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लियोनार्दो दा विंची: एक संपूर्ण जीवनी

लियोनार्दो दा विंची: एक संपूर्ण जीवनी

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परिचय

Leonardo da Vinci उन सबसे असाधारण मनुष्यों में से एक हैं जो इस धरती पर कभी जीए हैं। उन्हें केवल एक चित्रकार कहना उनकी अविश्वसनीय रूप से विस्तृत प्रतिभा के साथ घोर अन्याय होगा। उन्हें केवल एक वैज्ञानिक कहना उनकी कला की अनुपम सुंदरता को नकारना होगा। उन्हें एक आविष्कारक के रूप में परिभाषित करना उनकी दार्शनिक सोच की गहराई को अनदेखा करना होगा। वे एक साथ यह सब कुछ थे, और यही सब एक साथ होने के कारण वे किसी एक श्रेणी की सीमाओं से परे एक अलग ही व्यक्तित्व बन गए। उनका नाम प्रतिभा, जिज्ञासा और ज्ञान की उस बेचैन और अतृप्त भूख का पर्याय बन गया है जो महानतम मानव मस्तिष्कों की पहचान है।

पंद्रहवीं शताब्दी के मध्य में टस्कनी के एक छोटे से पहाड़ी क़स्बे Vinci में जन्मे Leonardo एक ऐसी दुनिया में पले-बढ़े जो गहरे बदलाव की दहलीज़ पर खड़ी थी। इतालवी पुनर्जागरण यूरोपीय संस्कृति को जड़ से नए सिरे से गढ़ रहा था — प्राचीन ग्रीस और रोम की बुद्धिमत्ता को पुनः खोजते हुए, साथ ही उससे आगे बढ़कर कला, दर्शन और प्राकृतिक अन्वेषण के नए क्षितिजों की ओर क़दम बढ़ा रहा था। Leonardo ने इस पुनर्जागरण में केवल भागीदारी नहीं की; बल्कि कई मायनों में वे स्वयं इसके प्रतीक बन गए और अपनी बौद्धिक शक्ति तथा कल्पना के बल पर अन्वेषण के पूरे-पूरे क्षेत्रों को आगे धकेलते हुए इसे और तेज़ कर दिया।

जो बात Leonardo को सदियों बाद भी इतना आकर्षक बनाती है, वह केवल यह नहीं है कि वे बहुत सारी अलग-अलग चीज़ों में असाधारण रूप से निपुण थे — हालाँकि जो भी उन्होंने आज़माया उसमें वे वाकई अभूतपूर्व थे। जो चीज़ उन्हें अन्य बहुमुखी प्रतिभाओं और अन्य महान मस्तिष्कों से अलग करती है, वह वह विशेष तरीका है जिससे उन्होंने अपनी विभिन्न रुचियों को एक ही एकीकृत समझ के प्रकल्प में पिरोया। उन्होंने चित्रकारी को एक अलग काम की तरह नहीं किया, शरीर-रचना के अध्ययन को दूसरा, मशीनों के डिज़ाइन को तीसरा और भूविज्ञान की जाँच को चौथा। Leonardo के लिए ये सभी गतिविधियाँ उसी गहरी इच्छा की अभिव्यक्ति थीं — यह समझने की कि दुनिया कैसे काम करती है, वक्र सतहों पर प्रकाश कैसे पड़ता है, मांसपेशियाँ हड्डियों को कैसे हिलाती हैं, पानी बाधाओं के आसपास कैसे बहता है, पक्षी हवा की अदृश्य धाराओं में कैसे उड़ते हैं। उनके लिए कला और विज्ञान दो अलग प्रयास नहीं थे, बल्कि वास्तविकता की प्रकृति की एक ही व्यापक जाँच के दो अलग-अलग पहलू थे।

उनकी चित्रकारियाँ दुनिया में सबसे अधिक प्रशंसित कृतियों में से हैं। Mona Lisa और The Last Supper ने सांस्कृतिक चेतना में इस कदर जगह बना ली है कि उन्हें ताज़ी नज़रों से देखना, उस आमूल मौलिकता के झटके को महसूस करना जो पहली बार देखने वालों को लगा होगा, अब वाकई मुश्किल हो गया है। फिर भी उनकी प्रसिद्धि के संचित बोझ तले, सदियों के पुनरुत्पादन, पैरोडी और टीका-टिप्पणी के बावजूद, ये कृतियाँ एक ऐसी शक्ति को बनाए हुए हैं जो बारीकी से ध्यान देने पर और भी उजागर होती है। ये प्रकाश और छाया पर महारत, मनोवैज्ञानिक चित्रण की सूक्ष्मता, और रचना तथा चित्रात्मक स्थान पर ऐसी पकड़ का प्रदर्शन करती हैं जो Leonardo की मृत्यु के बाद पीढ़ियों तक बेमिसाल रही और जो तब से अब तक बनाई गई हर चीज़ के सामने आज भी अपना दर्जा बनाए हुए है।

उनकी नोटबुकें भी उतनी ही असाधारण हैं, और कुछ मायनों में तो उनसे भी बढ़कर — क्योंकि जब तक उन्होंने उन्हें अपनी विशिष्ट दर्पण-लिपि से भरा और रेखाचित्रों, आरेखों, गणनाओं और टिप्पणियों से पाटा, तब से सदियों बाद तक दुनिया को उनके बारे में पता ही नहीं था। हज़ारों पन्ने आज भी मौजूद हैं, और उनमें आधुनिक विज्ञान और इंजीनियरिंग की कई केंद्रीय खोजों की पूर्व-झलकियाँ मिलती हैं। उन्होंने उड़ने वाली मशीनों, बख़्तरबंद वाहनों, सौर संकेंद्रकों, हाइड्रोलिक मशीनरी और मानव शरीर के शारीरिक रूप से सटीक चित्रणों की परिकल्पना ऐसे समय में की थी जब उनके समकालीनों के लिए ये विचार लगभग अकल्पनीय थे। उन्होंने पानी की गति का अध्ययन उसी तीव्रता से किया जिससे वे मानवीय अभिव्यक्ति का अध्ययन करते थे। उन्होंने मानव शवों का विच्छेदन इसलिए किया ताकि समझ सकें कि शरीर वास्तव में कैसे काम करता है — न कि केवल इसलिए कि सदियों पहले प्राचीन विद्वानों ने इसके बारे में क्या लिखा था, उसे स्वीकार कर लें।

उनका जीवन असाधारण बौद्धिक और कलात्मक उत्पादकता के छह से अधिक दशकों तक फैला रहा, हालाँकि यह निराशाओं, कुंठाओं और शानदार तरीके से अधूरे छोड़े गए कार्यों से भी अछूता नहीं था। उन्होंने बहुत सारे कामों को पूरा होने से पहले ही छोड़ दिया — या तो इसलिए कि उनका बेचैन मन हर वक्त किसी नए सवाल की तरफ दौड़ता रहता था, चाहे पुराना सवाल हल हुआ हो या नहीं, या फिर इसलिए कि वे परियोजनाएँ अपने समय की सामग्री और संसाधनों की सीमाओं के चलते तकनीकी या व्यावहारिक रूप से असंभव साबित हो जाती थीं। हर किसी की नज़र में वे एक आकर्षक और करिश्माई शख्सियत थे — जवानी में लंबे कद के, जीवन भर सुंदर, बातचीत में माहिर, संगीत में दक्ष, और ऐसे व्यक्तिगत चुम्बकत्व से भरे हुए कि उनके लंबे करियर के दौरान संरक्षक, शिष्य, प्रतिद्वंद्वी और प्रशंसक सभी उनकी ओर खिंचे चले आते थे।

Leonardo को पूरी तरह समझने के लिए उस दुनिया को समझना ज़रूरी है जिसमें वे रहते थे। उनकी जवानी का Florence एक ऐसा शहर था जो एक सांस्कृतिक क्रांति से गुज़र रहा था — एक ऐसी क्रांति जिसे संपन्न व्यापारी परिवारों, और सबसे बढ़कर Medici परिवार ने संरक्षण दिया था। वे जानते थे कि कला और ज्ञान का संरक्षण करना खुद में शक्ति की अभिव्यक्ति और सभ्यतागत प्रतिष्ठा का दावा है। उनके壮年 के वर्षों वाला Milan, Sforza वंश के अधीन था — महत्वाकांक्षी शासक जिन्हें अपने दरबार को सुसज्जित करने के लिए कलाकारों की और अपनी सैन्य स्थिति मज़बूत करने तथा अपने क्षेत्र का प्रबंधन करने के लिए इंजीनियरों की ज़रूरत थी। उनके बाद के वर्षों का Rome और France, इतालवी युद्धों की उथल-पुथल में उलझे हुए थे — ऐसे महान संघर्ष जिन्होंने यूरोप का राजनीतिक नक्शा ही बदल दिया और Leonardo को ऐसे शक्तिशाली संरक्षकों की परस्पर विरोधी माँगों और तेज़ी से बदलती किस्मत के बीच राह निकालने पर मजबूर कर दिया, जिनकी खुद की सुरक्षा कभी सुनिश्चित नहीं थी।

