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युगों के माध्यम से कला का इतिहास

युगों के माध्यम से कला का इतिहास

युगों-युगों से कला का संपूर्ण इतिहास — प्रागैतिहासिक गुफा चित्रों से लेकर आधुनिक और समकालीन कला तक

गति

परिचय

कला मानवीय आत्मा की सबसे स्थायी अभिव्यक्तियों में से एक है। जब किसी प्राचीन पूर्वज ने पहली बार किसी गुफा की दीवार पर अपना हाथ रखा और उँगलियों के चारों ओर गेरू का रंग फूँककर एक ऐसी आकृति बनाई जो चालीस हज़ार साल बाद भी बची हुई है — उसी क्षण से मानवजाति ने यह साबित कर दिया कि उसके भीतर चिह्नित करने, चित्रित करने, सुंदर बनाने और संवाद करने की एक अदम्य इच्छाशक्ति है। सबसे व्यापक अर्थ में, कला का इतिहास सभ्यता का ही इतिहास है — यह एक ऐसा अभिलेख है जो बताता है कि हर महाद्वीप और हर युग के विभिन्न लोगों ने अपनी दुनिया को किस तरह समझा, अपने देवताओं को किस तरह सम्मान दिया, अपने शासकों की किस तरह प्रशंसा की, अपने मृतकों का किस तरह शोक मनाया, और दृश्य क्षितिज से परे के भविष्य की किस तरह कल्पना की।

युगों-युगों में कला के संपूर्ण इतिहास का अनुसरण करना एक असाधारण विस्तार और जटिलता की यात्रा है। इसमें फ्रांस की लास्को गुफाओं में दीपक की रोशनी में चारकोल से बने बाइसन, मिस्र के रेगिस्तान पर दृष्टि टिकाए विशाल चूना-पत्थर के स्फिंक्स, शास्त्रीय एथेंस की संगमरमरी पूर्णता, बीजान्टिन चर्चों में दमकती सोने की मोज़ेक, इतालवी पुनर्जागरण के क्रांतिकारी कैनवास, Rembrandt के चित्रों की मनोवैज्ञानिक तीव्रता, क्यूबिज़्म की खंडित ज्यामिति और समकालीन डिजिटल युग की चकित कर देने वाली विविधता — सब कुछ शामिल है। प्रत्येक आंदोलन उन आंदोलनों से उभरा जो उससे पहले आए थे, और सामाजिक शक्तियों, तकनीकी परिवर्तनों, धार्मिक रूपांतरणों तथा नवीनता और अर्थ की मानवीय भूख के प्रति प्रतिक्रिया करते हुए विकसित हुए।

कला इतिहास का यह व्यापक सर्वेक्षण पाषाण युग से लेकर इक्कीसवीं सदी तक दृश्य कला की प्रमुख परंपराओं को समेटता है। यह चित्रकला, मूर्तिकला, स्थापत्य कला, मुद्रण कला, फ़ोटोग्राफी और नए माध्यमों की जाँच करता है तथा महान आंदोलनों और उन्हें परिभाषित करने वाले व्यक्तिगत कलाकारों का अनुसरण करता है। यह केवल पश्चिमी कला की धारा ही नहीं, बल्कि इस्लामी, पूर्व एशियाई, अफ्रीकी और कोलंबस-पूर्व कला की भव्य परंपराओं पर भी विचार करता है — यह स्वीकार करते हुए कि रचनात्मक प्रतिभा विश्व के हर कोने में पुष्पित हुई है। प्राचीन मेसोपोटामिया की कला फ्लोरेंस के पुनर्जागरण की कला के साथ खड़ी है; फ़ारस की इस्लामी लघु-चित्रकला जापान की परिदृश्य मुद्रण कला के साथ; और दक्षिणी अफ्रीका की शैल कला दक्षिण-पश्चिमी फ्रांस की गुफा चित्रकला के साथ।

कलात्मक शैलियों का विकास कभी भी एकरेखीय क्रम में नहीं होता। आंदोलन एक-दूसरे से मिलते हैं, एक-दूसरे के विरुद्ध प्रतिक्रिया करते हैं और पुरानी परंपराओं को पुनर्जीवित करते हैं। नव-शास्त्रीयवादी प्राचीन ग्रीस और रोम की ओर देख रहे थे, जबकि स्वच्छंदतावादी व्यक्तिपरक भावनात्मक क्षेत्र में आगे बढ़ रहे थे। प्रभाववादियों ने शैक्षणिक परंपरा को तोड़ा, लेकिन यही प्रभाववाद उत्तर-प्रभाववादियों को अपर्याप्त लगा। हर युग अपनी चिंताओं और आकांक्षाओं के चश्मे से अतीत की पुनर्व्याख्या करता है। इस गतिशील अंतःक्रिया को समझना कला इतिहास से किसी भी गंभीर संवाद के लिए अनिवार्य है।

यह लेख कलाकृतियों को उनके सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भों में रखता है, क्योंकि कोई भी चित्र या मूर्ति शून्य में नहीं बनती। गॉथिक काल की वेदी-चित्रकारी मध्यकालीन चर्च की धर्मशास्त्र को प्रतिबिंबित करती है। बारोक युग के भव्य कैनवास निरंकुश राजाओं और प्रति-सुधार के पोप के प्रचार की आवश्यकताओं को पूरा करते थे। प्रभाववादियों ने आधुनिक पेरिसी जीवन को चित्रित किया क्योंकि वे एक ऐसे शहर में रहते थे जिसे औद्योगीकरण और नगर-नियोजन रूपांतरित कर रहे थे। समकालीन डिजिटल कलाकार निगरानी, पहचान और सूचना के अभौतिकीकरण से जूझते हैं क्योंकि ये इक्कीसवीं सदी के निर्धारक अनुभव हैं।

चाहे कोई पहली बार कला इतिहास से परिचित हो रहा विद्यार्थी हो, महान संग्रहालयों में मिलने वाली उत्कृष्ट कृतियों को समझने की कोशिश करता जिज्ञासु यात्री हो, या अपने मौजूदा ज्ञान को गहरा करने का इच्छुक कोई उत्साही व्यक्ति — यह मार्गदर्शिका एक संपूर्ण और सुलभ आधार प्रदान करती है। कला का इतिहास केवल शैक्षणिक ज्ञान नहीं है; यह एक जीवंत विरासत है — सहस्राब्दियों में फैली वह बातचीत जो इस प्रश्न पर केंद्रित है कि मनुष्य होने का अर्थ क्या है।

प्रागैतिहासिक कला और गुफा चित्रकारी

कला की सबसे प्राचीन ज्ञात कृतियाँ लेखन, कृषि और स्थायी बस्तियों से दसियों हज़ार साल पहले की हैं। ये प्राचीन रचनाएँ उस काल से उभरती हैं जिसे पुरातत्त्वविद उच्च पाषाण काल (Upper Paleolithic) कहते हैं — मोटे तौर पर 40,000 से 10,000 ईसा पूर्व के बीच — हालाँकि हाल की खोजों ने प्रतीकात्मक व्यवहार के साक्ष्य को मानव प्रागितिहास में और भी पीछे धकेल दिया है। प्रागैतिहासिक कला का अध्ययन हमें सौंदर्यात्मक आवेग की उन्हीं जड़ों तक ले जाता है — उस क्षण तक जब जैविक प्राणी सांस्कृतिक प्राणी बने और जीवन-रक्षा की तात्कालिक माँगों से परे हटकर प्रतिनिधित्व और प्रतीकों के ज़रिये दुनिया से जुड़ने लगे।

सबसे पुरानी कलात्मक कलाकृतियों में छोटी-छोटी वहनीय वस्तुएँ हैं: उकेरी हुई मूर्तियाँ, माला के रूप में इस्तेमाल होने वाले छिद्रयुक्त कवच, और हड्डी व पत्थर पर अमूर्त नक्काशियाँ। ऑस्ट्रिया में पाई गई और लगभग 28,000 से 25,000 ईसा पूर्व की Willendorf की Venus इन्हीं वस्तुओं में सबसे प्रसिद्ध है। यह छोटी चूना-पत्थर की मूर्ति, मात्र ग्यारह सेंटीमीटर ऊँची, एक अत्यधिक भरे-पूरे स्त्री रूप को दर्शाती है जिसमें उभरे हुए स्तन, पेट और कूल्हे हैं। पूरे यूरोप में दर्जनों ऐसी मूर्तियाँ मिली हैं, जो उर्वरता, स्त्रीत्व या दिव्य स्त्री-शक्ति के बारे में व्यापक साझा मान्यताओं का संकेत देती हैं। जर्मनी की Hohle Fels Venus, जो लगभग 40,000 ईसा पूर्व की है, अब तक खोजी गई सबसे पुरानी प्रतिनिधित्वात्मक मूर्तियों में से एक है और यूरोप में शारीरिक रूप से आधुनिक मानव संस्कृति के आरंभिक काल में प्रतिनिधित्वात्मक कला की उत्पत्ति को बहुत पीछे ले जाती है।

दक्षिण-पश्चिमी फ्रांस और उत्तरी स्पेन की गुफा-चित्रकारियाँ प्रागैतिहासिक कला की सबसे दृश्यात्मक रूप से शानदार उपलब्धियाँ हैं। 1940 में फ्रांस के Dordogne क्षेत्र में Lascaux गुफा तंत्र की खोज ने पूरी दुनिया को चकित कर दिया। लगभग 17,000 साल पहले बनाई गई ये चित्रकारियाँ गुफा की दीवारों और छतों को ऑरोच, घोड़े, हिरण, बाइसन और असाधारण ऊर्जा और शारीरिक सूक्ष्म-निरीक्षण से युक्त एक दौड़ते साँड़ की उल्लेखनीय छवियों से ढकती हैं। कलाकारों ने काले मैंगनीज़ डाइऑक्साइड और लाल-पीले गेरू का उपयोग किया — रंग को खोखली हड्डियों से फूँककर, जानवरों के बालों के ब्रश से लगाकर और हाथों को सीधे चट्टान की सतह पर दबाकर। उन्होंने गुफा की दीवारों की प्राकृतिक आकृतियों का उपयोग त्रि-आयामिता का आभास देने के लिए किया — एक ऐसी तकनीक जो लोकप्रिय कल्पना में पाषाण काल की संस्कृति को जो स्थान मिलता है उससे कहीं अधिक असाधारण परिष्कार प्रकट करती है।

