जो रॉबेन द्वीप संग्रहालय संचालित होता है, वह एक असाधारण संस्था है जो अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना करती है। पर्यटकों का बुनियादी अनुभव V and A Waterfront से फ़ेरी की सवारी के साथ शुरू होता है — यह यात्रा अपने आप में एक प्रतीकात्मक आयाम रखती है, क्योंकि पर्यटक उसी रास्ते को उलटे क्रम में तय करते हैं जो कैदियों ने द्वीप पर लाए जाने और वहाँ से जाने पर तय किया था। फ़ेरी के पीछे केप टाउन और टेबल माउंटेन का छोटा होता दृश्य और सामने द्वीप का उभरता आकार उस एकाकीपन का कुछ अहसास दिलाता है जो वहाँ बंद लोगों ने महसूस किया होगा — हालाँकि आधुनिक पर्यटक का अनुभव उससे बेशक अतुलनीय रूप से अलग है।

द्वीप पर पहुँचने के बाद पर्यटकों को पहले बस द्वारा मुख्य स्थलों का भ्रमण कराया जाता है — चूने की खदान, द्वितीय विश्व युद्ध की तोप की मोर्चेबंदियाँ, किनारे पर घोंसला बनाते पेंगुइन, वह बस्ती जहाँ कभी जेल कर्मचारी रहते थे, चर्च, कुष्ठरोगियों का कब्रिस्तान — और फिर उन्हें अधिकतम सुरक्षा वाली जेल में ले जाया जाता है। B सेक्शन, जहाँ Mandela और उनके साथियों को रखा गया था, दौरे का केंद्रबिंदु है, और यहीं संग्रहालय अनुभव का सबसे प्रभावशाली और प्रसिद्ध पहलू सामने आता है।

कई वर्षों तक, रॉबेन आइलैंड के जेल भ्रमण उन लोगों द्वारा कराए जाते थे जो स्वयं वहाँ कैदी रह चुके थे। पूर्व राजनीतिक बंदी संग्रहालय गाइड बन गए और अपने काम में एक ऐसा अधिकार और इतिहास के साथ एक ऐसी आत्मीयता लेकर आए, जिसे कोई भी अकादमिक प्रशिक्षण हासिल नहीं कर सकता था। Nelson Mandela की कोठरी में खड़े होकर किसी ऐसे व्यक्ति को सुनना जो अपने निजी अनुभव के आधार पर बता रहा हो कि वहाँ कैद रहना कैसा लगता था — यह अनुभव पारंपरिक संग्रहालय जगत में किसी भी चीज़ से बिल्कुल अलग था। Ahmed Kathrada, Neville Alexander और कई अन्य पूर्व कैदियों ने संग्रहालय के विकास में और कुछ मामलों में पर्यटकों को भ्रमण कराने में भी भाग लिया।

जैसे-जैसे वर्ष बीतते गए और पूर्व कैदियों की पीढ़ी बुज़ुर्ग होती गई, उनमें से कम और कम लोग गाइड के रूप में काम कर पाने में सक्षम रहे, और उनके साथ जो संस्थागत स्मृति जुड़ी हुई है वह धीरे-धीरे ऐसे गाइडों की दूसरी पीढ़ी को सौंपी जा रही है जिन्होंने इस द्वीप को प्रत्यक्ष रूप से नहीं झेला। यह बदलाव एक व्यावहारिक और एक दार्शनिक — दोनों तरह की चुनौती पेश करता है। पूर्व कैदियों की जीवंत गवाही अपरिहार्य थी, और उसका धीरे-धीरे इस परिदृश्य से विदा होना संग्रहालय की पेशकश की प्रकृति में एक अपरिवर्तनीय बदलाव है। संग्रहालय प्रबंधन के सामने यह चुनौती है कि उस गवाही को सुलभ रूपों में — ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग, लिखित विवरण, इंटरैक्टिव प्रदर्शनियों में — संरक्षित किया जाए, और साथ ही नए गाइडों को इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाए कि वे पर्यटकों तक उसके महत्व और गंभीरता को पहुँचा सकें।

प्रतीकात्मक महत्व और रंगभेद-उत्तर दक्षिण अफ्रीका

रंगभेद-उत्तर दक्षिण अफ्रीका की राष्ट्रीय चेतना में रॉबेन आइलैंड का एक अनूठा स्थान है। यह वह स्थल है जो मुक्ति आंदोलन की पीड़ा और उसकी अंतिम विजय से सबसे गहराई से जुड़ा है, और इस नाते यह एक अपार प्रतीकात्मक अर्थ का बोझ वहन करता है। 11 फरवरी 1990 को Victor Verster Prison से Mandela की रिहाई और उसके बाद अप्रैल 1994 में दक्षिण अफ्रीका के पहले लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित राष्ट्रपति के रूप में उनका चुनाव — ये वे घटनाएँ थीं जिन्होंने इस द्वीप के अर्थ को उत्पीड़न के स्थान से स्वतंत्रता के स्मारक में बदल दिया। जो कोठरियाँ लोगों को तोड़ने और अपमानित करने के लिए बनाई गई थीं, वे पीछे मुड़कर देखने पर एक लोकतांत्रिक राष्ट्र की जन्मस्थली बन गईं।

रंगभेद-उत्तर युग में इस द्वीप का उपयोग महत्वपूर्ण सार्वजनिक आयोजनों और प्रतीकात्मक संकेतों की पृष्ठभूमि के रूप में किया गया है। दुनिया भर के राजनीतिक नेताओं ने यहाँ का दौरा किया है, और उनमें से कई Mandela की कोठरी में रुककर वहाँ जो हुआ और उसके अर्थ पर विचार करते रहे हैं। Mandela के साथ — जो दुनिया के सबसे प्रसिद्ध कैदी और मुक्ति के नायक हैं — इस द्वीप का जुड़ाव उसे एक ऐसी गूँज देता है जो दुनिया में कहीं भी बहुत कम ऐतिहासिक स्थलों को नसीब है।

