
यूक्लिड
यूक्लिड की जीवनी — प्राचीन यूनानी गणितज्ञ, एलिमेंट्स, ज्यामिति, ज्यामिति के जनक
परिचय
मानव विचार के लंबे इतिहास में बहुत कम ऐसी हस्तियाँ हैं जिन्होंने बौद्धिक जगत को उतनी गहराई से आकार दिया जितना अलेक्जेंड्रिया के Euclid ने — वह प्राचीन यूनानी गणितज्ञ जो लगभग 300 BCE में सक्रिय थे और जिन्होंने दुनिया को अब तक लिखी गई सबसे प्रभावशाली पुस्तकों में से एक दी। उनकी महान रचना, Elements, केवल आधुनिक संकीर्ण अर्थों में ज्यामिति की पाठ्यपुस्तक नहीं है; यह तार्किक चिंतन का एक विशाल स्मारक है — अंतरिक्ष, संख्या और गणितीय सत्य की प्रकृति की एक सुव्यवस्थित खोज — जिसने दो हजार से अधिक वर्षों तक कठोर तर्क के मानदंड निर्धारित किए। एक ऐसे युग में जब लिखने की सामग्री दुर्लभ थी, जब ज्ञान का प्रसार कठिन हस्तलिपि के माध्यम से होता था, और जब प्रमाण की अवधारणा अभी विकसित हो ही रही थी — Euclid ने प्राचीन यूनानी जगत के संचित ज्यामितीय और अंकगणितीय ज्ञान को एक ऐसी एकल, सुसंगत निगमनात्मक संरचना में व्यवस्थित किया जो अलेक्जेंड्रिया से Oxford तक, Baghdad से Boston तक, टॉलेमाई फराओं के काल से औद्योगिक क्रांति के युग तक विद्यालयों में पढ़ाई जाती रही।
Euclid का नाम ज्यामिति से इस कदर अभिन्न हो गया है कि कई शताब्दियों के विद्यार्थी "Euclid करना" को ज्यामितीय तर्कणा के पूरे उद्यम का संक्षिप्त रूप मानने लगे। नाविकों ने यूक्लिडीय सिद्धांतों के आधार पर अपने मार्ग निर्धारित किए, वास्तुकारों ने इन्हीं सिद्धांतों से गिरजाघर और महल बनाए, इंजीनियरों ने इन्हीं से तनाव और दबाव की गणना की, और दार्शनिकों ने Euclid की पद्धति को कठोर तर्क का आदर्श माना। Thomas Hobbes ने जब Elements को पढ़ा तो उसके प्रमाणों की शक्ति से इतने अभिभूत हुए कि कहा जाता है उन्होंने उद्गार किया कि ऐसे प्रमाण गलत हो सकते हैं — यह असंभव है। Baruch Spinoza ने अपनी Ethics को यूक्लिडीय प्रस्तावों और प्रमाणों की शैली में लिखा, यह मानते हुए कि नैतिक सत्यों को भी ज्यामितीय सत्यों जैसी ही निश्चितता के साथ निगमित किया जा सकता है। Isaac Newton ने अपनी Principia Mathematica को यूक्लिडीय रेखाओं पर संगठित किया और अपने गति के नियमों तथा सार्वभौमिक गुरुत्वाकर्षण को परिभाषाओं और अभिगृहीतों से व्युत्पन्न प्रमेयों के रूप में प्रस्तुत किया।
इस विरासत को और भी अधिक उल्लेखनीय बनाती है यह तथ्य कि स्वयं उस व्यक्ति के बारे में लगभग कुछ भी ज्ञात नहीं है। Euclid ने कोई आत्मकथा नहीं छोड़ी, न कोई पत्र, न कोई व्यक्तिगत विचार। प्राचीन जगत ने उनके बारे में हैरानी की हद तक कम जीवनी संबंधी जानकारी संरक्षित की, और जो थोड़े-बहुत अंश उपलब्ध हैं वे उनके जीवनकाल के कई शताब्दियों बाद लिखे गए। हम नहीं जानते वे कहाँ पैदा हुए, कब पैदा हुए, कब उनका निधन हुआ, या उनके व्यक्तिगत जीवन, उनके गुरुओं अथवा परिवार के बारे में कुछ भी। हम जानते हैं कि वे टॉलेमाई मिस्र की चमचमाती राजधानी अलेक्जेंड्रिया में कार्यरत थे, और हमें लगभग यह भी पता है कि वे किस काल में सक्रिय थे। इससे परे, Euclid हमारे लिए लगभग पूरी तरह अपने गणित के माध्यम से ही जीवित हैं।
यह लेख Euclid of Alexandria के बारे में हम जो जानते हैं और जो उचित रूप से अनुमान लगा सकते हैं, उसकी एक व्यापक पड़ताल है: वह बौद्धिक जगत जिसमें वे रहे और काम किया, वह महान संकलन जो Elements है और उसकी पुस्तक-दर-पुस्तक विषयवस्तु, वह अभिगृहीत पद्धति जिसे उन्होंने परिष्कृत किया और पश्चिमी विचार पर उसका स्थायी प्रभाव, उनके अन्य उपलब्ध ग्रंथ, यूनानी गणित के इतिहास में उनका स्थान, और मध्यकालीन इस्लामी जगत के अरबी विद्वानों के माध्यम से, Venice की पुनर्जागरण मुद्रण शालाओं से होते हुए, उन्नीसवीं शताब्दी की गैर-यूक्लिडीय क्रांति के पार और हमारे अपने युग के गणित तक — उनके विचारों की असाधारण यात्रा। इस प्राचीन यूनानी गणितज्ञ के जीवन और विरासत का अनुसरण करते हुए हम मानव सभ्यता की कहानी की सबसे दीर्घकालिक और सुदूरगामी बौद्धिक उपलब्धियों में से एक से साक्षात्कार करते हैं।
Euclid के जीवन के बारे में हम क्या जानते हैं
जो इतिहासकार Euclid की जीवनी लिखने बैठता है, उसके सामने एक अजीब चुनौती होती है: इस विषय का जीवन लगभग पूरी तरह अंधेरे में डूबा हुआ है। प्राचीन यूनानियों में जीवनी लेखन की एक जीवंत परंपरा थी — कवियों, दार्शनिकों, सेनापतियों और राजनेताओं के विस्तृत विवरण लिखे जाते थे। फिर भी Euclid, जो प्राचीन दुनिया के सबसे प्रभावशाली बौद्धिक विभूतियों में से एक था, अपने पीछे लगभग कोई जीवनी संबंधी साक्ष्य नहीं छोड़ गया। उसकी रचनाएँ बची हैं; पर वह स्वयं इतिहास में कहीं खो गया है।
हमारे पास जो थोड़ी-बहुत जानकारी है, उसका मुख्य स्रोत Lycia के दार्शनिक Proclus हैं, जो लगभग 410 से 485 ई. के बीच जीवित रहे — यानी Euclid के समय के सात शताब्दियों से भी बाद। Proclus ने अपनी रचना Commentary on the First Book of Euclid's Elements में Euclid का एक संक्षिप्त विवरण दर्ज किया है, जो आगे चलकर उसकी जीवनी से जुड़े सभी प्रयासों का आधार बन गया। Proclus बताते हैं कि Euclid ने "Elements को संकलित किया, Eudoxus के अनेक प्रमेयों को एकत्र किया, Theaetetus के अनेक प्रमेयों को परिष्कृत किया, और जो बातें उसके पूर्ववर्तियों ने केवल ढीले-ढाले ढंग से सिद्ध की थीं, उन्हें अखंडनीय प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया।" वे यह भी जोड़ते हैं कि Euclid, Plato के पहले शिष्यों के बाद और Eratosthenes तथा Archimedes के समय से पहले आया, और उसे प्रथम Ptolemy के काल में रखते हैं। Proclus ने दो प्रसिद्ध किस्से भी दर्ज किए हैं जो सदियों से दोहराए जाते रहे हैं।
पहला किस्सा स्वयं राजा Ptolemy I से जुड़ा है, जिन्होंने Euclid से पूछा कि क्या Elements से गुज़रे बिना ज्यामिति में महारत हासिल करने का कोई छोटा रास्ता नहीं है। Euclid ने कथित तौर पर जवाब दिया, "ज्यामिति तक कोई राजमार्ग नहीं जाता।" यह वाक्य एक कहावत बन गया है, जिसका अर्थ ज्यामिति से कहीं आगे बढ़कर वास्तविक बौद्धिक उपलब्धि की लोकतांत्रिक प्रकृति को समेट लेता है: समझ के लिए कोई शॉर्टकट नहीं होता, कोई पद या रुतबा किसी को सीखने की कठिन मेहनत से नहीं बचा सकता। यह संवाद वास्तव में हुआ था या नहीं, यह हम नहीं जान सकते, लेकिन इसमें एक सुगढ़ शिक्षाप्रद कहानी की झलक है जो Euclid के गणित के प्रति नज़रिए की कोई ज़रूरी बात कह जाती है। दूसरा किस्सा Proclus का नहीं, बल्कि चौथी शताब्दी के गणितज्ञ Stobaeus का है, जिसमें एक छात्र ने पूछा कि ज्यामिति सीखने से उसे क्या मिलेगा। Euclid ने कथित तौर पर अपने सेवक से कहा कि उस छात्र को थोड़ा पैसा दे दो, "क्योंकि उसे जो कुछ भी सीखे उससे फ़ायदा उठाना ज़रूरी है।" यह भी शायद काल्पनिक हो, लेकिन दोनों कहानियाँ यह संकेत देती हैं कि Euclid को प्राचीन दुनिया में एक ऐसे शिक्षक के रूप में जाना जाता था जिसके मानक बेहद ऊँचे थे और जिसमें एक सूखा हास्यबोध था।
एक अन्य स्रोत Alexandria के गणितज्ञ Pappus हैं, जिन्होंने लगभग 320 ई. के आसपास लिखा, और जिन्होंने Euclid को "उन सभी के प्रति सबसे निष्पक्ष और सद्भावनापूर्ण" बताया "जो किसी भी हद तक गणित को आगे बढ़ाने में सक्षम थे।" Pappus के विवरण में उस कठोर गणितीय सतह के नीचे एक सहयोगी और उदार व्यक्तित्व की झलक मिलती है। एक और संक्षिप्त उल्लेख दूसरी शताब्दी ई. में जीवित रहे दार्शनिक और इतिहासकार Apuleius से मिलता है, जिन्होंने Euclid का ज़िक्र तो किया, लेकिन तथ्यात्मक जानकारी में कुछ खास नहीं जोड़ा।
जो बात उचित विश्वास के साथ कही जा सकती है वह यह है: Euclid, Ptolemy I Soter के शासनकाल में Alexandria में सक्रिय था, जिन्होंने 323 से 285 ई.पू. तक मिस्र पर शासन किया। इससे Euclid की प्रमुख सक्रियता का काल तीसरी शताब्दी ई.पू. की पहली तिमाही में, मोटे तौर पर लगभग 300 ई.पू. में, स्थापित होता है — यह तिथि परंपरागत है और गणित के इतिहासकारों में व्यापक रूप से स्वीकृत है। उसके जन्म और मृत्यु की तिथियाँ पूरी तरह अज्ञात हैं। अनुमान बहुत भिन्न-भिन्न हैं — कुछ विद्वानों का सुझाव है कि उसका जन्म लगभग 325 ई.पू. और मृत्यु लगभग 265 ई.पू. में हुई — लेकिन ये केवल उसकी दर्ज गतिविधियों के समय और उस काल के सामान्य जीवनकाल पर आधारित शिक्षित अनुमान हैं। उसे "fl. 300 BCE" — यानी लगभग 300 ई.पू. में सक्रिय — के रूप में दर्ज करने की पुरानी विद्वत्तापूर्ण परंपरा अब भी सबसे तर्कसंगत और स्वीकार्य रूप बनी हुई है।
Euclid का जन्म अलेक्जेंड्रिया में हुआ था या वे वहाँ कहीं और से आए थे — यह अज्ञात है। Proclus के विवरण से यह संकेत मिलता है कि उन्होंने एथेंस में Plato की Academy की परंपरा में गणितीय शिक्षा प्राप्त की थी, और यह आमतौर पर माना जाता है कि Euclid या उनके शिक्षकों का उस एथेनियन संस्था से संबंध था। यह Academy चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में यूनानी जगत में गणितीय गतिविधि का केंद्र रही थी, और Elements में जो अनेक परिणाम दिखाई देते हैं, वे मूल रूप से उससे जुड़े गणितज्ञों द्वारा विकसित किए गए थे — जिनमें Theaetetus, Eudoxus of Cnidus और Menaechmus शामिल हैं। संभव है कि Euclid को अलेक्जेंड्रिया आमंत्रित किए जाने से पहले उन्होंने वहाँ अध्ययन किया हो, लेकिन यह भी अनुमान मात्र है, कोई स्थापित तथ्य नहीं। प्राचीन स्रोतों में अलेक्जेंड्रिया के Euclid और Megara के Euclid — जो Socrates के समकालीन और उनसे लगभग सौ वर्ष पहले के दार्शनिक थे — के बीच एक निरंतर भ्रम भी पाया जाता है। मध्यकालीन यूरोपीय विद्वान कभी-कभी इन दोनों को एक मान लेते थे, किंतु आधुनिक शोध ने इस भ्रम को बहुत पहले ही सुलझा दिया है।
व्यक्तिगत जानकारी की इस कमी के बावजूद, Euclid की रचनाओं के आंतरिक साक्ष्य हमें यह बताते हैं कि वे किस प्रकार की बौद्धिक प्रतिभा के धनी थे। वे सबसे पहले और सबसे बढ़कर संगठन और तार्किक संश्लेषण के उस्ताद थे। Elements मुख्य रूप से मौलिक खोज की कोई कृति नहीं है — Euclid स्वयं स्पष्ट थे कि वे पूर्ववर्ती गणितज्ञों के कार्य को आधार बनाकर उसे व्यवस्थित रूप दे रहे थे — लेकिन यह असाधारण स्थापत्य बुद्धिमत्ता की एक कृति अवश्य है। सैकड़ों प्रमेयों को एक सुसंगत निगमनात्मक अनुक्रम में व्यवस्थित करना, आरंभ में ठीक सही स्वयंसिद्धों का चुनाव करना, परिणामों को इस क्रम में रखना कि प्रत्येक केवल पहले से स्थापित बातों पर ही आश्रित हो — इस सबके लिए अत्यंत असाधारण कौशल चाहिए, और Euclid इससे पूरी तरह संपन्न थे। वे स्पष्ट रूप से एक प्रतिभाशाली शिक्षक भी थे, और उनकी अन्य रचनाएँ गणितीय रुचियों की एक विस्तृत श्रृंखला दर्शाती हैं — शुद्ध ज्यामिति से लेकर प्रकाशिकी, खगोलशास्त्र और संख्या सिद्धांत तक। गणित के पीछे के इस व्यक्ति को हम वास्तव में जान सकते हैं या नहीं, यह अनिश्चित ही रहेगा — लेकिन गणित स्वयं एक असाधारण शक्ति और अनुशासन से संपन्न मस्तिष्क की गवाही देता है।
अलेक्जेंड्रिया और टॉलेमिक दरबार
जिस संसार में Euclid रहते और काम करते थे, उसे समझने के लिए अलेक्जेंड्रिया शहर को और 323 ईसा पूर्व में Alexander the Great की मृत्यु के बाद के वर्षों में टॉलेमिक दरबार के इर्द-गिर्द पनपी उस असाधारण बौद्धिक संस्कृति को समझना आवश्यक है। अलेक्जेंड्रिया कोई प्राचीन नगर नहीं था; यह एक नई रचना थी, जिसे 331 ईसा पूर्व में Alexander ने स्वयं नील डेल्टा के पश्चिमी किनारे पर उस स्थान पर स्थापित किया था, जो अपने प्राकृतिक बंदरगाह और भूमध्यसागरीय दुनिया तथा मिस्र की मुख्यभूमि के बीच अपनी रणनीतिक स्थिति के लिए चुना गया था। जब Alexander बिना किसी शासन-योग्य आयु के उत्तराधिकारी के मर गए, तो उनके सेनापतियों ने उनके विशाल साम्राज्य को आपस में बाँट लिया। मिस्र Ptolemy पुत्र Lagus के हिस्से में आया — जो Alexander के सबसे विश्वसनीय सेनापतियों में से एक थे — जिन्होंने टॉलेमीज़ के नाम से जाने जाने वाले राजवंश की स्थापना की और लगभग 283 ईसा पूर्व में अपनी मृत्यु तक मिस्र पर Ptolemy I Soter — अर्थात् Ptolemy the Savior — के रूप में शासन किया।
Ptolemy I एक असामान्य सांस्कृतिक महत्वाकांक्षा वाले शासक थे। वे समझते थे कि एक नया राजवंश, चाहे सैन्य दृष्टि से कितना भी सशक्त हो, उसे उन विविध जनसमूहों की दृष्टि में — यूनानियों, मकदूनियों, मिस्रियों और यहूदियों की नज़र में — अपनी वैधता सिद्ध करनी होगी, और उन्होंने यह कार्य आंशिक रूप से विद्या, धर्म और कलाओं के उदार संरक्षण के एक भव्य कार्यक्रम के माध्यम से किया। उन्होंने दो असाधारण संस्थाओं की स्थापना की, या उनकी नींव डालना आरंभ किया, जो सदियों तक अलेक्जेंड्रिया को प्राचीन विश्व की बौद्धिक राजधानी बनाए रखेंगी: अलेक्जेंड्रिया का पुस्तकालय, जिसका लक्ष्य दुनिया की सभी पुस्तकों को संग्रहीत करना था, और Mouseion अर्थात् Museum — पुस्तकालय से संलग्न एक शोध संस्था, जहाँ समस्त यूनानी जगत के विद्वान राजा के खर्च पर रह सकते थे, काम कर सकते थे और पढ़ा सकते थे, तथा शैक्षणिक जीवन के सामान्य आर्थिक दबावों से मुक्त रह सकते थे।
मूसेइओन को आंशिक रूप से एथेंस के दार्शनिक विद्यालयों — Plato की Academy और Aristotle के Lyceum — की तर्ज पर बनाया गया था, लेकिन यह उनसे कहीं अधिक भव्य पैमाने पर संचालित होता था, जिसमें राजकीय वित्त पोषण, स्थायी सुविधाएँ, सामूहिक भोजन व्यवस्था, और विद्वानों के लिए वेतन की सुविधा थी। माना जाता है कि Euclid टॉलेमी के संरक्षण की इसी उर्वर भूमि में रहे और काम किया। Proclus हमें बताते हैं कि Euclid "प्रथम Ptolemy के समय" सक्रिय थे, और Ptolemy I द्वारा ज्यामिति सीखने का कोई संक्षिप्त रास्ता पूछने वाला किस्सा Euclid को राजदरबार से जोड़ता है। यह मानना स्वाभाविक है कि Euclid उन प्रारंभिक विद्वानों में से एक थे जो टॉलेमी के संरक्षण से आकर्षित होकर अलेक्जेंड्रिया आए थे — संभवतः Demetrius of Phalerum के निमंत्रण पर, जो एथेंस के उस राजनेता और बुद्धिजीवी थे जिन्होंने Ptolemy I के सलाहकार के रूप में कार्य किया और जिन्हें उस महान पुस्तक-संग्रह परियोजना की शुरुआत का श्रेय दिया जाता है।
अलेक्जेंड्रिया का पुस्तकालय एक किंवदंती बन गया। प्राचीन स्रोतों के अनुसार इसका लक्ष्य ग्रीक भाषा में लिखी गई हर पुस्तक की एक प्रति अपने पास रखना था, और कहा जाता है कि Ptolemy के दूत अलेक्जेंड्रिया के बंदरगाह में प्रवेश करने वाले हर जहाज़ पर चढ़ जाते थे और जो भी किताबें मिलती थीं उन्हें ज़ब्त कर लेते थे — उनकी नकल तैयार करवाकर नकल वापस कर देते थे और असली प्रतियाँ अपने पास रख लेते थे। यह कहानी पूरी तरह सटीक है या नहीं, यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना कि इससे झलकने वाला माहौल: यह एक ऐसा नगर और एक ऐसा दरबार था जहाँ ज्ञान का संग्रह और उसकी प्रगति राजकीय नीति का विषय थी, जहाँ विद्वानों को मूल्य दिया जाता था और उनका समर्थन किया जाता था, और जहाँ यूनानी जगत की संचित विद्वत्ता को एकत्र कर व्यवस्थित किया जा रहा था। Euclid जैसी प्रतिभा और संगठन-कौशल रखने वाले गणितज्ञ के लिए यह एक आदर्श वातावरण था।
अलेक्जेंड्रिया स्वयं प्राचीन विश्व का एक अजूबा था — भूमध्यसागर के तट पर सुनियोजित ग्रिड योजना पर बसा यह नगर चौड़े राजमार्गों, भव्य सार्वजनिक इमारतों, और प्रसिद्ध फ़ारोस प्रकाश स्तंभ — जो प्राचीन विश्व के सात आश्चर्यों में से एक था — से सुसज्जित था, जो उसके दोहरे बंदरगाह की रक्षा करता था। यह शुरू से ही एक महानगरीय नगर था, जो भूमध्यसागर और निकट पूर्व के कोने-कोने से व्यापारियों, विद्वानों, दार्शनिकों और कारीगरों को अपनी ओर खींचता था। यहाँ पनपी द्विभाषी यूनानी-मिस्री संस्कृति इससे पहले कभी अस्तित्व में नहीं रही थी। यूनानी भाषा शिक्षा और प्रशासन की भाषा बनी रही, लेकिन मिस्री धार्मिक परंपराएँ, कलात्मक रीतियाँ और बौद्धिक व्यवहार हेलेनिक परंपराओं के साथ इस तरह घुलमिल गए कि एक समृद्ध और विशिष्ट संस्कृति का जन्म हुआ।
इस वातावरण में गणित फला-फूला। मूसेइओन ने न केवल शुद्ध गणितज्ञों को, बल्कि खगोलविदों, चिकित्सकों, इंजीनियरों, कवियों और दार्शनिकों को भी आकर्षित किया, और विभिन्न विषयों के बीच यह परस्पर प्रभाव प्रारंभिक टॉलेमी काल की बौद्धिक जीवंतता का एक प्रमुख स्रोत था। Euclid की रुचियों का अपना विस्तार — उन्होंने प्रकाशिकी और खगोलशास्त्र पर भी लिखा, न कि केवल शुद्ध गणित पर — इसी अंतर-विषयक माहौल को दर्शाता है। उनकी Optics, उदाहरण के लिए, दृश्य किरणों के व्यवहार पर ज्यामितीय तर्क को लागू करती है — एक ऐसी समस्या जो गणित और प्राकृतिक दर्शन के संगम पर खड़ी थी। उनकी Phaenomena खगोलशास्त्र के प्रश्नों पर गोलीय ज्यामिति को लागू करती है। टॉलेमी के दरबार ने Euclid को केवल काम करने की जगह नहीं दी; उसने एक ऐसी संस्कृति दी जिसमें अमूर्त गणित और प्राकृतिक जगत की समझ के बीच के संबंध को गंभीरता से लिया जाता था और राजकीय समर्थन के साथ आगे बढ़ाया जाता था।