स्पेन के Cantabria में स्थित Altamira गुफा, जो उन्नीसवीं सदी में खोजी गई थी और जिस पर पुरातत्त्व समुदाय ने शुरू में विश्वास नहीं किया था, में जीवंत प्रकृतिवाद से चित्रित बाइसन हैं। कला इतिहासकार Marcelino Sanz de Sautuola, जिन्होंने पहले इनके महत्त्व को पहचाना था, पर जालसाज़ी का आरोप लगाया गया — क्योंकि उनके समकालीन यह मान नहीं सकते थे कि पाषाण काल के मनुष्य इतनी कुशलता के योग्य थे। 14,000 से 17,000 साल पुरानी ये चित्रकारियाँ विभिन्न मुद्राओं में बाइसन दिखाती हैं, जिनमें सोए हुए जानवर भी हैं जिनके रूप लहरदार छत की सतह के साथ स्वाभाविक रूप से प्रवाहित होते हैं। ये कृतियाँ पूर्ण कलात्मक परिपक्वता की उपलब्धि का प्रतिनिधित्व करती हैं — आदिम टटोलना नहीं, बल्कि एक लंबी अभ्यास-परंपरा से विकसित कुशल दृश्य अभिव्यक्ति।

फ्रांस के Ardeche क्षेत्र में स्थित Chauvet गुफा, जो 1994 में खोजी गई और जिसकी आयु लगभग 36,000 वर्ष आंकी गई है, Lascaux से भी पुरानी है और कई मायनों में और भी अधिक प्रभावशाली है। इस गुफा में गैंडे, शेर, भालू, घोड़े और मैमथ की छवियाँ हैं, जो एक आत्मविश्वासपूर्ण रेखांकन कौशल के साथ बनाई गई हैं जो कलात्मक विकास के सरल-से-जटिल की ओर बढ़ने की परंपरागत धारणाओं को चुनौती देती हैं। Chauvet के कलाकारों ने आयतन और गति का विश्वसनीय भ्रम पैदा करने के लिए छायाँकन और परिदृश्य तकनीकों का प्रयोग किया। कुछ छवियाँ सरपट दौड़ते जानवरों की गति का संकेत देती हैं — सिनेमाई क्रम से सहस्राब्दियों पहले। Chauvet का अस्तित्व विद्वानों को यह सुझाव देता है कि जटिल दृश्य कला की क्षमता शारीरिक रूप से आधुनिक मनुष्यों के साथ अचानक उभरी, न कि क्रमिक रूप से विकसित हुई।

प्रागैतिहासिक गुफा कला के उद्देश्य विद्वानों के बीच अभी भी बहस का विषय हैं। शुरुआती सिद्धांतों ने सहानुभूतिपूर्ण जादू का अनुमान लगाया था: शिकार के जानवरों का चित्रण सफल शिकार सुनिश्चित करेगा। दूसरों ने शमनवादी व्याख्याएँ प्रस्तावित की हैं, यह सुझाव देते हुए कि गुफाएँ अनुष्ठान स्थलों के रूप में काम करती थीं जहाँ साधक परिवर्तित चेतना की अवस्थाओं में प्रवेश करते थे और पशु-आत्माओं से संवाद करते थे। अधिक हाल की व्याख्याएँ सामाजिक और संचार कार्यों पर जोर देती हैं — वे तरीके जिनसे छवियों ने पीढ़ियों में सांस्कृतिक ज्ञान और समूह पहचान का संचरण किया। वयस्कों के साथ बच्चों के हस्त-चिह्नों की उपस्थिति यह सुझाती है कि ये स्थान शैक्षणिक और अनुष्ठानिक दोनों कार्य करते थे। जो स्पष्ट है वह यह है कि प्रागैतिहासिक गुफा चित्रकला साधारण मस्तिष्कों का काम नहीं है, बल्कि ऐसे जटिल मनुष्यों का है जिनकी सौंदर्यात्मक संवेदनशीलता हमारी अपनी से पूरी तरह तुलनीय थी।

यूरोप से परे, प्रागैतिहासिक कला विश्व भर में पुष्पित हुई। ऑस्ट्रेलिया के Kimberley क्षेत्र की शैल कला में सुरुचिपूर्ण मानव आकृतियाँ दर्शाने वाले अत्यंत प्राचीन चित्र शामिल हैं। दक्षिणी अफ्रीका के San लोगों ने Drakensberg पर्वत और Cederberg जंगल में हज़ारों शैल चित्र बनाए, जिनमें से कई ईलैंड, मनुष्यों और अर्ध-मानव, अर्ध-पशु थेरियनथ्रोपिक आकृतियों को दर्शाते हैं जो San की आध्यात्मिक मान्यता के केंद्र में हैं। इंडोनेशिया के Sulawesi की गुफा चित्रकारियाँ — जिनमें हाथ के स्टेंसिल और प्राणी-आकृतियाँ हैं जो अब तक की सबसे पुरानी दिनांकित प्रतिनिधित्वात्मक कला में से हैं — यह सुझाव देती हैं कि छवि-निर्माण का आवेग संज्ञानात्मक आधुनिकता के क्षण में मानव प्रजाति में स्वतंत्र रूप से उत्पन्न हुआ — यह एक किसी एक उद्गम स्थल से फैलने वाली नहीं बल्कि कलात्मक क्षमता का वैश्विक उद्भव था।

नवपाषाण काल में, लगभग 10,000 ईसा पूर्व से कृषि को अपनाने के साथ, स्थायी समुदायों की नई स्थायित्व के साथ-साथ स्मारकीय कला के नए रूप उभरे। इंग्लैंड में Stonehenge, फ्रांस के Brittany में Carnac के पाषाण-खंड और आयरलैंड में Newgrange जैसी महापाषाण संरचनाएँ खगोलीय, धार्मिक और सामुदायिक उद्देश्यों की पूर्ति करती थीं। इन विशाल स्थापत्य उद्यमों के लिए अभूतपूर्व सामाजिक संगठन और पीढ़ियों तक फैली समय की एक अवधारणा की आवश्यकता थी, जो सामूहिक श्रम द्वारा आकारित भूदृश्य में मानव पहचान को स्थापित करती थी। कुम्हारी, बुनाई और धातु-कर्म ने धीरे-धीरे नवपाषाण समाजों की भौतिक और सौंदर्यात्मक संस्कृति को समृद्ध किया, और आगे आने वाली महान सभ्यताओं की नींव तैयार की। खानाबदोश से स्थायी जीवन की ओर संक्रमण ने ऐसी पहली परिस्थितियाँ निर्मित कीं जिनमें सच्ची स्मारकीय और स्थायी कला संभव हो सकी।

प्राचीन मेसोपोटामिया और मिस्र की कला

टिग्रिस, यूफ्रेटस और नील नदी की घाटियों में पहले नगरों के उदय के साथ, संगठित दृश्य कला की पहली सच्ची स्मारकीय परंपराएँ भी जन्मीं। ये आरंभिक सभ्यताएँ, जिनका स्थापत्य कला, मूर्तिकला और सजावटी कलाओं में योगदान पश्चिमी और निकट-पूर्वी संस्कृति के संपूर्ण परवर्ती इतिहास को आकार देता रहा, ने देवताओं, राजाओं और अनंत जीवन की इच्छा की सेवा में अत्यंत महत्त्वाकांक्षी कृतियाँ रचीं। प्राचीन मेसोपोटामिया और मिस्र की कला आज भी दुनिया की सबसे पहचानी जाने वाली कला में से है — इसकी औपचारिक परंपराएँ इतनी पूर्ण रूप से विकसित और इतनी निरंतरता से सदियों तक लागू हुईं कि यह मानव सभ्यता द्वारा अब तक की सबसे विशिष्ट सौंदर्य-प्रणालियों में से एक बन गई।

मेसोपोटामिया — वह भूमि जो दो नदियों के बीच स्थित है और जो आज इराक और सीरिया है — ने लगभग 4000 ईसा पूर्व विश्व के पहले नगरों को जन्म दिया। Uruk की सुमेरियन सभ्यता ने सिलिंडर मुहरें बनाईं — पत्थर के छोटे तराशे हुए सिलिंडर जिन्हें मिट्टी की तख्तियों पर लपेटने पर निरंतर कथात्मक छवियाँ उभरती थीं — जो मानव इतिहास में बड़े पैमाने पर उत्पादित छवियों के पहले उदाहरणों में से एक हैं। Ur का Standard, जो लगभग 2600 ईसा पूर्व बनाया गया और Ur के शाही कब्रिस्तान में खोजा गया, कथात्मक कला का एक असाधारण प्रारंभिक उदाहरण है, जो मोज़ेक पैनलों में युद्ध और उत्सव के दृश्यों को श्रेणीबद्ध स्तर पर मानव आकृतियों के साथ दर्शाता है — शासक अपनी प्रजा से बड़े — एक परंपरा जो सत्ता और प्राधिकार की दृश्य भाषा के रूप में सहस्राब्दियों तक कई संस्कृतियों में बनी रही।

अक्कदी साम्राज्य ने प्राचीन विश्व की कुछ सबसे शक्तिशाली चित्र-मूर्तियाँ बनाईं। कांस्य में ढला Head of an Akkadian Ruler, जो लगभग 2300 ईसा पूर्व का है और अब बगदाद में इराक संग्रहालय में है, धातु-ढलाई में अद्भुत तकनीकी कौशल और एक सम्मोहक मनोवैज्ञानिक उपस्थिति प्रदर्शित करता है जो चार हज़ार साल के मानव इतिहास में आदेश और बुद्धिमत्ता के भाव से वापस देखता प्रतीत होता है। Naram-Sin की स्टेल, जो लगभग 2254 से 2218 ईसा पूर्व बनाई गई, पर्वतीय लोगों पर अक्कदी राजा की विजय को असाधारण गतिशीलता की एक विकर्ण रचना में उत्सवित करती है — राजा पत्थर के शीर्ष पर विजयी, शत्रु सैनिक उसके नीचे गिरते हुए। इस विकर्ण रचना ने पहले की मेसोपोटामियाई कला की क्षैतिज पंजी-प्रणाली से नाता तोड़ा।