लेकिन दक्षिण अफ्रीका का रंगभेद-उत्तर इतिहास जटिल रहा है और कई मायनों में गहरी निराशा से भरा भी। रंगभेद से लोकतंत्र की ओर संक्रमण एक उल्लेखनीय राजनीतिक उपलब्धि थी, लेकिन इसने उन गहरी असमानताओं और संरचनात्मक अन्यायों को अनसुलझा छोड़ दिया जो रंगभेद ने पैदा किए और जड़ें जमाई थीं। गरीबी, बेरोज़गारी, अपराध, भ्रष्टाचार और अपर्याप्त सार्वजनिक सेवाएँ अधिकांश दक्षिण अफ्रीकियों के लिए विनाशकारी वास्तविकताएँ बनी रहीं। African National Congress — Mandela और रॉबेन आइलैंड के राजनीतिक कैदियों की पार्टी — ने 1994 से दक्षिण अफ्रीका पर शासन किया और पाया कि रंगभेद से मुक्ति का अर्थ स्वतः ही आर्थिक न्याय या प्रभावी शासन नहीं है।

Jacob Zuma का राष्ट्रपति काल, जो 2009 से 2018 तक चला, एक विशेष रूप से नुकसानदेह दौर था। Zuma, जिन्होंने खुद 1963 से शुरू होकर दस साल Robben Island पर बिताए थे, एक ऐसे कार्यकाल की अगुवाई करते रहे जो भ्रष्टाचार, प्रभावशाली कारोबारी हितों द्वारा सरकारी तंत्र पर कब्ज़ा, सार्वजनिक संस्थाओं के पतन और लगातार आर्थिक गिरावट से भरा था। एक पूर्व Robben Island कैदी का ऐसी सरकार की बागडोर संभालना, जो लूट और भ्रष्टाचार के लिए कुख्यात थी — इस विडंबना से दक्षिण अफ़्रीकी अनजान नहीं थे। यह मुक्ति आंदोलन की आकांक्षाओं और रंगभेद के बाद के शासन की कड़वी सच्चाइयों के बीच की खाई का एक दर्दनाक प्रतीक बन गया। Zuma के युग ने ANC और लोकतांत्रिक राज्य की संस्थाओं पर जनता के भरोसे को बुरी तरह तोड़ दिया।

ये राजनीतिक सच्चाइयाँ Robben Island में सहेजी गई स्मृति के साथ एक जटिल तनाव में मौजूद हैं। यह द्वीप एक ऐसे दक्षिण अफ़्रीका का प्रतीक है जो ऊँचे आदर्शों और असाधारण बलिदान से बना था — जहाँ लोगों ने अन्याय से समझौता करने की बजाय कारावास और पीड़ा को चुना। उन लोगों की मदद से बने रंगभेद के बाद के दक्षिण अफ़्रीका ने अक्सर उन आदर्शों पर खरा उतरने में कमी दिखाई, और जो वादे किए गए थे और जो हासिल हुआ उनके बीच की खाई, संघर्ष और उसके परिणामों को झेलने वाले कई लोगों के लिए गहरी पीड़ा और रोष का स्रोत रही है।

फिर भी Robben Island इस बात की याद दिलाता रहता है कि मनुष्य किस हद तक सक्षम है — चाहे वह क्रूरता हो या साहस, गरिमा और दृढ़ता। चूने की खदान के पत्थर, Mandela की कोठरी की छोटी-सी खिड़की, वह कुटीर जहाँ Robert Sobukwe ने लगभग पूरी तरह एकांत में छह साल बिताए, कोढ़ियों के कब्रिस्तान की शिलाएँ — ये सभी अपने भीतर असाधारण परिस्थितियों में जिए गए जीवनों का सघन बोझ समेटे हैं, और ये दुनिया भर से आने वाले आगंतुकों से आज भी आज़ादी की कीमत और प्रतिरोध के अर्थ के बारे में बात करते हैं।

संरक्षण की चुनौतियाँ और विरासत प्रबंधन

Robben Island को एक विरासत स्थल के रूप में संभालना, साथ ही उसके प्राकृतिक पर्यावरण को बचाए रखना और हर साल लाखों पर्यटकों की ज़रूरतें पूरी करना — यह सब मिलकर एक बड़ी चुनौती खड़ी करते हैं। सामान्य समय में द्वीप पर हर साल 400,000 से अधिक पर्यटक आते हैं, और इतनी बड़ी संख्या में आगंतुकों का दबाव इमारतों की भौतिक संरचना, द्वीप की पारिस्थितिक अखंडता और पर्यटकों के अनुभव की गुणवत्ता — तीनों पर काफी भारी पड़ता है।

जेल की इमारतों को, खासकर उच्चतम सुरक्षा वाले हिस्से को, निरंतर रखरखाव और जीर्णोद्धार की ज़रूरत है। ये संरचनाएँ रंगभेद के दौर में जल्दबाज़ी और कम लागत में बनाई गई थीं, ऐसी सामग्री और निर्माण तकनीकों से जो लंबे समय तक टिके रहने के लिए नहीं बनाई गई थीं, और दशकों में ये काफी जर्जर हो चुकी हैं। दक्षिण अफ़्रीकी सरकार और Robben Island Museum को संरक्षण कार्य के लिए पर्याप्त वित्त जुटाने में लगातार कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है, और UNESCO तथा अन्य विरासत संस्थाओं की रिपोर्टें समय-समय पर इन संरचनाओं की हालत को लेकर चिंता जताती रही हैं। पानी का रिसाव, संरचनात्मक दरारें, प्लास्टर का खराब होना और जंग — इन सभी पर ध्यान देना ज़रूरी हो गया है, और संरक्षण की ज़रूरतों और पर्यटकों की पहुँच के बीच संतुलन बैठाना कभी-कभी मुश्किल रहा है।