नील नदी के मुहाने पर स्थित होने के कारण अलेक्जेंड्रिया को प्राचीन भूमध्यसागरीय क्षेत्र और निकट पूर्व के व्यापार मार्गों तक अतुलनीय पहुँच प्राप्त थी। ग्रीस, रोम, कार्थेज, फोनीशिया, काला सागर के बंदरगाहों, अरब और भारत से जहाज़ इसके बंदरगाह से गुज़रते थे और अपने साथ ज्ञात दुनिया के हर कोने से सामान, विचार और विद्वान लाते थे। कुछ प्राचीन स्रोतों के अनुसार शहर की आबादी अपने चरमोत्कर्ष पर लगभग पाँच लाख के करीब थी, जिससे यह प्राचीन विश्व के सबसे बड़े शहरों में से एक बन गया था। यह असाधारण सांस्कृतिक विविधता वाला शहर था, जिसमें ग्रीक, यहूदी, मिस्री और अनेक अन्य समुदाय एक साझी शहरी संस्कृति में भागीदारी करते हुए भी अपनी अलग पहचान बनाए रखते थे। ऐसे शहर का बौद्धिक जीवन इस विविधता से समृद्ध होना स्वाभाविक था: म्यूज़ियन महज़ एक ऐसी ग्रीक संस्था नहीं थी जिसे विदेशी ज़मीन पर रोप दिया गया हो, बल्कि यह वास्तव में एक बहुसांस्कृतिक संस्था थी जो कई बौद्धिक परंपराओं से ऊर्जा ग्रहण करती थी और विविध पृष्ठभूमियों तथा विद्वत्तापूर्ण रुचियों वाले श्रोताओं की सेवा करती थी।
जिस मिस्र में Euclid ने काम किया, वह एक अत्यंत प्राचीन गणितीय परंपरा का वारिस भी था। Euclid के जन्म से हज़ारों वर्ष पहले से मिस्री लिपिक भूमि क्षेत्रफल, अनाज की मात्रा और पिरामिड के आयामों की गणनाएँ करते आ रहे थे। राइंड मैथेमेटिकल पेपिरस और मॉस्को मैथेमेटिकल पेपिरस — जो Euclid से एक हज़ार से भी अधिक वर्ष पुराने हैं — यह दर्शाते हैं कि मिस्री गणितज्ञ व्यावहारिक ज्यामितीय समस्याओं पर सुव्यवस्थित, भले ही गैर-सैद्धांतिक, तरीके से काम करते थे। Euclid का दृष्टिकोण बिल्कुल अलग था — अमूर्त, सैद्धांतिक और प्रमाण-आधारित — लेकिन वे एक ऐसी धरती पर काम कर रहे थे जहाँ व्यावहारिक गणना को सदा महत्त्व दिया जाता था, और पुस्तकालय तथा म्यूज़ियन में उनके संस्थागत आवास ने उन्हें मिस्र, बेबीलोन और व्यापक ग्रीक जगत की लिखित परंपराओं तक पहुँच प्रदान की। एलिमेंट्स किसी अर्थ में इस समूची परंपरा का चरमबिंदु था — वह क्षण जब निकट पूर्व के व्यावहारिक गणनात्मक ज्ञान, ग्रीक गणितज्ञों की सैद्धांतिक ज्यामिति और प्लेटोनिक दार्शनिक परंपरा की तार्किक कठोरता सब एक साथ मिलकर एक एकल, निर्णायक रचना में समाहित हो गए।
एलिमेंट्स: संरचना और सिंहावलोकन
Euclid के एलिमेंट्स — ग्रीक में Stoicheia — तेरह पुस्तकों का एक संग्रह है जो गणित के विशाल क्षेत्र को समेटता है: समतल ज्यामिति के अत्यंत प्रारंभिक सिद्धांतों से लेकर संख्या सिद्धांत, अनुपात सिद्धांत और ठोस ज्यामिति तक, और अंततः प्लेटोनिक ठोस के नाम से जाने जाने वाले पाँच नियमित बहुफलकों के निर्माण और वर्गीकरण तक। यह एक साथ पाठ्यपुस्तक, शोध संकलन और गणितीय ज्ञान की प्रकृति तथा उसे कैसे संगठित किया जाना चाहिए — इस विषय पर एक दार्शनिक वक्तव्य भी है।
एलिमेंट्स की प्रतिभा किसी एकल प्रमेय में नहीं है — जिनमें से अधिकांश Euclid से पहले ही ज्ञात थे — बल्कि समग्र तार्किक स्थापत्य में है। Euclid प्रत्येक पुस्तक की, और विशेष रूप से महान प्रथम पुस्तक की, शुरुआत स्पष्ट आधारभूत तत्त्वों से करते हैं: परिभाषाएँ जो बताती हैं कि गणितीय वस्तुएँ क्या हैं, अभिगृहीत जो इन वस्तुओं के मूलभूत माने गए गुण हैं, और सामान्य धारणाएँ जो किसी भी क्षेत्र में लागू होने वाले सामान्य तार्किक सिद्धांत हैं। इन आधारों से वे प्रत्येक परवर्ती परिणाम को केवल तार्किक तर्क के बल पर निगमित करते हैं और हर कदम पर यह स्पष्ट करते हैं कि नया प्रस्ताव किन पूर्व परिणामों पर निर्भर करता है। परिणाम एक भव्य पदक्रमिक संरचना है जिसमें बाद के परिणाम पहले के परिणामों पर आधारित होते हैं और तार्किक श्रृंखला की प्रत्येक कड़ी दृश्यमान होती है।
यह दृष्टिकोण — जिसे हम आज स्वयंसिद्ध विधि (axiomatic method) कहते हैं — पूरी तरह Euclid की मौलिक खोज नहीं था। इससे पहले के यूनानी गणितज्ञ भी प्रमाण और तार्किक तर्क-वितर्क का उपयोग करते थे, और Euclid के समय से पहले भी ज्यामिति के संग्रह या पाठ्यपुस्तकें मौजूद थीं। Proclus ने कई पूर्ववर्ती लेखकों का उल्लेख किया है जिन्होंने Elements जैसे ग्रंथ लिखे, जिनमें पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व में Chios के Hippocrates भी शामिल हैं। लेकिन Euclid की उपलब्धि यह थी कि उन्होंने इतने व्यापक दायरे, कठोरता और तार्किक पूर्णता का एक ऐसा संश्लेषण प्रस्तुत किया कि इससे पहले के सभी कार्य अनावश्यक हो गए और अंततः लुप्त हो गए — उनकी सामग्री Elements में समा गई। गणित के इतिहासकार D. E. Smith ने टिप्पणी की थी कि Elements अब तक लिखी गई सबसे सफल पाठ्यपुस्तक है, और यह निर्णय आज भी उतना ही सटीक है: Elements को एक मानक शिक्षण ग्रंथ के रूप में, केवल मामूली बदलावों के साथ, दो हज़ार से अधिक वर्षों तक उपयोग किया गया — लगभग 300 ईसा पूर्व में इसकी रचना से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी तक।
Elements की तेरह पुस्तकें स्वाभाविक रूप से तीन व्यापक खंडों में विभाजित होती हैं। पुस्तक I से VI तक समतल ज्यामिति से संबंधित हैं — दो आयामों में बनने वाली आकृतियाँ, जिनमें त्रिभुज, आयत, वृत्त और उनके परस्पर संबंध शामिल हैं। पुस्तक VII से IX तक अंकगणित और प्रारंभिक संख्या सिद्धांत पर केंद्रित हैं, जिनमें पूर्ण संख्याओं, अभाज्य संख्याओं और अनुपातों के गुणधर्मों की खोज की गई है। पुस्तक X कुछ अलग खड़ी है — यह अपरिमेय राशियों की एक उल्लेखनीय और विस्तृत विवेचना है, यानी ऐसी मात्राएँ जिन्हें पूर्ण संख्याओं के अनुपात के रूप में व्यक्त नहीं किया जा सकता। पुस्तक XI से XIII तक त्रि-आयामी अंतरिक्ष की ज्यामिति यानी ठोस ज्यामिति से संबंधित हैं, जो इस प्रमाण के साथ समाप्त होती हैं कि ठीक पाँच नियमित बहुफलक (regular polyhedra) ही संभव हैं।
Euclid ने अपने कई पूर्ववर्तियों के कार्य से सहायता ली। पुस्तक V में अनुपात का सिद्धांत मुख्यतः Cnidus के Eudoxus की देन है, जिन्होंने इसे ऐसी मात्राओं के अनुपातों को संभालने के लिए विकसित किया था जो असंगणनीय (incommensurable) हो सकती थीं। पुस्तक X में अपरिमेय मात्राओं की विवेचना Theaetetus के कार्य से गहराई से जुड़ी है — वही गणितज्ञ जिन्हें Plato के उसी नाम के संवाद में अमर किया गया है, और जिन्हें अपरिमेय राशियों के वर्गीकरण का श्रेय दिया जाता है। पुस्तक VII–IX की संख्या सिद्धांत यूनानी अंकगणितीय अन्वेषण की एक लंबी परंपरा पर आधारित है। Euclid का योगदान नए प्रमेय खोजने के अर्थ में मौलिकता नहीं था, बल्कि यह सर्वोच्च संगठनात्मक मौलिकता थी: उन्होंने सही आरंभ बिंदु चुने, प्रमेयों को सही क्रम में व्यवस्थित किया, और उन परिणामों के लिए कठोर प्रमाण प्रस्तुत किए जिन्हें पहले केवल शिथिल या अपूर्ण रूप से प्रदर्शित किया गया था।
Elements, अपने नाम के बावजूद, आधुनिक संकुचित अर्थ में केवल ज्यामिति की रचना नहीं है। इसे बेहतर ढंग से उस गणितीय ज्ञान के व्यवस्थित विवेचन के रूप में वर्णित किया जा सकता है जिसे उस काल के शिक्षित यूनानी सबसे मौलिक मानते थे। प्राचीन यूनानी गणित की अवधारणा हमारी आधुनिक विषयगत सीमाओं से काफी व्यापक थी — इसमें वह सब कुछ समाहित था जिसे हम आज ज्यामिति, संख्या सिद्धांत और बाद में बीजगणित कहलाने वाले विषय के कुछ पहलू कहेंगे। Euclid का Elements इन सभी क्षेत्रों को एक ही निगमनात्मक विधि और मूलभूत मान्यताओं के एकल समुच्चय के अंतर्गत एकीकृत करता है।
पुस्तक I: आधारभूत सिद्धांत और समानांतर अभिधारणा
पुस्तक I, Elements का सबसे प्रसिद्ध और सर्वाधिक अध्ययन किया गया भाग है, और इसके अच्छे कारण हैं। यहीं Euclid वे तार्किक नींव रखते हैं जिन पर बाकी सब कुछ टिका है, और यहीं वे गणित के इतिहास के कुछ सबसे प्रसिद्ध परिणाम प्रस्तुत करते हैं — जिनमें वह प्रमेय भी शामिल है जिसे आज सार्वभौमिक रूप से पाइथागोरस प्रमेय के नाम से जाना जाता है। पुस्तक I की संरचना का पश्चिमी परंपरा की किसी भी अन्य गणितीय रचना से अधिक अध्ययन, प्रशंसा, आलोचना और अनुकरण किया गया है।
Euclid ने पुस्तक I की शुरुआत तेईस परिभाषाओं से की है। ये परिभाषाएँ सबसे बुनियादी — "बिंदु वह है जिसका कोई भाग नहीं होता," "रेखा एक बिना चौड़ाई की लंबाई है" — से लेकर अधिक जटिल संरचनाओं तक फैली हुई हैं। कुछ परिभाषाएँ आधुनिक पाठकों को उलझाने वाली या अधूरी लगती हैं; उदाहरण के लिए, सीधी रेखा की परिभाषा — "एक ऐसी रेखा जो अपने ऊपर के बिंदुओं के साथ समान रूप से स्थित हो" — उतनी सटीक नहीं है जितनी एक आधुनिक गणितज्ञ चाहता। लेकिन ये प्रारंभिक परिभाषाएँ एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य पूरा करती हैं: ये उस शब्दावली से परिचय कराती हैं जो पूरी पुस्तक में प्रयुक्त होगी और यह स्पष्ट करती हैं कि किन वस्तुओं का अध्ययन किया जा रहा है। क्या ये कठोर तार्किक परिभाषाओं के रूप में सफल होती हैं — यह प्रश्न बाद के गणितज्ञों ने उठाया, लेकिन पाठक को विषय से परिचित कराने के तरीके के रूप में ये उल्लेखनीय रूप से प्रभावी हैं।
परिभाषाओं के बाद पाँच अभिगृहीत आते हैं। ये गणित के इतिहास के सबसे प्रसिद्ध पाँच वाक्य हैं। पहले तीन अपेक्षाकृत निर्विवाद हैं — ये बताते हैं कि किसी भी बिंदु से किसी अन्य बिंदु तक एक सीधी रेखा खींची जा सकती है, किसी भी परिमित सीधी रेखा को सीधी दिशा में अनिश्चित काल तक बढ़ाया जा सकता है, और किसी भी केंद्र और किसी भी त्रिज्या से एक वृत्त खींचा जा सकता है। चौथा अभिगृहीत कहता है कि सभी समकोण एक-दूसरे के बराबर होते हैं — एक ऐसा कथन जो समतल की एकरूपता के बारे में एक प्रकार के दावे की तरह काम करता है। लेकिन पाँचवाँ अभिगृहीत ही वह है जिसने पूरे विषय के इतिहास में किसी भी अन्य एकल कथन से अधिक गणितीय विवाद उत्पन्न किया है।
पाँचवाँ अभिगृहीत कहता है: यदि एक सीधी रेखा दो सीधी रेखाओं पर इस प्रकार पड़े कि एक ही ओर के अंतःकोणों का योग दो समकोणों से कम हो, तो वे दोनों सीधी रेखाएँ, यदि अनिश्चित काल तक बढ़ाई जाएँ, तो उस ओर मिलेंगी जहाँ कोण दो समकोणों से कम हैं। यह एक ऐसा कथन है जो बताता है कि जब दो रेखाओं को एक तिर्यक रेखा काटती है और बने कोण दो समकोणों के बराबर नहीं होते, तब क्या होता है। अब अधिक परिचित रूप में, जिसे कभी-कभी Playfair का अभिगृहीत कहा जाता है, यह इस कथन के तुल्य है कि किसी दी गई रेखा पर न स्थित किसी दिए गए बिंदु से, उस रेखा के समांतर ठीक एक रेखा खींची जा सकती है। यही प्रसिद्ध समांतर अभिगृहीत है।
पाँचवें अभिगृहीत के बारे में यूनानी पाठकों और बाद के गणितज्ञों को जो बात अखरी, वह थी इसकी जटिलता। अन्य चार अभिगृहीत संक्षिप्त और सहजबोध से स्पष्ट हैं; पाँचवाँ लंबा, सशर्त और एक ऐसी स्थानिक अनुभूति की माँग करता है जिसे परिभाषित करना कठिन है। Euclid के तुरंत बाद यूनानी गणितज्ञों को संदेह होने लगा कि समांतर अभिगृहीत वास्तव में स्वतंत्र नहीं है — कि इसे शेष चार से सिद्ध किया जाना चाहिए। दो हजार वर्षों तक दुनिया के सबसे प्रतिभाशाली गणितीय मस्तिष्क समांतर अभिगृहीत को अन्य स्वयंसिद्धों से सिद्ध करने का प्रयास करते रहे, और हर प्रयास अंततः दोषपूर्ण निकला। विफलता की यह लंबी कहानी अंततः उन्नीसवीं शताब्दी में इतिहास की सबसे क्रांतिकारी बौद्धिक खोजों में से एक तक पहुँची: यह अनुभूति कि ऐसी सुसंगत ज्यामितियाँ अस्तित्व में हैं जिनमें समांतर अभिगृहीत असत्य है।
पाँच अभिगृहीतों के बाद Euclid पाँच सामान्य धारणाएँ प्रस्तुत करते हैं। ये सामान्य तार्किक सिद्धांत हैं जो केवल ज्यामिति तक सीमित नहीं हैं, जैसे "जो वस्तुएँ एक ही वस्तु के बराबर हों, वे आपस में भी बराबर होती हैं" और "संपूर्ण अपने भाग से बड़ा होता है।" इन सामान्य धारणाओं को अभिगृहीतों से इस आधार पर अलग किया गया है कि ये सार्वभौमिक रूप से लागू होती हैं, न कि केवल ज्यामितीय आकृतियों पर।
इन तेईस परिभाषाओं, पाँच अभिगृहीतों और पाँच सामान्य धारणाओं के आधार पर Euclid सैंतालीस प्रमेयों की व्युत्पत्ति करते हैं। शुरुआती प्रमेय रचनाओं से संबंधित हैं — किसी दिए गए रेखाखंड पर समबाहु त्रिभुज कैसे बनाएँ, किसी कोण को कैसे समद्विभाजित करें, लंब कैसे खींचें। इनके बाद त्रिभुजों और उनकी सर्वांगसमता की शर्तों से जुड़ी प्रमेयों की एक श्रृंखला आती है। पुस्तक का मध्य भाग समानांतर रेखाओं और समांतर चतुर्भुजों से संबंधित है। और पुस्तक I का चरमोत्कर्ष प्रमेय 47 है, जो उसे सिद्ध करती है जिसे हम पाइथागोरस प्रमेय कहते हैं: किसी समकोण त्रिभुज में, कर्ण पर बने वर्ग का क्षेत्रफल शेष दोनों भुजाओं पर बने वर्गों के क्षेत्रफलों के योग के बराबर होता है।
पाइथागोरस प्रमेय का Euclid का उपपत्ति गणित के समस्त इतिहास में सर्वाधिक प्रशंसित उपपत्तियों में से एक है। इसमें समकोण त्रिभुज की प्रत्येक भुजा पर वर्ग बनाए जाते हैं, समकोण के शीर्ष से कर्ण पर एक लंब खींचा जाता है, और फिर त्रिभुजों तथा समांतर चतुर्भुजों के क्षेत्रफलों से जुड़े चरणों की एक श्रृंखला के माध्यम से यह प्रदर्शित किया जाता है कि कर्ण पर बना वर्ग दो ऐसे आयतों में विभाजित हो जाता है जिनके क्षेत्रफल क्रमशः दोनों लंब भुजाओं पर बने वर्गों के क्षेत्रफलों के बराबर हैं। यह उपपत्ति कठोर, सुंदर और पहले छियालीस प्रमेयों के ढाँचे के भीतर पूर्णतः आत्मनिर्भर है। यह Euclid की संगठनात्मक प्रतिभा को उसके सर्वोत्तम रूप में दर्शाती है: जब तक हम प्रमेय 47 तक पहुँचते हैं, उपपत्ति के लिए आवश्यक प्रत्येक साधन पहले ही स्थापित किया जा चुका होता है। कुछ भी मान्यता के रूप में नहीं लिया जाता; सब कुछ अर्जित किया जाता है।
पुस्तक I की अंतिम प्रमेय, प्रमेय 48, उसका विलोम है: यदि किसी त्रिभुज की एक भुजा पर बने वर्ग का क्षेत्रफल शेष दोनों भुजाओं पर बने वर्गों के क्षेत्रफलों के योग के बराबर हो, तो पहली भुजा के सामने का कोण समकोण होता है। यह सुंदर सममिति — प्रमेय के तुरंत बाद उसका विलोम — एक विशिष्ट शैली है जो Elements में बार-बार दिखाई देती है।
पुस्तक I इस दृष्टि से भी उल्लेखनीय है कि Euclid ने जितना संभव हो सके, उतने लंबे समय तक समांतर अभिगृहीत के उपयोग से बचने की सावधानी बरती है। पुस्तक I की पहली अट्ठाईस प्रमेयों को समांतर अभिगृहीत के बिना सिद्ध किया जा सकता है; केवल प्रमेय 29 से आगे Euclid इसका प्रयोग करते हैं। यह संयोग नहीं है: Euclid पाँचवें अभिगृहीत की विशेष और विवादास्पद प्रकृति से परिचित प्रतीत होते हैं, और उन्होंने स्पष्ट रूप से सोच-समझकर इसके उपयोग को यथासंभव टाला, यह प्रदर्शित करते हुए कि इसके बिना कितनी अधिक ज्यामिति का निर्माण किया जा सकता है। पुस्तक I का वह भाग जिसमें समांतर अभिगृहीत की आवश्यकता नहीं पड़ती, कभी-कभी परम ज्यामिति या तटस्थ ज्यामिति कहलाता है, और उन्नीसवीं शताब्दी में गैर-यूक्लिडीय ज्यामितियों की खोज के बाद यह और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया।
पुस्तकें II–VI: समतल ज्यामिति
Elements की पुस्तकें II से VI समतल ज्यामिति के विकास को आगे बढ़ाती हैं और पुस्तक I के परिणामों को क्रमशः अधिक परिष्कृत दिशाओं में विस्तारित करती हैं। ये पुस्तकें मिलकर Euclid के स्वयंसिद्ध ढाँचे के भीतर समतल आकृतियों के बीच ज्यामितीय संबंधों का एक व्यापक विवेचन प्रस्तुत करती हैं।
पुस्तक II आधुनिक दृष्टिकोण से एक संक्षिप्त और कुछ हद तक पहेलीनुमा पुस्तक है, जो उस विषय से संबंधित है जिसे विद्वान अब ज्यामितीय बीजगणित कहते हैं। इसकी चौदह प्रमेयें आयतों और अन्य सरलरेखीय आकृतियों के क्षेत्रफलों से जुड़ी हैं, और ये प्रभावी रूप से उन बीजगणितीय तत्समकों को ज्यामितीय भाषा में व्यक्त करती हैं जिन्हें हम आज प्रतीकों से लिखते हैं। उदाहरण के लिए, एक प्रमेय ज्यामितीय रूप से वह बात सिद्ध करती है जिसे हम आज (a + b)² = a² + 2ab + b² लिखते हैं, जबकि दूसरी उसके ज्यामितीय समतुल्य को प्रस्तुत करती है जिसे हम (a − b)² = a² − 2ab + b² लिखते हैं। Euclid के पास, निस्संदेह, कोई बीजगणितीय संकेत प्रणाली नहीं थी; ये परिणाम रेखाओं, आयतों और वर्गों के संदर्भ में व्यक्त और सिद्ध किए गए थे। पुस्तक II का उद्देश्य आंशिक रूप से पुस्तक X में अपरिमेय राशियों के विवेचन के लिए आवश्यक ज्यामितीय साधन प्रदान करना है और आंशिक रूप से यह प्रदर्शित करना है कि बीजगणितीय संक्रियाओं को विशुद्ध ज्यामितीय रूप में कैसे व्यक्त किया जा सकता है — जो अंकगणितीय की तुलना में ज्यामितीय तर्कपद्धति के प्रति यूनानियों की विशिष्ट प्राथमिकता को दर्शाता है।
पुस्तक III वृत्तों की ज्यामिति को लेती है, जो ग्रीक गणित में सबसे महत्वपूर्ण विषयों में से एक हैं। इसके सैंतीस प्रमेय वृत्तों के मूलभूत गुणों को स्थापित करते हैं: जीवाओं और चापों के बारे में प्रमेय, वृत्तों में कोणों के बारे में, स्पर्श रेखाओं और उनके गुणों के बारे में, तथा उन वृत्तों के बीच संबंधों के बारे में जो एक-दूसरे को काटते हैं या स्पर्श करते हैं। पुस्तक III का एक सबसे महत्वपूर्ण परिणाम वह प्रमेय है जिसके अनुसार किसी जीवा द्वारा वृत्त के केंद्र पर बना कोण, उसी जीवा द्वारा परिधि पर उसी ओर किसी भी बिंदु पर बने कोण का दोगुना होता है। यह प्रमेय, और इसी जैसे अन्य प्रमेय, समतल ज्यामिति और गोलीय खगोल विज्ञान दोनों के विकास के लिए आवश्यक सिद्ध हुए।
पुस्तक IV वृत्तों में अंतर्निहित और वृत्तों के बाह्य परिगत नियमित बहुभुजों से संबंधित है। इसके सोलह प्रमेय यह दर्शाते हैं कि वृत्तों में समबाहु त्रिभुज, वर्ग, नियमित षट्भुज और नियमित पंद्रह भुजाओं वाले बहुभुज कैसे अंकित किए जाएं, तथा इन आकृतियों के परितः वृत्त कैसे परिगत किए जाएं। पुस्तक IV का सबसे उल्लेखनीय भाग — अनेक पाठकों के लिए — नियमित पंचभुज का निर्माण है, जो एक काफी कठिन समस्या है और जिसके लिए स्वर्णिम अनुपात तथा पुस्तक II में विकसित निर्माण तकनीकों का उपयोग आवश्यक है। Euclid का पंचभुज समस्या का सुंदर समाधान कई पूर्ववर्ती पुस्तकों के परिणामों पर आधारित है, जो एक बार फिर Elements की तार्किक संरचना की संचयी शक्ति को उजागर करता है।