यह जीवनी Leonardo के जीवन और कार्य के समस्त आयामों के साथ न्याय करने का प्रयास है। यह Tuscany की ग्रामीण भूमि में उनके शुरुआती वर्षों से लेकर विभिन्न इतालवी और अंततः फ्रांसीसी संरक्षकों की सेवा में उनके लंबे करियर तक के उनके विकास को रेखांकित करती है, उनकी कलात्मक उपलब्धियों और वैज्ञानिक अन्वेषणों को बारीकी से उकेरती है, और चित्रकला, विज्ञान, इंजीनियरिंग तथा आधुनिक दुनिया की व्यापक संस्कृति में उनकी स्थायी विरासत का मूल्यांकन करती है। यह उस सबसे असाधारण मस्तिष्कों में से एक की कहानी है जो मानव जाति ने कभी पैदा किया हो — एक ऐसा मस्तिष्क जो कई मायनों में उस पंद्रहवीं और सोलहवीं सदी का नहीं था जिसमें वह जीया, बल्कि एक ऐसे भविष्य का था जो अभी सदियों दूर था और जिसे हम खुद भी अभी तक पूरी तरह नहीं पा सके हैं।

Vinci में प्रारंभिक जीवन

Vinci शहर Monte Albano की दक्षिणी ढलानों पर बसा है — Tuscany की पहाड़ी भूमि में, Florence शहर और Ligurian Sea के बीच। यह एक साधारण-सा स्थान है, जो जैतून के बागों और अंगूर के खेतों से घिरा हुआ है जो Renaissance काल में Tuscan जीवन की कृषि रीढ़ थे। यह भूमि मध्य Italy के अधिकांश हिस्सों की तरह सौम्य सुंदरता से भरी है — लहराती पहाड़ियाँ जिन पर गहरे रंग के सरू के पेड़ जगह-जगह खड़े हैं, छोटी-छोटी नदियों द्वारा तराशी गई उथली घाटियाँ, और जंगली जड़ी-बूटियों और मिट्टी की वह हर-मौसम महकती सुगंध जो Tuscan देहात की पहचान है। यहीं, पंद्रहवीं सदी के मध्य में, Leonardo का जन्म हुआ — Ser Piero da Vinci नाम के एक Florentine नोटरी और Caterina नाम की एक साधारण परिवार की युवती के यहाँ।

उनके जन्म की परिस्थितियाँ अनियमित ज़रूर थीं, लेकिन उस युग के लिए कोई असाधारण बात नहीं थी। Ser Piero एक समृद्ध और महत्वाकांक्षी व्यक्ति थे, जो नोटरी के एक ऐसे परिवार से आते थे जो कई पीढ़ियों से Vinci और उसके आसपास के क्षेत्र की सेवा करता आया था। नोटरी के पेशे ने da Vinci परिवार को टस्कन समाज के सम्मानित मध्यम वर्ग में एक सुरक्षित स्थान दिलाया था — न तो वे कुलीन थे, न ही साधारण, बल्कि उस कानूनी और प्रशासनिक ढाँचे से जुड़े थे जो समाज को एकसूत्र में बाँधे रखता था। जब Leonardo का जन्म हुआ, तब Ser Piero का विवाह नहीं हुआ था, और Caterina एक साधारण घराने की महिला थीं — संभवतः किसी स्थानीय किसान की बेटी या शायद किसी स्थानीय जागीर पर काम करने वाली बंधुआ मज़दूर। उनके बीच का संबंध एक बच्चे को तो जन्म दे गया, लेकिन विवाह में नहीं बदला। Ser Piero ने जल्द ही अपनी सामाजिक हैसियत के अनुरूप किसी परिवार की लड़की से शादी का इंतज़ाम कर लिया, जबकि Caterina ने अंततः एक स्थानीय व्यक्ति से विवाह किया और एक अलग घर बसाया, जहाँ उन्होंने अन्य बच्चों की परवरिश की।

युवा Leonardo को अपनी माँ के पास रखने की बजाय उनके पिता के घर में ले जाया गया, और उनका पालन-पोषण da Vinci परिवार के घर में उनके दादा-दादी Antonio और Lucia की देखरेख में हुआ — और खासतौर पर उनके चाचा Francesco की छत्रछाया में, जो उनके शुरुआती विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले थे। यह व्यवस्था बालक के लिए भावनात्मक रूप से कुछ जटिलताएँ ज़रूर लाई होगी, लेकिन इसने उन्हें एक स्थिर और भौतिक रूप से सुखी बचपन दिया — एक समृद्ध ग्रामीण परिवार में, जिसके क्षेत्र के पेशेवर और नागरिक जीवन से अच्छे संबंध थे। Ser Piero ने अपने नाजायज़ बेटे को स्वीकार किया और उनकी परवरिश की, हालाँकि अवैध संतान होने का दाग Leonardo के जीवनभर कुछ व्यावहारिक और कानूनी रूपों में उनके साथ बना रहा — सबसे बड़ी बाधा यह थी कि वे अपने पिता का पेशा विरासत में नहीं ले सकते थे, क्योंकि फ्लोरेंस की नोटरी गिल्ड में सदस्यता के लिए वैध जन्म अनिवार्य था।

Vinci क्षेत्र के परिदृश्य ने Leonardo की कल्पना, उनकी सौंदर्य-बोध की संवेदनशीलता और अंततः उनकी वैज्ञानिक सोच पर एक गहरी और स्थायी छाप छोड़ी। टस्कनी की पहाड़ियाँ और नदियाँ, जैतून के पत्तों से छनकर आती सुबह की रोशनी, चिकने पत्थरों पर बहती धाराओं की लहरें, अंगूर के बागों के ऊपर बाज़ों की उड़ान, शाम को घाटियों में उमड़ता कोहरा और सुबह की धूप में उसका बिखर जाना — ये सभी संवेदनात्मक अनुभव उस असाधारण दृश्य-स्मृति और तीव्र अवधारणात्मक संवेदनशीलता को सींचते रहे, जो उनके सारे जीवन में उनके कलात्मक और वैज्ञानिक कार्यों की नींव बनी। उनके चित्रों और रेखाचित्रों का गहन अध्ययन करने वाले अनेक विद्वानों ने उनकी कृतियों की पृष्ठभूमि में दिखने वाले विशिष्ट परिदृश्यों पर ध्यान दिलाया है और यह सुझाव दिया है कि ये धुंधले, पथरीले, जल-तराशे दृश्य उस टस्कन ग्रामीण इलाके की रूपांतरित यादें हैं, जिसे उन्होंने बचपन में इतनी तीव्रता और आनंद के साथ खोजा था।

उनके चाचा Francesco Leonardo के शुरुआती विकास में विशेष रूप से महत्वपूर्ण भूमिका में रहे। Ser Piero के विपरीत, जो फ्लोरेंस में एक सक्रिय कानूनी कामकाज के साथ व्यस्त पेशेवर व्यक्ति थे, Francesco मूलतः एक ज़मींदार किसान थे जो अपने दिन पारिवारिक संपत्ति पर बिताते थे, और लगता है कि उन्होंने अपने छोटे भतीजे को आसपास के देहात में घूमने, प्राकृतिक घटनाओं को देखने और प्रकृति के प्रति उस जिज्ञासा को पोसने की पर्याप्त आज़ादी दी, जो आगे चलकर Leonardo के बौद्धिक जीवन की पहचान बनने वाली थी। जीवन के बाद के वर्षों में Leonardo ने बड़े जोश के साथ लिखा कि प्रकृति को समझने के लिए प्रत्यक्ष अवलोकन कितना ज़रूरी है — उनका आग्रह था कि जो लोग केवल दूसरों की लिखी बातें पढ़ते हैं, वे हमेशा उनसे कम जानेंगे जो सचमुच दुनिया को अपनी आँखों से देखते हैं। टस्कनी की पहाड़ियों में बचपन की वे भटकनें — कीड़ों और पक्षियों के व्यवहार को देखना, चट्टानों की संरचना और पौधों की वृद्धि के तरीकों को परखना, इस बात का अध्ययन करना कि छोटी-छोटी धाराएँ किस तरह नरम मिट्टी में रास्ता बनाती हैं और चौड़े तालाबों में तलछट जमा करती हैं — यही उस जीवनपर्यंत असाधारण सावधानी से देखने की आदत की वास्तविक शुरुआत थी।

उनकी औपचारिक शिक्षा उस दौर के फ्लोरेंटाइन मानवतावादी अभिजात वर्ग के मानदंडों के हिसाब से सीमित थी, हालाँकि उस ग्रामीण समुदाय के मानदंडों के अनुसार यह शायद पर्याप्त थी जिसमें वे पले-बढ़े थे। उन्होंने इतालवी में पढ़ना-लिखना सीखा और रोज़मर्रा की व्यावहारिक गणनाओं के लिए ज़रूरी बुनियादी अंकगणित का कामचलाऊ ज्ञान हासिल किया। जो उन्हें नहीं मिला — और जो उनके वयस्क जीवन भर एक वास्तविक बौद्धिक कुंठा का स्रोत बना रहा — वह था लैटिन और यूनानी भाषाओं में गहन शास्त्रीय शिक्षा, जो पुनर्जागरण काल में गंभीर विद्वतापूर्ण विमर्श की आधारभूत भाषाएँ थीं। उनकी औपचारिक तैयारी में यह कमी उन्हें कुछ संदर्भों में पिछड़ा साबित करती थी, क्योंकि प्राचीनता और मध्यकालीन विद्वान परंपरा का संचित ज्ञान मुख्यतः लैटिन ग्रंथों में समाया हुआ था, जिन तक उनकी पहुँच बेहद सीमित थी। उन्होंने वयस्क होने पर लैटिन कुछ हद तक सीखकर और ऐसे लोगों को खोजकर इसकी भरपाई की जो उनके लिए प्रासंगिक अंशों का अनुवाद कर सकें, लेकिन उन्होंने कभी भी शास्त्रीय भाषाओं में वह दक्षता हासिल नहीं की जो उस युग के सच्चे विद्वान पुरुष की पहचान थी।