द्वीप के पारिस्थितिक संरक्षण के लिए भी निरंतर प्रबंधन की आवश्यकता रही है। दशकों में विभिन्न गैर-देशी पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं की आमद ने देशज वनस्पति की बहाली के लिए चुनौतियाँ पैदा की हैं। द्वीप के इतिहास के विभिन्न पहले के कालखंडों में लगाए गए चीड़ के पेड़ आवास और छाया तो देते हैं, लेकिन वे उन स्थानीय फाइनबॉस पौधों से प्रतिस्पर्धा करते हैं जो द्वीप के पर्यावरण के लिए अधिक अनुकूल और पारिस्थितिक दृष्टि से अधिक उपयुक्त हैं। इन परस्पर विरोधी ज़रूरतों — निर्मित विरासत के साथ-साथ प्राकृतिक विरासत — के बीच तालमेल बिठाने के लिए विशेषज्ञता और संसाधन दोनों चाहिए।

अफ्रीकी पेंगुइन की यह बस्ती, जो पर्यटकों को बेहद आकर्षक लगती है और जो द्वीप के सबसे लोकप्रिय आकर्षणों में से एक है, एक संकटग्रस्त आबादी है जिसे अशांति से और शिकार, प्रदूषण तथा जलवायु परिवर्तन के कारण मछलियों के वितरण में होने वाले बदलावों जैसे खतरों से सुरक्षा की ज़रूरत है। घोंसला बनाने वाले पेंगुइनों को कम से कम परेशानी हो, इसके लिए पर्यटक मार्गों का प्रबंधन करना, और साथ ही पर्यटकों को इन जीवों को करीब से देखने और उनसे जुड़ने का मौका देना — यह एक निरंतर चलने वाला संतुलन का खेल है।

फेरी सेवा अपने आप में एक तार्किक चुनौती है। टेबल बे की तीस मिनट की यह यात्रा खुले पानी में होती है और खराब मौसम में यह बेहद उबड़-खाबड़ हो सकती है। फेरी सेवा तेज़ हवाओं और ऊँची लहरों के कारण अक्सर बाधित होती है, खासकर सर्दियों के महीनों में। जब फेरियाँ नहीं चल पातीं, तो जिन पर्यटकों ने दौरे बुक किए होते हैं वे द्वीप तक नहीं पहुँच पाते और द्वीप की आमदनी को नुकसान होता है। पहुँच का यह मौसम पर निर्भर होना रॉबेन द्वीप की भौगोलिक स्थिति की एक अंतर्निहित विशेषता है, जिसे तकनीकी उपायों से पूरी तरह दूर नहीं किया जा सकता, और यह संग्रहालय के संचालन में एक स्थायी अनिश्चित कारक बना रहता है।

रॉबेन द्वीप की कहानी पर किसका नियंत्रण हो — कौन इसे सुनाए, किसकी आवाज़ में, किसके नज़रिए से — यह सवाल संग्रहालय की स्थापना के बाद से ही विवादास्पद रहा है। दक्षिण अफ्रीकी सरकार, रॉबेन आइलैंड म्यूज़ियम की शासी निकाय के ज़रिए, इस संस्था पर सर्वोच्च अधिकार रखती है, लेकिन पूर्व कैदियों और व्यापक मुक्ति आंदोलन समुदाय के इस बारे में पक्के विचार हैं कि इतिहास की व्याख्या और संप्रेषण कैसे होना चाहिए। प्रतिनिधित्व के मुद्दों पर, इस बात पर कि ANC बनाम PAC जैसी विशेष राजनीतिक परंपराओं के इतिहास को समान महत्व दिया जाए या नहीं, और द्वीप के आधिकारिक इतिहास तथा वहाँ कैद रहे लोगों के अधिक जटिल और कभी-कभी परस्पर-विरोधी जीवित अनुभवों के बीच के संबंध को लेकर — विभिन्न बिंदुओं पर तनाव उभरते रहे हैं।

स्थायी विरासत

रंगभेद कारागार के बंद होने के लगभग तीन दशक बाद और यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा मिलने के दो दशक से भी अधिक समय बाद, रॉबेन द्वीप मानव चेतना में एक अनोखा स्थान बनाए हुए है। यह बीसवीं सदी के महान नैतिक संघर्षों में से एक का सबसे शक्तिशाली भौतिक प्रतीक है — एक ऐसे लोगों का संघर्ष जो नस्लीय उत्पीड़न की एक ऐसी व्यवस्था के खिलाफ लड़े जो अपनी महत्वाकांक्षाओं में अद्वितीय रूप से सर्वव्यापी थी, बहुसंख्यकों के अमानवीयकरण में अद्वितीय रूप से स्पष्ट थी, और अंततः इतिहास के न्याय के समक्ष अद्वितीय रूप से बेनकाब हुई।