नव-असीरियाई साम्राज्य ने नौवीं से सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व में स्मारकीय राहत-मूर्तिकला की एक उल्लेखनीय परंपरा का निर्माण किया। Nimrud और Nineveh के महलों को एलाबेस्टर राहत पैनलों की विशाल श्रृंखलाओं से सजाया गया था, जिनमें सैन्य अभियानों, शाही शिकारों और अनुष्ठान समारोहों का चित्रण था। ये राहतें — जिनमें से अनेक अब लंदन में ब्रिटिश संग्रहालय, शिकागो में Oriental Institute और पेरिस में लूव्र में हैं — सटीक वृत्तचित्रीय विवरण को शक्तिशाली कथात्मक गति के साथ जोड़ती हैं। Nineveh से Dying Lioness उचित ही प्रसिद्ध है: एक शेरनी, तीरों से बिंधी हुई, अपने लकवाग्रस्त पिछले हिस्से को घसीटती हुई — पीड़ा का ऐसा चित्रण जो इतना जीवंत और सहानुभूतिपूर्ण है कि यह अपने प्रचार-परक संदर्भ से परे जाकर दुःख की एक सार्वभौमिक छवि बन जाता है। यह राहत सिद्ध करती है कि असीरियाई कलाकार एक ऐसी परंपरा के भीतर भी सच्ची भावनात्मक सहानुभूति में सक्षम थे जो मुख्यतः शाही महिमामंडन के लिए समर्पित थी।

बेबीलोनियाई लोगों ने Ishtar Gate का निर्माण किया, जो Nebuchadnezzar II के अधीन लगभग 575 ईसा पूर्व बनाया गया और प्राचीन स्थापत्य अलंकरण की सर्वोच्च उपलब्धियों में से एक है। द्वार की सतहें ड्रैगनों और साँड़ों की शीशे की ईंटों की राहतों से ढकी थीं — चमकीले नीले, पीले और सफेद रंगों में गहरे लापिस लाज़ुली की पृष्ठभूमि पर। बर्लिन के Pergamon संग्रहालय में पुनर्निर्मित द्वार बेबीलोन के पवित्र प्रांगण के इस प्रवेशद्वार के भारी दृश्य प्रभाव का कुछ आभास देता है, यह प्रदर्शित करते हुए कि टाइल-कार्य सजावट की प्राचीन निकट-पूर्वी परंपरा इस्लामी विश्व की महान शीशे-ईंट स्थापत्य परंपराओं से सहस्राब्दियों पहले की है। द्वार की ओर जाने वाला पूरा जुलूस-मार्ग इसी प्रकार सजाया गया था, जो नव वर्ष जुलूस के लिए दिव्य वैभव का एक गलियारा बनाता था।

प्राचीन मिस्र की कला इतिहास की सबसे स्थिर और सुसंगत कलात्मक परंपराओं में से एक है। प्रारंभिक राजवंशीय काल से लगभग 3100 ईसा पूर्व से 30 ईसा पूर्व में रोमन विजय तक — तीन हज़ार साल से अधिक के कालखंड में — मिस्री कलाकारों ने औपचारिक परंपराओं के एक उल्लेखनीय रूप से सुसंगत समूह का पालन किया। मिस्री कलात्मक प्रणाली तकनीकी सीमा का परिणाम नहीं थी बल्कि जानबूझकर चुनाव का — एक ऐसी प्रतिनिधित्व-प्रणाली जो क्षणिक दृश्य स्वरूपों के बजाय संसार के बारे में आवश्यक सत्यों को व्यक्त करने के लिए तैयार की गई थी। सहस्राब्दियों में इसकी असाधारण स्थिरता उस धर्मशास्त्रीय और राजनीतिक व्यवस्था की स्थिरता को प्रतिबिंबित करती है जिसकी सेवा में यह थी, जहाँ परिवर्तन न केवल अनावश्यक था बल्कि दिव्य व्यवस्था के विघ्न के रूप में सक्रिय रूप से अवांछनीय था।

इन परंपराओं में सबसे विशिष्ट है संयुक्त आकृति, जिसमें मानव शरीर के विभिन्न अंगों को सबसे अभिलाक्षणिक कोण से दिखाया जाता है। सिर को प्रोफाइल में दिखाया जाता है, लेकिन आँख को सामने से। कंधों को सामने से दिखाया जाता है, लेकिन कूल्हे और पैरों को प्रोफाइल में। यह संश्लेषण एक ऐसी आकृति बनाता है जो एक अर्थ में, केवल प्रोफाइल या केवल सामने के दृश्य से अधिक संपूर्ण है — प्रत्येक शारीरिक भाग के सबसे सूचनाप्रद पहलू को शामिल करते हुए। परिणाम तुरंत मिस्री के रूप में पहचाना जाता है और एक सुसंगत दृश्य दर्शन का प्रतिनिधित्व करता है, न कि प्रकृतिवाद के भोले प्रयास का। एक ऐसी संस्कृति के लिए जिसमें चित्रित शरीर की पूर्णता का मृतक के लिए प्रत्यक्ष धार्मिक निहितार्थ था, प्रतिनिधित्व के प्रति यह दृष्टिकोण केवल सौंदर्यशास्त्र से परे गहरे उद्देश्यों की पूर्ति करता था।

मिस्री स्मारकीय कला का पैमाना चकित करने वाला है। Giza में Khufu का महान पिरामिड, जो लगभग 2560 ईसा पूर्व बना, लगभग चार हज़ार वर्षों तक पृथ्वी पर सबसे ऊँची मानव-निर्मित संरचना बना रहा। Giza पठार की जीवित चट्टान से तराशा गया स्फिंक्स विशाल शाही चित्र-मूर्तिकला की मिस्री परंपरा को मूर्त रूप देता है। प्राचीन Thebes में Luxor और Karnak के मंदिर, जो कई शताब्दियों में बने और रंगीन राहतों, स्तंभों और विशाल मूर्तियों से सजाए गए, असाधारण भव्यता का एक स्थापत्य परिदृश्य बनाते हैं। Abu Simbel में मंदिर परिसर, जो Ramesses II के अधीन लगभग 1264 ईसा पूर्व बालू-पत्थर की चट्टान में तराशा गया और जिसमें फ़राओ की लगभग सड़सठ फीट ऊँची चार विशाल बैठी हुई मूर्तियाँ हैं, नूबियाई रेगिस्तान में उसकी दिव्यता को अखंडनीय दृश्य शक्ति के साथ घोषित करता है।

मिस्री चित्रकला और राहत-मूर्तिकला मुख्यतः अंत्येष्टि और धार्मिक उद्देश्यों की पूर्ति करते थे। Luxor में Valley of the Kings की मकबरों की दीवारें जटिल चित्रित कथाओं से ढकी हैं जो मृतकों की परलोक यात्रा, Osiris द्वारा आत्मा के न्याय, और धर्मियों की प्रतीक्षा में अनंत जीवन के आनंदों का वर्णन करती हैं। Book of the Dead के पपीरस — चित्रांकित पांडुलिपियाँ जो मृतकों के साथ दफनाई जाती थीं — खतरनाक परलोक यात्रा के लिखित और दृश्य मार्गदर्शिका प्रदान करते थे। 1922 में Howard Carter द्वारा लगभग अखंडित Tutankhamun की मकबर में पाए गए खज़ानों ने शाही मिस्री भौतिक संस्कृति की पूर्ण भव्यता प्रकट की: सोने के ताबूत, रंगीन संदूक, एलाबेस्टर के कैनोपिक जार, और प्रसिद्ध सोने का अंत्येष्टि मुखौटा। यह मुखौटा, जो आदर्शीकृत शाही विशेषताओं को युवा राजा के चेहरे की स्वाभाविकता के साथ जोड़ता है, प्राचीन शिल्पकला की सर्वोच्च उत्कृष्ट कृतियों में से एक है और कला इतिहास की सबसे तुरंत पहचानी जाने वाली वस्तुओं में से एक है।

फ़राओ Akhenaten के अधीन Amarna काल, जिसने लगभग 1353 से 1336 ईसा पूर्व शासन किया, मिस्री परंपरा से एक उल्लेखनीय शैलीगत विचलन का प्रतिनिधित्व करता है। Akhenaten ने पारंपरिक मिस्री बहुदेववाद को सूर्य-चक्र Aten की पूजा से प्रतिस्थापित किया और राजधानी को Akhetaten (आधुनिक Amarna) नामक नए नगर में स्थानांतरित कर दिया। उनके संरक्षण में बनी कला एक स्पष्ट प्रकृतिवाद और अनौपचारिकता दर्शाती है जो मुख्यधारा की मिस्री परंपरा से बिल्कुल भिन्न है: फ़राओ को लंबी खोपड़ी, उभरे हुए जबड़े और लटकते पेट के साथ, तथा अपनी पत्नी Nefertiti और उनकी बेटियों के साथ अंतरंग घरेलू दृश्यों में दिखाया गया है। Nefertiti की प्रसिद्ध रंगीन चूना-पत्थर की प्रतिमा — जो अब बर्लिन के Neues Museum में है — औपचारिक परिष्कार को एक अभूतपूर्व मनोवैज्ञानिक उपस्थिति के साथ जोड़ती है, जो Amarna शैली के संक्षिप्त लेकिन असाधारण पुष्पन का संकेत देती है — इससे पहले कि उसके उत्तराधिकारियों के अधीन पारंपरिक स्वरूपों की पुनर्स्थापना हो।