फिर भी यही सीमा कई मायनों में एक मुक्ति भी थी। चूँकि Leonardo किसी लैटिन ग्रंथ को खोलकर किसी प्राचीन विद्वान ने शरीर-रचना, प्रकाशिकी या जल-विज्ञान के बारे में जो लिखा है उस पर निर्भर नहीं हो सकते थे, इसलिए वे स्वयं संसार की ओर मुड़ने पर विवश हुए — प्रत्यक्ष अवलोकन और व्यावहारिक प्रयोग को अपनी जाँच-पड़ताल का प्राथमिक माध्यम बनाते हुए। जब उनके समकालीन प्राचीन ग्रंथों की बारीकियों पर बहस कर रहे थे, तब Leonardo पत्थरों के इर्द-गिर्द बहते पानी को देख रहे थे, जानवरों की आंतरिक संरचना समझने के लिए उनका विच्छेदन कर रहे थे, और कैलिपर से मानव शरीर के अनुपात नाप रहे थे। यह मूलतः अनुभवजन्य दृष्टिकोण — जो आंशिक रूप से उनकी अधूरी शिक्षा की संयोगवश उपज था — उनके बौद्धिक व्यक्तित्व की सबसे विशिष्ट और फलदायी विशेषताओं में से एक बन गया।

उनकी कलात्मक प्रतिभा बचपन से ही स्पष्ट थी। उनमें वह तीव्र दृश्य-संवेदनशीलता और असाधारण हस्त-कौशल था जो अंततः उन्हें कला के इतिहास के सर्वश्रेष्ठ चित्रकारों में से एक बनाने वाला था। यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि ठीक कब या किस विशेष घटना के ज़रिये उनकी असाधारण प्रतिभा उनके परिवार की नज़र में आई, लेकिन किसी समय उनके आसपास के लोगों को यह स्पष्ट हो गया कि इस लड़के में असामान्य गुण हैं जिन्हें पोषण और उचित अभिव्यक्ति की ज़रूरत है। एक ऐसे प्रतिभाशाली युवक के लिए जिसके पास असाधारण दृश्य-क्षमता तो थी लेकिन विद्वत व्यवसायों के लिए आवश्यक सामाजिक प्रतिष्ठा या वैध जन्म नहीं था, खुला रास्ता था किसी स्थापित कुशल कारीगर की कार्यशाला में शिक्षु बनना। और Ser Piero, जिनके पूरे फ्लोरेंटाइन जगत में व्यावसायिक संपर्क थे, ने अपने बेटे के लिए शहर की सबसे उत्कृष्ट कार्यशालाओं में से एक में जगह दिलाने का प्रबंध किया।

जिस फ्लोरेंस में Leonardo किशोरावस्था में दाखिल हुए, वह यूरोप के सबसे उल्लेखनीय शहरों में से एक था — एक व्यावसायिक और वित्तीय महानगर जो उस असाधारण सांस्कृतिक परिवर्तन का केंद्र भी बन चुका था जिसे हम आज पुनर्जागरण कहते हैं। Medici परिवार, जिसकी संपदा की नींव अंतर्राष्ट्रीय बैंकिंग और व्यापार पर टिकी थी, ने कला और ज्ञान के संवर्धन को राजनीतिक प्रतिष्ठा का एक सुविचारित और अत्यंत परिष्कृत साधन बना दिया था। Cosimo de Medici, उनके पुत्र Piero, और सबसे बढ़कर उनके पौत्र Lorenzo — जिन्हें इतिहास Lorenzo the Magnificent के नाम से जानता है — के क्रमिक संरक्षण में फ्लोरेंस कलात्मक उत्पादन, दार्शनिक विमर्श, साहित्यिक उपलब्धि और स्थापत्य नवाचार का ऐसा केंद्र बन गया जिसकी बराबरी यूरोपीय जगत में कहीं नहीं थी। चित्रकार, मूर्तिकार, वास्तुकार, दार्शनिक, शास्त्रीय विद्वान और संगीतकार इतालवी प्रायद्वीप और उससे परे के दूर-दूर के क्षेत्रों से इस शहर की ओर खिंचे चले आते थे, और शहर के अग्रणी कलाकारों की कार्यशालाएँ चर्च, संपन्न व्यापारी परिवारों और स्वयं Medici की ओर से मिलने वाले कमीशन से सदा व्यस्त रहती थीं।

यही वह असाधारण रूप से प्रेरणादायक वातावरण था जिसमें युवा Leonardo अपने छोटे से पहाड़ी कस्बे से आया था, और इस शहर ने उसे गहराई से और स्थायी रूप से गढ़ा। पंद्रहवीं सदी के उत्तरार्ध का Florence महज एक ऐसी जगह नहीं थी जहाँ सुंदर चीज़ें बनाई जाती थीं; यह वह जगह थी जहाँ कला और सौंदर्य तथा कलात्मक अभ्यास और प्रकृति की खोज के बीच के संबंध पर सक्रिय रूप से बहस होती थी और उन्हें लगातार नए सिरे से परिभाषित किया जाता था। कलाकार महज कारीगर नहीं थे जो स्थापित परंपराओं के अनुसार तय कार्यक्रमों को अंजाम देते हों; वे विचारक थे जो दृश्य जगत और उसके साथ मानवता के संबंध की नई समझ विकसित करने में जुटे थे। Leonardo ठीक उसी सही क्षण पर पहुँचा जब वह इन विचारों की उथल-पुथल को उनके सबसे उर्वर दौर में आत्मसात कर सके और उन्हें उस सीमा से कहीं आगे ले जा सके जिसकी उसके किसी भी समकालीन ने कल्पना तक नहीं की थी।

Verrocchio के साथ शिक्षुता

जब Ser Piero da Vinci ने अपने प्रतिभाशाली बेटे को प्रशिक्षण देने के लिए एक उस्ताद की तलाश की, तो उनकी या तो अच्छी समझ थी या फिर सौभाग्यशाली जान-पहचान, कि उन्होंने पूरे Florence के बेहतरीन कला-प्रतिष्ठानों में से एक, Andrea del Verrocchio की कार्यशाला में जगह दिलाई। Verrocchio एक असाधारण रूप से बहुमुखी और तकनीकी रूप से निपुण कलाकार थे जो चित्रकारी, मूर्तिकला, सुनारी और अन्य शिल्पों में समान दक्षता से काम करते थे, और जिनकी कार्यशाला शहर के सबसे प्रभावशाली और विवेकशील संरक्षकों से लगभग हर तरह के काम के आदेश लेती थी। उनका Medici दरबार से गहरा जुड़ाव था और Florence की कुछ सबसे महत्त्वपूर्ण एवं सार्वजनिक कला-परियोजनाओं के लिए उन पर भरोसा किया जाता था। असाधारण प्रतिभा और महत्त्वाकांक्षा वाले किसी युवा कलाकार के लिए व्यावसायिक विकास हेतु इससे अधिक प्रेरणादायक या बेहतर संपर्कों वाला वातावरण शायद ही मिल सकता था।

Renaissance-कालीन Florence की कार्यशाला प्रणाली वह प्राथमिक संस्था थी जिसके माध्यम से कलात्मक प्रशिक्षण और पेशेवर पहचान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती थी। एक युवा शिक्षार्थी आमतौर पर अपनी शुरुआती किशोरावस्था में किसी स्थापित उस्ताद के स्टूडियो में प्रवेश करता था और कई वर्षों तक पूरी तरह व्यावहारिक एवं क्रमबद्ध तरीके से शिल्प को बिल्कुल बुनियाद से सीखता था। वह सबसे साधारण और विनम्र कार्यों से शुरुआत करता — रंगद्रव्य पीसना, लकड़ी के पैनल और कैनवास की सतहें तैयार करना, औज़ार साफ करना, उस्ताद और उनके ग्राहकों के लिए काम-काज करना — और जैसे-जैसे उसका कौशल विकसित होता और उस्ताद का उस पर भरोसा बढ़ता, उसे धीरे-धीरे अधिक माँग वाले और तकनीकी रूप से जटिल कार्य सौंपे जाते। वह उस्ताद द्वारा पहले से बनाई गई कृतियों का अध्ययन और नकल करने में लंबे घंटे बिताता, अनुकरण के ज़रिए उस कार्यशाला परंपरा की विशेष दृश्य आदतों और तकनीकी प्राथमिकताओं को सीखता जिसमें वह प्रवेश कर रहा था। वह नए आदेशों को पूरा करने में सहायता करता — वस्त्रों, पृष्ठभूमि के दृश्यों या स्थापत्य तत्त्वों को रंगता — जबकि उस्ताद सबसे कठिन और प्रतिष्ठित हिस्से अपने लिए सुरक्षित रखते। अंततः, यदि वह प्रतिभाशाली और परिश्रमी होता, तो वह इतनी उत्कृष्ट गुणवत्ता का काम करने लगता कि कार्यशाला के नाम से ग्राहकों को भेजी गई तैयार कृतियों में उसका और उस्ताद का काम अलग से पहचाना न जा सके।