जो लोग रॉबेन द्वीप पर कैद किए गए — Mandela, Sisulu, Mbeki, Kathrada, Sobukwe, और सैकड़ों अन्य जिनके नाम कम प्रसिद्ध हैं पर जिनकी पीड़ा कम वास्तविक नहीं थी — उन्होंने जेल में अपने आचरण से वह साबित कर दिखाया जिसकी रंगभेद सरकार को न उम्मीद थी, न जिसे वह रोक सकती थी: कि मानवीय आत्मा, यदि उसके पास पर्याप्त कारण और पर्याप्त साथ हो, तो किसी भी शारीरिक कठिनाई या मनोवैज्ञानिक दबाव से नहीं टूट सकती। रॉबेन द्वीप विश्वविद्यालय इस अर्थ में रंगभेद सरकार की सबसे बड़ी विफलता था। लोगों को एक दूरदराज़ के द्वीप पर भुला देने और नष्ट करने के इरादे से भेजकर, सरकार ने उल्टे एक ऐसी भट्टी तैयार कर दी जिसमें बीसवीं सदी के कुछ सबसे असाधारण राजनीतिक विचारक और नेता तराशे गए।

जो बगीचा Mandela ने B सेक्शन के आँगन में उगाया था, चूना पत्थर की खदान में जो चर्चाएँ हुईं, जो पत्र लिखे गए, सेंसर किए गए और कभी-कभी दोबारा लिखे गए, हर बाधा के बावजूद जो डिग्रियाँ हासिल की गईं, दशकों की कैद के दौरान जो राजनीतिक बहसें जारी रहीं — ये सब रॉबेन द्वीप के इतिहास का उतना ही हिस्सा हैं जितने कि कारागार की क्रूर परिस्थितियाँ और कैद की अन्यायपूर्णता।

आज, यह द्वीप — जो कभी निर्वासन और यातना की जगह हुआ करता था — टेबल बे में मानवीय जीवट, विचारों की शक्ति और विषम से विषम परिस्थितियों में भी स्वतंत्रता की संभावना के एक स्मारक के रूप में खड़ा है। पेंगुइन अपने घोंसले इसके किनारों पर बनाते हैं, मानवीय राजनीति से उतने ही बेपरवाह जितने पहले थे। दूसरे विश्व युद्ध की विशाल तोपें उस समुद्र की ओर चुपचाप मुँह किए खड़ी हैं जिसे उन्हें दागने की कभी ज़रूरत नहीं पड़ी। चूने का वह खदान अब शांत पड़ा है, बी सेक्शन की पत्थर की दीवारें केप की कड़ी रोशनी में आज भी खड़ी हैं, और वी एंड ए वॉटरफ्रंट से आने वाली फेरी दुनिया के कोने-कोने से आए सैलानियों को उस छोटी-सी कोठरी के सामने ला खड़ा करती है, जहाँ एक असाधारण इंसान ने अपनी ज़िंदगी के अठारह साल बिताए और वहाँ से बाहर निकला — अपने देश को आज़ादी की राह दिखाने के लिए तैयार।

रॉबेन आइलैंड एक चेतावनी है, एक स्मृति है और एक वादा भी। यह चेताता है कि संगठित क्रूरता की क्षमता मानव समाजों में सदा मौजूद रहती है और इसका सक्रिय रूप से प्रतिरोध किया जाना चाहिए। यह उन लोगों की याद दिलाता है जिन्होंने उस क्रूरता का बोझ उठाया और उसे अपनी पहचान नहीं बनने दिया। और यह उन लोगों से वादा करता है जो इसमें विश्वास रखने को तैयार हैं — कि उत्पीड़न की कोई भी व्यवस्था, चाहे वह कितनी भी शक्तिशाली हो, कितनी भी सुव्यवस्थित हो, कितनी भी गहराई से समाज के ताने-बाने में बुनी हुई हो, स्थायी नहीं होती। रॉबेन आइलैंड के कैदियों ने सबसे कठिन तरीके से यह साबित किया कि आज़ादी के लिए लड़ना हमेशा सार्थक है, कि जो लोग समर्पण करने से इनकार कर दें उनसे उनकी गरिमा आखिरकार छीनी नहीं जा सकती, और कि सबसे एकाकी और भूले-बिसरे इंसान भी — अगर वे अपना मकसद और एकजुटता बनाए रखें — दुनिया बदल सकते हैं।

फेरी की यात्रा और आज का पर्यटक अनुभव

रॉबेन आइलैंड की यात्रा नेल्सन मंडेला गेटवे से शुरू होती है — यह केप टाउन के वी एंड ए वॉटरफ्रंट पर स्थित एक संग्रहालय और टिकट केंद्र है, जिसका नाम खुद इस द्वीप के सबसे मशहूर कैदी के नाम पर रखा गया है। यह इमारत यात्रा की तैयारी और संदर्भ प्रदान करने का काम करती है — यहाँ द्वीप के इतिहास और रंगभेद के विरुद्ध संघर्ष पर आधारित प्रदर्शनियाँ लगी हैं, ताकि सैलानी जब द्वीप पर पहुँचें तो उन्हें कुछ अंदाज़ा हो कि वे क्या देखने वाले हैं। टेबल बे को पार करने में फेरी को दोनों तरफ से लगभग तीस-तीस मिनट लगते हैं, और समुद्री सफर — समुद्री यात्रा के मानकों से भले ही साधारण हो — इस अनुभव का एक अहम हिस्सा है।

फेरी के डेक पर खड़े होकर, जब केप टाउन पीछे छूटता जाता है और द्वीप सामने आता दिखता है, तो उस पार करने का कुछ-कुछ एहसास होता है जो कैद में बंद उन लोगों को होता होगा जब वे यही रास्ता तय करते थे। टेबल माउंटेन की हरी ढलानें — उसकी सपाट चोटी और उस पर अक्सर उमड़ने वाले बादल, जिन्हें केपटाउनवासी "टेबलक्लॉथ" कहते हैं — शहर की क्षितिज रेखा के ऊपर दिखाई देती हैं। टेबल बे का ठंडा और अक्सर उफनता पानी मुख्य भूमि और द्वीप के बीच फैला है। यह दूरी इतनी कम है कि मुख्य भूमि हमेशा दिखती रहती है — और यही बात इस एकांत को और भी तीखा बना देती है। रॉबेन आइलैंड पर कैद लोग साफ दिनों में उस शहर को देख सकते थे जहाँ से उन्हें हटाया गया था, उन पहाड़ों को जिन पर वे नहीं चढ़ सकते थे, उन गलियों को जहाँ उनके परिवार रंगभेद की मार झेलते हुए जी रहे थे। जो चीज़ उनसे छीनी गई थी वह दिखती रहती थी — और यही दृश्यता उस छिनने को और अधिक असहनीय बना देती थी।