पुस्तक V गणितीय दृष्टि से Elements की सबसे गहन पुस्तकों में से एक है, हालाँकि यह सबसे अमूर्त पुस्तकों में से भी एक है। यह Eudoxus of Cnidus द्वारा विकसित अनुपात के सिद्धांत को प्रस्तुत करती है — एक ऐसा सिद्धांत जो विशेष रूप से उन परिमाणों के अनुपातों को संभालने के लिए बनाया गया था जो अतुल्यमापी हो सकते हैं, अर्थात ऐसे परिमाण जिनका अनुपात पूर्ण संख्याओं के अनुपात के रूप में व्यक्त नहीं किया जा सकता। यह स्थिति एक वर्ग के विकर्ण और उसकी भुजा के साथ तुरंत उत्पन्न होती है, जिनका अनुपात दो का वर्गमूल है — एक ऐसी राशि जिसे ग्रीकों ने सिद्ध किया कि यह किन्हीं भी दो पूर्ण संख्याओं का अनुपात नहीं है।
Eudoxus की अनुपात की परिभाषा, जिसे Euclid पुस्तक V में प्रस्तुत करते हैं, अत्यंत सूक्ष्म और परिष्कृत है। दो अनुपातों A:B और C:D को बराबर कहा जाता है यदि धनात्मक पूर्णांकों m और n के किसी भी युग्म के लिए, जब भी mA, nB से बड़ा हो तो mC, nD से बड़ा हो; जब भी mA, nB के बराबर हो तो mC, nD के बराबर हो; और जब भी mA, nB से छोटा हो तो mC, nD से छोटा हो। यह परिभाषा अतुल्यमापी परिमाणों की कठिनाई को पूरी तरह से दरकिनार कर देती है, क्योंकि यह अनुपात को ऐसी तुलनाओं के आधार पर परिभाषित करती है जो हमेशा की जा सकती हैं, चाहे प्रत्यक्ष माप संभव न हो। यह प्राचीन गणित की महान बौद्धिक उपलब्धियों में से एक है, और यह उन्नीसवीं सदी में Richard Dedekind द्वारा वास्तविक संख्याओं के कठोर उपचार से दो हजार से भी अधिक वर्ष पहले की है — Dedekind की परिभाषा, जो परिमेय संख्याओं में "कट्स" के माध्यम से वास्तविक संख्या को परिभाषित करती है, संरचनात्मक रूप से Eudoxus की परिभाषा से बहुत मिलती-जुलती है।
पुस्तक VI, पुस्तक V के अनुपात के सिद्धांत को समतल ज्यामिति पर लागू करती है। इसके तैंतीस प्रमेय समरूप आकृतियों से संबंधित हैं — ऐसी आकृतियाँ जिनका आकार समान होता है किंतु आकार जरूरी नहीं कि समान हो। Euclid अनेक अन्य परिणामों के साथ यह भी सिद्ध करते हैं कि समरूप त्रिभुजों की भुजाएँ आनुपातिक होती हैं; कि एक समकोण त्रिभुज के समकोण से कर्ण पर डाला गया लंब, त्रिभुज को दो ऐसे त्रिभुजों में विभाजित करता है जो एक-दूसरे के और संपूर्ण त्रिभुज के समरूप हों; तथा कि समरूप सरलरेखीय आकृतियों के क्षेत्रफल उनकी संगत भुजाओं के वर्गों के अनुपात में होते हैं। समरूप आकृतियों का सिद्धांत शुद्ध गणित और उसके अनुप्रयोगों दोनों में अत्यंत उपयोगी है, और पुस्तक VI यह दर्शाकर कि समानुपातिकता और समरूपता किस प्रकार समतल की संरचना में अंतर्निहित हैं, यूक्लिडीय समतल ज्यामिति के उपचार को प्रभावी रूप से पूर्ण करती है।
Elements में समतल ज्यामिति की छह पुस्तकें मिलकर इस विषय का एक पूर्ण और अनिवार्यतः आत्मनिर्भर परिचय प्रस्तुत करती हैं, जैसा कि प्राचीन यूनानी इसे समझते थे। इनमें सर्वांगसमता और समरूपता, त्रिभुजों, वृत्तों और नियमित बहुभुजों के गुण, अनुपात का सिद्धांत, तथा क्षेत्रफलों और लंबाइयों के बीच संबंध शामिल हैं। यह सामग्री, केवल मामूली संशोधनों के साथ, दो हज़ार से अधिक वर्षों तक पश्चिमी दुनिया में माध्यमिक विद्यालय की ज्यामिति शिक्षा की मूल आधारशिला बनी रही, और Euclid के विवेचन की मुख्य रेखाएँ आज भी ज्यामिति के पाठ्यक्रमों में मानक बनी हुई हैं।
पुस्तकें VII–IX: संख्या सिद्धांत
समतल ज्यामिति से संख्या सिद्धांत की ओर बढ़ने से पहले, यह उचित होगा कि हम एक क्षण रुककर पुस्तक I से VI तक की समग्र उपलब्धि की सराहना करें। ये छह पुस्तकें मिलकर उस विषय का एक पूर्ण निगमनात्मक विवेचन प्रस्तुत करती हैं जिसे प्राचीन यूनानी समतल ज्यामिति कहते थे — अर्थात् दो आयामों में आकृतियों की ज्यामिति — और ये परिणामों की एक विशाल श्रृंखला को आच्छादित करती हैं। Euclid हर प्रकार की सरल रेखीय आकृतियों के बारे में, वृत्तों और उनके गुणों के बारे में, सर्वांगसमता और समरूपता की शर्तों के बारे में, लंबाइयों और क्षेत्रफलों के बीच संबंध के बारे में, और अपनी पूर्ण सामान्यता में अनुपात के सिद्धांत के बारे में प्रमेय सिद्ध करते हैं। फिर भी इन सैकड़ों परिणामों में से प्रत्येक तार्किक रूप से उन तेईस परिभाषाओं, पाँच स्वयंसिद्धों और पाँच सामान्य धारणाओं से निगमित होता है जो पुस्तक I के आरंभ में प्रतिपादित की गई हैं। स्वयंसिद्ध पद्धति की यह संचयी शक्ति, जो छह पुस्तकों और सैकड़ों प्रतिज्ञप्तियों में प्रदर्शित होती है, एक ऐसा दृश्य है जिसने ढाई सहस्राब्दियों से पाठकों और विद्यार्थियों को विस्मय में डाला है।
यह भी उल्लेखनीय है कि पुस्तकें I–VI की समतल ज्यामिति उस अधिकांश सामग्री को समेटे हुए है जिससे आधुनिक विद्यार्थी माध्यमिक विद्यालय के ज्यामिति पाठ्यक्रमों में परिचित होते हैं। समांतर रेखाओं और तिर्यक रेखाओं से संबंधित प्रमेय, त्रिभुजों के कोणों का योग, समांतर चतुर्भुजों और आयतों के गुण, पायथागोरस प्रमेय और उसका विलोम, वृत्तों और अंतर्लिखित कोणों के गुण, नियमित बहुभुजों की रचना, और समरूप आकृतियों के बीच संबंध — ये सभी Elements में उपस्थित हैं, और अधिकांश माध्यमिक विद्यालय के ज्यामिति पाठ्यपुस्तकें किसी न किसी स्तर पर Euclid के प्रस्तुतीकरण की सरलीकृत वंशज हैं। यह तथ्य कि कक्षा की ज्यामिति अपनी मूलभूत विषय-वस्तु में ढाई सहस्राब्दियों में इतनी कम बदली है, Euclid के विवेचन की पूर्णता का एक प्रमाण है।
पुस्तक VI से पुस्तक VII की ओर का संक्रमण Elements के सबसे उल्लेखनीय बदलावों में से एक है। Euclid रेखाओं और वृत्तों के ज्यामितीय अध्ययन को पीछे छोड़कर संख्या सिद्धांत के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं — अर्थात् धनात्मक पूर्णांकों और उनके गुणों के अध्ययन में। यह परिवर्तन केवल विषय-वस्तु का परिवर्तन नहीं है, बल्कि वैचारिक ढाँचे का भी परिवर्तन है। पुस्तकें I–VI में अध्ययन की वस्तुएँ ज्यामितीय परिमाण हैं — रेखाखंड, क्षेत्रफल, कोण — और ये अपरिमेय हो सकते हैं। पुस्तकें VII–IX में अध्ययन की वस्तुएँ यूनानी अर्थ में संख्याएँ हैं: धनात्मक पूर्ण संख्याएँ, या जिन्हें हम धनात्मक पूर्णांक कहेंगे। यूनानी गणित परिमाण और संख्या के बीच एक स्पष्ट भेद करती थी, और पुस्तकें VII–IX इस भेद को संख्या सिद्धांत के लिए विशिष्ट परिभाषाओं के एक नए समुच्चय से प्रारंभ करके प्रतिबिंबित करती हैं।
पुस्तक VII बाईस परिभाषाओं से खुलती है जो अंकगणितीय पुस्तकों की शब्दावली स्थापित करती हैं। इनमें इकाई, संख्या, सम और विषम संख्याएँ, अभाज्य और भाज्य संख्याएँ, तथा संख्याओं के "समतल" या "घन" होने की अवधारणा (जिसका अर्थ क्रमशः दो या तीन गुणनखंडों के गुणनफल के रूप में व्यक्त किए जाने योग्य) की परिभाषाएँ शामिल हैं। एक अभाज्य संख्या की परिभाषा — "केवल इकाई द्वारा मापी जाने वाली संख्या" — अनिवार्यतः आधुनिक परिभाषा के समान ही है, और यह अभाज्यता और गुणनखंडन की समस्त परवर्ती चर्चा की आधारशिला है।
पुस्तक VII का सबसे महत्वपूर्ण एल्गोरिदमिक परिणाम — और समस्त गणित के सबसे महत्वपूर्ण परिणामों में से एक — प्रमेय 1 और 2 में प्रकट होता है, जहाँ Euclid वह प्रस्तुत करते हैं जिसे अब दो संख्याओं का महत्तम समापवर्तक (GCD) ज्ञात करने के लिए यूक्लिडियन एल्गोरिदम कहा जाता है। यह एल्गोरिदम बार-बार घटाव के द्वारा, या अपने आधुनिक रूप में, शेषफल सहित बार-बार भाग के द्वारा काम करता है। दो धनात्मक पूर्णांक दिए जाने पर, छोटी संख्या को बड़ी संख्या से बार-बार घटाया जाता है; जब दोनों संख्याएँ बराबर हो जाती हैं, तो वह समान मान ही उनका GCD होता है। यह सुंदर प्रक्रिया न केवल सही है बल्कि कुशल भी है, और यह आधुनिक कम्प्यूटेशनल संख्या सिद्धांत की नींव बनी हुई है। यूक्लिडियन एल्गोरिदम गणित के सबसे पुराने एल्गोरिदमों में से एक है और सबसे व्यापक रूप से उपयोग किए जाने वाले एल्गोरिदमों में से भी एक है।
पुस्तक VII में अभाज्य संख्याओं के गुणों, विभाज्यता, लघुत्तम समापवर्त्य और संख्याओं के अनुपात की संरचना पर प्रमेय जारी रहते हैं। प्रमेय 20, जो यह दर्शाता है कि दो संख्याओं का लघुत्तम समापवर्त्य सदैव विद्यमान रहता है और उसकी रचना की जा सकती है, तथा प्रमेय 24, जो यह स्थापित करता है कि यदि कोई अभाज्य संख्या दो संख्याओं के गुणनफल को विभाजित करती है तो उसे उनमें से कम से कम एक को अवश्य विभाजित करना चाहिए — ये मौलिक महत्व के परिणाम हैं। उत्तरवर्ती प्रमेय अनिवार्य रूप से वही है जिसे आधुनिक संख्या सिद्धांतकार Euclid का लेम्मा कहते हैं, जो अभाज्य गुणनखंडन के सिद्धांत की आधारशिला है।
पुस्तक VIII गुणोत्तर श्रेणी में संख्याओं से संबंधित है — जैसे 1, 2, 4, 8, ... या 1, 3, 9, 27, ... जैसी अनुक्रम जिनमें प्रत्येक पद अपने पूर्व पद का एक निश्चित गुणज होता है। Euclid ऐसी श्रेणियों के गुणों को सिद्ध करते हैं, जिनमें पदों के बीच के संबंध और वे शर्तें शामिल हैं जिनके अंतर्गत गुणोत्तर श्रेणी की संख्याओं में सामान्य गुणनखंड होते हैं। यह पुस्तक कुछ तकनीकी है और पुस्तक VII तथा IX की तुलना में कम पढ़ी जाती है, किंतु यह पुस्तक VII के मूलभूत संख्या सिद्धांत और पुस्तक IX के अधिक प्रसिद्ध परिणामों के बीच एक सेतु का काम करती है।
पुस्तक IX Elements की सबसे प्रसिद्ध पुस्तकों में से एक है, क्योंकि इसमें गणित के इतिहास के दो सबसे विख्यात प्रमेय हैं। प्रमेय 20 यह सिद्ध करता है कि अनंत रूप से अनेक अभाज्य संख्याएँ हैं। यह उपपत्ति गणितीय तर्क का एक उत्कृष्ट नमूना है और गणितीय तर्क के सबसे व्यापक रूप से पढ़ाए जाने वाले उदाहरणों में से एक बन गई है। Euclid यह मानते हैं कि केवल परिमित रूप से अनेक अभाज्य संख्याएँ हैं, और उन्हें लिखते हैं: उन्हें p?, p?, ..., p? कहें। फिर वे उन सभी को गुणा करके एक जोड़ने से बनी संख्या पर विचार करते हैं: N = p? × p? × ... × p? + 1। यह संख्या N या तो स्वयं अभाज्य है, जिस स्थिति में यह मूल सूची में नहीं है, या यह भाज्य है, जिस स्थिति में इसका एक अभाज्य गुणनखंड है। किंतु वह अभाज्य गुणनखंड p?, p?, ..., p? में से कोई नहीं हो सकता, क्योंकि N को इनमें से किसी से भी भाग देने पर शेषफल 1 बचता है। किसी भी स्थिति में, मूल सूची में न होने वाली एक अभाज्य संख्या होती है, जो इस धारणा का खंडन करती है कि सूची पूर्ण थी। अतः अभाज्य संख्याएँ परिमित नहीं हो सकतीं; वे अनंत हैं। यह तर्क इतना स्वच्छ, इतना सरल और इतना अखंडनीय है कि इसने दो हजार से अधिक वर्षों से गणितज्ञों और विद्यार्थियों को आनंदित किया है। यह शायद अप्रत्यक्ष उपपत्ति की शक्ति का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है — जिसे यूनानी reductio ad absurdum कहते थे।
पुस्तक IX का प्रमेय 36 सम पूर्ण संख्याओं के लिए एक सूत्र देता है — वे संख्याएँ जो अपने भाजकों के योग के बराबर होती हैं। Euclid सिद्ध करते हैं कि यदि 2? − 1 अभाज्य है, तो 2??¹(2? − 1) एक पूर्ण संख्या है। 2? − 1 के रूप की अभाज्य संख्याओं को अब Mersenne अभाज्य संख्याएँ कहा जाता है, और पूर्ण संख्याओं से उन्हें जोड़ने वाला Euclid का परिणाम तब से पूर्ण संख्याओं के अध्ययन में केंद्रीय बना हुआ है। अठारहवीं शताब्दी में, Leonhard Euler ने इसका विलोम सिद्ध किया: प्रत्येक सम पूर्ण संख्या ठीक इसी रूप की होती है। क्या कोई विषम पूर्ण संख्या है — यह प्रश्न गणित की सबसे पुरानी अनसुलझी समस्याओं में से एक बना हुआ है।
पुस्तक X: अपरिमेय परिमाण
Elements की पुस्तक X पूरे संग्रह में सबसे बड़ी और कई मायनों में सबसे तकनीकी रूप से जटिल पुस्तक है। इसमें कुल एक सौ पंद्रह प्रमेय हैं — किसी भी अन्य पुस्तक से अधिक — और इसका विषय, अपरिमेय राशियों का वर्गीकरण, प्राचीन यूनानी गणित की सबसे परिष्कृत उपलब्धियों में से एक है। इतिहास में Elements के कई पाठकों को पुस्तक X अत्यंत कठिन लगी है; यहाँ तक कि अनुभवी गणितज्ञों ने भी इसे कभी-कभी प्रमेयों के एक ऐसे जंगल के रूप में वर्णित किया है जिसमें से मूलभूत तर्क को समझ पाना मुश्किल होता है। फिर भी यह एक वास्तविक बौद्धिक विजय का प्रतिनिधित्व करती है।
वह मूलभूत समस्या जो पुस्तक X को प्रेरित करती है, वह है असंमेय राशियों का अस्तित्व। यूनानियों ने पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व में किसी समय यह खोज की कि किसी वर्ग का विकर्ण उसकी भुजा के साथ असंमेय है: चाहे कोई कितनी भी छोटी इकाई चुने, कोई ऐसी इकाई नहीं है जो किसी वर्ग की भुजा और विकर्ण दोनों को बराबर-बराबर नाप सके। आधुनिक भाषा में, विकर्ण और भुजा का अनुपात दो का वर्गमूल है, और दो का वर्गमूल एक परिमेय संख्या नहीं है। यह खोज — जिसे प्राचीन स्रोतों में पाइथागोरसवादियों के, शायद Metapontum के Hippasus के, नाम पर बताया गया है, हालाँकि पूरी कहानी अस्पष्ट है — उस गणितीय परंपरा के लिए गहरे रूप से परेशान करने वाली थी जिसने यह मान लिया था कि सभी राशियों को साझा इकाइयों से मापा जा सकता है। इसने यूनानी गणितज्ञों को अनुपातों और समानुपातों से निपटने के लिए पूरी तरह नई वैचारिक संरचनाएँ विकसित करने पर मजबूर किया।
पुस्तक V में प्रस्तुत Eudoxus का समानुपात सिद्धांत इस चुनौती का एक जवाब था: इसने राशियों के अनुपातों की तुलना करने और उनके साथ काम करने का एक तरीका प्रदान किया, भले ही वे राशियाँ असंमेय हों। पुस्तक X एक दूसरा, अधिक विस्तृत जवाब है: यह उन सभी प्रकार की असंमेय राशियों का वर्गीकरण करने का प्रयास करती है जो ज्यामितीय रचनाओं से उत्पन्न हो सकती हैं, और विभिन्न प्रकार की अपरिमेय राशियों के बीच इस आधार पर अंतर करती है कि वे परिमेय राशियों से किस प्रकार बनती हैं।
पुस्तक X में Euclid का वर्गीकरण उन राशियों के बीच अंतर करता है जो किसी दी गई परिमेय राशि के साथ संमेय हैं और जो नहीं हैं, और फिर असंमेय राशियों को उनके वर्गमूलों के बीजगणितीय रूप के अनुसार विभिन्न प्रकारों में विभाजित करता है। यह वर्गीकरण तेरह अलग-अलग प्रकार की अपरिमेय राशियों को मान्यता देता है, जिनमें वे शामिल हैं जिन्हें हम परिमेय संख्याओं के वर्गमूल, ऐसे वर्गमूलों के योग और अंतर, और अधिक जटिल संयोजन कहेंगे। Euclid इस वर्गीकरण को करने के लिए जो तकनीकी उपकरण विकसित करते हैं वह अत्यंत जटिल है, जिसमें प्रमेयों की लंबी श्रृंखलाएँ शामिल हैं जो प्रत्येक प्रकार के गुणधर्मों और उनके बीच के संबंधों को स्थापित करती हैं।
आधुनिक गणितज्ञों ने कभी-कभी यह सवाल उठाया है कि क्या पुस्तक X की जटिलता उसके परिणामों द्वारा उचित ठहराई जाती है, क्योंकि Euclid जो वर्गीकरण प्राप्त करते हैं वह सही और परिष्कृत होते हुए भी सभी संभावित अपरिमेय राशियों को समाप्त नहीं करता और वास्तविक संख्याओं के पूर्ण सिद्धांत से बहुत पीछे रह जाता है। लेकिन अपनी शर्तों पर परखा जाए — केवल ज्यामितीय विधियों का उपयोग करके असंमेय राशियों के क्षेत्र में तर्कसंगत व्यवस्था लाने के प्रयास के रूप में — पुस्तक X एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। यह दर्शाती है कि अपरिमेयता की खोज, बिना समाधान के एक संकट होने से बहुत दूर, व्यवस्थित जाँच और सावधानीपूर्वक वर्गीकरण से निपटी जा सकती थी।
पुस्तकें XI–XIII: त्रि-आयामी ज्यामिति
Elements की अंतिम तीन पुस्तकें समतल से तीन-आयामी अंतरिक्ष की ओर बढ़ती हैं, और ठोस आकृतियों की ज्यामिति को उसी कठोरता और तार्किक सावधानी के साथ विकसित करती हैं जो पुस्तकें I–VI ने समतल आकृतियों को समर्पित की थी। Elements के इस अंतिम भाग को कभी-कभी उसके चरमोत्कर्ष की एक लंबी तैयारी के रूप में पढ़ा गया है: पुस्तक XIII में यह प्रमाण कि ठीक पाँच नियमित बहुफलक हैं — चतुष्फलक, घन, अष्टफलक, द्वादशफलक, और विंशतिफलक — एक परिणाम जिसे प्राचीन यूनानियों ने Plato के Timaeus और ब्रह्मांड की गहरी संरचना से घनिष्ठ रूप से जोड़ा।
पुस्तक XI की शुरुआत अट्ठाईस परिभाषाओं से होती है, जो पुस्तक I में स्थापित ज्यामितीय शब्दावली को त्रि-आयामी वस्तुओं तक विस्तारित करती हैं। इनमें ठोस, अंतरिक्ष में तल, ठोस कोण, घन, चतुष्फलक, अष्टफलक, द्वादशफलक और विंशतिफलक की परिभाषाएँ शामिल हैं। पुस्तक XI के उनतालीस प्रमेय ठोस ज्यामिति के बुनियादी परिणाम स्थापित करते हैं: कि एक सीधी रेखा किसी तल के लंबवत होती है यदि वह उस तल में अपने पाद से गुज़रने वाली प्रत्येक रेखा के लंबवत हो, कि दो तल जो समानांतर नहीं हैं, वे एक सीधी रेखा में प्रतिच्छेद करते हैं, और समानांतर तलों तथा ठोस कोणों के गुणधर्म। ये प्रमेय रेखाओं और तलों के उन प्राथमिक परिणामों के त्रि-आयामी समतुल्य हैं, जो पुस्तक I ने द्वि-आयामों में स्थापित किए थे।
पुस्तक XII वक्र और ठोस आकृतियों — वृत्त, शंकु, बेलन, पिरामिड और गोले — के क्षेत्रफल एवं आयतन की गणना को समर्पित है। इन गणनाओं को करने के लिए Euclid अपवर्जन की विधि (method of exhaustion) नामक एक तकनीक का अनिवार्य रूप से उपयोग करते हैं, जिसे Eudoxus of Cnidus ने विकसित किया था और जो कलन-पूर्व गणित में सबसे महत्त्वपूर्ण योगदानों में से एक मानी जाती है। अपवर्जन की विधि किसी वक्र या अनियमित आकृति को सरल आकृतियों की एक अनुक्रम — वृत्त में अंकित बहुभुज, या शंकु में अंकित पिरामिड — द्वारा सन्निकटित करके काम करती है, और फिर यह दर्शाती है कि सन्निकट आकृति और वास्तविक आकृति के बीच का अंतर किसी भी पूर्वनिर्धारित मात्रा से छोटा किया जा सकता है। इस माध्यम से Euclid अन्य परिणामों के साथ-साथ यह सिद्ध करते हैं कि वृत्तों के क्षेत्रफल परस्पर उनके व्यासों के वर्गों के अनुपात में होते हैं, कि किसी भी शंकु का आयतन उसी आधार और ऊँचाई वाले बेलन के आयतन का एक-तिहाई होता है, और कि गोलों के आयतन परस्पर उनके व्यासों के घनों के अनुपात में होते हैं।