प्राचीन यूनानी कला और मूर्तिकला

प्राचीन ग्रीस की कला पश्चिमी कलात्मक परंपरा में एक आधारभूत स्थान रखती है — न केवल ऐतिहासिक पूर्ववृत्त के रूप में, बल्कि एक चिरस्थायी आदर्श के रूप में भी। प्राचीन यूनानियों ने नौवीं शताब्दी ईसा पूर्व के Geometric काल से लेकर पहली शताब्दी ईसा पूर्व में समाप्त होने वाले Hellenistic काल तक लगभग एक हज़ार वर्षों में, मानव शरीर और प्राकृतिक स्वरूप के दृश्य प्रतिनिधित्व के लिए एक ऐसा दृष्टिकोण विकसित किया जिसने mimesis — प्रकृति की नकल — को कलात्मक उद्देश्य के केंद्र में रखा। गणितीय अनुपात और सौंदर्य-दर्शन पर आधारित मानव रूप की आदर्शता के साथ संयुक्त इस प्रकृतिवाद की प्रतिबद्धता ने मूर्तिकला और चित्रकला की ऐसी कृतियाँ उत्पन्न कीं जिन्होंने दो हज़ार से अधिक वर्षों तक यूरोपीय कलात्मक महत्त्वाकांक्षाओं को परिभाषित किया और पश्चिमी दृश्य संस्कृति में उत्कृष्टता के मानदंड के रूप में मानी जाती रहीं।

Mycenaean सभ्यता के पतन के बाद यूनानी कला का सबसे पहला चरण Geometric काल के नाम से जाना जाता है, लगभग 900 से 700 ईसा पूर्व। इस युग का नाम उन अमूर्त ज्यामितीय पैटर्नों से आता है — आँकड़े, हीरे, टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएँ और त्रिभुज — जो मिट्टी के बर्तनों को ढकते थे। Geometric मिट्टी के बर्तनों पर मानव आकृतियाँ दिखाई देती हैं लेकिन ज्यामितीय आकृतियों से निर्मित सरलीकृत सिल्हूट के रूप में: त्रिकोणीय धड़, गोलाकार सिर, आयताकार पैर। एथेंस के अंत्येष्टि amphora, जिनमें से कुछ स्मारकीय आकार तक पहुँचे, prothesis और ekphora के दृश्यों — मृतकों की विदाई और अंतिम जुलूस — को चित्रित करते थे, जो पश्चिमी कला में सबसे पहली कथात्मक चित्रकला में से कुछ हैं और उल्लेखनीय प्रारंभिक परिष्कार के साथ स्मारकीय पात्र को स्मृति-छवि के वाहन के रूप में स्थापित करते हैं।

Archaic काल, लगभग 700 से 480 ईसा पूर्व तक, ने मूर्तिकला में प्रकृतिवाद की ओर तीव्र विकास देखा। खड़ा पुरुष युवा — kouros — इस काल का प्रमुख मूर्तिकला स्वरूप बन गया। आरंभिक kouroi एक पैर आगे रखे, बाँहें बाजू में, कठोर और सामने से खड़े होते हैं, उनकी विशेषताएँ तथाकथित Archaic मुस्कुराहट से योजनाबद्ध हैं — होंठों का हल्का-सा ऊपर की ओर मुड़ना जिसका सटीक अर्थ अभी भी अस्पष्ट है लेकिन जो इन आकृतियों को एक अलौकिक जीवंतता देता है। सातवीं और छठी शताब्दियों में, kouroi धीरे-धीरे अधिक शारीरिक रूप से विश्वसनीय हो गए: माँसपेशियाँ अधिक सटीक रूप से बनाई गईं, मुद्राएँ अधिक सहज, अनुपात अधिक सामंजस्यपूर्ण। स्त्री समकक्ष kore, वस्त्राभूषित आकृतियों की बढ़ती सुरुचिपूर्णता और प्रकृतिवाद को दर्शाती है, हर उत्तरवर्ती पीढ़ी शरीर पर पड़ने वाले वस्त्र के चित्रण में प्रगति प्रदर्शित करती है।

Classical काल, 480 ईसा पूर्व में फारस पर यूनानी विजय के बाद से 323 ईसा पूर्व और सिकंदर महान की मृत्यु तक, यूनानी कलात्मक आदर्शों का पूर्णतम पुष्पन है। पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व में काम करने वाले मूर्तिकार Polykleitos ने Canon विकसित किया — प्रत्येक शारीरिक भाग के बीच और समग्र के साथ संबंध पर आधारित मानव आदर्श अनुपात की एक गणितीय प्रणाली। उनका Doryphoros (भाला वाहक), जो खोए हुए कांस्य मूल की रोमन संगमरमर प्रतियों के माध्यम से आज जाना जाता है, contrapposto में इस प्रणाली को मूर्त रूप देता है — भार एक पैर पर स्थानांतरित, विपरीत कंधे और कूल्हे ऊँचे — जो Archaic मूर्तिकला की कठोर सामनेवाली मुद्रा से बिल्कुल भिन्न प्राकृतिक गति और जैविक एकता की भावना पैदा करता है और पश्चिमी कला में पुरुष आकृति के प्रतिनिधित्व के लिए मानक स्थापित करता है।

Pheidias, Classical काल के सर्वोच्च मूर्तिकार और एथेनियन Acropolis के मूर्तिकला कार्यक्रम के अधीक्षक, ने Parthenon के भीतर खड़ी महान chryselephantine (सोने और हाथी दाँत की) Athena Parthenos की प्रतिमा और उतनी ही प्रसिद्ध Olympia में chryselephantine Zeus की प्रतिमा बनाई, जिसे प्राचीन विश्व के सात आश्चर्यों में गिना जाता है। दोनों मूल नष्ट हो गए हैं, केवल प्राचीन विवरणों और छोटी प्रतियों से जाने जाते हैं। जो बचा है वह Parthenon का असाधारण मूर्तिकला सजावट है: Athena के जन्म और Athena और Poseidon के बीच प्रतियोगिता को दर्शाने वाली pediment मूर्तियाँ, Lapith और centaur, देवताओं और दानवों के बीच युद्ध दिखाने वाली metopes, और Panathenaic जुलूस को दर्शाने वाली Ionic frieze। ये कृतियाँ — जिनमें से कई अब लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय और एथेंस के Acropolis संग्रहालय में विभाजित हैं — Classical यूनानी मूर्तिकला की सर्वोच्च उपलब्धि का प्रतिनिधित्व करती हैं।

चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में Classical आदर्श में एक नरमाई और मानवीयकरण आया। Praxiteles ने अपनी मूर्तियों में अधिक कामुक, शिथिल गुणवत्ता लाई, जो सबसे प्रसिद्ध रूप से Knidos की Aphrodite में दिखती है — यूनानी कला में जीवन आकार की महिला नग्न आकृति का पहला चित्रण, जिसके बारे में कहा जाता था कि वह इतनी सुंदर थी कि आगंतुक उसे देखने के लिए बड़ी दूरियाँ तय करते थे और प्रशंसा से अभिभूत हो जाते थे। शरीर का S-वक्र, सिर का हल्का झुकाव, और मांस की सतह का कोमल चित्रण Hellenistic काल की भावनात्मक अभिव्यक्ति की ओर एक निर्णायक कदम है। Alexander महान के दरबारी मूर्तिकार Lysippos ने Polykleitan Canon को और संशोधित किया, अधिक सुडौल अनुपात बनाए और ऐसी मूर्तिकला का परिचय दिया जिसे मुख्यतः सामने से नहीं बल्कि कई बिंदुओं से देखा जा सके — एक परिवर्तन जिसके सभी परवर्ती पश्चिमी मूर्तिकला के लिए दूरगामी परिणाम हुए।

सिकंदर महान की विजयों के बाद Hellenistic काल में यूनानी कला अधिक भावनात्मक रूप से तीव्र, रचना में अधिक जटिल, और व्यक्तिगत मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं तथा मानव प्रकारों की पूरी श्रृंखला के साथ अधिक संलग्न हो गई। Vatican संग्रहालयों में स्थित Laocoön Group, जो Trojan पुजारी Laocoon और उनके बेटों को दैवीय साँपों की कुंडलियों में दर्शाता है, Classical आदर्श की शांत सुंदरता से बहुत परे एक पीड़ा और शारीरिक तीव्रता प्राप्त करता है। Nike of Samothrace — पंखों वाली विजय अब Louvre में — अपने भव्य वस्त्रों के साथ जो मानो वास्तविक समुद्री हवा में लहरा रहे हों, पत्थर में गति और वायुमंडलीय प्रभाव की Hellenistic महारत को प्रदर्शित करती है। Pergamon Altar, अपने देवताओं और दानवों के युद्ध को दर्शाने वाली frieze के साथ, असाधारण रचनात्मक महत्त्वाकांक्षा के एक कार्य में Hellenistic नाटकीयता को स्मारकीय स्थापत्य पैमाने तक ले गया।

यूनानी मिट्टी के बर्तन, जो भारी मात्रा में उत्पादित होकर भूमध्यसागरीय दुनिया में व्यापार होते थे, यूनानी चित्रकला परंपराओं का एक अमूल्य अभिलेख प्रदान करते हैं — क्योंकि यूनानी पैनल चित्रकला लगभग पूरी तरह नष्ट हो गई है। Attic black-figure मिट्टी के बर्तन, जो सातवीं शताब्दी में विकसित हुए, प्राकृतिक लाल मिट्टी के विरुद्ध सिल्हूट आकृतियाँ बनाने के लिए चमकदार slip लगाने की तकनीक का उपयोग करते हैं, जिसमें आंतरिक विवरण के लिए नक्काशी की गई रेखाएँ होती हैं। Red-figure मिट्टी के बर्तन, जो एथेंस में लगभग 530 ईसा पूर्व आविष्कृत हुए, इस योजना को उलट देते हैं: आकृतियाँ मिट्टी के प्राकृतिक लाल रंग में छोड़ी जाती हैं जबकि पृष्ठभूमि slip में चित्रित होती है, जिससे चित्रकार आंतरिक विवरण के लिए चित्रित रेखाओं का उपयोग कर सकता है और अधिक प्रकृतिवाद और अभिव्यंजक सीमा प्राप्त होती है। Euphronios और Euthymides जैसे महान red-figure चित्रकारों ने इस तकनीक को शारीरिक निरीक्षण और मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मता के असाधारण स्तर तक पहुँचाया — उनकी कृतियाँ प्राचीन विश्व से बची सबसे अच्छी चित्रकारियों में से हैं और अन्यथा खोई हुई एक चित्रात्मक परंपरा के अनमोल अभिलेख हैं।