Leonardo किशोरावस्था में Verrocchio की कार्यशाला में दाखिल हुए और वहाँ लगभग छह साल तक रहे। धीरे-धीरे उन्होंने स्वतंत्र उस्ताद का दर्जा हासिल किया और फ्लोरेंटाइन चित्रकारों की गिल्ड में पंजीकरण कराया, जिसने उन्हें अपने नाम से काम स्वीकार करने का कानूनी अधिकार दिया। इन निर्णायक वर्षों में उन्होंने सर्वोच्च स्तर का तकनीकी प्रशिक्षण आत्मसात किया। Verrocchio सतहों की बनावट को उकेरने में, जटिल वस्त्रों को संभालने में, कठिन और चुनौतीपूर्ण मुद्राओं में मानव आकृतियों को दर्शाने में, और आकृतियों को वास्तुकला तथा परिदृश्य की पृष्ठभूमि में इस तरह समाहित करने में विशेष रूप से कुशल थे कि स्थानिक संगति और दृश्य सामंजस्य बना रहे। वे एक विचारशील और सैद्धांतिक दृष्टि रखने वाले कलाकार भी थे, जिनकी रुचि चित्रकारी के विज्ञान में, रंजकों और ग्लेज़ के प्रकाशीय गुणों में, परिप्रेक्ष्य के गणित में, तथा अपनी मूर्तियों और चित्रों में आकृतियों की शारीरिक सटीकता में थी।

Leonardo ने इस समस्त व्यवस्थित तकनीकी ज्ञान को आत्मसात किया और फिर उससे कहीं आगे, पूरी तरह अपनी दिशाओं में निकल गए। उनकी सहज अवलोकन-शक्ति और Verrocchio की कार्यशाला में मिले कठोर प्रशिक्षण ने मिलकर एक ऐसे रेखाचित्रकार और चित्रकार को जन्म दिया, जिसकी योग्यता का उस युग में कोई उदाहरण नहीं था। इस काल के उनके जो रेखाचित्र आज भी मौजूद हैं, वे पहले से ही एक ऐसा आत्मविश्वास, एक दृढ़ता और अवलोकन की सूक्ष्मता प्रकट करते हैं जो उनकी युवावस्था को झुठलाती है। वे किसी विशेष चेहरे की सटीक संरचना या वस्त्र की किसी सिलवट पर पड़ती रोशनी के अनुभव को रेखाओं की निश्चितता और साधनों की मितव्ययिता के साथ इस तरह पकड़ लेते थे कि उनका काम कार्यशाला या शहर में उनके किसी भी समकालीन से तुरंत अलग पहचाना जा सकता था।

Leonardo के शुरुआती विकास के बारे में सबसे प्रकाशमान और अक्सर उद्धृत की जाने वाली कहानियों में से एक, Verrocchio की कार्यशाला को दी गई एक बड़ी पेंटिंग से जुड़ी है जिसमें मसीह के बपतिस्मा को दर्शाया गया है। कलाकार और जीवनीकार Giorgio Vasari ने अपने प्रसिद्ध कलाकारों की जीवनियों के संग्रह में पहली बार प्रकाशित एक विवरण के अनुसार, Verrocchio ने अपने युवा शिष्य से रचना के बाईं ओर अग्रभूमि में एक स्वर्गदूत चित्रित करने को कहा। जब Verrocchio ने देखा कि Leonardo ने क्या बनाया है, तो वे उसकी गुणवत्ता और उसमें झलकती प्रतिभा के प्रमाण से इतने अभिभूत हो गए कि उन्होंने फिर कभी चित्र न बनाने का संकल्प ले लिया — यह मानते हुए कि शिष्य ने गुरु की बराबरी ही नहीं की, बल्कि उसे पार कर लिया है। यद्यपि इस कहानी के विशिष्ट विवरण बार-बार कहे जाने में निस्संदेह बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए हैं, फिर भी उस पेंटिंग की ध्यानपूर्वक जाँच से काम का एक ऐसा अंश सामने आता है जो आसपास के क्षेत्रों की तुलना में स्पष्ट रूप से अधिक सूक्ष्म, अधिक बारीक और तकनीकी दृष्टि से अधिक निपुण है। स्वर्गदूत का प्रकाशमान, कोमलता से गढ़ा हुआ चेहरा, रचना के बाएँ किनारे के पीछे दिखते परिदृश्य की नाजुक वायुमंडलीय गुणवत्ता, कठोर रेखाओं का परिवेशीय छाया में धीरे-धीरे विलीन होना — इन सबको विद्वान आम तौर पर Verrocchio के बजाय Leonardo का काम मानते हैं, और ये चित्र में बाकी किसी भी चीज़ से गुणात्मक रूप से भिन्न हैं।

चाहे Verrocchio ने अपने शिष्य का योगदान देखकर सचमुच चित्रकारी छोड़ने की कसम खाई हो या नहीं, यह कहानी Leonardo की प्रतिभा की प्रकृति और उसके प्रशिक्षण से उसके संबंध के बारे में कुछ सच्चाई ज़रूर बयान करती है। वे महज एक परिश्रमी और सक्षम विद्यार्थी नहीं थे जिन्होंने सिखाई गई तकनीकें सीख ली हों और अब उन्हें पेशेवर दक्षता से अंजाम दे रहे हों। वे एक क्रांतिकारी प्रतिभा थे जो चित्रकारी में, प्रकाश और वातावरण तथा मनोवैज्ञानिक चरित्र के चित्रण में, ऐसे दृष्टिकोण विकसित कर रहे थे जो उनके गुरु या गुरु के विशिष्ट समकालीनों की उपलब्धियों से परे थे। जो विशेष तकनीक वे पहले से ही विकसित करने लगे थे — जिसमें रेखाओं को जानबूझकर नरम किया जाता है और तीखे किनारों को धीरे-धीरे स्वर-क्रम में विलीन किया जाता है — वह उस चीज़ की पूर्वाभास देती है जिसे बाद में sfumato कहा गया, और यह इस बात का एक मूलभूत पुनर्विन्यास है कि चित्रकारी दृश्य अनुभव की वास्तविकता से किस तरह संबंध स्थापित कर सकती है।

Verrocchio के स्टूडियो के कार्यशाला वातावरण ने Leonardo को बौद्धिक और कलात्मक संपर्कों तथा विचारों की एक असाधारण रूप से विस्तृत श्रृंखला से परिचित कराया। Verrocchio की दुकान फ्लोरेंस के कुछ सबसे महत्वपूर्ण मस्तिष्कों के लिए एक मिलन-स्थल थी, और शहर स्वयं दार्शनिकों, गणितज्ञों, वास्तुकारों, प्राकृतिक दार्शनिकों और शास्त्रीय विद्वानों का घर था, जिनके विचार संरक्षण, मित्रता और बौद्धिक आदान-प्रदान के अनौपचारिक किंतु अत्यंत उत्पादक नेटवर्कों में स्वतंत्र रूप से प्रवाहित होते थे, जो शहर के सांस्कृतिक जीवन को आपस में जोड़ते थे। Leonardo ने इस वातावरण में परिप्रेक्ष्य के उन गणितीय सिद्धांतों से साक्षात्कार किया जो एक साथ अभ्यासरत कलाकारों और सैद्धांतिक गणितज्ञों दोनों द्वारा विकसित किए जा रहे थे। उन्हें उन शारीरिक अन्वेषणों से भी अवगत होने का अवसर मिला जो कुछ प्रगतिशील कलाकार और चिकित्सक करने लगे थे — वे वास्तविक मानव शरीरों की जाँच इसलिए करते थे ताकि उन संरचनाओं को समझ सकें जिन्हें वे सटीकता के साथ चित्रित करने का प्रयास कर रहे थे। वे उस व्यापक मानवतावादी चिंतन की धारा में पूरी तरह डूबे हुए थे जो प्राकृतिक जगत के अध्ययन और प्राचीन ज्ञान की पुनर्प्राप्ति को शिक्षित बौद्धिक जीवन के केंद्र में रखती थी।

इन फ्लोरेंसवासी वर्षों के दौरान उन्होंने दृश्य-सावधानी और व्यवस्थित अभिलेख-संधारण की वे आदतें विकसित कीं जो अंततः उनकी असाधारण नोटबुक्स के रूप में सामने आईं। वे जहाँ भी जाते — यहाँ तक कि शहर की गलियों में टहलते समय भी — अपनी एक छोटी-सी ड्रॉइंग बुक साथ रखते थे, और उसका उपयोग वे लगातार उन चीज़ों के रेखाचित्र बनाने के लिए करते थे जो उनका ध्यान खींचती थीं या उनकी जिज्ञासा जगाती थीं: भीड़ में मिले किसी चेहरे की विशिष्ट अभिव्यक्ति, सुबह के समय पत्तियों के बीच से प्रकाश पड़ने का खास अंदाज़, भारी बोझ उठाए किसी आदमी का आसन, गर्मियों की दोपहर में बादलों की बनावट, आकाश की पृष्ठभूमि में किसी पेड़ की शाखाओं का स्वरूप। ये त्वरित अध्ययन केवल किसी विशेष चित्र या कार्यशाला परियोजना की तैयारी नहीं थे; ये उनकी उस मूलभूत और बाध्यकारी प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति थे जो दृश्य जगत को उसकी सबसे सघन और निरंतर पर्यवेक्षण के अधीन करके समझना चाहती थी।