अपवर्जन की विधि, पीछे मुड़कर देखने पर, समाकल कलन (integral calculus) की एक सच में उल्लेखनीय अग्रदृष्टि है। यह आधुनिक अर्थ में सीमाओं या अत्यल्पांशों (infinitesimals) का उपयोग नहीं करती, किंतु एक सुचिंतित तार्किक संरचना के माध्यम से वही परिणाम प्राप्त करती है जो अनंत की ओर किसी प्रत्यक्ष अपील से बचती है। यह अपने परिणाम reductio ad absurdum द्वारा स्थापित करती है: यदि किसी वृत्त का क्षेत्रफल उसके व्यास के वर्ग के समानुपाती नहीं होता, तो कोई अंकित बहुभुज एक निश्चित राशि से एक साथ बड़ा और छोटा दोनों होता, जो असंभव है। यह अप्रत्यक्ष दृष्टिकोण, तार्किक रूप से निर्दोष होते हुए भी, यह समझने का सबसे प्रबोधक तरीका नहीं है कि परिणाम सत्य क्यों हैं, और यह प्राचीन गणित की उन विशेषताओं में से एक है जिसे Euclid के महानतम उत्तराधिकारी Archimedes ने सीमित पाया। Archimedes ने यांत्रिक तर्क की एक "विधि" विकसित की — तुलाओं और अत्यल्पांश तर्कणा का उपयोग करते हुए — प्रमेयों की खोज के लिए, और उसके पश्चात सार्वजनिक प्रस्तुति के लिए कठोर अपवर्जन-शैली के प्रमाण प्रस्तुत किए।
पुस्तक XIII, Elements की परिणति है, और इसके अठारह प्रमेय पाँच नियमित बहुफलकों (regular polyhedra) के निर्माण और वर्गीकरण की ओर बढ़ते हैं। एक नियमित बहुफलक एक ऐसी ठोस आकृति है जिसके सभी फलक सर्वांगसम नियमित बहुभुज हों और जिसके सभी शीर्षों पर फलकों की एक समान व्यवस्था हो। ऐसे पाँच ठोस हैं — चतुष्फलक (चार समबाहु त्रिभुजाकार फलक), घन या षट्फलक (छह वर्गाकार फलक), अष्टफलक (आठ समबाहु त्रिभुजाकार फलक), द्वादशफलक (बारह नियमित पंचभुजाकार फलक), और विंशतिफलक (बीस समबाहु त्रिभुजाकार फलक)। Euclid दर्शाते हैं कि प्रत्येक को कैसे निर्मित किया जाए और एक गोले में अंकित किया जाए, और पुस्तक का — तथा समग्र Elements का — अंतिम प्रमेय यह सिद्ध करता है कि कोई अन्य नियमित बहुफलक संभव नहीं है। यह प्रमाण कि ठीक पाँच ऐसे ठोस हैं, इस तथ्य पर आधारित है कि एक ठोस कोण के लिए कम से कम तीन फलक आवश्यक हैं, और प्रत्येक शीर्ष पर फलक-कोणों का योग 360° से कम होना चाहिए; संभावित नियमित बहुभुजों (त्रिभुज, वर्ग, पंचभुज, षट्भुज आदि) पर विचार करने पर पाया जाता है कि केवल पाँच विन्यास ही इन प्रतिबंधों को संतुष्ट करते हैं।
पाँच नियमित बहुफलकों का प्लेटो से संबंध — जिन्होंने अपने संवाद *Timaeus* में इनका उपयोग चार शास्त्रीय तत्वों और संपूर्ण ब्रह्मांड को दर्शाने के लिए किया था — यही कारण है कि इन्हें प्लेटोनिक ठोस (Platonic solids) कहा जाता है। चतुष्फलक (tetrahedron) अग्नि का प्रतीक था, अष्टफलक (octahedron) वायु का, घन (cube) पृथ्वी का, और बीसफलक (icosahedron) जल का, जबकि बारह पंचभुजाकार फलकों वाला द्वादशफलक (dodecahedron) ब्रह्मांड या आकाश से जोड़ा गया था। यह तथ्य कि Euclid की *Elements* इन्हीं ब्रह्मांडीय दृष्टि से महत्वपूर्ण ठोस आकृतियों के निर्माण और वर्गीकरण के साथ समाप्त होती है, लगभग निश्चित रूप से सुविचारित है — यह एक संकेत है कि ब्रह्मांड को समझने में गणितीय तर्कणा का क्या स्थान है।
स्वयंसिद्ध विधि और गणितीय प्रमाण
शायद विचार के इतिहास में Euclid का सबसे स्थायी योगदान किसी विशेष प्रमेय में नहीं, बल्कि स्वयं उस पद्धति में निहित है। स्वयंसिद्ध विधि — अर्थात् स्पष्ट रूप से बताई गई मान्यताओं के एक छोटे से समूह से शुरू करके केवल तार्किक निगमन द्वारा सभी परवर्ती परिणाम निकालने की प्रक्रिया — Euclid के साथ शुरू नहीं हुई, परंतु Euclid ने इसे इस हद तक परिपूर्ण किया कि यह दो हजार वर्षों तक वैज्ञानिक और दार्शनिक तर्कणा का आदर्श बनी रही। यह समझने के लिए कि यह विधि क्या है और यह इतनी क्रांतिकारी बौद्धिक उपलब्धि क्यों थी, इसके विकल्पों को समझना आवश्यक है।
Euclid से पहले, व्यावहारिक गणित उस तरीके से बिल्कुल भिन्न था जिस प्रकार वह *Elements* में है। मिस्र और बेबीलोन की गणित परंपराएँ — जो भूमि माप, निर्माण कार्य और व्यापार से जुड़ी समस्याओं को सुलझाने की परिष्कृत तकनीकों वाली अत्यंत विकसित परंपराएँ थीं — मुख्यतः उदाहरण और प्रक्रिया के आधार पर काम करती थीं। एक लिपिक लिखता: "यदि आपके पास 10 इकाई भुजा वाला एक वर्गाकार भूखंड है, तो उसका क्षेत्रफल 100 वर्ग इकाई है।" यदि किसी अन्य समस्या में त्रिभुज का क्षेत्रफल निकालना हो, तो एक अलग प्रक्रिया दी जाती। तकनीकें काम करती थीं, और अक्सर अच्छी तरह काम करती थीं, लेकिन यह समझाने का कोई प्रयास नहीं किया जाता था कि वे अधिक मूलभूत सिद्धांतों के संदर्भ में काम क्यों करती हैं। ज्ञान प्रक्रियात्मक और अनुभवजन्य था, न कि सैद्धांतिक और प्रदर्शनकारी।
यूनानी दार्शनिक परंपरा, विशेष रूप से जैसी प्लेटो और अरस्तू ने उसे आकार दिया, एक भिन्न आदर्श पर बल देती थी। प्लेटो के लिए सच्चा ज्ञान केवल विश्वसनीय धारणा नहीं है — वह वह समझ है जो यह ग्रहण करती है कि कोई बात क्यों होनी ही चाहिए, न केवल यह कि वह है। अरस्तू ने इस अंतर्बोध को अपने *Posterior Analytics* में प्रदर्शन के सिद्धांत के रूप में संहिताबद्ध किया: वास्तविक वैज्ञानिक ज्ञान उन प्रमाणों से बना होता है जो तथ्यों को प्रथम सिद्धांतों से निगमित करते हैं, और प्रथम सिद्धांत स्वयं या तो परिभाषाएँ होनी चाहिए (जो बताएँ कि पदों का अर्थ क्या है), अभिधारणाएँ (postulates) (विषय-वस्तु से संबंधित ऐसे कथन जो बिना प्रमाण के स्वीकार किए जाते हैं), या सामान्य स्वयंसिद्ध (axioms) (सामान्य तार्किक सत्य)। *Elements* इस अरिस्टोटेलियन आदर्श की अब तक की सबसे परिपूर्ण अभिव्यक्ति है। Euclid ने संभवतः अरस्तू को पढ़कर अरस्तू के सैद्धांतिक निर्देशन से अपनी पद्धति नहीं ली — बल्कि अरस्तू और Euclid दोनों उस परंपरा को आत्मसात कर रहे थे और उसे वाणी दे रहे थे जो कम से कम छठी शताब्दी ईसा पूर्व में Thales के काल से यूनानी गणित समुदाय में विकसित हो रही थी।
*Elements* की स्वयंसिद्ध संरचना कई गहन उद्देश्यों की पूर्ति करती है। सबसे पहले, यह स्पष्ट करती है कि क्या मान लिया गया है और क्या सिद्ध किया गया है। अभिधारणाओं को आरंभ में स्पष्ट रूप से बताकर Euclid पाठक को अपनी प्रणाली की सीमाएँ दिखाता है: जो कुछ भी आगे आएगा वह तभी सत्य होगा जब अभिधारणाएँ सत्य हों। यह पारदर्शिता गणितीय तर्क की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है, और यही गणित को अन्य विषयों से अलग करती है जहाँ मूलभूत मान्यताएँ प्रायः अव्यक्त और अपरीक्षित रह जाती हैं।
दूसरी बात, स्वयंसिद्ध पद्धति (axiomatic method) एक ऐसी निश्चितता का मानक प्रस्तुत करती है जो प्रयोगसिद्ध विज्ञान (empirical science) में कभी हासिल नहीं की जा सकती। किसी भी भौतिक प्रयोग पर सवाल उठाया जा सकता है — शायद परिस्थितियाँ पूरी तरह नियंत्रित नहीं थीं, शायद माप में थोड़ी चूक हो गई, शायद कोई अलग प्रयोग कोई अलग परिणाम देता। लेकिन स्पष्ट स्वयंसिद्धों से वैध तार्किक चरणों द्वारा निकाले गए गणितीय प्रमाण पर उसी तरह सवाल नहीं उठाया जा सकता। या तो तर्क वैध है या नहीं है; या तो स्वयंसिद्धों को स्वीकार किया जाता है या नहीं किया जाता। यही गणितीय ज्ञान को उसका वह विशेष स्वरूप देता है जिसमें अनिवार्यता और सार्वभौमिकता होती है, और Elements पहली ऐसी रचना थी जिसने इस स्वरूप को बड़े पैमाने पर साकार किया।
तीसरी बात, प्रमाण की पद्धति विचारों में स्पष्टता लाने के लिए बाध्य करती है। किसी परिणाम को केवल दावे के रूप में पेश करने या उदाहरणों से समझाने के बजाय उसे सिद्ध करने के लिए यह ज़रूरी है कि उसे इतनी गहराई से समझा जाए कि यह दिखाया जा सके कि वह अधिक मूलभूत सिद्धांतों से क्यों अनिवार्यतः निकलता है। प्रमाण का अनुशासन केवल परिणामों को संप्रेषित करने का तरीका नहीं है; यह उन्हें समझने का तरीका भी है। Elements की इस शैक्षणिक शक्ति को उन लगभग सभी गणितज्ञों और दार्शनिकों ने पहचाना जिन्होंने इसका अध्ययन किया।
यूक्लिडीय प्रमाण के प्रारूप का अपना एक विशिष्ट स्वरूप है। यह आमतौर पर इस कथन से शुरू होता है कि क्या सिद्ध किया जाना है। इसके बाद एक रचना (construction) आती है — तर्क को संभव बनाने के लिए आवश्यकतानुसार खींची गई अतिरिक्त रेखाएँ या वृत्त। फिर आता है असली प्रमाण, जो कथनों की एक श्रृंखला होती है जिनमें से प्रत्येक को किसी परिभाषा, अभिधारणा (postulate), सामान्य धारणा (common notion), या पहले से स्थापित प्रमेय के संदर्भ से उचित ठहराया जाता है। प्रमाण का समापन इस कथन से होता है कि जो सिद्ध किया जाना था वह सिद्ध हो गया, और परंपरागत रूप से यह QED (quod erat demonstrandum — "जो प्रदर्शित किया जाना था") से समाप्त होता है।
इस प्रारूप का प्रभाव असाधारण रूप से व्यापक रहा है। जब Newton ने अपनी Principia लिखी, जब Spinoza ने अपनी Ethics लिखी, जब Bertrand Russell और Alfred North Whitehead ने Principia Mathematica लिखी, और जब आज हर क्षेत्र के गणितज्ञ अपने शोध पत्र लिखते हैं, तो वे सभी प्रमाण-आधारित तर्क की उस परंपरा में काम कर रहे होते हैं जिसकी सबसे स्पष्ट वंश-परंपरा Euclid तक जाती है। विशिष्ट प्रारूप बदल गया है, संकेत-प्रणाली बदल गई है, और आधुनिक गणित Euclid की तुलना में कहीं अधिक लचीले और शक्तिशाली तार्किक उपकरणों के साथ काम करता है, लेकिन स्पष्ट रूप से कही गई मान्यताओं से वैध तार्किक चरणों द्वारा परिणामों को सिद्ध करने की मूलभूत प्रतिबद्धता वही है जो Euclid ने Elements में मूर्त रूप दी थी।
हालाँकि, यह ध्यान देने योग्य है कि आधुनिक दृष्टिकोण से Elements में तार्किक कमियाँ भी हैं। उन्नीसवीं सदी के गणितज्ञों ने, विशेष रूप से David Hilbert ने अपनी Grundlagen der Geometrie (1899) में, कई ऐसे स्थानों की पहचान की जहाँ Euclid के तर्क परोक्ष रूप से उन गुणधर्मों को मान लेते हैं जो उनकी कही गई अभिधारणाओं में शामिल नहीं हैं। उदाहरण के लिए, Euclid की पहली ही प्रमेय — समबाहु त्रिभुज की रचना — बिना प्रमाण के यह मान लेती है कि दो वृत्त एक-दूसरे को काटते हैं, जो ज्यामितीय दृष्टि से स्पष्ट है लेकिन पाँच अभिधारणाओं द्वारा तार्किक रूप से सुनिश्चित नहीं है। Hilbert के कार्य ने यूक्लिडीय ज्यामिति का एक पूर्ण और कठोर स्वयंसिद्धीकरण (axiomatization) प्रदान किया जो वास्तव में सब कुछ कही गई अभिधारणाओं से सिद्ध करता है, लेकिन इसके लिए Euclid की पाँच अभिधारणाओं से कहीं अधिक अभिधारणाओं की आवश्यकता पड़ी। इन कमियों का अस्तित्व Euclid की उपलब्धि को कम नहीं करता — दो हज़ार वर्षों तक किसी ने उन्हें नहीं खोजा, जो इस बात का प्रमाण है कि Elements कितनी असाधारण सावधानी के साथ रची गई थी — लेकिन यह हमें याद दिलाता है कि कठोरता का मानक, सभी मानकों की तरह, ऐतिहासिक परिस्थितियों से निर्धारित होता है।
अन्य रचनाएँ: Optics, Data, Phaenomena
Elements, अपनी सर्वोच्चता के बावजूद, Euclid की बौद्धिक उपलब्धियों का केवल एक हिस्सा है। Euclid को श्रेय दिए जाने वाले कई अन्य ग्रंथ प्राचीन काल से आज तक बचे हुए हैं, और वे एक ऐसे गणितीय मस्तिष्क की झलक दिखाते हैं जो अपने दायरे और जिज्ञासा दोनों में असाधारण था। हालाँकि इनमें से कोई भी रचना Elements जितनी विशाल या ऐतिहासिक रूप से प्रभावशाली नहीं है, फिर भी हर एक अपने आप में महत्वपूर्ण है और Euclid की गणितीय रुचियों तथा उनकी कार्यपद्धति पर अतिरिक्त प्रकाश डालती है।
Data वह रचना है जो शैली और विषय-वस्तु दोनों दृष्टियों से Elements के सबसे करीब है। इसमें चौंसठ प्रमेय हैं जो "दी गई" राशियों की अवधारणा से संबंधित हैं — यानी ऐसी राशियाँ जिनके मान निर्धारित होते हैं, भले ही उन्हें अभी स्पष्ट रूप से परिकलित न किया गया हो। Data का केंद्रीय विचार यह है: यदि किसी ज्यामितीय संरचना के कुछ पहलू दिए गए हों (अर्थात उनके मान निश्चित हों), तो उस संरचना के और कौन-से पहलू इससे निर्धारित हो जाते हैं? उदाहरण के लिए, यदि किसी त्रिभुज की दो भुजाओं का अनुपात दिया गया हो और एक कोण दिया गया हो, तो उस त्रिभुज के बारे में और क्या निर्धारित किया जा सकता है? यह दृष्टिकोण Elements का पूरक है, न कि उसका परिशिष्ट: जहाँ Elements इस बात के प्रमेय सिद्ध करता है कि क्या सार्वभौमिक रूप से सत्य है, वहीं Data यह विश्लेषण करता है कि जब कुछ जानकारी दी जाती है तो उससे क्या निष्कर्ष निकलते हैं।
ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में Data का उपयोग अधिक उन्नत गणितीय कार्य की तैयारी के रूप में किया जाता था — विशेष रूप से उस प्रकार की समस्या-समाधान पद्धति के लिए जिसे यूनानी गणित में "विश्लेषण" कहा जाता था। यह एक ऐसी विधि है जिसमें यह मान लिया जाता है कि समस्या हल हो चुकी है और फिर उसके निहितार्थों को तब तक उलटे क्रम में खोजा जाता है जब तक कि कोई पहले से ज्ञात तथ्य न मिल जाए, फिर वास्तविक समाधान निर्मित करने के लिए तर्क को पुनः आगे की दिशा में चलाया जाता है। Data के चौंसठ प्रमेय विभिन्न "दी गई" परिस्थितियों से निकलने वाले निष्कर्षों की एक सूची प्रस्तुत करते हैं, और यह सूची संभवतः ज्यामितीय समस्याओं के विश्लेषण के लिए एक उपकरण-संग्रह के रूप में प्रयुक्त होती थी। यह पुस्तक Elements जैसी ही संयमित निगमनात्मक शैली में लिखी गई है, और इसके लिए आवश्यक गणितीय परिपक्वता का स्तर भी तुलनीय है।
Optics बिल्कुल अलग प्रकृति की रचना है। यह दृष्टि और परिप्रेक्ष्य की ज्यामिति पर पहला व्यवस्थित यूनानी ग्रंथ है, और यह इस अध्ययन में Euclidean ज्यामितीय विधियों का उपयोग करता है कि वस्तुएँ आँखों को कैसे दिखती हैं। Optics का मूल अभिगृहीत — कि दृश्य बोध आँखों से वस्तुओं की ओर निकलने वाली किरणों के माध्यम से होता है, न कि आधुनिक प्रकाशिकी की तरह वस्तुओं से आँखों की ओर आने वाली किरणों से — आधुनिक विज्ञान की मान्य भौतिक अवधारणा नहीं है, लेकिन प्राचीन यूनानी प्राकृतिक दर्शन के ढाँचे में यह एक तर्कसंगत और उत्पादक मान्यता थी। Euclid इस दृश्य किरण मॉडल का उपयोग करके ऐसे प्रमेयों की एक श्रृंखला निगमित करते हैं जो बताते हैं कि वस्तुओं का आभासी आकार आँख पर बनने वाले कोण पर कैसे निर्भर करता है, अधिक दूरी पर स्थित वस्तुएँ छोटी क्यों दिखती हैं, और वृत्तों की वक्रता किसी कोण से देखने पर उनके दिखने के तरीके को कैसे प्रभावित करती है।
Optics की शुरुआत दृश्य किरणों की प्रकृति के बारे में सात अभिगृहीतों से होती है, फिर इकसठ प्रमेय सिद्ध किए जाते हैं। ये प्रमेय प्राचीन जगत में व्यावहारिक और सैद्धांतिक दृष्टि से अत्यंत रोचक प्रश्नों की एक विस्तृत श्रृंखला को संबोधित करते हैं — जैसे कि दूर की वस्तुएँ छोटी क्यों दिखती हैं, किसी कोण से देखा गया वृत्त दीर्घवृत्त जैसा क्यों दिखता है, और दृष्टि की धुरी से सर्वाधिक विचलित होने वाली किरणें ही सबसे अधिक विवरण क्यों प्रदान करती हैं। Optics एक अर्थ में उस चीज़ का ज्यामितीय अध्ययन है जिसे हम आज परिप्रेक्ष्य कहते हैं, और इसने बाद के पुनर्जागरण काल के चित्रात्मक परिप्रेक्ष्य के सिद्धांतों की कई शताब्दियों पहले ही आधारभूमि तैयार कर दी थी। हालाँकि इसकी भौतिक मान्यताएँ आधुनिक प्रकाशिकी से भिन्न हैं, इसका ज्यामितीय तर्क आज भी सही है: किसी वस्तु का आभासी आकार वास्तव में उस कोण पर निर्भर करता है जो वह दर्शक की आँख पर बनाती है, और Euclid का इस संबंध का विवेचन गणितीय दृष्टि से सुदृढ़ है।
फेनोमेना अठारह प्रस्तावों का एक संक्षिप्त ग्रंथ है जो गणितीय खगोल विज्ञान पर लागू गोलाकार ज्यामिति से संबंधित है। इसमें तारों के उदय और अस्त होने, पृथ्वी से दिखने वाले राशिचक्र की गति, और खगोलीय गोले की ज्यामिति से जुड़े प्रश्नों पर विचार किया गया है। फेनोमेना खगोलीय घटनाओं के सबसे पुराने जीवित गणितीय विवेचनों में से एक है, और यह प्रारंभिक गणितीय खगोल विज्ञान के एक छोटे संग्रह का हिस्सा है जिसमें Autolycus of Pitane और Aristarchus of Samos की रचनाएँ भी शामिल हैं। इसका दृष्टिकोण पूर्णतः ज्यामितीय है: Euclid कोई प्रेक्षण नहीं करते और न ही कोई ब्रह्माण्ड संबंधी निष्कर्ष निकालते हैं; वे केवल इस मान्यता के ज्यामितीय परिणामों को स्थापित करते हैं कि तारे एक घूमते हुए गोले पर स्थित हैं। फेनोमेना यह दर्शाता है कि Euclid की रुचि आकाश के गणितीय वर्णन तक भी फैली हुई थी, जो उनकी ज्यामितीय पद्धतियों का एक स्वाभाविक विस्तार था।
एक चौथी जीवित रचना, On Divisions of Figures, केवल एक अरबी अनुवाद और अरबी से निकले एक मध्यकालीन लैटिन संस्करण के रूप में उपलब्ध है। यह सीधी रेखाओं द्वारा समरेखीय आकृतियों (त्रिभुजों, समांतर चतुर्भुजों और अन्य बहुभुजों) को निश्चित अनुपातों में विभाजित करने से संबंधित है। यह विधि समतल ज्यामिति और व्यावहारिक भूमि मापन दोनों की समस्याओं से गहराई से जुड़ी है, और इस रचना की Heron of Alexandria के एक समान ग्रंथ से समानता है। यह अनिश्चित है कि On Divisions of Figures Euclid की एक पूर्ण रचना है या किसी बड़े ग्रंथ का अंश।