प्राचीन रोमन कला

रोमन कला यूनानी नींव पर इतनी गहराई से निर्भर करती है कि इसे कभी-कभी महज नकल कहकर खारिज कर दिया गया है — एक आरोप जो एक हद तक सत्य होते हुए भी उन वास्तविक और महत्त्वपूर्ण योगदानों को अस्पष्ट करता है जो रोमनों ने दृश्य कलाओं में किए। रोमनों ने यूनानी कलात्मक परंपराओं को पूरी तरह आत्मसात किया, यूनानी कलाकारों को आयात किया, यूनानी मूर्तियाँ खरीदीं या लूटीं, और रोमन शिल्पकारों से प्रसिद्ध यूनानी मूल की प्रतियाँ बनवाईं — यही कारण है कि आज हम कई खोई हुई उत्कृष्ट कृतियों को जानते हैं। लेकिन रोमनों ने दृश्य कला के लिए विशिष्ट उद्देश्य और रूप भी विकसित किए जो उनके अपने मूल्यों और उनके उल्लेखनीय राजनीतिक और सामाजिक संगठन को दर्शाते हैं — चित्र-मूर्तिकला, कथात्मक राहत-मूर्तिकला और स्थापत्य नवीनता की एक परंपरा बनाते हुए जो दृश्य संस्कृति के पूरे इतिहास के सबसे उत्कृष्ट अध्यायों में से एक है।

रोमन चित्र-मूर्तिकला कला इतिहास की सबसे असाधारण परंपराओं में से एक है। जहाँ यूनानी चित्र-मूर्तिकला आदर्शीकरण की ओर झुकती थी — दार्शनिकों, एथलीटों और शासकों को विशिष्ट व्यक्तियों के बजाय सुंदरता या ज्ञान के प्रकारों के रूप में प्रस्तुत करते हुए — रोमन चित्र-मूर्तिकला ने एक निर्भीक verism का अनुसरण किया: उम्र, चरित्र और जीवन-अनुभव के चिह्नों सहित व्यक्तिगत शारीरिक बनावट का सच्चा चित्रण। गणतंत्र काल के सीनेटरों और patresfamilias के चित्र गहरी झुर्रियों वाले, ढीले गाल और पीछे हटती ठोड़ी के साथ चेहरे दिखाते हैं, जिनमें जिम्मेदारी और अधिकार का संचित भार पढ़ा जा सकता है। यह परंपरा आंशिक रूप से पूर्वजों के मोम के मृत्यु-मुखौटे, imagines, रखने की रोमन प्रथा से निकली थी, जो कुलीन परिवारों के घरों में प्रदर्शित होते थे और अंत्येष्टि जुलूसों में ले जाए जाते थे — रोमन चित्र-मूर्तिकला को मृतकों के वास्तविक चेहरों से सीधा जोड़ते हुए।

रोमन चित्रकला मुख्यतः 79 ईसवी में Mount Vesuvius के विस्फोट से ज्वालामुखी राख में दबे Pompeii और Herculaneum की उल्लेखनीय संरक्षण के माध्यम से जानी जाती है। समृद्ध Pompeii के निवासियों के घर काफी परिष्कृत दीवार-चित्रकारियों से सजे थे, जिनमें स्थापत्य भ्रम भी था जिनमें चित्रित स्तंभ और परिदृश्य यह आभास देते थे कि दीवारें बगीचों या स्तंभों वाली गलियों की ओर खुलती हैं, उच्च गुणवत्ता के पौराणिक कथा-चित्र भी, और असाधारण ताज़गी के still-life चित्र भी। Pompeii के बाहर Villa of the Mysteries में जीवन-आकार की आकृतियों का एक निरंतर frieze है जो एक Dionysiac दीक्षा संस्कार में शामिल प्रतीत होता है — एक ऐसी मनोवैज्ञानिक तीव्रता और स्थानिक महत्त्वाकांक्षा की चित्रकारी जो किसी भी काल की उत्कृष्ट कृतियों में से एक के रूप में मान्यता की पात्र है।

रोमन स्मारकीय मूर्तिकला प्रचारात्मक और स्मारकीय उद्देश्यों की पूर्ति करती थी। रोम में Trajan का स्तंभ, जो 113 ईसवी में पूर्ण हुआ, राहत-मूर्तिकला की एक निरंतर सर्पिल frieze से लिपटा है जो Emperor Trajan के दो Dacian अभियानों का चित्रण करती है — लगभग 2,600 आकृतियों का एक वृत्तांत जो खोलने पर लगभग 625 फीट फैल जाता है। ज़मीन से पढ़ने योग्यता की समस्या के रचनात्मक समाधान — जिसमें विभिन्न ऊँचाइयों पर पठनीयता बढ़ाने के लिए आकृतियाँ और स्थानिक संबंध समायोजित किए गए — रोमन कथात्मक डिज़ाइन की एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। Ara Pacis Augustae — Augustus शांति की वेदी — 9 ईसा पूर्व में समर्पित, रूपकात्मक पैनलों को Augustan परिवार के सदस्यों को दर्शाती जुलूस-राहतों के साथ यूनानी आदर्शवाद और रोमन विशिष्टता के एक संश्लेषण में जोड़ती है जो शाही स्मारकीय कला के लिए मॉडल बन गई।

रोमन स्थापत्य कला संभवतः रोमन दृश्य संस्कृति की सबसे स्थायी विरासत है। कंक्रीट निर्माण का विकास, मेहराब, तिजोरी और गुंबद के साथ मिलकर, रोमन वास्तुकारों को यूनानी trabeated निर्माण से असंभव पैमाने और जटिलता के आंतरिक स्थान बनाने की अनुमति देता था। रोम में Pantheon, जो Hadrian के अधीन लगभग 125 ईसवी में बना, अपने लगभग 142 फीट व्यास के अप्रवर्धित कंक्रीट गुंबद के साथ, एक सहस्राब्दी से अधिक तक दुनिया का सबसे बड़ा गुंबद बना रहा और आज भी वास्तुकारों और इंजीनियरों को प्रेरित करता है। Colosseum, जो 80 ईसवी में पूर्ण हुआ, अपनी धनुषाकार गलियारों और अस्सी धनुषाकार प्रवेशद्वारों की सरल प्रणाली के माध्यम से दसियों हज़ार दर्शकों की आवाजाही को कुशलतापूर्वक प्रबंधित करता था। रोमन जल-सेतु, विजयी मेहराब, मंदिर, स्नानागार और basilica ब्रिटेन से मेसोपोटामिया तक एक विशाल साम्राज्य में फैले, एक स्थापत्य शब्दकोश बनाते हुए जिसने हर उस परिदृश्य पर अमिट छाप छोड़ी जिसे उसने छुआ और रोम के पतन के बाद सदियों तक यूरोपीय स्थापत्य को प्रभावित किया।

रोमन मोज़ेक ने तकनीकी परिष्कार के असाधारण स्तर प्राप्त किए। opus vermiculatum के मोज़ेक, छायाँकन और परिप्रेक्ष्य के चित्रात्मक प्रभाव बनाने के लिए काँच और पत्थर के छोटे tesserae का उपयोग करते हुए, धनी रोमन घरों के फर्शों को सजाते थे। Pompeii के House of the Faun का Alexander Mosaic, जो संभवतः एक प्रसिद्ध Hellenistic चित्रकारी की नकल है, Alexander महान और फारसी राजा Darius III के बीच Issus की लड़ाई को नाटकीय foreshortening, मनोवैज्ञानिक तीव्रता और तकनीकी कौशल के साथ दर्शाता है जो प्राचीन मोज़ेक परंपरा की सर्वोच्च उपलब्धि है। अब Naples के Museo Archeologico Nazionale में, यह निजी घरेलू स्थानों की सजावट के लिए यूनानी मॉडलों को अनुकूलित करने की रोमन क्षमता को प्रदर्शित करता है।

बीजान्टिन और प्रारंभिक ईसाई कला

चौथी शताब्दी ईसवी के आरंभ में Constantine I के अधीन रोमन साम्राज्य के एक बुतपरस्त से ईसाई राजव्यवस्था में परिवर्तन ने इतिहास के सबसे महत्त्वपूर्ण सौंदर्यात्मक बदलावों में से एक को शुरू किया। ग्रेको-रोमन कला की प्रकृतिवादी और मानवतावादी परंपराओं को धीरे-धीरे ईसाई धर्मशास्त्र की सेवा की ओर मोड़ा गया, जिससे गहन आध्यात्मिक तीव्रता की एक दृश्य संस्कृति उत्पन्न हुई जो एक सहस्राब्दी तक पश्चिमी और पूर्वी यूरोप पर हावी रही। बीजान्टिन कला — वर्तमान तुर्की में Constantinople केंद्रित पूर्वी रोमन साम्राज्य की कला — ने पवित्र छवियों की एक विशिष्ट भाषा विकसित की जिसने रोमन तकनीकी परंपराओं को एक नए आध्यात्मिक उद्देश्य और भौतिक प्रकृतिवाद की जानबूझकर पारगमन के साथ दिव्य उपस्थिति के पक्ष में जोड़ा।

सबसे पुरानी ईसाई कला रोम के नीचे catacombs में दिखाई देती है, जहाँ ईसाई मृतकों को भूमिगत दीर्घाओं में दफनाया जाता था। ये catacomb चित्रकारियाँ, जो दूसरी और तीसरी शताब्दी ईसवी की हैं, बुतपरस्त छवियों को ईसाई उद्देश्यों के लिए अनुकूलित करती हैं: Good Shepherd — अपने कंधों पर मेमने को लिए एक युवक — Greco-Roman ram-bearer की छवियों को प्रतिध्वनित करता है; मछली और लंगर ईसाई प्रतीक बनते हैं; orant आकृतियाँ बाँहें उठाए प्रार्थना में खड़ी होती हैं। शैली सादगी से चित्रित है लेकिन एक सरल भक्तिमय ऊर्जा से भरी है जो रोमन राज्य के दबाव में एक समुदाय की जरूरतों की सेवा करने वाली एक नई कलात्मक परंपरा की शुरुआत को चिह्नित करती है।