Verrocchio की कार्यशाला में उनका कार्यकाल तब समाप्त हुआ जब उन्होंने स्वतंत्र कमीशन तलाशने के लिए आवश्यक प्रतिष्ठा और आत्मविश्वास प्राप्त कर लिया था, और मिलान में प्रतीक्षारत अवसरों के लिए फ्लोरेंस पूरी तरह छोड़ने से पहले ही, वे पहले से ही पर्याप्त महत्व और महत्वाकांक्षा की कई स्वतंत्र कृतियाँ बना चुके थे। इस काल में चित्रित एक Annunciation उनकी प्रकाश के चित्रण में पहले से परिपक्व महारत, वनस्पति-विवरण की प्रस्तुति, विश्वसनीय परिप्रेक्ष्य-स्थान के निर्माण, तथा सूक्ष्म रूप से देखे गए हाव-भाव और अभिव्यक्ति के माध्यम से व्यक्तित्वों के चरित्र-चित्रण की क्षमता को प्रदर्शित करती है। Adoration of the Magi के नाम से ज्ञात एक अधूरी वेदी-कृति — जो San Donato a Scopeto के मठ के लिए कमीशन की गई थी किंतु कभी पूरी नहीं हुई — उनकी कलात्मक सोच की असाधारण महत्वाकांक्षा और उन नवाचारों को और भी नाटकीय रूप से उजागर करती है जो वे रचना में, भीड़ और मनोवैज्ञानिक अंतःक्रिया के चित्रण में, तथा धार्मिक कल्पना की भक्तिपरक विषय-वस्तु और मानव व्यवहार के यथार्थवादी अवलोकन के बीच के संबंध के प्रति अपने दृष्टिकोण में पहले से ही विकसित कर रहे थे। विशेष रूप से Adoration एक ऐसे मन को दर्शाती है जो परंपरागत समाधानों को स्वीकार करने से पूरी तरह इनकार करता था — एक ऐसा मन जो उन स्थापित सीमाओं को चुनौती दे रहा था जो यह तय करती थीं कि एक धार्मिक चित्र क्या कर सकता है और क्या अर्थ रख सकता है।

Verrocchio के साथ बिताए गए वे वर्ष हर मायने में उस नींव के समान थे, जिस पर Leonardo के पूरे बाद के करियर की इमारत खड़ी हुई। उन्होंने उसे सर्वोच्च स्तर की तकनीकी महारत दी, यूरोप के सबसे महत्वपूर्ण कलात्मक शहर में पेशेवर संपर्क और प्रतिष्ठा दी, बौद्धिक प्रेरणा और अपने युग की सबसे अग्रणी सोच से परिचय कराया, और सबसे बढ़कर वह आत्मविश्वास दिया जिससे वह उस तरह के महत्वाकांक्षी और उदार संरक्षण की तलाश कर सके जो उसे उन अनगिनत जाँच-पड़तालों और परियोजनाओं को आगे बढ़ाने का अवसर देता, जिनकी कल्पना उसका असाधारण मन पहले से ही कर रहा था। जब वह Florence से Milan के लिए रवाना हुआ, तो वह अपने साथ न केवल एक कुशल चित्रकार का हुनर लेकर गया, बल्कि प्राकृतिक जगत की व्यापक जाँच के एक सुविचारित कार्यक्रम की शुरुआत भी लेकर गया, जो उसके जीवन के शेष दशकों तक उसे व्यस्त रखने वाला था।

Milan और Sforza दरबार

Florence छोड़कर Milan के दरबार में जगह तलाशने का फैसला Leonardo के पूरे करियर के सबसे निर्णायक फैसलों में से एक था, और इसने उसके जीवन और कार्य की दिशा को उन तरीकों से आकार दिया, जिनकी भविष्यवाणी करना फैसला लेते समय शायद मुश्किल होता। Florence निस्संदेह इटली की सांस्कृतिक राजधानी था और कई मायनों में पूरे यूरोपीय जगत की भी, लेकिन यह एक ऐसा शहर भी था जहाँ Leonardo अब तक उस स्तर की निरंतर पहचान और स्थिर, उदार संरक्षण हासिल नहीं कर पाया था, जिसकी उसकी महत्वाकांक्षाओं को जरूरत थी। Medici परिवार, प्रतिभाशाली कलाकारों की सराहना करने और बौद्धिक तथा कलात्मक उपलब्धि के लिए अनुकूल दरबारी माहौल बनाए रखने के बावजूद, Leonardo पर विशेष रूप से और टिकाऊ तरीके से ध्यान केंद्रित नहीं कर पाए थे जो उसे वह सुरक्षा और संसाधन दे सके जिनकी उसे अपनी सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए जरूरत थी। उसके पास अधूरे काम थे, अधूरे वादे थे, और यह बढ़ती हुई भावना थी कि Florentine परिवेश, अपनी असाधारण समृद्धि और प्रेरणा के बावजूद, उसकी कलात्मक, वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग रुचियों के उस विशेष और असामान्य संयोजन के लिए आदर्श संदर्भ नहीं था।

Milan ने कुछ बुनियादी रूप से अलग पेशकश की। Ludovico Sforza, जो अपने साँवले रंग और अपने व्यक्तिगत प्रतीक-चिह्न के कारण पूरे इटली में il Moro के नाम से जाने जाते थे, Milan की डचीके वास्तविक शासक थे — जो इतालवी राज्यों में सबसे शक्तिशाली और समृद्ध में से एक था — और वे ठीक उसी तरह के महत्वाकांक्षी, सैन्यवादी, और छवि-सजग संरक्षक थे जिन्हें Leonardo की पेशकश की जरूरत थी और जो उसका उचित पुरस्कार दे सकते थे। Ludovico चाहते थे कि महान कलाकार उनके दरबार को सुंदर बनाएँ और उनकी भव्यता का गुणगान करें, इंजीनियर उनके किलेबंदी को मजबूत करें और हथियार डिजाइन करें और उनके क्षेत्रों का प्रबंधन करें, संगीतकार और कवि उनके दरबार का मनोरंजन करें और उनके सम्मान में रचना करें, और ऐसे सामान्य बौद्धिक दिग्गज जिनकी प्रतिभा उनके शासन पर अनुकूल प्रकाश डाले और उनके दरबार को प्राचीनकाल के महानतम दरबारों के समकक्ष सभ्यता के केंद्र के रूप में स्थापित करे। Leonardo यह सब कुछ था और उससे भी बढ़कर, और उसमें यह समझने की बुद्धि और सामाजिक कुशाग्रता थी कि इस तरह के संभावित संरक्षक के सामने खुद को सबसे प्रभावी ढंग से कैसे प्रस्तुत किया जाए।

वह पत्र जो Leonardo ने कथित तौर पर Ludovico को अपना परिचय देने और नौकरी के लिए अपनी दावेदारी पेश करने हेतु भेजा था, कलाकारों और उनके संरक्षकों के बीच संबंधों के पूरे इतिहास में सबसे रोचक दस्तावेज़ों में से एक है। एक चित्रकार के रूप में अपनी प्रतिष्ठा और उपलब्धियों से शुरुआत करने के बजाय — जो कि निस्संदेह उनकी सबसे प्रतिष्ठित और व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त उपलब्धि थी — Leonardo ने एक सैन्य और नागरिक इंजीनियर के रूप में अपनी क्षमताओं का विस्तारपूर्वक और क्रमबद्ध तरीके से वर्णन करते हुए पत्र की शुरुआत की। उन्होंने बड़ी व्यवस्थित सटीकता के साथ बताया कि वे आक्रमण झेलने में सक्षम चल पुल बना सकते हैं, घेराबंदी अभियानों के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए जल-निकासी नाले और सुरंगें बना सकते हैं, दुश्मन की सेना के बीच से आगे बढ़ने में सक्षम बख्तरबंद वाहन तैयार कर सकते हैं, तोपें और मोर्टार तथा विनाश के अन्य हथियार बना सकते हैं, नौसैनिक युद्ध के उपयुक्त जहाज़ बना सकते हैं, घिरे हुए शहरों के जल-स्रोतों से नदियों का रुख मोड़ सकते हैं, और हर प्रकार के नागरिक इंजीनियरिंग कार्यों को डिज़ाइन करके कार्यान्वित कर सकते हैं। उन्होंने एक मूर्तिकार के रूप में अपनी प्रतिभा का भी उल्लेख किया, और कहा कि वे उस भव्य अश्वारोही स्मारक को बना सकते हैं जिसे Ludovico अपने पिता — वंश के संस्थापक — की स्मृति में बनाने पर लंबे समय से विचार कर रहे थे। और पत्र के एकदम अंत में, लगभग एक संक्षिप्त परंतु बाद में सूझी बात की तरह, उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि दरबार को रुचि हो, तो वे किसी भी कुशल चित्रकार की तरह चित्रकारी भी कर सकते हैं।

इस पत्र में जो रणनीतिक बुद्धिमत्ता झलकती है, वह अत्यंत उल्लेखनीय है। Leonardo ठीक-ठीक समझते थे कि Ludovico जैसा शासक किस चीज़ को सबसे अधिक महत्त्व देता है और क्या चीज़ उन्हें दरबारी संरक्षण के लिए होड़ कर रहे अनेक अन्य कलाकारों और शिल्पकारों से अलग और उपयोगी बनाएगी। उन्होंने सौंदर्य से नहीं बल्कि शक्ति से, कला से नहीं बल्कि इंजीनियरिंग से शुरुआत की — क्योंकि वे समझते थे कि इतालवी राज्यों के निरंतर राजनीतिक और सैन्य तनावों के परिप्रेक्ष्य में, किसी शासक के लिए शहरों की किलेबंदी करने और हथियार बनाने की क्षमता, सुंदर वेदी-चित्र बनाने की क्षमता से अनंतगुना अधिक मूल्यवान थी। यह पत्र कारगर रहा, और Leonardo ने Sforza दरबार में एक पद सुनिश्चित कर लिया, जो उनके पूरे जीवन का सबसे लंबा और कई मायनों में सबसे फलदायी कार्यकाल साबित हुआ।