इन जीवित रचनाओं के अतिरिक्त, प्राचीन स्रोतों में Euclid को श्रेय दिए गए कई अन्य ग्रंथों का उल्लेख है जो अब लुप्त हो चुके हैं। Porisms, जिसका Pappus of Alexandria ने विस्तार से वर्णन किया है, संभवतः एक महत्त्वपूर्ण रचना थी जो उन शर्तों से संबंधित थी जिन्हें किसी समस्या का हल होने के लिए पूरा करना आवश्यक है — यह विषय प्रमेयों और समस्याओं के बीच का मध्यवर्ती क्षेत्र है। Pappus के अनुसार Porisms में सैकड़ों प्रस्तावों वाली तीन पुस्तकें थीं, किंतु इस रचना का कोई भी अंश आज उपलब्ध नहीं है। शंकु परिच्छेदों पर लिखी रचना Conics को Apollonius of Perga के कहीं अधिक विस्तृत विवेचन ने स्पष्टतः अप्रासंगिक बना दिया और इसीलिए यह संरक्षित नहीं रही। Surface Loci उच्च कोटि के वक्रों और पृष्ठों से संबंधित थी और वह भी लुप्त हो गई। Pseudaria, या Book of Fallacies, संभवतः एक शैक्षिक ग्रंथ था जो विद्यार्थियों को ज्यामिति में भ्रामक तर्कों को पहचानना सिखाने के लिए लिखा गया था — यह शैक्षणिक दृष्टि से एक परिष्कृत रचना थी जिसका केवल एक संक्षिप्त विवरण Proclus में मिलता है।
Euclid की रुचियों का विस्तार — जो उनकी जीवित रचनाओं और लुप्त ग्रंथों के शीर्षकों से प्रकट होता है — अत्यंत उल्लेखनीय है। शुद्ध ज्यामिति, संख्या सिद्धांत, प्रकाशिकी, खगोल विज्ञान, अपरिमेय राशियों का वर्गीकरण, समस्याओं का विश्लेषण, तर्कदोषों की पहचान — यह गणितीय संलग्नता की इतनी व्यापकता है जो Euclid को पुरातनकाल के सबसे बहुमुखी गणितज्ञों में स्थान दिलाती है।
Euclid का गणितीय दर्शन
Euclid को एक गणितज्ञ के रूप में समझने के लिए उनके गणितीय दर्शन को समझने का प्रयास करना आवश्यक है — उनकी वे धारणाएँ, चाहे अप्रत्यक्ष हों या स्पष्ट, कि गणित क्या है, गणितीय वस्तुएँ क्या हैं, और गणितीय ज्ञान किस प्रकार प्राप्त और प्रमाणित किया जाता है। इन प्रश्नों का उत्तर देना सरल नहीं है, आंशिक रूप से इसलिए कि Euclid अपनी जीवित रचनाओं में इनके बारे में स्पष्ट रूप से लगभग कुछ भी नहीं कहते। वे गणित के दार्शनिक नहीं बल्कि गणितज्ञ हैं, और उनके ग्रंथ प्रमेयों को सिद्ध करने के लिए लिखे गए हैं, न कि गणितीय ज्ञान की नींव का विश्लेषण करने के लिए। फिर भी, Elements में वे जो चुनाव करते हैं — क्या मान लेना है, क्या सिद्ध करना है, अपने तर्कों को कैसे व्यवस्थित करना है — वे दार्शनिक प्रतिबद्धताओं को दर्शाते हैं जिन्हें आंशिक रूप से पुनर्निर्मित किया जा सकता है।
इन सभी प्रतिबद्धताओं में सबसे मूलभूत है — प्रमाण को गणितीय ज्ञान के एकमात्र माध्यम के रूप में स्वीकार करना। Euclid कभी भी किसी परिणाम को स्थापित करने के लिए अंतर्ज्ञान या संभाव्यता का सहारा नहीं लेते; हर वह प्रस्ताव जो परिभाषा, अभिधारणा या सामान्य धारणा नहीं है, उसे पहले से स्थापित परिणामों के आधार पर तार्किक तर्क द्वारा सिद्ध किया जाना अनिवार्य है। प्रमाण को गणितीय ज्ञान के मानदंड के रूप में यह स्वीकृति ग्रीक दार्शनिक संस्कृति की गहरी धाराओं को दर्शाती है, जिसमें मत (doxa) और ज्ञान (episteme) के बीच का भेद मौलिक महत्त्व रखता था। Plato के अनुसार, केवल मत एक प्रकार की मानसिक अवस्था है जो दिखावे पर निर्भर होती है और परिस्थितियों के साथ बदलती रहती है; जबकि ज्ञान दृढ़, अनिवार्य और इस समझ पर आधारित होता है कि चीज़ें जैसी हैं, वैसी क्यों हैं। Euclid के हाथों में गणितीय प्रमाण वह साधन है, जिसके द्वारा कठोर दार्शनिक अर्थ में गणितीय ज्ञान की प्राप्ति होती है।
विद्वानों में व्यापक सहमति है कि Euclid एक Platonवादी थे — कम से कम अपनी गणितीय व्यवहार-पद्धति में, भले ही उनकी स्पष्ट दार्शनिक निष्ठाओं में यह अनिवार्य रूप से प्रकट न हो। गणितीय वस्तुओं के बारे में Platon का दृष्टिकोण यह मानता है कि वे अमूर्त, शाश्वत सत्ताएँ हैं जो किसी भी भौतिक रूप से स्वतंत्र रूप से विद्यमान रहती हैं। Euclid जिन त्रिभुजों और वृत्तों पर प्रमेय सिद्ध करते हैं, वे पेपिरस पर या रेत में खींचे जाने वाले अपूर्ण त्रिभुज नहीं हैं; वे आदर्श त्रिभुज हैं — पूर्णतः समबाहु, पूर्णतः समकोण — जिन्हें भौतिक रेखाचित्र केवल अनुमानित रूप में प्रस्तुत करते हैं। जब Euclid कहते हैं "माना ABC एक त्रिभुज है," तो वे किसी भौतिक आकृति का वर्णन नहीं कर रहे, बल्कि एक अमूर्त गणितीय वस्तु का आह्वान कर रहे हैं। इस त्रिभुज के बारे में वे जो प्रमेय सिद्ध करते हैं, वे अनिवार्य रूप से और शाश्वत रूप से सत्य हैं — न कि केवल इस विशेष रेखाचित्र के संदर्भ में आकस्मिक रूप से सत्य।
गणितीय वस्तुओं की यह Platonवादी अवधारणा Euclid की रचनाओं की प्रकृति के बारे में रोचक दार्शनिक प्रश्न उठाती है। जब Euclid अपनी पहली अभिधारणा में कहते हैं कि किन्हीं भी दो बिंदुओं के बीच एक सीधी रेखा खींचना संभव है, तो क्या वे भौतिक जगत के बारे में कोई धारणा बना रहे हैं — कि ऐसी रेखा वास्तव में खींची जा सकती है — या ज्यामितीय अंतरिक्ष की तार्किक संरचना के बारे में — कि ऐसी रेखा का अस्तित्व है? आधुनिक गणितज्ञ Euclid की अभिधारणाओं को भौतिक क्रियाओं के विवरण के बजाय अस्तित्व के कथनों के रूप में व्याख्यायित करते हैं, और यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि Euclid स्वयं भी इन्हें इसी रूप में समझते थे। उनकी रचनाएँ भौतिक रेखाचित्र बनाने के निर्देश नहीं हैं; वे यह प्रदर्शन हैं कि अभिधारणाओं के आधार पर कुछ निश्चित ज्यामितीय वस्तुओं का अस्तित्व अनिवार्य रूप से सिद्ध होता है।
Euclid के गणितीय दर्शन का एक अन्य आयाम अनंत के प्रति उनके दृष्टिकोण में परिलक्षित होता है। ग्रीक गणित सामान्यतः वास्तविक अनंत के प्रति अत्यंत सतर्क था — अर्थात् एक पूर्ण अनंत संग्रह या वास्तव में अनंत परिमाण की अवधारणा के प्रति। Euclid कभी यह नहीं कहते कि एक सीधी रेखा अनंत लंबी है; वे केवल यह कहते हैं कि एक परिमित सीधी रेखा को सदा बढ़ाया जा सकता है। वे कभी यह नहीं कहते कि किसी रेखा पर अनंत बिंदु हैं; वे केवल यह कहते हैं कि किन्हीं भी दो बिंदुओं के बीच सदा एक और बिंदु खोजा जा सकता है। यह "संभावित अनंत" — यह विचार कि एक प्रक्रिया सदा जारी रखी जा सकती है, किंतु कभी पूर्ण अनंत तक नहीं पहुँचती — ग्रीक गणितीय पद्धति की विशेषता है। यही वह आधार है जो Euclid को किसी अनंत समुच्चय का स्पष्ट रूप से उल्लेख किए बिना यह सिद्ध करने में सक्षम बनाता है कि अभाज्य संख्याएँ अनंत हैं: उनका प्रमाण यह दर्शाता है कि अभाज्य संख्याओं की कोई भी परिमित सूची पूर्ण नहीं हो सकती — जो कि अभाज्य संख्याओं के एक वास्तविक अनंत समुच्चय के अस्तित्व की घोषणा करने से सूक्ष्म किंतु महत्त्वपूर्ण रूप से भिन्न है।
तत्वों की स्वयंसिद्ध संरचना गणित और उसकी नींव के बीच के संबंध के बारे में एक विशेष दृष्टिकोण को भी दर्शाती है। Euclid की पाँच अभिधारणाएँ स्वतः स्पष्ट सत्यों के रूप में प्रस्तुत नहीं की गई हैं जिन्हें किसी औचित्य की आवश्यकता न हो; ये स्पष्ट रूप से स्वीकृत मान्यताएँ हैं जिनका उद्देश्य उन सब बातों को संभव बनाना है जो उनके बाद आती हैं। यह एक दार्शनिक दृष्टि से परिष्कृत स्थिति है: इसमें यह दावा करने की बजाय कि गणितीय सत्य सार्वभौमिक रूप से स्पष्ट प्रथम सिद्धांतों से निकाले जाते हैं, Euclid यह स्वीकार करते हैं कि गणित की नींव में विशिष्ट और संभावित रूप से विवादास्पद मान्यताएँ शामिल होती हैं। समांतर अभिधारणा को शेष चार से सिद्ध करने के प्रयासों का लंबा इतिहास — और अंततः यह खोज कि ऐसा करना असंभव है — Euclid की इस प्रवृत्ति को उचित ठहराती है कि उन्होंने इसे एक अलग मान्यता के रूप में माना। अपनी मान्यताओं को स्पष्ट रूप से बताने की Euclid की तत्परता, और समांतर अभिधारणा के प्रति उनकी स्पष्ट असहजता — जो इसके उपयोग में उनकी देरी से झलकती है — एक प्रशंसनीय कठोरता और ईमानदारी वाली गणितीय ज्ञानमीमांसा का संकेत देती है।
यूनानी गणित पर प्रभाव
तत्व किसी शून्य से नहीं उभरे, और उनका प्रभाव भी शून्य में नहीं फैला। Euclid कम से कम दो शताब्दियों पुरानी यूनानी गणितीय शोध की परंपरा की परिणति थे, और उनके द्वारा स्थापित परंपरा उनके बाद भी कई शताब्दियों तक जारी रही, जिसने असाधारण प्रतिभा के गणितज्ञ पैदा किए जिन्होंने यूक्लिडियन नींव पर अपना काम खड़ा किया।
यूनानी गणित पर Euclid के प्रभाव की पूरी व्यापकता को समझने के लिए पहले उस गणितीय परंपरा को समझना होगा जो उन्हें विरासत में मिली थी। छठी शताब्दी ईसा पूर्व में Miletus के Thales से आरंभ होकर, यूनानी विचारकों ने यह विचार विकसित करना शुरू किया था कि ज्यामितीय सत्यों को केवल माप या अवलोकन से नहीं, बल्कि तार्किक तर्क से भी स्थापित किया जा सकता है। प्राचीन परंपरा में Thales को पहले ज्यामितीय प्रमाणों का श्रेय दिया जाता है, जिनमें यह प्रमेय भी शामिल है कि अर्धवृत्त में कोण एक समकोण होता है और यह कि एक त्रिभुज अपनी माध्यिका द्वारा समद्विभाजित होता है। Pythagoras और दक्षिणी इटली में छठी और पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व के Pythagorean बंधुत्व ने गणित को एक दार्शनिक अन्वेषण में बदल दिया — उनका विश्वास था कि ब्रह्मांड की संरचना मूलतः गणितीय है और उन्होंने स्वयं को संख्याओं, अनुपातों और ज्यामितीय रूपों के अध्ययन के लिए समर्पित किया। इसी परंपरा में गणितीय प्रमाण की अवधारणा — यह विचार कि गणितीय दावों को केवल दर्शाने से नहीं बल्कि कठोर रूप से उचित ठहराना होगा — पहली बार अंकुरित हुई और एक व्यवस्थित अभ्यास के रूप में विकसित हुई।
पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व के Sophists और Socratic दार्शनिकों ने तार्किक तर्क के मानकों को और परिष्कृत किया, यह माँग करते हुए कि दावों को स्वीकृत आधार-वाक्यों से वैध तर्क द्वारा उचित ठहराया जाए। यह कोई संयोग नहीं है कि Plato, जिनकी एथेंस में स्थित Academy चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में गणितीय गतिविधि का केंद्र बन गई थी, गणित को कठोर ज्ञान के आदर्श के रूप में गहराई से महत्व देते थे। Plato की Republic में यह प्रसिद्ध रूप से कहा गया है कि दार्शनिक-शासक बनने के इच्छुक व्यक्तियों को दर्शनशास्त्र की ओर मुड़ने से पहले दस वर्ष गणित का अध्ययन करना होगा, और Academy के द्वार पर उत्कीर्ण वाक्य — "जो ज्यामिति से अनजान हो, वह प्रवेश न करे" — एक ऐसी संस्था की भावना को व्यक्त करता है जो गणितीय प्रशिक्षण को समस्त गंभीर बौद्धिक कार्य की नींव मानती थी। इसी Platonic वातावरण में Euclid के तत्काल पूर्ववर्तियों ने अपना सबसे महत्वपूर्ण कार्य किया।
Elements को समझने के संदर्भ में सबसे निकटतम पूर्ववर्ती गणितज्ञ Eudoxus of Cnidus थे, जो चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में जीवित रहे और जिन्होंने Elements के दो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भागों में मूलभूत योगदान दिया: Book V में अनुपात का सिद्धांत और Book XII में प्रयुक्त exhaustion की विधि। Eudoxus, Plato के शिष्य थे और प्राचीन विश्व के सर्वाधिक रचनाशील गणितज्ञों में से एक थे। उनके अनुपात के सिद्धांत ने, जो अतुलनीय परिमाणों (incommensurable magnitudes) को पूर्ण कठोरता के साथ संभालता है, उस समस्या का समाधान किया जो अपरिमेयता (irrationality) की खोज के बाद से यूनानी गणित को परेशान करती आ रही थी। Euclid का यह निर्णय कि वे Elements को Eudoxus की नींव पर खड़ा करेंगे, इस कृति को वह दृढ़ता प्रदान करता है जो अन्यथा संभव न होती।
Theaetetus of Athens, Plato के एक अन्य शिष्य, जिनकी मृत्यु लगभग 369 ईसा पूर्व में हुई, ने अपरिमेय संख्याओं के सिद्धांत में योगदान दिया जो Book X में परिलक्षित होता है, और Platonic ठोस आकृतियों (Platonic solids) के अध्ययन में भी, जो Book XIII का आधार है। Plato का संवाद Theaetetus, जो ज्ञान की प्रकृति से संबंधित है, इस गणितज्ञ को एक असाधारण बौद्धिक प्रतिभा संपन्न युवक के रूप में अमर कर देता है। यह संवाद उस दिन की पृष्ठभूमि पर आधारित है जब Theaetetus युद्ध में घातक रूप से घायल हुए थे, जो उनकी गणितीय विरासत को एक दुखद आयाम देता है।
जो गणितज्ञ महत्त्व में Euclid के सबसे प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी बने और जिन्होंने Euclidean नींव पर सबसे सीधे निर्माण किया, वे थे Archimedes of Syracuse, जो लगभग 287 से 212 ईसा पूर्व तक जीवित रहे। Archimedes को व्यापक रूप से प्राचीनकाल के महानतम गणितज्ञों में से एक माना जाता है, और उन्होंने Elements को एक निपुण विद्वान की गहरी समझ के साथ पढ़ा और उपयोग किया। वृत्त के मापन, सर्पिलों, गोले और बेलन, तथा अन्य उन्नत विषयों पर उनकी रचनाएँ सभी Elements में उपस्थित विधियों और विचारों का विकास हैं, जिन्हें Euclid से कहीं अधिक परिष्कृत स्तर तक ले जाया गया। Archimedes ने exhaustion की विधि को Euclid से कहीं आगे बढ़ाया, और उन्होंने वह विकसित किया जिसे उन्होंने "यांत्रिक विधि" (mechanical method) कहा — तुलादंड और अत्यल्पांशों (infinitesimals) का उपयोग करके परिणाम खोजने की एक तर्क-पद्धति, हालांकि उन्हें कठोर रूप से सिद्ध करने के लिए नहीं — जो पूर्वदृष्टि से लगभग दो हज़ार वर्ष पहले ही integral calculus का पूर्वाभास देती है।
Apollonius of Perga, जो तीसरी और दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में जीवित रहे और Alexandria में कार्य किया, ने Conics पर एक महान ग्रंथ लिखा जिसने इस विषय पर Euclid की अपनी खोई हुई रचना को पीछे छोड़ दिया। Apollonius के Conics की आठ पुस्तकें, जिनमें से सात आज भी उपलब्ध हैं, दीर्घवृत्त (ellipses), परवलय (parabolas) और अतिपरवलय (hyperbolas) के गुणधर्मों का व्यापक विवेचन प्रस्तुत करती हैं, और वे Elements के समान ही निगमनात्मक शैली में लिखी गई हैं, जिसमें Euclidean परिणामों का स्वतंत्र रूप से उल्लेख किया गया है। आज हम जिन शब्दों "ellipse," "parabola," और "hyperbola" का उपयोग करते हैं, वे Apollonius के ही गढ़े हुए हैं।
Heron of Alexandria, जिन्होंने संभवतः पहली शताब्दी ईसवी में कार्य किया, ने Euclidean ज्यामितीय विधियों को सर्वेक्षण, यांत्रिकी और अभियांत्रिकी की व्यावहारिक समस्याओं की एक विस्तृत श्रृंखला पर लागू किया। उनकी Metrica में विभिन्न आकृतियों के क्षेत्रफल और आयतन के सूत्र दिए गए हैं, जिनमें त्रिभुज के तीनों भुजाओं के पदों में क्षेत्रफल के लिए प्रसिद्ध "Heron's formula" भी शामिल है। Pappus of Alexandria, जिन्होंने लगभग 320 ईसवी में कार्य किया, ने एक Mathematical Collection लिखी जो पूर्ववर्ती यूनानी गणित की एक विशाल श्रृंखला का सारांश और विस्तार करती है, जिसमें Euclid का बारंबार उल्लेख है और प्रायः Euclidean परिणामों के वैकल्पिक प्रमाण या विस्तार भी प्रस्तुत किए गए हैं।
संक्षेप में कहा जाए तो यूनानी गणित पर Elements का प्रभाव व्यापक और स्थायी था। Euclid से लेकर Pappus तक के पाँच सदियों के काल में, Elements यूनानी गणितीय शिक्षा की साझा पृष्ठभूमि के रूप में कार्य करता रहा — वह ग्रंथ जिसे हर गंभीर विद्यार्थी उन्नत कार्य की ओर बढ़ने से पहले आत्मसात करता था। Euclid के बाद हर महत्त्वपूर्ण यूनानी गणितज्ञ ने उन्हीं अवधारणाओं, विधियों और परिणामों के ढाँचे में काम किया जो Elements ने स्थापित किए थे, और व्यावहारिक रूप से किसी को भी मूलभूत कार्य को वापस जाकर नए सिरे से करने की ज़रूरत नहीं पड़ी। Elements नींव था, और इतनी सुदृढ़ नींव कि वह उस हर चीज़ का भार वहन कर सके जो यूनानी गणितीय परंपरा ने आगे चलकर उस पर निर्मित की।
इतिहास में Elements की यात्रा
Euclid की मृत्यु के बाद Elements का इतिहास असाधारण रूप से विविध कालों, स्थानों और संस्कृतियों में निरंतर संप्रेषण, अनुकूलन और प्रभाव की कहानी है। विश्व के इतिहास में बहुत कम ग्रंथ ऐसे रहे हैं जिनका इतने लंबे समय तक इतने लगातार अध्ययन होता रहा हो और जो इतने समय तक इतने प्रासंगिक बने रहे हों। Elements किस प्रकार जीवित रहा और किन-किन राहों से होकर गुज़रा — यह कहानी भी उसमें निहित गणित जितनी ही अद्भुत है।
पाठ के भौतिक संप्रेषण का अनुसरण करने से पहले, प्राचीन यूनानी दार्शनिक परंपरा में Elements की स्वीकृति पर विचार करना उचित होगा, क्योंकि Elements आरंभ से ही केवल एक गणितीय ग्रंथ नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और दार्शनिक ग्रंथ भी था। उत्तरकालीन रोमन साम्राज्य में बौद्धिक जीवन पर वर्चस्व रखने वाले नव-प्लेटोवादी दार्शनिकों के लिए Euclid का Elements शुद्ध बुद्धि की उस शक्ति का प्रमाण था जो शाश्वत सत्यों को ग्रहण करने में सक्षम है। Proclus, जिनकी पहली पुस्तक पर टीका Euclid के जीवन और उनकी गणितीय पद्धति दोनों पर हमारा सबसे समृद्ध प्राचीन स्रोत है, Elements को उतना ही एक धार्मिक दस्तावेज़ मानते थे जितना गणितीय। उनके दृष्टिकोण में, गणितीय वस्तुएँ सर्वोच्च दैवीय सत्ताओं और परिवर्तनशील भौतिक जगत के बीच की मध्यवर्ती स्थिति में थीं; गणित के अध्ययन से आत्मा पदार्थ में अपनी डूबी हुई अवस्था से ऊपर उठकर शुद्ध बौद्धिक लोक की ओर खिंचती है। वह ज्यामितिज्ञ जो यह सिद्ध करता है कि त्रिभुज के आंतरिक कोणों का योग दो समकोण के बराबर होता है, वह केवल कोई अनुभवजन्य नियमितता दर्ज नहीं कर रहा, बल्कि एक ऐसे शाश्वत, अनिवार्य सत्य को ग्रहण कर रहा है जो सृष्टि के दैवीय क्रम में सहभागी है।
नव-प्लेटोवादियों द्वारा Euclid के इस दार्शनिक विनियोग ने यह सुनिश्चित करने में मदद की कि Elements को अनेक तकनीकी ग्रंथों में से एक के रूप में नहीं, बल्कि बौद्धिक परंपरा के एक पवित्र ग्रंथ के रूप में देखा जाए — जो सावधानीपूर्वक संरक्षण और श्रद्धापूर्ण अध्ययन के योग्य था। Proclus की टीका, जो Euclid के प्रमेयों के साथ वैसा ही सूक्ष्म व्यवहार करती है जैसा अन्य विद्वान Plato के संवादों या Homer के महाकाव्यों के साथ करते थे, इस उच्च सांस्कृतिक प्रतिष्ठा को प्रतिबिंबित और सुदृढ़ करती है। Elements केवल उपयोगी नहीं था; वह सुंदर, महत्त्वपूर्ण और दार्शनिक दृष्टि से गहन था। Elements के सांस्कृतिक महत्त्व की यह धारणा आगे आने वाली उथल-पुथल भरी सदियों में उसके जीवित रहने के लिए अत्यंत निर्णायक सिद्ध हुई।