Constantine के अधीन ईसाई धर्म के वैधीकरण ने ईसाई कला को लगभग रातोंरात बदल दिया। बड़े basilican चर्च सामूहिक ईसाई पूजा को समायोजित करने के लिए बनाए गए, उनके आंतरिक भाग अभूतपूर्व समृद्धि के संगमरमर, सोने और मोज़ेक से सजाए गए। apse मोज़ेक प्रमुख स्मारकीय रूप बन गया, जो सुनहरी पृष्ठभूमि पर पदासीन Christ या Virgin और Child को श्रेणीगत सामने से प्रस्तुत करता था, उनकी बड़ी आँखें नीचे पूजक की दृष्टि से मिलती थीं — एक सीधे आध्यात्मिक संवाद के संबंध में जो चर्च के भौतिक स्थान के भीतर पवित्र उपस्थिति को मूर्त और तात्कालिक बनाने के लिए था।

बीजान्टिन परंपरा छठी शताब्दी ईसवी में Emperor Justinian I के अधीन अपने पहले महान पुष्पन तक पहुँची। Constantinople में Hagia Sophia, जो 537 ईसवी में पूर्ण हुई और गणितज्ञ Anthemius of Tralles तथा इंजीनियर Isidoros of Miletos द्वारा डिज़ाइन की गई, किसी भी सभ्यता की सर्वोच्च स्थापत्य उपलब्धियों में से एक है। इसका विशाल गुंबद, खिड़कियों की एक पंक्ति पर तैरता प्रतीत होता है जो आंतरिक भाग को प्रकाश से भर देती है, स्वर्गीय पारगमन का एक भारी प्रभाव उत्पन्न करती है। बीजान्टिन इतिहासकार Procopius ने लिखा कि गुंबद एक सुनहरी जंजीर से स्वर्ग से लटकी प्रतीत होती है — एक ऐसे स्थापत्य स्थान के असाधारण प्रभाव को पकड़ने वाली छवि जो प्रकाश में अपनी भौतिकता को घुला देती है। इटली के Ravenna में San Vitale के चर्च की मोज़ेक, जो 547 ईसवी में पूर्ण हुई, Emperor Justinian और Empress Theodora को सुनहरी भव्यता में प्रस्तुत करती है, उनके कठोर सामने से जुलूस शाही और दिव्य क्षेत्रों को मिलाते हुए — एक ऐसी छवि जिसने पृथ्वी पर ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में सम्राट की बीजान्टिन अवधारणा को परिभाषित किया।

Icon — Christ, Virgin या किसी संत की वहनीय चित्रित छवि — बीजान्टिन पूजा का केंद्रीय कला-रूप बन गई। Iconों को केवल प्रतिनिधित्व के रूप में नहीं बल्कि खिड़कियों के रूप में समझा जाता था जिनके माध्यम से पवित्र आदर्श-प्रोटोटाइप पूजक के सामने प्रकट होता था — एक धर्मशास्त्रीय अवधारणा जिसे John of Damascus सहित धर्मशास्त्रियों ने सटीकता के साथ व्यक्त किया। बीजान्टिन iconography में मानक बनी सुनहरी पृष्ठभूमि किसी स्थान को नहीं बल्कि भौतिक स्थान और समय से परे एक पारलौकिक क्षेत्र को दर्शाती है। बीजान्टिन iconographic परंपरा की लंबी आकृतियाँ, बड़ी आँखें, छोटे मुँह और सपाट वस्त्र जानबूझकर प्रकृतिवाद से भटकते हैं — विषय की शारीरिक प्रकृति के बजाय आध्यात्मिक प्रकृति को संकेत देने के लिए। आठवीं और नौवीं शताब्दी का Iconoclast विवाद, जिसके दौरान शाही अधिकारियों ने समय-समय पर छवियाँ बनाने और उनकी पूजा पर रोक लगाई, प्रारंभिक बीजान्टिन कला की विशाल मात्रा को नष्ट करने का कारण बना। 843 ईसवी में छवि-पूजा की बहाली, जिसे पूर्वी रूढ़िवादी ईसाई Orthodoxy की विजय के रूप में मनाते हैं, ने icon की पवित्र स्थिति को निश्चित रूप से स्थापित किया।

परवर्ती बीजान्टिन परंपरा ने इतिहास की कुछ सबसे सुंदर पवित्र कलाएँ उत्पन्न कीं। एथेंस के पास Daphni के चर्च के गुंबद में Pantocrator मोज़ेक, लगभग 1100 ईसवी में बनाई गई, एक भयावह महिमा और मनोवैज्ञानिक शक्ति के Christ को प्रस्तुत करती है। Constantinople में Kariye Camii (Chora Church) की मोज़ेक, जो चौदहवीं शताब्दी के आरंभ में बनाई गई, Palaeologan Renaissance के नाम से जाने जाने वाले देर बीजान्टिन पुनर्जागरण का प्रतिनिधित्व करती है, जो बीजान्टिन परंपरा के अभी भी-प्रभावशाली आध्यात्मिक ढाँचे के भीतर शास्त्रीय प्रकृतिवाद और कथात्मक ऊर्जा के पुनरुद्धार को दर्शाती है। ये देर बीजान्टिन कृतियाँ — अपनी स्थानिक गहराई और व्यक्तिगत अभिव्यक्ति की नई भावना के साथ — इतालवी चित्रकार Giotto पर प्रारूपी प्रभाव डालने वालों में थीं, जिन्होंने उन्हें पश्चिमी आलंकारिक चित्रकला की नींव में बदल दिया।

पश्चिमी यूरोप में प्रारंभिक मध्यकालीन कला ने रोमन और बीजान्टिन दोनों परंपराओं से प्रेरणा ली जबकि विशिष्ट स्थानीय शैलियाँ भी विकसित कीं। Ireland और Northumbrian England के मठों में बनी Hiberno-Saxon कला ने आश्चर्यजनक सजावटी जटिलता की प्रकाशित पांडुलिपियाँ बनाईं। Book of Kells, जो Columba की मठ-परंपरा में लगभग 800 ईसवी में बनी, में ऐसे पृष्ठ हैं जिनकी जटिल गुँथी हुई सजावट, ज्यामितीय पैटर्न और zoomorphic अलंकरण इतने विस्तृत हैं कि मध्यकालीन लेखक Giraldus Cambrensis ने घोषित किया कि यह मानव हाथों के बजाय स्वर्गदूतों का काम प्रतीत होती है — इसके अनाम रचयिताओं की असाधारण धैर्य और दृश्य कल्पनाशीलता को श्रद्धांजलि। carpet pages — भूलभुलैया-जैसी जटिलता की पूर्ण-पृष्ठ सजावटी रचनाएँ — कला इतिहास में सबसे उल्लेखनीय सजावटी उपलब्धियों में से हैं।

इस्लामी कला और सुलेख

इस्लामी विश्व की कला मानव दृश्य संस्कृति की महान परंपराओं में से एक है — जो अपनी औपचारिक सृजनशीलता, आध्यात्मिक गहराई और असाधारण भौगोलिक विस्तार के लिए विशिष्ट है। सातवीं शताब्दी ईसवी में अरब प्रायद्वीप में इस्लाम के उदय के साथ उभरी, इस्लामी कला ने बीजान्टिन साम्राज्य, Sassanid फारस और प्राचीन मिस्र की कलात्मक परंपराओं को शीघ्रता से आत्मसात और रूपांतरित किया — एक ऐसी दृश्य संस्कृति बनाई जो स्पेन से मध्य एशिया और अंततः उप-सहारा अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैली। भारी क्षेत्रीय विविधता के बावजूद, इस्लामी कला इस्लाम के धर्मशास्त्र और सौंदर्य-दर्शन से निकले कुछ साझा सिद्धांतों से एकीकृत है — जिनमें सबसे प्रमुख है दिव्य वाक्य की केंद्रीयता और सृष्टि के नीचे स्थित गणितीय व्यवस्था।

इस्लामी दृश्य कला को नियंत्रित करने वाला सबसे मूलभूत सिद्धांत ईश्वर के वचन की केंद्रीयता है। कुरान, पैगंबर मुहम्मद के माध्यम से प्रेषित अल्लाह का प्रत्यक्ष वचन होने के नाते, सर्वोच्च सौंदर्यात्मक और आध्यात्मिक वस्तु मानी जाती है। सुलेख — सुंदर लेखन की कला — इसलिए इस्लामी संस्कृति में वह स्थान रखती है जो पश्चिमी संस्कृति में चित्रकला को प्राप्त है। सुंदर लिपि में कुरान लिखना भक्ति का एक कार्य है, और सुलेख-लेखक कलाकारों में सबसे सम्मानित है। अरबी सुलेख की प्रमुख लिपियाँ — प्रारंभिक कुरानों और स्थापत्य शिलालेखों में प्रयुक्त स्मारकीय Kufic शैली, पांडुलिपि उत्पादन के लिए मानक बनी प्रवाहमान Naskh शैली, और स्मारकीय सजावट में प्रयुक्त ऊँची Thuluth शैली — प्रत्येक में विशिष्ट सौंदर्यात्मक चरित्र और आध्यात्मिक संबंध हैं जो सुलेख को एक दृश्य और पवित्र कला दोनों बनाते हैं।

इस्लामी स्थापत्य कला उन महान मस्जिद परंपराओं में असाधारण ऊँचाइयों पर पहुँची जो मुस्लिम दुनिया में फैलीं। जेरूसलम में Dome of the Rock, जो 691 ईसवी में Umayyad खलीफा Abd al-Malik के अधीन पूर्ण हुई और सबसे पुराने जीवित इस्लामी स्मारकों में से एक है, बीजान्टिन केंद्रीय-नियोजित martyrium स्वरूप को इस्लामी उद्देश्यों के लिए अनुकूलित करती है — इसका अष्टकोणीय आधार एक चमकीले सुनहरे गुंबद से शीर्षित है जो दूर से दिखता है, इसकी आंतरिक सतहें बीजान्टिन शिल्पकौशल की मोज़ेक से ढकी हैं। स्पेन में Cordoba की Great Mosque, जो 784 ईसवी में शुरू हुई और बाद की शताब्दियों में विस्तारित हुई, hypostyle prayer hall को असाधारण सुंदरता के दोहरे-आर्च वाले स्तंभों के जंगल में बदल देती है।