वे लगभग सत्रह वर्षों तक Milan में रहे — किसी भी एक शहर में बिताए गए उनके किसी भी अन्य कार्यकाल से कहीं अधिक — और इस असाधारण रूप से उत्पादक समय में उन्होंने अपनी कुछ सबसे महत्त्वपूर्ण कलाकृतियाँ रचीं, अपनी अनेक दूरगामी वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग जाँच-पड़तालें विकसित कीं, उस प्रकार का निरंतर संरक्षण और सापेक्षिक आर्थिक स्थिरता का अनुभव किया जो उनके जीवन में अन्यथा दुर्लभ रही, और स्वयं को निर्विवाद रूप से अपने समय के सबसे महान जीवित कलाकार और यूरोप के सबसे विलक्षण बुद्धिजीवियों में से एक के रूप में स्थापित किया।

उनके मिलान काल की सबसे भव्य और महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक थी — Francesco Sforza की एक विशाल अश्वारोही प्रतिमा बनाने का कमीशन। Francesco Sforza, Ludovico के पिता और वह सैन्य प्रतिभाशाली व्यक्ति थे जिन्होंने मिलान पर Sforza वंश का राज स्थापित किया था। यह स्मारक कांसे में ढाला जाना था और शुरू से ही इसे प्राचीन रोम के समय के बाद बनी सबसे बड़ी अश्वारोही प्रतिमा के रूप में डिज़ाइन किया गया था — एक ऐसी कृति जो मिलान की सांस्कृतिक महत्वाकांक्षा और Sforza परिवार के इतिहास के महान राजवंशों की पंक्ति में स्थान पाने के दावे को सिद्ध करती। Leonardo ने इस परियोजना में अपनी खास संपूर्णता और व्यवस्थित कठोरता के साथ खुद को झोंक दिया। उन्होंने एक लंबे अरसे तक घोड़ों का जुनूनी अध्ययन किया और हर कल्पनीय मुद्रा व कोण से घोड़ों के दर्जनों-दर्जनों रेखाचित्र बनाए। उन्होंने घोड़ों की शारीरिक संरचना का उसी गहरी तन्मयता से अध्ययन किया जो वे उस समय मानव शरीर-रचना पर लगाने लगे थे — उनकी मांसपेशियों और हड्डियों की बनावट, शरीर के विशिष्ट अनुपात, और उनके चलने, खड़े होने व वज़न संभालने के विशेष तरीकों को समझा। उन्होंने अपनी कल्पना के पैमाने पर कांसे की ढलाई की तकनीकी समस्याओं की पड़ताल की और काम के अभूतपूर्व आकार को संभालने के लिए नवीन ढलाई प्रक्रियाएँ विकसित कीं। अंततः उन्होंने घोड़े का एक पूर्ण आकार का मिट्टी का मॉडल तैयार किया — सवार के बिना लगभग आठ मीटर ऊँचा — जिसे सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया गया और उसे देखने वाले समकालीन लोगों ने उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की।

हालाँकि, अंत में Sforza Horse कभी कांसे में नहीं ढला, और वह भव्य मिट्टी का मॉडल अंततः नष्ट हो गया। फ्रांसीसी राजा Charles VIII द्वारा उत्तरी इटली पर आक्रमण ने इस परियोजना को बाधित कर दिया और ढलाई के लिए जमा किए गए बड़े परिमाण में कांसे को सैन्य खतरे से निपटने के लिए तोपें बनाने के अधिक तात्कालिक काम में लगा दिया गया। मिट्टी का मॉडल कुछ वर्षों तक बचा रहा, लेकिन अंततः फ्रांसीसी सैनिकों ने मिलान पर कब्ज़ा करने और Ludovico Sforza को निष्कासित करने के बाद उसे निशाना अभ्यास के लिए इस्तेमाल कर लिया। यह एक हृदयविदारक क्षति थी, और इसने उस पीड़ादायक क्रम की नींव रख दी — सावधानीपूर्वक तैयारी, फिर अधूरा या नष्ट हो गया परिणाम — जो Leonardo के पूरे जीवन में दुखद नियमितता के साथ दोहराता रहा।

मिलान के Santa Maria delle Grazie कॉन्वेंट की भोजनशाला की दीवार पर बनाई गई भव्य भित्तिचित्र कृति The Last Supper कहीं अधिक सफल उपलब्धि रही, और इसने संपूर्ण कला इतिहास की सबसे प्रसिद्ध और प्रभावशाली चित्रकारियों में से एक को जन्म दिया। यह कमीशन स्वयं Ludovico Sforza से मिला था, और Leonardo ने इस पर लगभग तीन वर्षों तक काम किया — रंग भरना शुरू करने से पहले बड़ी सावधानी के साथ रचना को विकसित करते रहे। विषय वह क्षण है जिसका वर्णन John के सुसमाचार में है, जब Christ अपने शिष्यों के साथ भोज पर बैठे हुए यह घोषणा करते हैं कि उनमें से जो मेज़ पर उपस्थित हैं, उनमें से एक उनके साथ विश्वासघात करेगा। इस विषय की नाटकीय संभावनाएँ स्पष्ट थीं, लेकिन इससे पहले किसी भी चित्रकार ने उस मनोवैज्ञानिक तीव्रता और रचनात्मक परिष्कार के आसपास भी नहीं पहुँचा था जो Leonardo ने इस कृति में उतारा।

उनकी रचना में Christ की आकृति को बिल्कुल केंद्र में बैठे हुए दर्शाया गया है, जो अपने पीछे खुली खिड़की से अलग और रेखांकित होती है, और एक स्थिर व शांत त्रिकोणीय आकार बनाती है — जिसके विपरीत आसपास के प्रेरितों की उथल-पुथल पूरी तीव्रता से उभरती है। बारह प्रेरितों को Christ के दोनों ओर तीन-तीन की चार टोलियों में व्यवस्थित किया गया है, और हर टोली में प्रत्येक आकृति Christ की घोषणा पर अपने अलग और स्पष्ट रूप से विभिन्न तरीके से प्रतिक्रिया देती है — कोई तत्काल बातचीत में एक-दूसरे के करीब आ रहा है, कोई सदमे में पीछे हट रहा है, कोई दृढ़ इनकार में आगे बढ़ रहा है, और कोई हैरानी भरे सवाल लेकर अपने पड़ोसी की तरफ मुड़ रहा है। Leonardo ने हर प्रेरित को केवल उसके शारीरिक स्वरूप और रंग-रूप से ही नहीं, बल्कि एक विशेष मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया से भी अलग किया — जो परंपरा के अनुसार उसके चरित्र और Christ के साथ उसके संबंध के बिल्कुल अनुरूप थी। Judas की आकृति को, जिसे परंपरानुसार मेज के नजदीकी तरफ अकेला दिखाया जाता था, यहाँ दूसरे प्रेरितों के बीच दूर की तरफ रखा गया है — वह मुख्यतः अपनी दोषी सिकुड़न की मुद्रा और चेहरे पर पड़ी छाया से पहचाना जाता है।

The Last Supper में Leonardo ने जो तकनीकी चुनौतियाँ खुद के लिए खड़ी कीं, वे उनके अपने जीवनकाल में ही स्पष्ट हो गई थीं और तब से इस कृति को परेशान करती आई हैं। पारंपरिक फ्रेस्को तकनीक में रंग को ताज़े गीले प्लास्टर पर तेज़ी से लगाया जाता है और सूखने पर वह दीवार की सतह के साथ स्थायी रूप से मिल जाता है — लेकिन इसके बजाय Leonardo ने एक सूखी दीवार पर काम करना चुना, जिसे पिच, जेसो और मैस्टिक के एक विशेष आधार से तैयार किया गया था। इस आधार पर उन्होंने इस तरह से रंग लगाया जिससे उन्हें काम करने का ज़्यादा समय मिले और वे बार-बार सुधार व सूक्ष्म बदलाव कर सकें — जैसा कि उनकी कार्यशैली की माँग थी। फ्रेस्को के लिए तेज़ और निर्णायक कार्यान्वयन ज़रूरी होता था, और जो गुण Leonardo को एक महान चित्रकार बनाते थे — बार-बार संशोधन करने, पुनर्विचार करने, और धीरे-धीरे कई परतों में सूक्ष्म समायोजन के ज़रिए प्रभाव गढ़ने की उनकी प्रवृत्ति — वे फ्रेस्को तकनीक की आवश्यकताओं से मूलतः असंगत थे। लेकिन उनके चुने हुए मिश्रित माध्यम ने भी गहरी अस्थिरता दिखाई, और काम पूरा होने के एक पीढ़ी के भीतर ही रंग उखड़ने और बिगड़ने लगा। आज जो पेंटिंग हम देखते हैं, सदियों में काफी बार जीर्णोद्धार और आंशिक रूप से दोबारा रंगी गई, वह Leonardo की मूल कृति का एक काफी क्षीण रूप है — फिर भी इसकी शक्ति और इसका क्रांतिकारी स्वरूप किसी भी ध्यानपूर्वक देखने वाले को स्पष्ट रूप से महसूस होता है।