किसी भी प्राचीन ग्रंथ के सामने सबसे बड़ा ख़तरा भौतिक क्षय और उत्तरोत्तर पीढ़ियों द्वारा उसकी प्रतिलिपि न बनाए जाने का होता है। पपाइरस सड़ जाता है, आग से पुस्तकालय नष्ट हो जाते हैं, युद्ध विद्वत् परंपराओं को बाधित करते हैं, और जिन ग्रंथों की नकल नहीं की जाती वे अंततः लुप्त हो जाते हैं। Elements इसलिए जीवित रहा, क्योंकि आंशिक रूप से उसे हर परवर्ती पीढ़ी के गणितज्ञों ने अनिवार्य माना और आंशिक रूप से अलेक्जेंड्रिया तथा बाद में बीज़ेन्टियम के विद्वानों की असाधारण परिश्रमशीलता के कारण, जिन्होंने यूनानी पाठ को संरक्षित और संप्रेषित किया।
प्राचीन यूनानी परंपरा में Elements के संपादन में सबसे महत्वपूर्ण हस्तक्षेप चौथी शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध में Alexandria के Theon ने किया। Theon, जो गणितज्ञ और दार्शनिक Hypatia के पिता थे, उन्होंने Elements का एक संशोधित संस्करण तैयार किया जो आगे चलकर सभी यूनानी पांडुलिपियों के लिए मानक पाठ बन गया। Theon का संस्करण कोई आमूलचूल परिवर्तन नहीं था; उन्होंने Euclid के मूल पाठ को काफी हद तक बनाए रखते हुए कुछ छोटे-मोटे स्पष्टीकरण किए, कुछ उपपत्तियों में मध्यवर्ती चरण जोड़े, और कुछ स्थानों पर वैकल्पिक उपपत्तियाँ और अनुवर्ती प्रमेय शामिल किए। इसका परिणाम एक ऐसा पाठ था जो मूल की तुलना में कुछ अधिक सुगम था, और ठीक इसी कारण से शिक्षकों तथा प्रतिलिपिकारों में अधिक लोकप्रिय हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी तक ज्ञात Elements की प्रत्येक यूनानी पांडुलिपि Euclid के मूल से नहीं, बल्कि Theon के पुनरीक्षण से ही उद्भूत हुई थी।
उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में Elements की एक यूनानी पांडुलिपि की खोज — जो अब Vatican Library में सुरक्षित है — एक महत्वपूर्ण घटना थी जो Theon से पहले की थी और पाठ का एक पूर्वतर रूप संजोए हुए थी। विद्वान François Peyrard ने 1808 में इस पांडुलिपि की पहचान एक पूर्व-Theonian परंपरा के प्रतिनिधि के रूप में की, और Vatican पांडुलिपि की Theon के पाठ से तुलना करने पर विद्वान पहली बार Euclid के मूल के अधिक निकट किसी पाठ का पुनर्निर्माण कर सके। J. L. Heiberg द्वारा 1883 से 1885 के बीच प्रकाशित यूनानी पाठ का संस्करण अभी भी मानक आलोचनात्मक संस्करण बना हुआ है, जिसमें पूर्व-Theonian पांडुलिपि और व्यापक पांडुलिपि परंपरा दोनों के साक्ष्य समाहित हैं।
बीजान्टिन यूनानी परंपरा ने उन शताब्दियों में Elements को जीवित रखा जब यह पश्चिमी यूरोप में काफी हद तक विस्मृत हो चुका था। बीजान्टिन विद्वान मध्यकाल के दौरान Elements की प्रतिलिपि करते, उसका अध्ययन करते और उस पर टीका-टिप्पणी करते रहे, जिससे यूनानी पाठ उन विद्वानों के लिए उपलब्ध बना रहा जो यूनानी भाषा पढ़ सकते थे, और आठवीं तथा नौवीं शताब्दी के महान अनुवाद आंदोलनों के माध्यम से इस्लामी जगत तक Euclid के संप्रेषण की संभावना बनी रही।
अरबी अनुवाद और मध्यकालीन विश्व
मध्यकालीन इस्लामी जगत में Elements की कहानी विज्ञान और ज्ञान के इतिहास के सबसे उल्लेखनीय अध्यायों में से एक है। आठवीं शताब्दी ईस्वी से आरंभ होकर, Baghdad की अब्बासी खिलाफत ने यूनानी विज्ञान, गणित, चिकित्सा और दर्शन की महान कृतियों को अरबी में अनुवाद करने का एक व्यवस्थित कार्यक्रम चलाया, जिसे अनुवाद आंदोलन या "बैत-उल-हिकमा" के काल के नाम से जाना जाता है। यह आंदोलन तेज़ी से विस्तार पा रहे साम्राज्य की व्यावहारिक आवश्यकताओं से प्रेरित था — भूमि सर्वेक्षण, खगोल विज्ञान, चिकित्सा, और अभियांत्रिकी, सभी के लिए उस प्रकार के व्यवस्थित ज्ञान की आवश्यकता थी जो यूनानी विज्ञान प्रदान करता था — और साथ ही खलीफाओं तथा उनके विद्वान सलाहकारों की वास्तविक बौद्धिक जिज्ञासा से भी।
Elements उन पहले और सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथों में था जिनका अनुवाद किया गया। दसवीं शताब्दी के विद्वान al-Nadim, जिन्होंने अरबी पुस्तकों की एक व्यापक ग्रंथसूची संकलित की, के अनुसार Elements का पहला अरबी अनुवाद al-Hajjaj ibn Yusuf ibn Matar ने अब्बासी खलीफा Harun al-Rashid के शासनकाल में किया, जिन्होंने 786 से 809 ईस्वी तक शासन किया। al-Hajjaj ने बाद में Harun के उत्तराधिकारी खलीफा al-Ma'mun के संरक्षण में इस अनुवाद को संशोधित किया, जिन्होंने 813 से 833 ईस्वी तक शासन किया और जो अनुवाद आंदोलन के विशेष रूप से समर्पित संरक्षक थे। इस प्रकार तैयार हुए दो अनुवादों की जोड़ी — जिन्हें कभी-कभी al-Hajjaj के दो "संस्करण" कहा जाता है — यूक्लिडीय ज्यामिति में अरबी गणितीय परंपरा की नींव बनी।
दूसरा प्रमुख अनुवाद Ishaq ibn Hunayn ने किया, जो प्रसिद्ध अनुवादक Hunayn ibn Ishaq के पुत्र थे और जिनका निधन लगभग 910 ईस्वी में हुआ। Ishaq के अनुवाद को बाद में गणितज्ञ और खगोलशास्त्री Thabit ibn Qurra ने संशोधित किया, जो लगभग 836 से 901 ईस्वी तक जीवित रहे और अब्बासी काल के सबसे प्रतिभाशाली विद्वानों में से एक थे। Ishaq ibn Hunayn के अनुवाद पर Thabit का यह संशोधन Elements का सबसे प्रामाणिक अरबी संस्करण बन गया, और बाद के अधिकांश अरबी गणितज्ञों — जिनमें al-Kindi, al-Farabi, Ibn al-Haytham और कई अन्य शामिल थे — ने इसी संस्करण का हवाला दिया और इसी की नींव पर आगे काम किया।
अरबी परंपरा Euclid के कार्य का महज निष्क्रिय संरक्षण नहीं थी। अरबी गणितज्ञों ने Elements के साथ सक्रिय रूप से जुड़ाव रखा — उस पर टीकाएँ लिखीं, अन्य अभिगृहीतों से समांतर अभिगृहीत को सिद्ध करने का प्रयास किया, और इसके परिणामों को बीजगणित, संख्या सिद्धांत, प्रकाशिकी और खगोलशास्त्र में नई खोजों का आधार बनाया। Ibn al-Haytham, जो लगभग 965 से 1040 ईस्वी तक जीवित रहे और लैटिन पश्चिम में Alhazen के नाम से जाने जाते हैं, उन्होंने प्रकाशिकी और ज्यामिति की नींव पर महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे जो Euclid के कार्य से सीधे संवाद में हैं। समांतर अभिगृहीत को शेष चार अभिगृहीतों से व्युत्पन्न करने का उनका प्रयास — जो अंततः असफल रहा, जैसा कि ऐसा कोई भी प्रयास होना ही था — कुछ महत्वपूर्ण नए विचार लेकर आया जिन्होंने बाद में यूरोपीय विद्वानों के ज्यामिति की नींव संबंधी कार्य को प्रभावित किया।
Nasir al-Din al-Tusi, महान फ़ारसी बहुज्ञ जो 1201 से 1274 ईस्वी तक जीवित रहे, उन्होंने पूर्ववर्ती अनुवादों की सावधानीपूर्वक तुलना के आधार पर Elements का एक नया अरबी संस्करण तैयार किया, जो इस्लामी जगत में व्यापक रूप से प्रचलित हो गया। al-Tusi उन अरबी गणितज्ञों में भी थे जो गैर-यूक्लिडीय ज्यामिति की खोज के सबसे निकट पहुँचे — उन्होंने समांतर अभिगृहीत का एक ऐसा रूप प्रस्तावित किया जो Euclid के मूल रूप से सूक्ष्म रूप से भिन्न है, किंतु शेष चार अभिगृहीतों से उतना ही असिद्ध करने योग्य है।
Euclid के साथ अरबी गणितीय जुड़ाव इस्लामी जगत की व्यापक बौद्धिक संस्कृति से और भी समृद्ध हुआ, जिसने फ़ारसी, यूनानी, भारतीय और सीरियाई परंपराओं के विद्वानों को एक रचनात्मक संश्लेषण में एक साथ लाया। गणितज्ञ al-Khwarizmi, जिन्होंने नवीं शताब्दी के प्रारंभ में बगदाद के बैतुल हिकमा (House of Wisdom) में काम किया और जिनके नाम से "algorithm" शब्द बना, वे यूक्लिडीय गणित से गहराई से परिचित थे और उन्होंने बीजगणित पर अपना मौलिक कार्य Elements की ज्यामितीय परंपरा की प्रतिक्रिया में आंशिक रूप से विकसित किया। "algebra" शब्द स्वयं al-Khwarizmi के ग्रंथ al-Kitab al-mukhtasar fi hisab al-jabr wal-muqabala — अर्थात् पूर्णता और संतुलन द्वारा गणना की संक्षिप्त पुस्तक — के शीर्षक से निकला है, और इसमें प्रस्तुत तकनीकों को प्रायः Elements की ज्यामितीय विधियों के — विशेषकर पुस्तक II के ज्यामितीय बीजगणित के — सामान्यीकरण और अमूर्तीकरण के रूप में समझा जा सकता है।
Ibn Sina (Avicenna), महान फ़ारसी दार्शनिक और चिकित्सक जो 980 से 1037 ईस्वी तक जीवित रहे, उन्होंने यूक्लिडीय ज्यामिति को विज्ञानों के अपने विश्वकोशीय विवेचन में समाहित किया और इसे फ़ारसी भाषी पाठकों की एक विशाल श्रृंखला तक सुलभ बनाया। al-Biruni, ग्यारहवीं शताब्दी के फ़ारसी बहुज्ञ जिन्होंने गणित, खगोलशास्त्र, इतिहास और अनेक अन्य विषयों पर लिखा, उन्होंने Euclid का विस्तार से हवाला दिया और Elements से संबंधित ज्यामितीय समस्याओं में अपना स्वतंत्र योगदान दिया। इन तमाम विद्वानों और अनेक अन्य लोगों के सामूहिक प्रयासों का परिणाम यह हुआ कि Elements एक यूनानी ग्रंथ से बदलकर इस्लामी बौद्धिक संस्कृति का एक जीवंत हिस्सा बन गया — एक विशाल भौगोलिक क्षेत्र में और कई शताब्दियों तक पढ़ा, पढ़ाया और आगे विकसित किया जाने वाला।
अरबी परंपरा में Euclid के संरक्षण और विकास के महत्व को कम करके नहीं आँका जा सकता। जब ग्यारहवीं और बारहवीं सदी में पश्चिमी यूरोप के विद्वानों ने यूनानी वैज्ञानिक ग्रंथों की खोज शुरू की — पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन के बाद से वे लगभग पूरी तरह इनसे वंचित रहे थे — तो उन्होंने ये ग्रंथ मुख्यतः अरबी परंपरा के माध्यम से ही पाए। अरबों ने यूनानियों की रचनाओं को केवल सहेजा नहीं था; उन्होंने उनका अध्ययन किया, उन्हें आगे बढ़ाया और समृद्ध किया, और यही समृद्ध Euclid यूरोप वापस पहुँचा।
पुनर्जागरण यूरोप में Elements
सदियों की अनुपस्थिति के बाद Euclid की पश्चिमी यूरोप में वापसी प्राचीन ज्ञान की पुनःप्राप्ति की एक महान गाथा है। आरंभिक मध्यकाल में — लगभग पाँचवीं से दसवीं सदी ईस्वी तक — पश्चिमी यूरोप में Elements का ज्ञान अत्यंत सीमित था। लैटिन भाषा के विश्वकोशीय ग्रंथों में अप्रत्यक्ष संदर्भों और सारांशों के ज़रिए इस रचना के कुछ अंश तो ज्ञात थे, लेकिन लैटिन में पूरा पाठ उपलब्ध नहीं था। लैटिन पश्चिम के विद्वान जानते थे कि Euclid ने ज्यामिति पर लिखा है और उनके कुछ निष्कर्षों से भी परिचित थे, परंतु उनके पास वह कठोर, प्रमाण-आधारित पाठ नहीं था जो उनकी महानता का मूल स्रोत था।
यह सफलता बारहवीं सदी में मिली, जब यूरोपीय विद्वान स्पेन, सिसिली और अन्य उन क्षेत्रों की यात्रा पर निकले जहाँ लैटिन ईसाई जगत और अरबी इस्लामी जगत का संपर्क होता था। वहाँ उन्होंने अरबी सीखी और उन महान वैज्ञानिक व दार्शनिक ग्रंथों का अनुवाद किया जिन्हें इस्लामी परंपरा में सँजोया और समृद्ध किया गया था। Elements का पहला पूर्ण लैटिन अनुवाद लगभग 1120 ईस्वी में Adelard of Bath ने किया — एक अंग्रेज़ विद्वान जिन्होंने अरब जगत में व्यापक यात्राएँ कीं और यूनानी वैज्ञानिक ग्रंथों तक पहुँचने के एकमात्र उद्देश्य से अरबी भाषा सीखी। Adelard का अनुवाद एक अरबी संस्करण से किया गया था, जो संभवतः al-Hajjaj परंपरा से निकला था, और इसने Euclid को पश्चिमी यूरोप के विद्वानों के सामने उस रूप में प्रस्तुत किया जिसे वे पढ़ सकते थे।
Adelard के अनुवाद के बाद अन्य लैटिन संस्करण भी आए, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण था बारहवीं सदी में इतालवी गणितज्ञ और अनुवादक Gerard of Cremona द्वारा तैयार किया गया संस्करण, और तेरहवीं सदी में फ्रांसिस्कन भिक्षु Campanus of Novara द्वारा किया गया संशोधन और पुनर्संयोजन। Campanus का संस्करण, जो लगभग 1255 में पूरा हुआ, इसमें विस्तृत टिप्पणी जोड़ी गई थी और यह अगली दो सदियों तक पश्चिमी यूरोप के विश्वविद्यालयों में Elements का मानक लैटिन पाठ बन गया। जब Elements पहली बार मुद्रित रूप में प्रकाशित हुई, तब Campanus का यही संस्करण प्रयुक्त हुआ — जिसमें मूल तेरह के बजाय पंद्रह पुस्तकें थीं, क्योंकि संदिग्ध प्रामाणिकता वाली दो पुस्तकें इसमें जोड़ दी गई थीं।
1482 में Elements की छपाई न केवल Euclid के इतिहास में, बल्कि पुस्तक के इतिहास में भी एक निर्णायक क्षण है। 25 मई, 1482 को Venice के मुद्रक Erhard Ratdolt ने Elements का पहला मुद्रित संस्करण — editio princeps — प्रकाशित किया, और यह एक साथ यूरोप में छपी उन पहली पुस्तकों में से एक थी जिनमें विस्तृत गणितीय आकृतियाँ और आरेख शामिल थे। अपनी प्रस्तावना में Ratdolt ने उल्लेख किया कि ज्यामितीय आरेखों को छापने की कठिनाई के कारण गणितीय ग्रंथ अन्य रचनाओं की तुलना में देर से मुद्रित हो पाए, और उन्होंने गर्व के साथ घोषणा की कि उन्होंने इस समस्या का समाधान कर लिया है। 1482 के Venice संस्करण में चार सौ से अधिक ज्यामितीय आरेख हैं, जो Ratdolt द्वारा इसी उद्देश्य के लिए विशेष रूप से विकसित वुडकट तकनीक से मुद्रित किए गए थे। यह पुस्तक एक तकनीकी उपलब्धि के साथ-साथ एक बौद्धिक मील का पत्थर भी थी।
सोलहवीं शताब्दी में यूरोप में Euclid के प्रति रुचि का एक विस्फोट-सा देखने को मिला। इटली, फ्रांस, जर्मनी और इंग्लैंड में नए संस्करण प्रकाशित हुए। 1482 में पहला ग्रीक संस्करण प्रकाशित हुआ, जिससे ग्रीक जानने वाले विद्वान Euclid को लैटिन अनुवाद की बजाय उनकी मूल भाषा में पढ़ सकते थे। जेसुइट गणितज्ञ Christopher Clavius ने 1574 में Elements का एक अत्यंत प्रभावशाली लैटिन संस्करण प्रकाशित किया, जो एक सदी से भी अधिक समय तक मानक पाठ्य-पुस्तक बना रहा। Federico Commandino के 1572 के इतालवी अनुवाद ने Elements को पहली बार आम बोलचाल की भाषा में उपलब्ध कराया, जिससे इसके पाठकों का दायरा लैटिन पढ़े-लिखे विद्वान वर्ग से आगे बढ़ गया। Henry Billingsley ने 1570 में पहला अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित किया, जिसमें John Dee की एक प्रस्तावना थी, जो गणितीय शिक्षा के महत्व के पक्ष में बड़े ही प्रभावशाली ढंग से तर्क देती थी।
सोलहवीं शताब्दी में एक और महत्वपूर्ण विकास यह हुआ कि Elements को व्यापक रूप से वैज्ञानिक लेखन के एक आदर्श के रूप में किस तरह समझा और इस्तेमाल किया जाता था। Francis Bacon, जिनके 1620 के Novum Organum ने प्रयोग से आगमनात्मक निष्कर्ष पर आधारित प्राकृतिक दर्शन का एक नया कार्यक्रम प्रस्तुत किया था, आंशिक रूप से यूक्लिडीय परंपरा की उस अत्यधिक निगमनात्मक प्रवृत्ति के विरुद्ध प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे जो उन्हें दिखती थी। लेकिन Bacon की यह आलोचना विरोधाभासी रूप से यही दर्शाती थी कि यूक्लिडीय मॉडल पढ़े-लिखे यूरोपीय विचारों में कितनी गहराई से समाया हुआ था — ज्ञान के प्रति नए दृष्टिकोण की वकालत करते हुए यूक्लिडीय मानक का सीधे सामना किए बिना काम ही नहीं चलता था। René Descartes, जिनका Discourse on Method 1637 में तीन वैज्ञानिक निबंधों के साथ परिशिष्ट के रूप में प्रकाशित हुआ, ने विश्लेषणात्मक ज्यामिति का विकास यूक्लिडीय ज्यामितीय प्रमाण की निश्चितता को बीजगणितीय गणना के क्षेत्र में लाने के उपाय के रूप में किया। Descartes की निर्देशांक ज्यामिति — जिसमें ज्यामितीय बिंदुओं को संख्याओं के जोड़ों से और ज्यामितीय वक्रों को बीजगणितीय समीकरणों से पहचाना जाता है — अपनी भावना में स्वयं गहरे रूप से यूक्लिडीय थी: इसका लक्ष्य विविध गणितीय समस्याओं को एक व्यवस्थित पद्धति तक सीमित करना था, जो निश्चित और प्रमाणिक परिणाम दे सके।
सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दियों के दौरान, Elements पूरे यूरोप और व्यापक रूप से अंग्रेज़ीभाषी दुनिया में विश्वविद्यालय स्तर पर ज्यामिति की शिक्षा के लिए मानक पाठ्य-पुस्तक बना रहा। Oxford और Cambridge ने Euclid में दक्षता को गणित की डिग्री के लिए अनिवार्य कर दिया था, और इन संस्थाओं के छात्र वर्षों तक इन प्रमेयों पर काम करते थे। अमेरिकी गणराज्य के शुरुआती दौर में, Elements को नव-स्थापित कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता था, जो अंग्रेज़ी विद्वत्-परंपराओं के माध्यम से वहाँ पहुँचा था। Euclid की प्रमेयें पढ़े-लिखे पाठकों को इतनी परिचित थीं कि लेखक और वक्ता इन्हें पूरे आत्मविश्वास के साथ उद्धृत या संकेतित कर सकते थे, यह जानते हुए कि उनके श्रोता समझेंगे।
इस लंबे कालखंड में Elements को जो अपार सम्मान मिला, उसके परिणाम गणित से कहीं आगे तक गए। अभिगृहीत प्रमाण का यूक्लिडीय मॉडल इस बात का आदर्श बन गया कि किसी भी क्षेत्र में कठोर तर्क कैसा दिखना चाहिए। राजनीतिक दार्शनिकों ने ज्यामितिज्ञों की तार्किक पद्धतियों से प्राकृतिक अधिकारों के अस्तित्व के पक्ष में तर्क दिए। धर्मशास्त्रियों ने यूक्लिडीय शैली के तर्कों से ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने का प्रयास किया। अमेरिकी स्वतंत्रता की घोषणा की शुरुआत ही कुछ सत्यों को "स्वतःसिद्ध" घोषित करते हुए होती है — एक ऐसा वाक्यांश जो अभिगृहीतों की भाषा की प्रतिध्वनि करता है — और फिर इन सत्यों से क्रांति के अधिकार का निगमन करती है, स्पष्ट रूप से एक यूक्लिडीय तर्क की संरचना अपनाते हुए। संक्षेप में, Euclid का गहरा सांस्कृतिक प्रभाव गणित से कहीं आगे तक फैला था और पश्चिमी सभ्यता के संपूर्ण बौद्धिक जीवन में अपनी छाप छोड़ गया।
गैर-यूक्लिडीय ज्यामिति और Euclid की विरासत