आधुनिक सैलानियों को एक व्यापक भ्रमण पर ले जाया जाता है जो आम तौर पर फेरी यात्राओं सहित कुल तीन से चार घंटे का होता है। द्वीप का बस-भ्रमण मुख्य बाहरी स्थलों को कवर करता है: वह खदान जहाँ कैदियों से जबरन मजदूरी कराई जाती थी, बंगलों का वह गाँव जहाँ पहरेदार और उनके परिवार रहते थे (जो अपनी घरेलू बनावट में इतना सामान्य दिखता है कि जेल से इसका विरोधाभास देखकर धक्का लगता है), दूसरे विश्व युद्ध की तोप-बैटरियाँ, लाइटहाउस, और वह तटरेखा जहाँ पेंगुइनों को देखा जा सकता है। बस-भ्रमण के साथ एक गाइड होता है जो ऐतिहासिक विवरण देता है और जो बेहतरीन स्थितियों में इस इतिहास से अपनी व्यक्तिगत जानकारी और भावनात्मक जुड़ाव भी साझा करता है।

अधिकतम सुरक्षा वाली जेल, जिसमें B सेक्शन की कोठरियाँ हैं, वह पुराना जेल खंड है जहाँ अधिकांश आगंतुक इस अनुभव को सबसे गहराई से महसूस करते हैं। कोठरियाँ एक केंद्रीय आँगन के चारों ओर खुलती हैं, और उनमें से गुज़रना मानो आकार — या यूँ कहें, उसकी अनुपस्थिति — से सामना करने का एक अभ्यास है। ये कमरे इंसानों को बंद रखने के लिए बनाए गए थे, और ये अकल्पनीय रूप से छोटे हैं। Mandela की कोठरी, B सेक्शन की कोठरी नंबर 5, जेल में सबसे अधिक देखा जाने वाला कमरा बन चुकी है, और आगंतुक खुले दरवाज़े के पास भीड़ लगाकर भीतर की सावधानी से सजाई गई जगह को देखते हैं। कई लोग लंबे वक्त तक चुपचाप खड़े रहते हैं, यह समझने की कोशिश करते हुए कि उस जगह में अठारह साल बिताने का क्या मतलब होता होगा।

राजनीतिक कैदियों के विपरीत साधारण अपराधियों को जहाँ रखा जाता था, वह जेल खंड भी इस दौरे का हिस्सा है, और राजनीतिक जेल खंड के साथ-साथ उसे देखने से आगंतुकों को रंगभेद की कारागार व्यवस्था के विस्तार और संगठन को समझने में मदद मिलती है। जेल के रूप में अपने चरम पर इस द्वीप में सैकड़ों कैदी रहते थे — राजनीतिक और आपराधिक दोनों — और इसे चलाने के लिए पहरेदारों, प्रशासकों, रसोइयों, चिकित्साकर्मियों और कारीगरों का एक बड़ा दल चाहिए था, जो अपने परिवारों के साथ द्वीप पर बसे गाँव में रहते थे। उस गाँव का सामान्य घरेलू जीवन — चर्च, स्कूल, खेल-सुविधाएँ — जेल की असाधारण क्रूरता के बिल्कुल करीब था, और ये दोनों दुनियाएँ एक नैतिक विभाजन में साथ-साथ टिकी हुई थीं, जो खुद इस बात को उजागर करती है कि संगठित अन्याय की व्यवस्थाएँ अपने आप को कैसे बनाए रखती हैं।

पत्र और गवाहियाँ: भीतर से उठती आवाज़ें

रॉबेन आइलैंड से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में सबसे प्रभावशाली हैं वहाँ कैद रहे लोगों के पत्र और लिखित गवाहियाँ। निरंतर निगरानी और सेंसरशिप की परिस्थितियों में तैयार किए गए ये दस्तावेज़ उल्लेखनीय हैं — इसलिए भी कि वे कैदियों के अंतर्मन के बारे में क्या उजागर करते हैं, और इसलिए भी कि वे क्या छुपाते हैं — वे हिस्से जिन्हें सेंसरों ने काट दिया या नामंज़ूर कर दिया, और वह आत्म-सेंसरशिप जो कैदी खुद पर लगाते थे, यह जानते हुए कि उनके हर लफ्ज़ को पाने वाले तक पहुँचने से पहले दुश्मन की नज़रें पढ़ेंगी।

Winnie को, अपने बच्चों को, साथियों और दोस्तों को लिखे Mandela के पत्र बड़े पैमाने पर प्रकाशित और अध्ययन किए जा चुके हैं। वे एक ऐसे इंसान को सामने लाते हैं जो असाधारण अनुशासन के साथ अपने रिश्तों, अपनी बौद्धिक जिज्ञासा और अपने भावनात्मक संतुलन को उन परिस्थितियों में बनाए रखने की कोशिश कर रहा था, जो इन तीनों को तोड़ने के लिए बनाई गई थीं। इन पत्रों की भाषा औपचारिक है — Mandela हमेशा से औपचारिक लेखक थे — लेकिन इनमें भीतर से भावनाओं की चमक झलकती है: तड़प के भाव, उन बच्चों के लिए पिता की नसीहतें जो उनके बिना बड़े हो रहे थे, उस पत्नी के लिए प्रेम की अभिव्यक्तियाँ जिनसे मिलना उन्हें मना था। इन्हें पढ़ते हुए कोई एक साथ महसूस करता है कि कितना कुछ कहा जा रहा है और कितना कुछ, मजबूरी में, अनकहा छोड़ा जा रहा है।