महान कलात्मक कमीशनों से परे, मिलान के वर्ष Leonardo की वैज्ञानिक और तकनीकी जाँच-पड़ताल के लिए असाधारण रूप से उत्पादक रहे — और यह अनेक विविध क्षेत्रों में फैली थी। उन्होंने लोम्बार्ड मैदान की विस्तृत नहर प्रणाली को नियंत्रित करने के लिए हाइड्रॉलिक मशीनें डिज़ाइन कीं, जो यूरोप की सबसे परिष्कृत हाइड्रॉलिक अवसंरचना प्रणालियों में से एक थी। उन्होंने व्यवस्थित शारीरिक-रचना संबंधी जाँच शुरू की जो अंततः उनकी अतुलनीय शारीरिक-रचना के रेखाचित्रों की श्रृंखला को जन्म देगी। उन्होंने दरबारी मनोरंजन के लिए नाट्य मंचन यंत्र और विस्तृत उत्सव-प्रदर्शन डिज़ाइन किए, जिनके शानदार यांत्रिक प्रभावों ने कथित रूप से Ludovico के दरबारियों को चकित और प्रसन्न किया। उन्होंने अपनी नोटबुक पर बढ़ती व्यवस्थित महत्त्वाकांक्षा के साथ काम किया और अपनी टिप्पणियों को उन व्यापक ग्रंथों में संगठित किया जो वे चित्रकला, शारीरिक-रचना, हाइड्रॉलिक्स, यांत्रिकी और अन्य विषयों पर लिखना चाहते थे। उन्होंने सैन्य किलेबंदी, नहरें और शहरी नियोजन की योजनाएँ भी डिज़ाइन कीं। इसके अलावा वे दरबार के एक सार्वभौमिक बौद्धिक आभूषण के रूप में भी काम करते थे — दार्शनिक चर्चाओं में भाग लेते, वैज्ञानिक प्रयोग प्रदर्शित करते और उस सार्वभौमिक प्रतिभा की भूमिका निभाते जिसकी एक महत्त्वाकांक्षी पुनर्जागरण दरबार को दरकार होती थी।

नोटबुक और वैज्ञानिक अन्वेषण

Leonardo da Vinci की नोटबुक्स किसी एक मानव मस्तिष्क की कार्यप्रणाली के सबसे असाधारण साक्ष्यों में से एक हैं, जो आज तक अस्तित्व में आई हैं। इनमें हज़ारों पृष्ठ हैं, जो संरक्षण और व्यवस्था की विभिन्न अवस्थाओं में हैं और उनकी विशिष्ट दाएँ से बाएँ की दर्पण-लिपि से भरे पड़े हैं — साथ ही चित्र, आरेख, संख्यात्मक गणनाएँ, सैद्धांतिक विचार, अवलोकन के अभिलेख, यांत्रिक डिज़ाइन, और कभी-कभी व्यक्तिगत टिप्पणियाँ भी हैं, जो पाठक को उस मस्तिष्क की एक अंतरंग और अक्सर चौंका देने वाली झलक देती हैं जिसने उन्हें रचा था। Leonardo दाएँ से बाएँ, दर्पण-लिपि में लिखते थे — इस आदत को कई तरह से समझाया गया है: बाएँ हाथ से लिखने का स्वाभाविक परिणाम जिससे लिखते वक्त गीली स्याही न फैले; सरसरी नज़र से अपने विचारों को निजी रखने की चाहत; या फिर महज़ एक अनोखी आदत जो उन्होंने शुरुआत में ही अपना ली और जीवनभर बनाए रखी। इसकी उत्पत्ति चाहे जो भी रही हो, दर्पण-लिपि नोटबुक्स को एक अंतरंग निजता का भाव देती है — जैसे पाठक को किसी मस्तिष्क को सोचते हुए देखने की अनुमति दी जा रही हो, न कि किसी श्रोता के रूप में संबोधित किया जा रहा हो।

नोटबुक्स में विषयों की जो व्यापकता और विविधता है, वह सच में चकित कर देने वाली है — यह उनके एक कलाकार या इंजीनियर के रूप में पेशेवर काम की ज़रूरतों से कहीं आगे तक जाती है। पृष्ठों के एक सामान्य क्रम में कोई कंधे के जोड़ का एक विस्तृत शारीरिक अध्ययन पा सकता है जिसमें हर मांसपेशी और कण्डरा को ध्यान से अंकित किया गया हो, फिर खिड़की से देखे गए एक दिलचस्प बादल के त्वरित रेखाचित्र, फिर संगीत अंतरालों के बीच गणितीय संबंधों पर टिप्पणियाँ, फिर एक नए तरह के यांत्रिक करघे का डिज़ाइन, फिर स्मृति की प्रकृति पर एक विचार, और फिर कम-ज़्यादा सफलता के साथ किया गया कोई ज्यामितीय प्रमाण। नोटबुक्स में दिखने वाला겉겉 अव्यवस्था का भाव और विषयों का लगातार बदलना बौद्धिक अनिश्चितता की निशानी नहीं है; यह बल्कि एक ऐसे मस्तिष्क का अभिलेख है जो इतना निरंतर सक्रिय और इतना अदम्य जिज्ञासु था कि वह किसी एक विषय तक अधिक देर तक खुद को सीमित नहीं रख सकता था — दूसरे विषयों से जुड़ाव दिखते ही वह उनका पीछा करने लगता था, चाहे वे कहीं भी ले जाएँ।

पानी की प्रकृति और व्यवहार पर उनकी जाँच-पड़ताल उनके सभी वैज्ञानिक अन्वेषणों में सबसे दीर्घकालिक, सबसे व्यवस्थित, और संभवतः सबसे गहन थी। वे अपने पूरे जीवन में बार-बार पानी के विषय पर लौटते रहे, और नोटबुक्स में सैकड़ों-सैकड़ों पृष्ठ जल-गतिकी की घटनाओं के अध्ययन को समर्पित हैं। उन्होंने बहते पानी को एक ऐसी तीव्रता से देखा जो जुनून की हद तक पहुँचती थी — लंबे समय तक यह निरीक्षण करते हुए कि नदी-नाले कैसे बहते हैं, पानी विभिन्न प्रकार की बाधाओं से टकराकर कैसा व्यवहार करता है, और वह विशिष्ट भँवर-सर्पिल और जलावर्त कैसे बनाता है जो उन्हें सौंदर्यात्मक और वैज्ञानिक — दोनों दृष्टियों से मोहित करते थे। उन्होंने पानी की सतह पर लहरों, बूँदों के बनने, किनारों से गिरते पानी के व्यवहार, विभिन्न प्रकार की मिट्टी में पानी के रिसाव, और बहते पानी के पत्थरीले व मिट्टी के मार्गों पर दीर्घकालिक प्रभावों का अध्ययन किया। उन्होंने जल-गतिकी के व्यवहार से जुड़ी विशिष्ट परिकल्पनाओं को परखने के लिए नियंत्रित प्रयोग तैयार किए और तरल गतिकी का एक व्यापक विज्ञान विकसित किया — उस औपचारिक गणितीय विवेचन से कई शताब्दियाँ पहले, जो बाद के वैज्ञानिकों ने इस विषय पर विकसित किया।

भूविज्ञान के क्षेत्र में उनकी खोजें कई मायनों में मानव ज्ञान में उनका सबसे क्रांतिकारी दार्शनिक योगदान थीं। आल्प्स की तलहटी की परतदार चट्टानों और इटली के अन्य स्थानों का बारीकी से अवलोकन करके, और यह सोचकर कि ये परतें कैसे बनी होंगी, वे पृथ्वी के इतिहास के बारे में ऐसे निष्कर्षों पर पहुँचे जो उस युग की प्रचलित मान्यताओं से बहुत आगे थे। उन्होंने देखा कि समुद्री जीवाश्म — मोलस्क के खोल और समुद्री जीवों की हड्डियाँ — किसी भी समुद्र से बहुत दूर, ऊँचे पहाड़ों की चट्टानों में धँसी हुई पाई जाती हैं, और उन्होंने प्राकृतिक दार्शनिकों द्वारा इस घटना के लिए दिए गए सभी पारंपरिक स्पष्टीकरणों को नकार दिया। उन्होंने इस विचार को खारिज किया कि ये प्रकृति की महज संयोगी रचनाएँ हैं — ऐसे पत्थर जो जैविक रूपों जैसे दिखते हैं लेकिन जिनकी कोई वास्तविक जैविक उत्पत्ति नहीं है। उन्होंने इस सुझाव को भी अस्वीकार किया कि ये नूह की बाढ़ द्वारा जमा किए गए थे, क्योंकि सीमित अवधि की कोई भी बाढ़ उन अनेक अलग-अलग जीवाश्म-युक्त परतों का निर्माण नहीं कर सकती जो उन्होंने वास्तविक चट्टानी संरचनाओं में देखी थीं। इसके बजाय वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि ये पहाड़ कभी समुद्र के नीचे थे, कि जिन जीवों के अवशेष वे देख रहे थे वे एक समुद्री वातावरण में जीए और मरे थे, और कि समुद्र तल का पहाड़ में रूपांतरण धीमी भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं का परिणाम था जो उस समय से कहीं अधिक लंबे कालखंड में घटित हुई जितना धर्मग्रंथों में सृष्टि के विवरण से संकेत मिलता है। अपने युग के बौद्धिक माहौल में यह कोई सुरक्षित या सहज निष्कर्ष नहीं था, और Leonardo ऐसे विचारों को कितनी स्पष्टता से व्यक्त करें, इस बारे में सतर्क रहते थे — लेकिन अपनी निजी डायरियों में उन्होंने इन्हें उल्लेखनीय स्पष्टता और आत्मविश्वास के साथ लिखा।