गणित के इतिहास में Euclid की विरासत की लंबी कहानी का सबसे नाटकीय अध्याय एक ऐसे सवाल से शुरू होता है जो पहली नज़र में महज़ एक तकनीकी प्रश्न लगता है: क्या Elements के पाँचवें अभिगृहीत को बाकी चार से सिद्ध किया जा सकता है? यह सवाल, जो प्राचीन काल से पूछा जाता रहा था, प्रारंभिक आधुनिक काल की सबसे महत्वपूर्ण गणितीय समस्याओं में से एक बन गया। और इसका समाधान — यह अहसास कि इसे सिद्ध नहीं किया जा सकता, और कि ऐसी सुसंगत ज्यामितियाँ मौजूद हैं जिनमें यह असत्य है — ने न केवल गणित को, बल्कि गणितीय ज्ञान और भौतिक जगत के बीच के संबंध की दार्शनिक समझ को भी पूरी तरह बदल दिया।
Euclid द्वारा प्रस्तुत पाँचवाँ अभिगृहीत इस दावे के समतुल्य है कि किसी दी गई रेखा पर न स्थित किसी भी बिंदु से उस रेखा के समानांतर ठीक एक रेखा खींची जा सकती है। इसे आजकल आमतौर पर Playfair का अभिगृहीत कहा जाता है — स्कॉटिश गणितज्ञ John Playfair के नाम पर, जिन्होंने 1795 में इसे यह सुस्पष्ट रूप दिया। Euclid द्वारा दिए गए मूल रूप में यह अभिगृहीत एक तिर्यक रेखा द्वारा दो रेखाओं पर बनाए गए कोणों से संबंधित है और कहता है कि यदि एक ओर के कोणों का योग दो समकोणों से कम हो, तो वे रेखाएँ उसी ओर बढ़ाने पर मिलेंगी। यह अभिगृहीत साधारण समतल यूक्लिडीय स्थान में सत्य है, लेकिन यह उस तरह स्पष्टतः स्वयंसिद्ध नहीं है जैसे बाकी चार अभिगृहीत हैं। Euclid की इसे उपयोग करने में स्पष्ट झिझक — वे इसे तब तक टालते रहे जब तक यह वास्तव में आवश्यक न हो गया, Proposition 29 में — यह दर्शाती है कि वे इसके अलग स्वभाव से भलीभाँति परिचित थे।
Euclid के बाद की यूनानी परंपरा में पाँचवें अभिगृहीत को सिद्ध करने के अनेक प्रयास हुए। पहली शताब्दी ईसा पूर्व में Posidonius ने समानांतर रेखाओं की एक अलग परिभाषा प्रस्तावित की जिससे प्रमाण आसान लगता था। दूसरी शताब्दी ईस्वी में Ptolemy ने एक तर्क दिया जो बाद में चक्रीय सिद्ध हुआ। पाँचवीं शताब्दी ईस्वी में Proclus ने एक और प्रयास किया जो भी असफल रहा। इन सभी प्रयासों में एक साझा कमज़ोरी थी: समानांतर अभिगृहीत को सिद्ध करने की कोशिश में इन लेखकों ने अनिवार्यतः एक ऐसी अतिरिक्त मान्यता प्रस्तुत कर दी जो स्वयं समानांतर अभिगृहीत के समतुल्य निकली। वे इसे सिद्ध नहीं कर रहे थे; वे केवल इसे एक अलग-सुनाई देने वाले दावे से प्रतिस्थापित कर रहे थे जिसमें वही तार्किक सामग्री थी।
यही प्रवृत्ति इस्लामी गणित की परंपरा में भी जारी रही। Ibn al-Haytham, Omar Khayyam और Nasir al-Din al-Tusi के महान प्रयास — जिनका उद्देश्य अन्य अभिगृहीतों से समानांतर अभिगृहीत को सिद्ध करना था — सभी उसी प्रकार विफल हुए: प्रस्तुत की गई अतिरिक्त मान्यताएँ उसी बात के समतुल्य थीं जो सिद्ध करनी थी। हालाँकि, इन इस्लामी प्रयासों का महत्व उनकी तात्कालिक विफलता से परे भी है: पाँचवें अभिगृहीत के प्रति वैकल्पिक दृष्टिकोण विकसित करते हुए, ये गणितज्ञ वास्तव में उन ज्यामितियों की तार्किक संरचना का अन्वेषण कर रहे थे जिनमें यह अभिगृहीत संशोधित था — भले ही उन्होंने इन विकल्पों को वास्तविक, सुसंगत ज्यामितियों के रूप में मान्यता देने का अंतिम कदम न उठाया हो।
यह संकट अठारहवीं सदी में Gerolamo Saccheri, Giovanni Girolamo Saccheri और Johann Heinrich Lambert के कार्यों के माध्यम से अपने चरम पर पहुँचा। Saccheri, एक इतालवी जेसुइट पादरी और गणितज्ञ थे, जिनका जीवनकाल 1667 से 1733 तक रहा। उन्होंने 1733 में Euclides ab Omni Naevo Vindicatus — अर्थात् Euclid Vindicated of Every Flaw — शीर्षक से एक ग्रंथ प्रकाशित किया। इसमें Saccheri ने व्यवस्थित रूप से यह जाँचा कि यदि समांतर अभिधारणा के स्थान पर दो विकल्पों को रखा जाए तो क्या होगा: पहला यह कि किसी दिए गए बिंदु से किसी दी गई रेखा के समांतर कोई रेखा नहीं खींची जा सकती (जिसे हम अब "अधिककोण की परिकल्पना" कहते हैं), और दूसरा यह कि उस बिंदु से एक से अधिक समांतर रेखाएँ खींची जा सकती हैं ("न्यूनकोण की परिकल्पना")। Saccheri ने यह सिद्ध किया कि पहली परिकल्पना Euclid की अन्य अभिधारणाओं के अंतर्गत विरोधाभास उत्पन्न करती है, परंतु दूसरी परिकल्पना — जो कि अतिपरवलयिक ज्यामिति की परिकल्पना है — उन्हें प्रमेयों की एक विशाल शृंखला से होकर ले गई, बिना कोई विरोधाभास उत्पन्न किए। Saccheri ने स्वयं को यह विश्वास दिला लिया कि उन्होंने अंततः एक विरोधाभास खोज लिया है, किंतु वह "विरोधाभास" वास्तव में केवल उनकी उस सहजात धारणा से टकराव था कि सीधी रेखाएँ अनंत तक विस्तृत होती हैं। यदि वे अपने गणित के वास्तविक निष्कर्षों को स्वीकार करने को तैयार होते, तो Saccheri किसी भी अन्य व्यक्ति से एक सदी पहले ही अ-यूक्लिडीय ज्यामिति की खोज कर सकते थे। परंतु इसके बजाय वे रुक गए — अंतिम वैचारिक कदम उठाने से हिचकिचाते हुए।
Johann Heinrich Lambert, जो 1760 के दशक में कार्यरत थे, Saccheri से आगे गए और बिना कोई विरोधाभास पाए उन्होंने काल्पनिक अ-यूक्लिडीय ज्यामिति के अनेक गुणधर्मों की वास्तव में गणना की। Lambert ने यह लक्ष्य किया, उदाहरण के लिए, कि उनकी काल्पनिक ज्यामिति में किसी त्रिभुज का क्षेत्रफल उसके कोणीय न्यूनता के समानुपाती होगा — अर्थात् उसके कोणों का योग 180 डिग्री से जितना कम पड़ता है, उस मात्रा के। यह एक अत्यंत सुंदर और सुस्पष्ट संबंध है, जिसका यूक्लिडीय ज्यामिति में कोई समतुल्य नहीं है, और यह एक सुसंगत गणितीय संरचना की ओर दृढ़ता से संकेत करता है। Lambert ने अपने निष्कर्ष प्रकाशित नहीं किए — संभवतः इस अनिश्चितता के कारण कि जिस प्रणाली का वे अध्ययन कर रहे थे, वह वास्तव में सुसंगत है या नहीं — और यह कार्य उनके मरणोपरांत ही प्रकाशित हो सका।
अंतिम सफलता 1820 के दशक में मिली, यूरोप के दो सुदूर भागों में स्वतंत्र रूप से कार्यरत दो गणितज्ञों के प्रयासों से: हंगेरियन János Bolyai और रूसी Nikolai Ivanovich Lobachevsky। Lobachevsky ने 23 फरवरी 1826 को कज़ान विश्वविद्यालय में एक व्याख्यान में अपने विचार प्रस्तुत किए — यह तिथि कभी-कभी अ-यूक्लिडीय ज्यामिति के जन्मदिन के रूप में स्मरण की जाती है — और 1829 में इस विषय पर अपना पहला शोधपत्र प्रकाशित किया। Bolyai, जो Carl Friedrich Gauss के एक सहयोगी के पुत्र थे, ने अपनी अ-यूक्लिडीय ज्यामिति को अपने पिता की एक गणितीय कृति के परिशिष्ट के रूप में लिखा, जो 1832 में प्रकाशित हुई। उस परिशिष्ट का लातिन शीर्षक था Scientiam Spatii Absolute Veram Exhibens — The Absolutely True Science of Space — और इसमें एक ऐसी ज्यामिति का संपूर्ण विकास प्रस्तुत किया गया था, जिसमें समांतर अभिधारणा के स्थान पर यह मान्यता रखी गई थी कि किसी भी दिए गए बिंदु से, किसी दी गई रेखा के समांतर अनंत रेखाएँ खींची जा सकती हैं।
Bolyai और Lobachevsky दोनों ने एक सुसंगत एवं पूर्ण ज्यामिति का निर्माण किया — जिसे हम आज अतिपरवलयिक ज्यामिति कहते हैं — जिसमें सीधी रेखाएँ समान दूरी बनाए रखने के बजाय एक-दूसरे से दूर होती जाती हैं, जिसमें किसी भी त्रिभुज के कोणों का योग सदैव 180 डिग्री से कठोरतः कम रहता है, और जिसमें समांतर अभिधारणा के स्थान पर उसके ठीक विपरीत मान्यता ली गई है। उनकी ज्यामितियाँ आंतरिक रूप से सुसंगत थीं, विरोधाभास से मुक्त थीं, और गणितीय दृष्टि से Euclid की ज्यामिति जितनी ही कठोर थीं। इसका निहितार्थ अत्यंत चौंकाने वाला था: कोई तार्किक कारण नहीं है कि यूक्लिडीय ज्यामिति ही, किसी अन्य ज्यामिति के बजाय, भौतिक अंतरिक्ष का वर्णन करे। पाँचवीं अभिधारणा वास्तव में शेष अभिधारणाओं से स्वतंत्र है; उसे उनसे व्युत्पन्न नहीं किया जा सकता; और उसके विकल्प उतनी ही आत्म-सुसंगत ज्यामितियों की ओर ले जाते हैं जितनी कि Euclid की।
Carl Friedrich Gauss, जो उस युग के सबसे महान गणितज्ञ थे, Bolyai और Lobachevsky के प्रकाशन से कई दशक पहले ही गैर-यूक्लिडीय ज्यामिति की खोज निजी तौर पर कर चुके थे। जब उन्हें उनके परिणामों का पता चला, तो Gauss ने उन्हें तुरंत सही माना और निजी पत्राचार में अपनी प्रशंसा व्यक्त की — हालाँकि उन्होंने स्वयं इस विषय पर कुछ भी प्रकाशित करने से इनकार कर दिया। कहा जाता है कि वे दार्शनिक विवादों के उस तूफान को भड़काना नहीं चाहते थे जिसकी उन्हें आशंका थी। गैर-यूक्लिडीय ज्यामिति की वैधता को Gauss की यह निजी स्वीकृति इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह पुष्टि करती है कि 1820 के दशक में ये विचार खोजे जाने के लिए परिपक्व हो चुके थे।
Bernhard Riemann, जिन्होंने Gauss के मार्गदर्शन में अध्ययन किया और 10 जून 1854 को "ज्यामिति की नींव में जो परिकल्पनाएँ निहित हैं, उन पर" शीर्षक से अपना प्रसिद्ध उद्घाटन व्याख्यान दिया, उन्होंने उस वैचारिक क्रांति को पूरा किया जिसकी शुरुआत Bolyai और Lobachevsky ने की थी। Riemann ने ज्यामिति को समझने के लिए एक सामान्य ढाँचा प्रस्तावित किया — जिसे उन्होंने "manifold" कहा — जो दूरी मापने के एक तरीके से सुसज्जित था और जिसे हम आज रीमानियन मेट्रिक कहते हैं। इस ढाँचे के भीतर, यूक्लिडीय ज्यामिति, अतिपरवलयिक ज्यामिति, और एक तीसरा प्रकार — जिसे अब दीर्घवृत्तीय ज्यामिति या गोलीय ज्यामिति कहते हैं — सभी एक बहुत अधिक सामान्य ज्यामितियों के परिवार के विशेष मामलों के रूप में सामने आते हैं, जो अपने वक्रता के चिह्न से अलग-अलग होते हैं। यूक्लिडीय ज्यामिति की वक्रता शून्य है, अतिपरवलयिक ज्यामिति की वक्रता ऋणात्मक है, और दीर्घवृत्तीय ज्यामिति की वक्रता धनात्मक है। Riemann के ढाँचे ने ऐसी ज्यामितियों की भी संभावना दी जिनमें वक्रता एक बिंदु से दूसरे बिंदु पर बदलती है — और यही वह बात थी जिसने साठ साल बाद Albert Einstein को सामान्य सापेक्षता के गणितीय आधार के रूप में रीमानियन ज्यामिति का उपयोग करने में सक्षम बनाया, जिसमें गुरुत्वाकर्षण को स्पेसटाइम की वक्रता के रूप में समझा जाता है।
गैर-यूक्लिडीय क्रांति के दार्शनिक निहितार्थ गणित से कहीं आगे तक फैले — ज्ञानमीमांसा, विज्ञान के दर्शन, और अमूर्त तर्क तथा अनुभवजन्य ज्ञान के बीच के संबंध की समझ तक। Immanuel Kant ने 1781 में प्रकाशित अपनी "Critique of Pure Reason" में यह प्रसिद्ध तर्क दिया था कि यूक्लिडीय ज्यामिति संश्लेषणात्मक प्रागनुभविक ज्ञान का एक रूप है — ऐसा ज्ञान जो संसार के बारे में वास्तव में सूचनाप्रद भी है (संश्लेषणात्मक) और फिर भी अनुभव से स्वतंत्र रूप से निश्चितता के साथ जाना जाता है (प्रागनुभविक)। Kant का मानना था कि मानव मन अनुभव के लिए एक स्थानिक अंतर्ज्ञान का ढाँचा लेकर आता है जो स्वाभाविक रूप से यूक्लिडीय है, और इसीलिए यूक्लिडीय ज्यामिति इतनी स्पष्ट रूप से सत्य लगती है। गैर-यूक्लिडीय ज्यामितियों की खोज ने Kant की स्थिति को बनाए रखना कठिन बना दिया: यदि ऐसी ज्यामितियाँ हैं जो Euclid की ज्यामिति जितनी ही आंतरिक रूप से संगत हैं, जिनमें समांतर अभिगृहीत असत्य है, तो यूक्लिडीय ज्यामिति उस रूप में विश्लेषणात्मक रूप से अनिवार्य नहीं हो सकती जैसा Kant ने माना था। भौतिक स्थान यूक्लिडीय है या नहीं, इस प्रश्न का उत्तर शुद्ध तर्क से नहीं दिया जा सकता; इसके लिए अनुभवजन्य जाँच आवश्यक है।
यह उपलब्धि, जिसे दार्शनिकों और गणितज्ञों ने उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के प्रारंभ में मिलकर स्पष्ट किया, आधुनिक विज्ञान के दर्शन के विकास में एक मील का पत्थर साबित हुई। इसने संश्लेषणात्मक प्रागनुभविक ज्ञान की कांटीय अवधारणा को उखाड़ फेंकने में योगदान दिया और वैज्ञानिक सिद्धांतों की अधिक अनुभवजन्य एवं भ्रांतिसंभव समझ का मार्ग प्रशस्त किया। यदि ज्यामिति तक — जो समस्त विज्ञानों में सबसे निश्चित और प्रत्यक्षतः अनिवार्य मानी जाती थी — अंततः स्थान की संरचना से संबंधित अनुभवजन्य तथ्यों पर निर्भर निकली, तो संभवतः समस्त वैज्ञानिक ज्ञान किसी न किसी हद तक अनुभवजन्य, खंडनीय और नए साक्ष्यों के आलोक में संशोधन के योग्य है। यह व्यापक अनुभववादी निष्कर्ष, जो Ernst Mach, Henri Poincaré और बाद में तार्किक प्रत्यक्षवादियों जैसे दार्शनिकों से जुड़ा है, गैर-यूक्लिडीय ज्यामिति की खोज का बड़ा ऋणी है।
गैर-यूक्लिडियन क्रांति ने यूक्लिडियन ज्यामिति को गलत या पुराना नहीं बना दिया। सामान्य मानवीय अनुभव और अधिकांश शास्त्रीय भौतिकी से संबंधित पैमानों की सीमा में, यूक्लिडियन ज्यामिति भौतिक अंतरिक्ष का एक असाधारण रूप से सटीक विवरण है। यह इंजीनियरिंग, वास्तुकला, नेविगेशन और स्कूल तथा व्यावहारिक जीवन में पढ़े जाने वाले अधिकांश गणित की नींव बनी हुई है। लेकिन गैर-यूक्लिडियन क्रांति ने यूक्लिडियन ज्यामिति की दार्शनिक स्थिति को मूलभूत रूप से बदल दिया। 1820 के दशक से पहले, यह आम धारणा थी कि यूक्लिडियन ज्यामिति अनिवार्य रूप से और पूर्व-अनुभवात्मक रूप से भौतिक अंतरिक्ष की वास्तविक संरचना का वर्णन करती है — कि अंतरिक्ष यूक्लिडियन होना ही चाहिए, क्योंकि यूक्लिडियन ज्यामिति ही एकमात्र संगत ज्यामिति है। 1820 के दशक के बाद यह स्पष्ट हो गया कि यह धारणा गलत थी: यूक्लिडियन ज्यामिति कई संगत ज्यामितियों में से एक है, और भौतिक अंतरिक्ष यूक्लिडियन है या नहीं, यह एक अनुभवजन्य प्रश्न है, न कि तार्किक आवश्यकता। यह दार्शनिक बदलाव, जिसके प्रभाव गणित से बहुत आगे ज्ञानमीमांसा और विज्ञान के दर्शन तक फैले, उन्नीसवीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण बौद्धिक घटनाओं में से एक था।
Newton, Spinoza, और यूक्लिडियन आदर्श
उन अनेक विचारकों में जो Euclid से प्रभावित हुए, दो नाम अपने ऋण की गहराई और स्पष्टता के कारण विशेष रूप से उभरकर सामने आते हैं: Isaac Newton और Baruch Spinoza। दोनों सत्रहवीं सदी में रहे, दोनों ऐसे युग में शिक्षित हुए जहाँ Elements अभी भी कठोर तर्कशक्ति के प्रशिक्षण का प्रमुख ग्रंथ था, और दोनों ने जान-बूझकर अपनी सबसे महत्वपूर्ण रचनाओं को Euclid के अनुकरण पर परिभाषाओं, स्वयंसिद्धों और प्रस्तावों के रूप में संगठित किया। इसके परिणामस्वरूप आधुनिक काल की शुरुआत की दो सबसे असाधारण बौद्धिक उपलब्धियाँ सामने आईं, और दोनों ही Alexandria के उस प्राचीन ज्यामितिज्ञ के प्रति एक प्रत्यक्ष और दृश्यमान ऋण स्वीकार करती हैं।
Isaac Newton की Philosophiae Naturalis Principia Mathematica, जो पहली बार 1687 में प्रकाशित हुई, शास्त्रीय यांत्रिकी और गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत का आधारभूत दस्तावेज़ है। Newton ने इसे तीन पुस्तकों में संगठित किया, जिनमें से प्रत्येक परिभाषाओं और स्वयंसिद्धों से शुरू होकर ज्यामितीय और गणितीय तर्कों द्वारा सिद्ध किए गए प्रस्तावों की एक श्रृंखला तक पहुँचती है। Principia के स्वयंसिद्ध — गति के तीन नियम — ठीक वैसे ही काम करते हैं जैसे Euclid के अभिगृहीत करते हैं: ये वे स्पष्ट और स्वीकृत प्रारंभिक बिंदु हैं जिनसे बाकी सब कुछ निकलता है। Newton के प्रस्तावों को फिर इन्हीं स्वयंसिद्धों से कठोर तर्क द्वारा निगमित किया गया है, और प्रत्येक प्रस्ताव स्पष्ट रूप से बताता है कि वह किन पूर्व परिणामों पर आधारित है। Elements से दृश्य और बौद्धिक समानता अचूक है, और यह आकस्मिक नहीं थी। Newton Cambridge में अपनी प्रारंभिक गणितीय शिक्षा से ही Euclid में गहरी पैठ रखते थे, और उन्होंने Principia के लिए यूक्लिडियन रूप इसलिए चुना क्योंकि उनका मानना था — जैसा कि Euclid का भी था — कि स्पष्ट स्वयंसिद्धों से निगमनात्मक संरचना वैज्ञानिक प्रस्तुति का सर्वोच्च रूप है।
हालाँकि यह ध्यान देने योग्य है कि Newton का यूक्लिडियन रूप का उपयोग केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि आंशिक रूप से कूटनीतिक भी था। Newton ने Principia लिखने से वर्षों पहले कलन — जिसे वे "method of fluxions" कहते थे — विकसित कर लिया था, और उनके कई परिणाम वास्तव में कलन का उपयोग करके ही खोजे गए थे। लेकिन उन्होंने इन्हें ज्यामितीय रूप में प्रस्तुत करना चुना, यूक्लिडियन शैली के प्रमाण का उपयोग करते हुए, आंशिक रूप से इसलिए क्योंकि उनका मानना था कि यह रूप उनके समकालीनों को अधिक आश्वस्त करेगा और कलन की उस नई तथा विवादित भाषा की ओर आकर्षित होने वाली दार्शनिक आपत्तियों के प्रति अधिक सुदृढ़ रहेगा। Principia एक अर्थ में कलन-आधारित तर्क के शरीर पर पहना यूक्लिडियन वेश है — जो इसे Euclid के सांस्कृतिक प्रभुत्व के प्रति एक श्रद्धांजलि और Newton के वास्तविक कार्य-पद्धति का कुछ हद तक भ्रामक प्रस्तुतीकरण दोनों बनाता है।
Baruch Spinoza की Ethics, जो 1677 में उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुई, यूक्लिडीय प्रभाव को और भी आगे ले जाती है। Spinoza ने नैतिकता, तत्त्वमीमांसा और ईश्वर की प्रकृति की नींव को उसी कठोरता और निश्चितता के साथ प्रमाणित करने का प्रयास किया, जिस प्रकार Euclid ने ज्यामितीय आकृतियों के गुणों को सिद्ध किया था। उन्होंने अपनी रचना को पाँच भागों में विभाजित किया, जिनमें से प्रत्येक की शुरुआत परिभाषाओं और स्वयंसिद्धों से होती थी और जो क्रमांकित प्रमेयों, औपचारिक उपपत्तियों, उपप्रमेयों और विवरणों के माध्यम से आगे बढ़ती थी। Ethics में प्रमेयों को ठीक उसी प्रकार स्पष्ट रूप से प्रतिपादित, औपचारिक रूप से प्रमाणित और पूर्व परिणामों से संदर्भित किया गया है, जैसा Elements में किया गया है। Spinoza का उद्देश्य था कि ईश्वर, प्रकृति, मानवीय स्वतंत्रता और नैतिकता पर होने वाली चर्चाओं से भावनात्मक अस्पष्टता और धार्मिक भावनाओं को हटाकर उनके स्थान पर वे आवश्यक सत्य स्थापित किए जाएँ जो स्पष्ट प्रथम सिद्धांतों से निगमित किए जा सकें।