Ahmed Kathrada, जिन्होंने रॉबेन आइलैंड के वर्षों सहित कुल छब्बीस साल जेल में बिताए, एक और विपुल पत्र-लेखक और सुव्यवस्थित रिकॉर्ड रखने वाले थे। उनके पत्र और संस्मरण द्वीप पर रोज़मर्रा की ज़िंदगी की एक जीवंत तस्वीर पेश करते हैं — छोटी-छोटी जीतें और अपमान, कैदियों के बीच बदलती सामाजिक गतिशीलता, पढ़ाई की सुविधाओं, अखबारों और खाने को लेकर जेल अधिकारियों से लड़ी गई लड़ाइयाँ, और वह बौद्धिक जीवन जिसने लंबी कैद के दौरान कैदियों को टिकाए रखा। Kathrada ने जेल जीवन के आपसी पहलुओं के बारे में भी विस्तार से लिखा — वहाँ बनी दोस्तियाँ, सँभाले गए तनाव, और उन लोगों के बीच दिया-लिया गया भावनात्मक सहारा जो अपने परिवारों और अपनी दुनिया से कट गए थे।

जिन कैदियों ने अपनी रिहाई के बाद अपने अनुभवों के बारे में बात की और लिखा है, उनकी गवाहियाँ रॉबेन आइलैंड पर हुई घटनाओं के प्रत्यक्ष ऐतिहासिक साक्ष्य का एक अमूल्य संग्रह हैं। रॉबेन आइलैंड संग्रहालय ने इन गवाहियों को व्यवस्थित रूप से दर्ज करने का काम किया है, यह समझते हुए कि पूर्व कैदियों की पीढ़ी उम्रदराज होती जा रही है और उनकी प्रत्यक्ष गवाही हमेशा उपलब्ध नहीं रहेगी। मौखिक इतिहास परियोजनाओं, फ़िल्मी वृत्तचित्रों, प्रकाशित संस्मरणों और शैक्षणिक शोध परियोजनाओं ने सब मिलकर इस संग्रह को समृद्ध किया है, और यह संग्रहालय के विरासत कार्य के सबसे महत्त्वपूर्ण घटकों में से एक है।

वैश्विक स्मृति में रॉबेन आइलैंड

रॉबेन आइलैंड ने वैश्विक स्तर पर जो पहचान हासिल की है, वह इसके जैसे आकार और अज्ञातता वाली कुछ ही जगहों को नसीब हुई है। यह पहचान सबसे बढ़कर Nelson Mandela से इसके जुड़ाव की वजह से है, जो 1990 में अपनी रिहाई और 1994 में अपने चुनाव के बाद दुनिया के सबसे प्रशंसित और प्रिय सार्वजनिक व्यक्तित्वों में से एक बन गए। Mandela के असाधारण व्यक्तिगत गुणों — उनकी गरिमा, कड़वाहट का अभाव, बदले की बजाय सुलह पर उनका ज़ोर, और उनका अद्भुत नैतिक अधिकार — ने उन्हें एक वैश्विक प्रतीक में बदल दिया, और रॉबेन आइलैंड, जहाँ उन्होंने अपनी लंबी कैद काटी, एक वैश्विक तीर्थस्थल बन गया।

दुनिया के हर देश के राष्ट्राध्यक्षों, राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों, राजाओं-महाराजाओं और सार्वजनिक हस्तियों ने इस द्वीप का दौरा किया है। Barack Obama 2013 में दक्षिण अफ्रीका की यात्रा के दौरान अपने परिवार के साथ यहाँ आए, Mandela की कोठरी में रुके और स्पष्ट रूप से भावुक होकर बाहर निकले। इस द्वीप पर अनगिनत किताबें, वृत्तचित्र, फ़िल्में और शैक्षणिक अध्ययन हो चुके हैं, और दुनियाभर के राजनीतिक भाषणों में इसे दृढ़ता और नैतिक स्पष्टता के ज़रिए स्वतंत्रता हासिल करने की संभावना के प्रतीक के रूप में उद्धृत किया जाता रहा है।

इस वैश्विक ख्याति ने फायदे और पेचीदगियाँ दोनों लाई हैं। अंतरराष्ट्रीय पर्यटन से मिलने वाले वित्तीय संसाधनों ने संग्रहालय के संचालन को बनाए रखने में मदद की है। वैश्विक ध्यान ने यह सुनिश्चित किया है कि रंगभेद और उसके पीड़ितों का इतिहास दक्षिण अफ्रीका की सीमाओं से बहुत आगे तक जाना जाए। लेकिन खासतौर पर Mandela पर और ANC के नेतृत्व के अनुभव पर ध्यान का केंद्रित होना कभी-कभी रॉबेन आइलैंड के इतिहास की अधिक संतुलित और जटिल समझ की कीमत पर रहा है। PAC के कैदियों, ब्लैक कॉन्शसनेस आंदोलन के कार्यकर्ताओं, और उन सैकड़ों कम-प्रसिद्ध राजनीतिक बंदियों के अनुभव — जिन्होंने द्वीप पर वर्षों गुज़ारे, बिना किसी के उन पर किताबें लिखे — लोकप्रिय आख्यान में कम दिखाई दिए हैं, और द्वीप के इतिहास की पूरी व्यापकता को सम्मान देने की चुनौती संग्रहालय और उसके क्यूरेटरों के लिए आज भी एक ज़िंदा सवाल बनी हुई है।