Granada, स्पेन में Alhambra Palace परिसर, जो मुख्यतः तेरहवीं और चौदहवीं शताब्दियों में Nasrid राजवंश के अधीन बना, Iberian Peninsula में Moorish स्थापत्य कला का परिणाम है। जटिल muqarnas vaulting, टाइलवर्क, तराशे हुए stucco और बेजोड़ परिष्कार के सुलेख शिलालेखों से सजाए गए आँगनों और हॉलों की उसकी श्रृंखला संवेदी सुंदरता का एक कुल वातावरण बनाती है जो दिव्य वादे के स्वर्ग को उजागर करने के लिए थी। बारह संगमरमर के शेरों के फव्वारे और उकेरे हुए stucco arcades को सहारा देने वाले पतले स्तंभों वाला Court of the Lions दुनिया के सबसे अधिक फोटोग्राफ किए जाने वाले स्थापत्य स्थानों में से एक है।

Arabesque — गुँथा हुआ वनस्पति-पत्र पैटर्न जो इस्लामी विश्व में स्थापत्य सतहों, पांडुलिपि किनारों और सजावटी वस्तुओं को ढकता है — इस्लामी कला में अनंत ज्यामितीय विस्तार की एक अमूर्त प्रणाली में विकसित किया गया। इस्लामी ज्यामितीय अलंकरण, समरूपता और tessellation के गणितीय सिद्धांतों पर निर्मित, बहुभुजों, तारों और विस्मयकारी जटिलता के गुँथे हुए पैटर्नों पर आधारित अंतहीन रूप से दोहराए जाने वाले पैटर्नों से सतहों को ढकता है। ये पैटर्न — फारसी मस्जिदों की टाइल फर्शों, मिस्र के madrasas की लकड़ी की जालियों, और Mamluk शिल्पकारों के धातु-कार्य में दिखाई देते — दृश्य धर्मशास्त्र का एक रूप हैं।

इस्लामी लघु-चित्रकारी परंपरा, विशेष रूप से फारस और मुगल भारत में विकसित, असाधारण परिष्कार की कृतियाँ बनाई। फारसी पांडुलिपि चित्रण, जो पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दियों के Timurid और Safavid काल में अपने शिखर पर पहुँचा, महान फारसी साहित्यिक महाकाव्यों — जिनमें Ferdowsi का Shahnameh (राजाओं की पुस्तक) और Nizami की प्रेम-कविताएँ शामिल हैं — को रत्न-जैसे रंग और जटिल परिदृश्य विवरण की चित्रकारियों में प्रस्तुत करता है। Herat के Timurid दरबार में और बाद में Safavid दरबार में काम करने वाले चित्रकार Bihzad ने उल्लेखनीय स्थानिक जटिलता और मनोवैज्ञानिक निरीक्षण की रचनाएँ बनाईं जिन्होंने उन्हें फारसी लघु-चित्रकारी परंपरा का सर्वोच्च गुरु स्थापित किया। मुगल चित्रकारी, जो सोलहवीं शताब्दी से सम्राट Akbar, Jahangir और Shah Jahan के अधीन विकसित हुई, Jesuit मिशनरी संपर्क के माध्यम से परिचित यूरोपीय प्रकृतिवाद के साथ फारसी लघु-चित्रकारी परंपराओं को मिलाकर महान सुंदरता और दस्तावेज़ी मूल्य के चित्र और प्राकृतिक इतिहास के चित्रण उत्पन्न किए।

इस्लामी सजावटी कलाएँ — जिनमें मिट्टी के बर्तन, धातु-कार्य, वस्त्र और काँच शामिल हैं — तकनीकी और सौंदर्यात्मक परिष्कार के असाधारण स्तर तक पहुँचीं। Abbasid इराक और Fatimid मिस्र के lusterware मिट्टी के बर्तन, धात्विक ग्लेज़ से लेपित जो इंद्रधनुषी चमक उत्पन्न करते हैं, मध्यकालीन दुनिया में व्यापार होते थे और मध्यकालीन यूरोप में नकल की जाती थी। Ottoman तुर्की के Iznik मिट्टी के बर्तन, जो सफेद जमीन पर अपने उज्ज्वल फ़िरोज़ा, कोबाल्ट नीले और टमाटर-लाल डिज़ाइनों के साथ सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दियों में उत्पादित हुए, किसी भी संस्कृति या काल में मिट्टी के बर्तन की सर्वोच्च उपलब्धियों में से एक हैं। फारसी और Anatolian कालीन और वस्त्र, ऊन, रेशम और धात्विक धागे में उनकी जटिल ज्यामितीय और curvilinear डिज़ाइनों के साथ, Renaissance यूरोप में इतने सम्मानित थे कि वे कई Flemish और Italian चित्रकारियों में विलासिता की प्रतीक वस्तुओं के रूप में दिखाई देते हैं।

मध्यकालीन कला और प्रकाशित पांडुलिपियाँ

पश्चिमी यूरोपीय कला में मध्यकालीन काल, जो मोटे तौर पर पाँचवीं शताब्दी ईसवी से पंद्रहवीं शताब्दी के अंत तक फैला है, कलात्मक उपलब्धि के एक हज़ार साल का प्रतिनिधित्व करता है जिसे लंबे समय से कम आँका या गलत समझा गया। medieval — मध्य युग — शब्द Renaissance की उन शताब्दियों के प्रति अवमानना को दर्शाता है जो शास्त्रीय पुरातनता और उसके अपने स्व-घोषित पुनर्जागरण के बीच थीं। आधुनिक कला इतिहास ने मध्यकालीन कला का निश्चित रूप से पुनर्वास किया है, इसकी धर्मशास्त्रीय परिष्कारता, औपचारिक महत्त्वाकांक्षा और क्षेत्रीय परंपराओं की उल्लेखनीय विविधता को मान्यता देते हुए। मध्य युग की कला सबसे ऊपर ईसाई चर्च की जरूरतों की सेवा करती थी, और इसे समझने के लिए उन धर्मशास्त्रीय उद्देश्यों को समझना आवश्यक है जो सबसे छोटे पांडुलिपि लघु-चित्र से लेकर सबसे बड़े cathedral कार्यक्रम तक हर सौंदर्यात्मक निर्णय को आकार देते थे।

Romanesque कला, जो लगभग 1000 से 1200 ईसवी तक फली-फूली, अपना नाम रोमन स्थापत्य रूपों — विशेष रूप से गोल मेहराब और barrel vault — के उपयोग से लेती है। Romanesque चर्च — जैसे Toulouse, फ्रांस में Saint-Sernin का Abbey, जर्मनी में Speyer Cathedral, और Florence, इटली में San Miniato al Monte — मोटी दीवारों, मोटे खंभों और अपेक्षाकृत अंधेरे आंतरिक भागों की एक शक्तिशाली, सुदृढ़ सौंदर्यशैली का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो तराशी हुई पत्थर की राहतों और दीवार-चित्रकारियों से सजाए गए हैं। महान Romanesque चर्चों के पश्चिमी दरवाज़ों पर उकेरे गए tympana संस्था के धर्मशास्त्रीय कार्यक्रम को स्मारकीय रूप में प्रस्तुत करते हैं: Burgundy में Autun Cathedral का Last Judgment, जिसे मूर्तिकार Gislebertus ने लगभग 1120 से 1135 के बीच उकेरा, अभिभूत करने वाली नाटकीय शक्ति का एक दृश्य प्रस्तुत करती है।

Gothic कला और स्थापत्य, जो उत्तरी फ्रांस में Abbot Suger of Saint-Denis के संरक्षण में लगभग 1140 के आसपास उभरी और तेरहवीं और चौदहवीं शताब्दियों में पूरे यूरोप में फैली, स्थापत्य और सौंदर्यात्मक अनुभव का एक रूपांतरण लाई। ribbed vault, pointed arch और flying buttress की संरचनात्मक नवाचारों ने Gothic निर्माताओं को विशाल पत्थर की वॉल्ट के भार को बाहरी आधारों पर स्थानांतरित करने की अनुमति दी, जिससे nave और choir की दीवारें विशाल रंगीन काँच के लिए खुल सकीं। Paris में Notre-Dame, Chartres, Reims, Amiens — फ्रांस में — Cologne जर्मनी में, और England में Salisbury के महान Gothic cathedral मानव इतिहास की सबसे महत्त्वाकांक्षी स्थापत्य उपलब्धियों में से हैं।

Gothic काल के रंगीन काँच पश्चिमी कला में प्रकाश और रंग के सबसे सुंदर अनुप्रयोगों में से एक है। Chartres Cathedral की खिड़कियाँ, जिनमें से कई बारहवीं और तेरहवीं शताब्दियों की हैं, आंतरिक भाग को एक अलौकिक नीली रोशनी से भर देती हैं। Paris में Sainte-Chapelle, जो France के Louis IX के अधीन बनी और 1248 में समर्पित हुई, Gothic दीवार को विघटित करने के सिद्धांत को उसकी चरम सीमा तक ले जाती है: पंद्रह विशाल खिड़कियों में ग्रंथ के एक हज़ार से अधिक अलग-अलग दृश्य हैं।

प्रकाशित पांडुलिपियाँ मध्यकालीन कला की सर्वोच्च उपलब्धियों में से एक हैं — बाइबल या उपासना के पवित्र पाठ को असाधारण परिष्कार की सजावटी और कथात्मक चित्रकारी के साथ जोड़ते हुए। Tres Riches Heures du Duc de Berry, जिसे Limbourg Brothers — Pol, Herman और Jean — ने पंद्रहवीं शताब्दी के आरंभ में Jean, Duke of Berry के लिए प्रकाशित किया, सभी Books of Hours में सबसे प्रसिद्ध है। वर्ष के बारह महीनों को दर्शाने वाले उसके कैलेंडर पृष्ठ असाधारण ताज़गी और प्रकृतिवाद के परिदृश्य दिखाते हैं — ग्रीष्मकालीन खेतों में परिश्रम करते किसान और Duke के भव्य महलों की पृष्ठभूमि में शिकार करते अभिजात — लापिस लाज़ुली, vermilion और सोने सहित शानदार खनिज रंगों में प्रस्तुत। ये छवियाँ मध्यकालीन और Renaissance दुनिया की दहलीज़ पर खड़ी हैं।