Spinoza दर्शनशास्त्र में यूक्लिडीय निश्चितता जैसा कुछ हासिल कर पाए या नहीं, यह सदा चलने वाली बहस का विषय है। उनकी परिभाषाएँ और स्वयंसिद्ध Euclid के ज्यामितीय अभिगृहीतों की तुलना में कहीं अधिक विवादास्पद हैं, और उनके प्रमाण तर्क-शृंखलाओं पर निर्भर हैं जिन पर दार्शनिक तब से लेकर आज तक विवाद करते आए हैं। लेकिन यह आकांक्षा — ज्यामितीय उपपत्ति की स्पष्टता, अनिवार्यता और पारदर्शिता को दर्शनशास्त्र में लाना — Euclid के बौद्धिक आदर्श को एक उल्लेखनीय श्रद्धांजलि है। Spinoza का मानना था कि पूर्ववर्ती दार्शनिकों का निश्चित ज्ञान प्राप्त न कर पाना बुद्धि की विफलता नहीं बल्कि पद्धति की विफलता थी, और इस विफलता को सुधारने के लिए उन्होंने जो पद्धति चुनी, वह Euclid की थी।
Abraham Lincoln का Euclid का अध्ययन Elements के प्रत्यक्ष व्यक्तिगत प्रभाव का एक तीसरा और विशेष रूप से अमेरिकी उदाहरण है। Lincoln, जिनकी औपचारिक शिक्षा बहुत कम थी, ने वयस्क होने पर तर्कशास्त्र और वक्तृत्वकला में स्वयं के निर्देशन में गहन अध्ययन किया। उन्होंने बाद में याद करते हुए बताया कि कांग्रेस के लिए चुने जाने के बाद उन्होंने Elements की पहली छह पुस्तकों को दीपक की रोशनी में आत्मसात करने का लक्ष्य निर्धारित किया — किसी व्यावहारिक उद्देश्य के लिए नहीं, बल्कि कठोर तर्क की क्षमता विकसित करने के लिए। Lincoln ने स्पष्ट रूप से कहा था कि उनका लक्ष्य यह समझना था कि किसी बात को प्रमाणित करने का अर्थ क्या है, यह निश्चित रूप से कह पाना कि कोई बात सिद्ध हुई या नहीं, और उन्होंने Euclid में वास्तविक प्रदर्शन का वह आदर्श पाया जो यह दर्शाता है कि प्रमाण वास्तव में कैसा दिखता है। इस अनुभव ने Lincoln की वक्तृत्वशैली पर स्थायी छाप छोड़ी: Gettysburg Address की सुगठित तार्किक संरचना, जो स्थापना से संबंधित एक प्रमेय से वर्तमान कार्यभार के बारे में निष्कर्ष की ओर सुविचारित गति करती है, Lincoln द्वारा स्वेच्छा से किए गए यूक्लिडीय प्रशिक्षण की देन है।
ये उदाहरण उस ग्रंथ की असाधारण सांस्कृतिक व्यापकता को दर्शाते हैं जो मूल रूप से प्राचीन यूनानी ज्यामिति का एक संकलन था। Newton के हाथों में यह गणितीय भौतिकी का आदर्श बना। Spinoza के हाथों में यह दार्शनिक नैतिकता का आदर्श बना। Lincoln के हाथों में यह राजनीतिक वक्तृत्वकला का प्रशिक्षण क्षेत्र बना। प्रत्येक मामले में आकर्षण एक ही था: Euclid की पद्धति की पारदर्शिता, वह तरीका जिसमें वह स्पष्ट करता है कि क्या मान लिया गया है, वह तरीका जिसमें वह ऐसे तर्क से निष्कर्ष निकालता है जिसे स्वीकृत आधार-वाक्यों के रहते नकारा नहीं जा सकता, और वह तरीका जिसमें वह अपने सर्वोत्तम रूप में ऐसे परिणाम उत्पन्न करता है जो केवल प्रेरक नहीं बल्कि अनिवार्य होते हैं।
आलोचनात्मक मूल्यांकन
Euclid की उपलब्धि का एक आलोचनात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत करने से पहले, यह देखना उचित होगा कि विभिन्न बौद्धिक परंपराओं में Elements ने कितने उल्लेखनीय और विविध तरीकों से अपनी भूमिका निभाई है। मध्यकालीन यूरोपीय विद्वानों के लिए, जिनकी पहुँच इस रचना के केवल कुछ अंशों तक और वह भी अपूर्ण अनुवादों के माध्यम से थी, Euclid मुख्यतः एक ऐसे प्राधिकारी थे जिनके निष्कर्षों का हवाला दिया जा सकता था, न कि ऐसे लेखक जिनके तर्कों का अनुसरण किया जा सके। पुनर्जागरण काल के उन विद्वानों के लिए जिन्होंने पूरे ग्रंथ को पुनः प्राप्त किया और यूनानी भाषा में नए आत्मविश्वास के साथ उसे पढ़ सके, Euclid मानवतावादी ज्ञान का एक आदर्श और पुरातनकाल का पुनः खोजा गया खज़ाना थे। सत्रहवीं शताब्दी के वैज्ञानिकों — Galileo, Descartes, Newton — के लिए Euclid इस बात का आदर्श थे कि कठोरतापूर्वक वैज्ञानिक लेखन कैसे किया जाना चाहिए: स्पष्ट सिद्धांतों से शुरू होकर, वैध तर्कों के माध्यम से, अनिवार्य निष्कर्षों तक पहुँचते हुए। उन्नीसवीं शताब्दी के शैक्षिक सुधारकों के लिए, जो इस बात पर बहस करते थे कि विद्यालयों में Euclid को मानक पाठ्यपुस्तक बने रहना चाहिए या इसे अधिक आधुनिक ग्रंथों से प्रतिस्थापित किया जाना चाहिए, Euclid शिक्षा के उद्देश्यों और पद्धतियों पर होने वाली बहसों में एक विवाद का केंद्र बन गए। आधुनिक युग के व्यावसायिक गणितज्ञों के लिए Euclid अत्यंत महत्वपूर्ण एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ हैं, किंतु अब एक सक्रिय शोध उपकरण नहीं रहे — अधिक शक्तिशाली और अधिक कठोरता से स्वयंसिद्धीकृत ग्रंथों ने उनकी जगह ले ली है।
इनमें से प्रत्येक संदर्भ में Euclid के Elements का अर्थ अलग-अलग रहा है, और इस अर्थ-वैविध्य में ही इस रचना की समृद्धि और गहराई का प्रमाण निहित है। जो ग्रंथ एक साथ शैक्षणिक उपकरण, दार्शनिक कसौटी, वैज्ञानिक आदर्श और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में कार्य कर सके, वह असाधारण बहुमुखिता और स्थायित्व का ग्रंथ है — और Elements में ये सभी गुण विद्यमान हैं।
Euclid की उपलब्धि का कोई भी गंभीर मूल्यांकन उनकी असाधारण उपलब्धियों और उन वास्तविक सीमाओं — जिन्हें परवर्ती गणित ने उजागर किया — दोनों को दृष्टि में रखकर ही किया जाना चाहिए। Euclid वह अचूक ऋषि नहीं थे जैसा दो हजार वर्षों की प्रशंसा ने उन्हें कभी-कभी प्रतीत कराया; वे एक प्रतिभाशाली, अनुशासित और सर्जनात्मक रूप से कुशल गणितज्ञ थे जो अपने समय और परंपरा की सीमाओं के भीतर कार्य कर रहे थे, और उनके कार्य को सर्वोत्तम रूप से तभी समझा और सराहा जा सकता है जब उन सीमाओं को स्पष्टतः देखा जाए।
Elements की सबसे बड़ी उपलब्धि कोई एक प्रमेय नहीं, बल्कि समग्र संरचना है। स्पष्ट परिभाषाओं, अभिगृहीतों और सामान्य धारणाओं से आरंभ करने का निर्णय; सब कुछ केवल तार्किक तर्क द्वारा निगमित करने की प्रतिबद्धता; किन परिणामों को और किस क्रम में सिद्ध करना है, इसका चयन; एक ऐसी तार्किक संरचना का निर्माण जिसमें सैकड़ों प्रमेय निर्भरता के एक क्रमबद्ध सोपान में व्यवस्थित हों और कोई चक्रीय तर्क न हो — इन सभी के लिए न केवल गणितीय ज्ञान, बल्कि विशेष रूप से संगठनात्मक और व्यवस्थित प्रकार की गणितीय प्रतिभा की आवश्यकता थी। Euclid से पहले किसी ने भी इस पैमाने पर तुलनीय कार्य नहीं किया था, और दो सहस्राब्दियों तक किसी को इससे बेहतर करने की आवश्यकता नहीं लगी।
Elements ने गणितीय ज्ञान की प्रकृति के बारे में एक गहरा दार्शनिक वक्तव्य भी प्रस्तुत किया। यह प्रदर्शित करके कि थोड़ी-सी स्पष्ट मान्यताओं से तार्किक निगमन द्वारा गणित के विशाल क्षेत्र की खोज की जा सकती है, इसने यह दिखाया कि गणित केवल ज्यामितीय प्रेक्षण से प्राप्त आनुभविक सामान्यीकरणों का संचय नहीं है, बल्कि यह शुद्ध तर्कबुद्धि से सुलभ आवश्यक सत्यों का एक क्षेत्र है। इस प्रदर्शन का दर्शन, विज्ञान और संस्कृति पर अत्यंत व्यापक प्रभाव पड़ा, और इसने Spinoza से Kant और Hilbert तक के विचारकों को अपने-अपने क्षेत्रों में कठोर, स्वयंसिद्ध ज्ञान के आदर्श का अनुसरण करने की प्रेरणा दी।
साथ ही, बाद के गणित ने Euclid की नींव में महत्वपूर्ण कमियाँ उजागर कीं। David Hilbert की 1899 की रचना Grundlagen der Geometrie ने दर्शाया कि यूक्लिडीय ज्यामिति के पूर्ण स्वयंसिद्धीकरण के लिए Euclid के पाँच अभिधारणाओं से कहीं अधिक स्वयंसिद्धों की आवश्यकता है — विशेष रूप से, Hilbert को उन सभी अंतर्निहित मान्यताओं को समाप्त करने के लिए बीस स्वयंसिद्धों की जरूरत पड़ी जिन्हें Euclid ने अनकहा छोड़ दिया था। इन अंतर्निहित मान्यताओं में एक रेखा पर बिंदुओं के क्रम से संबंधित दावे शामिल हैं (कौन-सी दिशा "बीच में" है), ज्यामितीय आकृतियों की सातत्यता के बारे में (जो यह मानने की अनुमति देती है कि यदि कोई रेखा वृत्त के आंतरिक भाग से गुजरती है तो वृत्त और रेखा का प्रतिच्छेदन अवश्य होगा), और समतल के अन्य टोपोलॉजिकल गुणों के बारे में जिनका Euclid ने बिना उल्लेख किए स्वतंत्र रूप से उपयोग किया। ये मामूली चूक नहीं हैं; ये Euclid के अनेक प्रमाणों की आधारशिला हैं, और स्वयं Euclid ने इन्हें पहचाना नहीं था।
Euclid की पद्धति में ये कमियाँ दो हजार वर्षों तक खोजी नहीं गईं, और यह तथ्य अपने आप में उल्लेखनीय है। यह इस बात का प्रमाण है कि Elements को कितनी असाधारण सावधानी से निर्मित किया गया था: इसके तर्क इतने कठोरता के निकट हैं कि अनेक शताब्दियों तक काम करने वाले अत्यंत प्रतिभाशाली गणितज्ञ भी शेष रह गई कमियों को नहीं पहचान सके। उन्नीसवीं शताब्दी में गणित में कठोरता के मानक इस स्तर तक पहुँचे कि Hilbert अंततः वह पहचान सके जो Euclid से छूट गया था — यह Euclid की निंदा नहीं, बल्कि गणितीय ज्ञान की प्रगतिशील प्रकृति का प्रमाण है।
गणित के इतिहास में, और व्यापक रूप से मानवीय विचार के इतिहास में, Euclid का स्थान सुरक्षित है और होना भी चाहिए। वे सबसे पहले एक संश्लेषक और एक वास्तुकार थे: उन्होंने अपने पूर्ववर्तियों के गणितीय ज्ञान को लिया, सबसे महत्वपूर्ण और मूलभूत परिणामों का चयन किया, उन्हें सबसे तार्किक रूप से कुशल क्रम में व्यवस्थित किया, और इतनी कठोरता और स्पष्टता के साथ प्रस्तुत किया कि उनका यह संकलन दो हजार से अधिक वर्षों तक एक निर्णायक ग्रंथ बना रहा। यह तथ्य कि Euclid ने पूर्ववर्ती गणितज्ञों के कार्य पर आधार रखा और Elements में समाहित अधिकांश सामग्री उनकी मौलिक खोज नहीं थी, इस उपलब्धि को कम नहीं करता; यह उसे उसके संदर्भ में रखता है। यह देखने के लिए कि विद्यमान ज्ञान को कैसे संगठित किया जाए, सही नींव क्या हों, और एक व्यापक निगमनात्मक सिद्धांत को संभव बनाने वाली तार्किक संरचना कैसे निर्मित की जाए — इसके लिए जिस प्रतिभा की आवश्यकता है, वह किसी एकल प्रमेय को सिद्ध करने के लिए आवश्यक प्रतिभा से कम नहीं है; वह प्रकृति में भिन्न है, और कहा जा सकता है कि अधिक दुर्लभ भी।
Euclid के बाद की शताब्दियों में, Elements का हर प्रमुख भाषा में अनुवाद हुआ, उसे हर प्रकार की विद्वत्तापूर्ण जाँच-परख का सामना करना पड़ा, और पूरे विश्व में कठोर गणितीय चिंतन की शिक्षा के लिए उसे आधारभूत ग्रंथ के रूप में उपयोग किया गया। Newton, Hobbes, Locke और Lincoln ने इसकी प्रशंसा की है — कहा जाता है कि Abraham Lincoln ने तार्किक तर्क करने की अपनी क्षमता को निखारने के लिए लालटेन की रोशनी में Elements की पहली छह पुस्तकों को पढ़ा था। Schopenhauer ने इसकी आलोचना की, जिन्हें इसकी पद्धति अत्यधिक नियमबद्ध और अस्वाभाविक लगी, और Mill और Russell ने विभिन्न दार्शनिक आपत्तियों के विरुद्ध इसका बचाव किया। यह ढाई सहस्राब्दियों और हर बसे हुए महाद्वीप तक फैले एक विशाल विद्वत्तापूर्ण साहित्य का विषय रहा है। कोई अन्य गणितीय ग्रंथ न इतने सार्वभौमिक रूप से पढ़ा गया है, न इतने निरंतर प्रभावशाली रहा है, और न ही मानवीय बौद्धिक संस्कृति के ताने-बाने में इतनी गहराई से बुना गया है।
Euclid को जिसे लंबे समय से ज्यामिति का जनक कहा जाता रहा है, उन्होंने एक असाधारण बौद्धिक अवसर के क्षण में काम किया: दुनिया के उस पहले शहर में जो विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय ज्ञान की राजधानी के रूप में बसाया गया था, एक ऐसे राजवंश के संरक्षण में जो ज्ञान को शक्ति के एक साधन के रूप में महत्व देता था, और यूनानी गणितीय विकास की कई शताब्दियों की परिणति पर — जिसने उनके इस संश्लेषण की रचना को संभव बनाया था। उन्होंने इस अवसर का सदुपयोग एक ऐसी कृति से किया जो इतनी सटीक, व्यापक और तार्किक दृष्टि से इतनी सशक्त थी कि यह दो हजार से अधिक वर्षों तक गणितीय तर्कशास्त्र का मानक बनी रही और आज भी पढ़ी, अध्ययन की और सराही जाती है। एक ऐसे क्षेत्र में जो अपने परिणामों की स्थायी वैधता से परिभाषित होता है, Euclid की उपलब्धि सभ्यता के इतिहास के सबसे चिरस्थायी बौद्धिक स्मारकों में से एक के रूप में खड़ी है।
यूक्लिडीय ज्यामिति की आधुनिक विरासत
इक्कीसवीं सदी में, Euclid की Elements गणित की दुनिया में एक विरोधाभासी स्थिति रखती है। एक ओर, यह अब अधिकांश स्कूलों या विश्वविद्यालयों में पाठ्यपुस्तक के रूप में उपयोग नहीं की जाती, क्योंकि इसकी जगह अधिक आधुनिक पद्धतियों ने ले ली है जो समुच्चय सिद्धांत, निर्देशांक ज्यामिति और सत्रहवीं शताब्दी से विकसित बीजगणितीय ढाँचे को समाहित करती हैं। दूसरी ओर, Euclid द्वारा स्थापित बौद्धिक परंपरा — गणितीय ज्ञान को स्पष्ट रूप से कथित स्वयंसिद्धों पर आधारित एक निगमनात्मक प्रणाली के रूप में व्यवस्थित करने की पद्धति — आज गणित में उतनी केंद्रीय है जितनी पहले कभी नहीं रही।
आधुनिक गणित अपनी गहरी संरचना में एक यूक्लिडीय उपक्रम है। गणित का हर शोधपत्र, स्पष्ट रूप से या अंतर्निहित रूप से, परिभाषाओं और मान्यताओं से आरंभ होता है और तार्किक तर्क के माध्यम से निष्कर्षों तक पहुँचता है। आधुनिक गणित का हर प्रमेय — बीजगणितीय टोपोलॉजी के सर्वाधिक अमूर्त परिणामों से लेकर संख्यात्मक विश्लेषण के सर्वाधिक संगणनात्मक प्रमेयों तक — से यह अपेक्षा की जाती है कि उसके साथ एक कठोर प्रमाण हो, जो यह स्पष्ट करे कि ठीक कौन-सी मान्यताएँ ली जा रही हैं और निष्कर्ष उनसे ठीक कैसे निकलता है। प्रमाण का यह मानक — यूक्लिडीय मानक — आधुनिक गणितज्ञों में इतनी गहराई से आत्मसात हो चुका है कि इसे स्वाभाविक रूप से गणित करने की प्रक्रिया का अभिन्न अंग मान लिया जाता है।
गणित की नींव पर Euclid का प्रभाव उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के प्रारंभ के स्वयंसिद्ध आंदोलन में भी स्पष्ट रूप से दिखता है, जो एक प्रत्यक्ष अर्थ में वह करने का प्रयास था जो Euclid ने ज्यामिति के लिए किया था — वह सब के लिए करना। स्वयंसिद्धों का सबसे छोटा संभव समुच्चय खोजने की प्रेरणा — जिससे गणितीय परिणामों का सबसे बड़ा संभव भंडार व्युत्पन्न किया जा सके — और इस व्युत्पत्ति को स्पष्ट और कठोर बनाना, Hilbert की Grundlagen der Geometrie से होते हुए Frege की Grundgesetze der Arithmetik तक और Russell तथा Whitehead की Principia Mathematica तक जाती है। ये सभी परियोजनाएँ, तकनीकी उपकरणों में Euclid से चाहे जितनी भी भिन्न रही हों, अपनी गहरी प्रेरणा में यूक्लिडीय थीं।
डिजिटल युग में यूक्लिडीय विचारों ने नए अनुप्रयोग और नया जीवन पाया है। यूक्लिडीय एल्गोरिदम — Elements की पुस्तक VII में दी गई दो संख्याओं का महत्तम समापवर्तक निकालने की विधि — कंप्यूटर विज्ञान में सर्वाधिक व्यापक रूप से लागू एल्गोरिदमों में से एक है। जब भी कोई कंप्यूटर प्रोग्राम महत्तम समापवर्तक की गणना करता है, किसी भिन्न को न्यूनतम रूप में घटाता है, या कुछ प्रकार की क्रिप्टोग्राफ़िक गणनाएँ करता है, तो वह वास्तव में एक ऐसी प्रक्रिया को क्रियान्वित कर रहा होता है जिसे Euclid ने दो हजार से अधिक वर्ष पहले वर्णित किया था। RSA एन्क्रिप्शन एल्गोरिदम, जो इंटरनेट संचार की अधिकांश सुरक्षा का आधार है, मूल रूप से उन संख्या-सैद्धांतिक परिणामों पर निर्भर करता है जो Elements की पुस्तक VII से IX में दिए गए परिणामों से गहरे रूप से संबंधित हैं। ज्यामिति के जनक, एक बहुत वास्तविक अर्थ में, आधुनिक क्रिप्टोग्राफ़ी के एक योगदानकर्ता पूर्वज हैं।
यूक्लिडीय ज्यामिति आज भी रोज़मर्रा के अनुभव और अधिकांश व्यावहारिक अनुप्रयोगों की ज्यामिति बनी हुई है। वास्तुकला, इंजीनियरिंग, सर्वेक्षण, विनिर्माण, नेविगेशन, और वस्तुतः वे सभी तकनीकी विषय जो भौतिक संसार को आकार देते हैं — सभी यूक्लिडीय ढाँचे के भीतर काम करते हैं। मिलीमीटर के एक अंश से लेकर हज़ारों किलोमीटर तक के पैमानों के लिए — यानी अनिवार्य रूप से पैमानों की वह पूरी सीमा जो पृथ्वी की सतह पर मानव गतिविधि के लिए मायने रखती है — यूक्लिडीय ज्यामिति महज़ एक उपयोगी सन्निकटन नहीं है, बल्कि किसी भी व्यावहारिक सटीकता के स्तर पर यह पूर्णतः सटीक है। सामान्य सापेक्षता की गैर-यूक्लिडीय ज्यामिति GPS उपग्रहों, ब्लैक होल और ब्रह्मांड की वृहद संरचना के लिए प्रासंगिक है, लेकिन पुल बनाने वाला इंजीनियर, वास्तुकार और शहरी योजनाकार — ये सभी Euclid की दुनिया में ही काम करते हैं।
हाल के दशकों में गणित के इतिहास और दर्शन ने Euclid के अध्ययन को भी नई ऊर्जा दी है। विद्वानों ने Elements की तार्किक संरचना का विस्तृत विश्लेषण किया है, प्रस्ताव दर प्रस्ताव उसकी निर्भरताओं को खँगाला है और उसकी शक्तियों तथा कमियों दोनों को चिह्नित किया है। गणित के दर्शन को इस अध्ययन से समृद्धि मिली है कि Euclid की अभिधारणाएँ वास्तव में हमें किन मान्यताओं के प्रति प्रतिबद्ध करती हैं, और वैकल्पिक ज्यामितियाँ गणितीय सत्य की प्रकृति के बारे में क्या उजागर करती हैं। इसके अलावा Elements के सांस्कृतिक इतिहास पर एक बढ़ता हुआ साहित्य भी है — इसे विभिन्न कालों और स्थानों में कैसे पढ़ा गया, इसका विभिन्न पाठकों के लिए क्या अर्थ था, और ढाई सहस्राब्दियों में अनुवाद, मुद्रण और अध्यापन के ज़रिये इसके स्वरूप और सामग्री में कैसे परिवर्तन आए।
व्यापक सांस्कृतिक अर्थ में, Euclid की विरासत उस विचार की विरासत है कि ज्ञान को प्रमाण की एक पारदर्शी संरचना के रूप में संगठित किया जा सकता है, कि दावों को अटकलों से अलग किया जा सकता है, कि जो सिद्ध हो चुका है उसे निश्चितता के साथ जाना जा सकता है, और कि जो मान लिया गया है उसकी जाँच करके ज्ञान की सीमाओं को ठीक-ठीक निर्धारित किया जा सकता है। यह विचार — जिसे Euclid ने अपने से पहले किसी भी व्यक्ति से अधिक पूर्णता के साथ मूर्त रूप दिया, और जो तब से गणित का प्रेरक आदर्श रहा है — सभ्यता के बौद्धिक जीवन में किसी एकल विचारक द्वारा किए गए सबसे महत्त्वपूर्ण योगदानों में से एक है।

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