रॉबेन आइलैंड के इतिहास का अंतरराष्ट्रीय पहलू उस वैश्विक अभियान को भी समेटे हुए है जिसने अंततः दक्षिण अफ्रीका के राजनीतिक रूपांतरण में मदद की। प्रतिबंधों के लिए, दक्षिण अफ्रीकी कंपनियों से निवेश वापस लेने के लिए, सांस्कृतिक और खेल बहिष्कार के लिए, और सबसे बढ़कर Nelson Mandela और अन्य राजनीतिक कैदियों की रिहाई के लिए चलाए गए अभियान 1970 और 1980 के दशकों में दुनियाभर के शहरों और संसदों में लड़े गए। टेबल बे में अपने द्वीप पर दुनिया से अलग-थलग रॉबेन आइलैंड के कैदी, दूसरे अर्थ में एक वैश्विक एकजुटता आंदोलन से जुड़े हुए थे जिसने अंततः उनकी रिहाई को संभव बनाने में योगदान दिया। फ्री मंडेला अभियान, जिसने 1980 के दशक में गति पकड़ी और 1988 में लंदन के Wembley Stadium में एक कॉन्सर्ट से असाधारण बढ़ावा मिला — जिसे दुनियाभर में करोड़ों लोगों ने देखा — ने वे राजनीतिक परिस्थितियाँ बनाने में मदद की जिनके तहत रंगभेद सरकार के लिए Mandela की कैद बनाए रखना उत्तरोत्तर कठिन होता गया।

वास्तुकला और भौतिक स्थान

रॉबेन द्वीप का निर्मित परिवेश एक पैलिम्पसेस्ट है — एक ऐसा ग्रंथ जिसे एक के बाद एक आने वाले अधिभोगियों ने बार-बार लिखा, और हर एक ने द्वीप की भौतिक संरचना पर अपनी छाप छोड़ी। शुरुआती यूरोपीय इमारतें तो कब की मिट चुकी हैं, लेकिन द्वीप के इतिहास के हर प्रमुख दौर ने इमारतें, मिट्टी के काम, या अन्य भौतिक निशान छोड़े हैं, जिन्हें देखने की समझ रखने वाले पढ़ सकते हैं।

कुष्ठरोगी बस्ती ने द्वीप पर एक कब्रिस्तान छोड़ा है, जहाँ उन मरीज़ों को दफनाया गया जिनकी मृत्यु इस बस्ती के अस्सी से अधिक वर्षों के अस्तित्व के दौरान हुई। कब्रें औपनिवेशिक युग की नस्लीय भेदभाव की नीतियों को दर्शाती हैं — विभिन्न नस्लीय समूहों के लिए अलग-अलग खंड बने हुए हैं — और जहाँ शिलालेख बचे हैं, वे उन लोगों की पहचान और उत्पत्ति के बारे में कुछ बयान करते हैं जो अपने घरों से दूर इस द्वीप पर मारे गए। यह कब्रिस्तान द्वीप के सबसे मार्मिक स्थलों में से एक है — एक याद दिलाने वाला कि रॉबेन द्वीप में निर्वासन और कैद का इतिहास रंगभेद की जेल से बहुत पहले का है, और इसने अनेक ऐसी जानें लीं जिन्हें इतिहास ने काफी हद तक भुला दिया है।

द्वितीय विश्व युद्ध की सैन्य संरचनाएँ अपनी इंजीनियरिंग में पर्याप्त ठोस और प्रभावशाली हैं। तटीय तोपखाने की मोर्चेबंदियाँ विशाल कंक्रीट की संरचनाएँ हैं, जो भारी कैलिबर की तोपें रखने और भारी मार झेलने के लिए बनाई गई थीं। भूमिगत सुरंगें और संचार सुविधाएँ इन मोर्चेबंदियों को एक रक्षात्मक नेटवर्क से जोड़ती थीं, जो अपने समय में एक गंभीर सैन्य प्रतिष्ठान था। आज इन संरचनाओं से गुज़रते हुए, आगंतुक द्वीप की सुरक्षा में किए गए निवेश के पैमाने और उस हद को दोनों समझ सकते हैं, जिस हद तक माना गया खतरा — केप टाउन पर धुरी शक्तियों का नौसैनिक हमला — आखिरकार कभी सामने नहीं आया।

रंगभेद युग की जेल की इमारतें द्वीप पर सर्वाधिक देखी जाने वाली और सबसे प्रतीकात्मक रूप से भरी-पूरी संरचनाएँ हैं। वास्तुकला की दृष्टि से ये बेहद साधारण हैं — व्यावहारिक, सस्ती, और नियंत्रण के मकसद से बनाई गई, किसी और उद्देश्य के लिए नहीं। दीवारें मोटी हैं, कोठरियाँ छोटी हैं, खिड़कियाँ ऊँची और सींखचों से बंद हैं, और आंगनों पर पहरेदारी मीनारों का पहरा है। डिज़ाइन की हर बात भीतर बंद लोगों के दमन की ओर उन्मुख है। और फिर भी ये बदसूरत, उपयोगितावादी इमारतें, उनके भीतर रचे गए इतिहास के कारण, दुनिया की सबसे महत्त्वपूर्ण संरचनाओं में शुमार हो गई हैं।