मध्यकालीन कला पांडुलिपि प्रकाशन और चर्च सजावट से बहुत आगे तक फैली थी। देर मध्यकालीन काल की tapestries — जैसे New York के Metropolitan Museum of Art में Hunt of the Unicorn श्रृंखला और Paris में Musee de Cluny में Lady and the Unicorn tapestries — महान परिष्कार की स्मारकीय वस्त्र-कला की एक परंपरा का प्रतिनिधित्व करती हैं। Bayeux Tapestry, वास्तव में लगभग 230 फीट लंबी एक कढ़ाई जो लगभग 1070 ईसवी में बनाई गई, England की Norman विजय को एक निरंतर पट्टी प्रारूप में वर्णित करती है जो पाठ और छवि के संयोजन में आधुनिक अनुक्रमिक दृश्य कहानी सुनाने का पूर्वाभास देती है।

मध्यकालीन सुनार-कार्य, एनामलिंग, कांस्य-ढलाई और हाथी दाँत की नक्काशी ने सर्वोच्च तकनीकी गुणवत्ता की वस्तुएँ बनाईं जो शासकों और prelates की सबसे मूल्यवान संपत्तियों में से थीं। मध्यकालीन चर्च की reliquary कला ने संतों के भौतिक अवशेषों के लिए विस्तृत पात्र बनाए — सोने, कीमती रत्नों, enamel और नक्काशीदार हाथी दाँत को ऐसी संरचनाओं में मिलाकर जो एक साथ कलाकृतियाँ, भक्तिमय वस्तुएँ और स्थापत्य मॉडल थीं। मध्यकालीन काल की शिल्प-परंपराएँ — जिनमें उन्हें नियंत्रित करने वाली guild प्रणालियाँ और उन्हें संचारित करने वाली कार्यशाला-प्रथाएँ शामिल हैं — ने वे तकनीकी नींव प्रदान की जिन पर Renaissance नवाचार खड़ा हुआ।

इतालवी पुनर्जागरण

इतालवी पुनर्जागरण — चौदहवीं से सोलहवीं शताब्दी के इतालवी नगर-राज्यों में शास्त्रीय ज्ञान और कलात्मक मूल्यों का पुनर्जन्म — पश्चिमी कला के इतिहास के सबसे निर्णायक मोड़ों में से एक है। पुनर्जागरण ने दृश्य कला के उद्देश्यों, तकनीकों और सामाजिक दर्जे में क्रांति की, चित्रकला और मूर्तिकला को केवल यांत्रिक शिल्पों के बजाय बौद्धिक संलग्नता के योग्य उदार कलाओं के रूप में स्थापित किया। इसने रैखिक परिप्रेक्ष्य के माध्यम से त्रि-आयामी स्थान के व्यवस्थित प्रतिनिधित्व को विकसित किया। इसने मानव इतिहास की कुछ सबसे प्रसिद्ध कलाकृतियाँ बनाईं। और इसने व्यक्तिगत कलात्मक प्रतिभा का विचार स्थापित किया — अनूठी सृजनात्मक व्यक्तित्व जिसकी कृतियाँ व्यक्तिगत दृष्टि की अमिट छाप छोड़ती हैं — जो आज भी पश्चिमी कलात्मक संस्कृति के केंद्र में है।

तेरहवीं और चौदहवीं शताब्दियों के Proto-Renaissance ने इन परिवर्तनों की भूमि तैयार की। Florentine मूर्तिकार Nicola Pisano, जो तेरहवीं शताब्दी के दूसरे भाग में काम कर रहे थे, ने प्रेरणा के लिए सीधे प्राचीन रोमन sarcophagi की ओर देखा — ऐसी pulpit राहतें बनाईं जो प्रचलित बीजान्टिन-प्रभावित शैली से निर्णायक रूप से अलग थीं। चित्रकार Cimabue ने सपाट बीजान्टिन चित्रकारी परंपरा में एक नई आयतनात्मक गुणवत्ता लाना शुरू किया। लेकिन Giotto di Bondone, जो तेरहवीं और चौदहवीं शताब्दी के अंत में काम कर रहे थे, ने निर्णायक विराम किया — यूरोपीय चित्रकला को विश्वसनीय त्रि-आयामी स्थानों के भीतर वास्तविक शारीरिक उपस्थिति और मनोवैज्ञानिक व्यक्तिगतता की आकृतियाँ चित्रित करके रूपांतरित किया।

Padua में Arena Chapel में Giotto के fresco चक्र, जो लगभग 1305 में पूर्ण हुए, पश्चिमी चित्रकला की सर्वोच्च उपलब्धियों में से एक हैं। Joachim और Anna, Virgin Mary और Christ के जीवनों के दृश्यों को स्मारकीय सरलता और मनोवैज्ञानिक तीव्रता के साथ रचा गया है जो बिल्कुल नया था। मृत Christ पर विलाप, शोक करती आकृतियों के अपने वृत्त और शोक की उनकी व्यक्तिगत अभिव्यक्तियों के साथ, एक भावनात्मक प्रत्यक्षता और मानवीय सत्य प्राप्त करती है जो पहले किसी पश्चिमी चित्रकारी ने नहीं किया था। समकालीन लेखक Dante ने अपनी Divine Comedy में Giotto की प्रशंसा की।

Florence में पंद्रहवीं शताब्दी — Quattrocento — ने Medici परिवार और अन्य धनी व्यापारियों और नागरिक संस्थाओं के संरक्षण में स्थापत्य, मूर्तिकला और चित्रकला का एक साथ पुष्पन देखा। मूर्तिकार Donatello ने अभूतपूर्व मनोवैज्ञानिक जटिलता और औपचारिक साहस की कृतियाँ बनाईं। उनका कांस्य David, जो 1440 के दशक में कभी बना और अब Florence के Bargello Museum में है, पुरातनता के बाद पहली बड़े आकार की मुक्त-खड़ी नग्न कांस्य मूर्ति थी। Florentine वास्तुकार Filippo Brunelleschi ने 1420 और 1436 के बीच Florence Cathedral — Duomo — के गुंबद के निर्माण की इंजीनियरिंग समस्या को एक अभिनव double-shell निर्माण और herringbone ईंट-बिछाने की तकनीक के माध्यम से हल किया, और यूरोपीय चित्रकला को रूपांतरित करने वाले गणितीय परिप्रेक्ष्य निर्माण का भी प्रदर्शन किया।

चित्रकार Masaccio, जो 1420 के दशक में Florence में काम कर रहे थे और लगभग सत्ताईस वर्ष की आयु में मृत्यु को प्राप्त हुए, ने Giotto, Donatello और Brunelleschi के परिप्रेक्ष्य के पाठों को पूरी तरह आत्मसात करके स्मारकीय गुरुत्व और स्थानिक विश्वसनीयता की चित्रकारियाँ बनाईं। Florence में Santa Maria Novella में उनका Trinity fresco विश्वसनीय barrel vault का trompe l'oeil भ्रम पैदा करने के लिए रैखिक परिप्रेक्ष्य का उपयोग करता है। Santa Maria del Carmine के Brancacci Chapel में उनके frescoes, Saint Peter के जीवन को दर्शाते हुए, ऐसी आकृतियाँ चित्रित करते हैं जो विश्वसनीय रूप से प्रकाशित त्रि-आयामी स्थानों में भौतिक भार और मनोवैज्ञानिक उपस्थिति के साथ चलती हैं।

Leonardo da Vinci (1452 से 1519) ने वैज्ञानिक जिज्ञासा और कलात्मक प्रतिभा को इस तरह संयुक्त किया जिसने बाद की पीढ़ियों को मोहित किया है। sfumato के उनके उपयोग ने — तीव्र रूपरेखाओं के बिना स्वरों के धुँधले वायुमंडलीय मिश्रण की तकनीक — उनकी आकृतियों को जीवन और मनोवैज्ञानिक अंतरंगता की बेजोड़ भावना दी। The Last Supper, जो Milan में Santa Maria delle Grazie की भोजनशाला की दीवार पर लगभग 1495 से 1498 के बीच चित्रित किया गया, Christ की घोषणा के क्षण को पकड़ता है कि उनके शिष्यों में से एक उन्हें धोखा देगा — प्रत्येक प्रेरित व्यक्तिगत मनोवैज्ञानिक सटीकता के साथ प्रतिक्रिया करता हुआ। Mona Lisa, जो लगभग 1503 से 1519 के बीच चित्रित हुई और अब Paris के Louvre में है, दुनिया की सबसे प्रसिद्ध चित्रकारी है।

Michelangelo Buonarroti (1475 से 1564) ने मूर्तिकला, चित्रकला और स्थापत्य में अतिमानवीय ऊर्जा और महत्त्वाकांक्षा के साथ काम किया। उनकी संगमरमर की मूर्तियाँ — जिनमें 1504 में पूर्ण David और अब Florence के Galleria dell'Accademia में, Rome में Saint Peter की Basilica में Pieta, और देर से अधूरी Rondanini Pieta शामिल हैं — पश्चिमी मूर्तिकला के वीरतापूर्ण सुंदरता और आध्यात्मिक गहराई के आदर्श को परिभाषित करती हैं। Vatican में Sistine Chapel की छत, जो 1508 और 1512 के बीच चित्रित हुई, Genesis के दृश्यों और भविष्यवक्ताओं, sibyl और Christ के पूर्वजों की छवियों से पाँच हज़ार वर्ग फीट से अधिक क्षेत्र को ढकती है।

Raphael Sanzio (1483 से 1520) ने High Renaissance में शास्त्रीय सामंजस्य, अनुग्रह और स्पष्टता की एक गुणवत्ता लाई जो Leonardo की मनोवैज्ञानिक गहराई और Michelangelo की माँसपेशीय ऊर्जा को पूरक करती थी। Vatican में Pope Julius II के निजी पुस्तकालय के लिए 1509 और 1511 के बीच चित्रित School of Athens, पुरातनता के दार्शनिकों को एक आदर्शीकृत स्थापत्य सेटिंग में इकट्ठा करता है।