इन इमारतों का संरक्षण अपने साथ खास चुनौतियाँ लेकर आता है। इन्हें टिकाऊपन के इरादे से नहीं बनाया गया था, और जेल बंद होने के बाद के दशक इन पर भारी पड़े हैं। जेल की इमारतों को स्थिर करने, पुनर्स्थापित करने और बनाए रखने का चल रहा काम महँगा और तकनीकी रूप से माँग करने वाला है, और इसे विरासत संरक्षण की ज़रूरतों तथा बड़ी संख्या में आगंतुकों को सुरक्षित रूप से समायोजित करने की व्यावहारिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाना होता है। रॉबेन आइलैंड म्यूज़ियम ने इस कार्य के लिए अंतरराष्ट्रीय तकनीकी सहायता और धन की माँग की है, और विभिन्न परियोजनाओं ने अलग-अलग बिंदुओं पर विशेष संरक्षण चुनौतियों का समाधान किया है।

निष्कर्ष: युगों के लिए एक द्वीप

रॉबेन द्वीप को किसी एक कहानी, एक महत्त्व, या एक भावना तक सीमित नहीं किया जा सकता। यह असाधारण जटिलता का स्थान है, जहाँ औपनिवेशिक और नस्लीय वर्चस्व की सबसे बुरी प्रवृत्तियाँ लगभग चार शताब्दियों तक चलती रहीं, और जहाँ मानवीय प्रतिरोध, एकजुटता और सृजनशीलता की सबसे अच्छी प्रवृत्तियों ने भी अपनी अभिव्यक्ति पाई। यह एक साथ महान सौंदर्य का स्थान है — चट्टानों पर पेंगुइन, लहरों में सील, और नीले आसमान के सामने तैरता केप टाउन के ऊपर का पहाड़ — और ऐतिहासिक भार का वह स्थान भी, जो अपने भीतर की हर चीज़ पर दबाव डालता है।

वे पुरुष और महिलाएँ जिनकी ज़िंदगियाँ रॉबेन द्वीप से जुड़ीं — सत्रहवीं सदी के निर्वासित मलय रईस, उन्नीसवीं सदी के कुष्ठ रोगी, बीसवीं सदी के राजनीतिक कैदी — इन सभी में एक बात समान थी: राज्य की शक्ति ने इन्हें उनकी दुनिया से उखाड़ कर अफ्रीका के दक्षिणी छोर पर एक ठंडी खाड़ी में स्थित एक छोटे, बेआड़ द्वीप पर डाल दिया था। समुद्र भी उनका उतना ही जेलर था जितना कोई इंसानी पहरेदार, और अपनी जानी-पहचानी दुनिया से यह दूरी अपने आप में ही एक सज़ा थी।

इतिहास में कैद और पीड़ा के अनेक स्थलों से रॉबेन द्वीप को जो बात अलग करती है, वह है — रंगभेद के दशकों में वहाँ जो हुआ: एक जेल का विश्वविद्यालय में रूपांतरण, उन परिस्थितियों में भी राजनीतिक उद्देश्य को जीवित रखना जो उसे बुझाने के लिए बनाई गई थीं, और लंबी कैद से उन लोगों का उभरना जो बाद में एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के संस्थापक बने। यह रूपांतरण अपने आप या आसानी से नहीं हुआ। यह उन व्यक्तिगत चुनावों का परिणाम था जो अलग-अलग इंसानों ने कल्पनातीत कठिन हालात में किए। निराश होने की जगह पढ़ाई करने का चुनाव, सिर्फ सहते रहने की जगह बहस करने का चुनाव, दीवार को ताकते रहने की जगह बगीचा उगाने का चुनाव, यह जानते हुए भी कि सेंसर होंगी — फिर भी पत्र लिखने का चुनाव — ये सब इरादे और गरिमा के कार्य थे जो वर्षों और दशकों में संचित होते रहे और आखिरकार कुछ ऐसा बन गए जिसने दुनिया बदल दी।

इतिहास का सबसे बड़ा शिक्षक और सबसे बड़ा जेलर समय है। समय ने अंततः रंगभेद की उस जेल को बंद कर दिया, उसके वास्तुकारों को वह अपराधी साबित कर दिखाया जो वे थे, और उन कैदियों को सही ठहराया जिन्होंने न्याय की अपनी भावना से समझौता करने से इनकार कर दिया था। समय ने Table Bay के उस द्वीप को कुछ ऐसा बना दिया जिसकी उसके वास्तुकारों ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी: एक स्मारक — उनकी सत्ता का नहीं, बल्कि उसकी हार का। उस खदान की चूना-पत्थर की धूल, जहाँ आँखें खराब हुईं और कमरें टूटीं, अब एक UNESCO विश्व धरोहर स्थल पर बैठती है, और जिन लोगों ने वहाँ मज़दूरी की वे नायकों के रूप में याद किए जाते हैं, जबकि जिन्होंने उन्हें कैद किया वे — अगर याद किए भी जाते हैं तो — शर्म के साथ याद किए जाते हैं।

रॉबेन द्वीप आज भी कायम है। फेरियाँ अभी भी Table Bay पार करती हैं, पेंग्विन अभी भी पथरीले किनारे पर घोंसला बनाते हैं, और Mandela की कोठरी अभी भी वैसे ही खड़ी है — उसकी एकमात्र सलाखों वाली खिड़की आसमान की ओर खुलती है। जिस द्वीप का मकसद लोगों को इतिहास से मिटाना था, उसने उल्टे उन्हें इतिहास के लिए संरक्षित कर दिया, और उनकी कहानी आज भी वर्षों के पार हर उस इंसान से बात करती है जो वह समुद्री सफर तय करने और सुनने की तैयारी रखता है।

स्रोत

https://www.countryreports.org https://sahistory.org.za/article/robben-island https://whc.unesco.org/en/list/916/ https://www.robben-island.org.za/banishment-1939-now-3/ https://sahistory.org.za/people/robert-sobukwe https://islamicfocus.co.za/sheikhs-of-robben-island/