उनकी प्रकाशिकी संबंधी खोजें चित्रकारी की किसी भी व्यावहारिक आवश्यकता से कहीं आगे तक जाती थीं। वे समझते थे कि आँख एक लेंस प्रणाली है और यह बाहरी वस्तुओं से प्रकाश ग्रहण करके काम करती है, न कि उन वस्तुओं की ओर किरणें उत्सर्जित करके — जो उस समय भी प्राकृतिक दार्शनिकों के बीच वास्तविक बहस का विषय था, क्योंकि कुछ लोग दृष्टि की प्राचीन उत्सर्जन सिद्धांतों को अभी भी गंभीरता से लेते थे। उन्होंने लेंस और दर्पणों के गुणों का सावधानीपूर्वक अध्ययन किया, वक्र सतहों पर प्रकाश के व्यवहार की जाँच की, और अपवर्तन तथा परावर्तन के बारे में अपने निष्कर्षों को परखने के लिए नियंत्रित प्रयोग तैयार किए। उन्होंने सहज रूप से समझ लिया कि अपवर्तन — यानी जब प्रकाश किरणें एक पारदर्शी माध्यम से दूसरे में जाती हैं तो मुड़ जाती हैं — पानी या काँच के माध्यम से देखी गई वस्तुओं के आभासी विस्थापन के लिए जिम्मेदार है, और उन्होंने इस घटना को नियंत्रित करने वाले लगभग सटीक ज्यामितीय संबंधों को भी समझा। उन्होंने बड़ी सूक्ष्मता से छायाओं के बनने का अध्ययन किया — पूर्ण छाया के क्षेत्र और आंशिक छाया के घेरे यानी उपच्छाया के बीच अंतर किया, और प्रकाश स्रोत के आकार तथा छायाग्रस्त सतह की दूरी के संदर्भ में उनके आकार और रूप को नियंत्रित करने वाले ज्यामितीय नियम निकाले।

उनकी यांत्रिक जाँच-पड़ताल एक वास्तविक रूप से व्यवस्थित मशीन-विज्ञान पर आधारित थी — यानी सभी यांत्रिक उपकरणों के व्यवहार को नियंत्रित करने वाले सिद्धांतों का एक समग्र विश्लेषण। वे समझते थे कि सभी जटिल मशीनें मुट्ठी भर साधारण मशीनों के संयोजन से बनती हैं — लीवर, पहिया और धुरी, घिरनी, आनत तल, कील और पेंच — और उन्होंने इनमें से प्रत्येक का बारी-बारी से अध्ययन किया, बल, दूरी और कार्य के बीच के उन गणितीय संबंधों को समझा जो इनके व्यवहार को निर्धारित करते हैं। वे यांत्रिक लाभ की अवधारणा से भली-भाँति परिचित थे — यह विचार कि साधारण मशीनें किस तरह अधिक दूरी पर लगाए गए कम बल को कम दूरी पर अधिक बल में बदल देती हैं — और उन्होंने इस समझ को अपने यांत्रिक डिज़ाइनों में निरंतर और सर्जनात्मक ढंग से उपयोग में लाया। उन्होंने घर्षण की समस्या का भी असाधारण सावधानी से अध्ययन किया। उन्होंने इसे सभी यांत्रिक तंत्रों में ऊर्जा-हानि का प्रमुख कारण माना और व्यवस्थित रूप से यह देखा कि घर्षण की मात्रा किन बातों पर निर्भर करती है — सतहों की सामग्री, उन पर पड़ने वाला भार और आपेक्षिक गति की रफ़्तार। घर्षण के बारे में उनके निष्कर्ष उन औपचारिक नियमों की अग्रिम झलक थे जो बाद के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने विकसित किए।

नोटबुक पर किया गया उनका काम एक दीर्घकालिक महत्वाकांक्षा से प्रेरित था — अपने संचित अवलोकनों और अंतर्दृष्टियों को व्यापक प्रकाशित ग्रंथों की एक श्रृंखला में रूपांतरित करना, जो प्राकृतिक ज्ञान का एक व्यवस्थित विश्वकोश बनाते। उन्होंने अपने पूरे जीवनकाल में चित्रकला, शरीर-रचना, यांत्रिकी, जल-विज्ञान, पक्षियों की उड़ान, भूविज्ञान, प्रकाशिकी और अन्य विषयों पर ग्रंथ लिखने की दिशा में काम किया। किंतु इनमें से कोई भी ग्रंथ उनकी संतुष्टि के अनुरूप कभी पूरा नहीं हो सका, और उनके जीवनकाल में इनमें से अधिकांश कभी प्रकाशित भी नहीं हुए। व्यवस्थित प्रकाशन का वह महत्वाकांक्षी कार्यक्रम जो उनके ज्ञान को उनके समकालीनों और उत्तराधिकारियों तक पहुँचा सकता था, सदा के लिए अधूरा रह गया — उसी बेचैन, निरंतर आगे बढ़ती जिज्ञासा का शिकार, जिसने उनकी खोजों को इतना असाधारण बनाया था। वे हमेशा कुछ नया खोज लेते थे जिसे काम में शामिल करना ज़रूरी लगता था, हमेशा अपनी समझ को इस तरह संशोधित और विस्तारित करते रहते थे कि उसे समेटने का काम हमेशा अधूरा और समयपूर्व जान पड़ता था।

चित्रकला और कलात्मक महारचनाएँ

एक चित्रकार के रूप में Leonardo की ख्याति अपेक्षाकृत कम बची हुई कृतियों पर टिकी है, क्योंकि वे अपनी कार्यशैली में विख्यात रूप से धीमे और सुविचारित थे और उन्होंने कई कमीशन या तो अधूरे छोड़ दिए या आंशिक रूप से ही पूरे किए। लेकिन जो चित्र उन्होंने पूर्ण किए, वे पश्चिमी कला के इतिहास की सबसे महान उपलब्धियों में से हैं, और यूरोपीय चित्रकला के परवर्ती विकास पर उनका प्रभाव गहरा, व्यापक और स्थायी रहा है — इतना कि कला-इतिहासकार आज भी उसे खँगालते रहते हैं।

चित्रकला के प्रति उनका दृष्टिकोण इस मूलभूत दार्शनिक विश्वास पर आधारित था कि सच्ची चित्रकला के लिए प्रकृति का और उसके स्वरूपों को संचालित करने वाले सिद्धांतों का यथासंभव समग्र ज्ञान अनिवार्य है। जो चित्रकार शरीर-रचना नहीं समझता, वह मानव-आकृति को सटीकता से चित्रित नहीं कर सकता। जो प्रकाशिकी नहीं जानता, वह प्रकाश और छाया को विश्वसनीय ढंग से उकेर नहीं सकता। जो भूविज्ञान और वनस्पति-विज्ञान से अनजान है, वह विश्वसनीय परिदृश्य नहीं बना सकता। जो परिप्रेक्ष्य के विज्ञान से परिचित नहीं, वह ऐसा चित्र-स्थान नहीं रच सकता जो किसी सुज्ञ दर्शक की कसौटी पर खरा उतरे। Leonardo के लिए ये विश्वास महज़ सैद्धांतिक मान्यताएँ नहीं थीं; ये उनकी कार्य-पद्धति का व्यावहारिक आधार थे, और इन्हीं ने उन वैज्ञानिक अन्वेषणों को गति दी जो उनके वास्तविक चित्रकार्य के साथ-साथ उनके समय और ऊर्जा का बड़ा हिस्सा लेते रहे।

उन्होंने अपने पूरे करियर में जो तकनीक विकसित और परिष्कृत की, जिसे कला इतिहासकार sfumato कहते हैं, वह शायद चित्रकला की तकनीकी शब्दावली में उनका सबसे विशिष्ट और सबसे प्रभावशाली योगदान है। यह शब्द इतालवी भाषा के धुएं या धुंध के अर्थ से आया है, और यह चित्रकारी की उस विधि को बताता है जिसमें प्रकाश और छाया के क्षेत्रों के बीच के संक्रमण को स्पष्ट और तीखी रेखाओं से परिभाषित करने की बजाय धुंधला और घुला-मिला कर दिखाया जाता है। जहाँ उनके युग के और उनसे पहले के अधिकांश चित्रकार अपनी आकृतियों को आत्मविश्वास भरी रूपरेखाओं से परिभाषित करते थे जो उन्हें उनकी पृष्ठभूमि और एक-दूसरे से साफ़ तौर पर अलग करती थीं, वहीं Leonardo ने जानबूझकर इन सीमाओं को नरम किया और आकृतियों के किनारों को आसपास के वातावरण में इस तरह घुलने दिया जो देखने के वास्तविक अनुभव के कहीं ज़्यादा करीब था। उन्होंने अपनी प्रकाशीय जाँच-पड़ताल के ज़रिए यह समझ लिया था कि आँख वस्तुओं को उस तरह तीखे किनारों वाला नहीं देखती जैसा कि खींची गई रूपरेखाएँ सुझाती हैं; वस्तुओं के चारों ओर हवा होती है, और हवा में ऐसे प्रकाशीय गुण होते हैं जो किनारों की अनुभूति को, ख़ासकर दूरी पर, धुंधला और कोमल बना देते हैं। इस वास्तविक प्रकाशीय अनुभव को रंगों में उतारकर उन्होंने वायुमंडलीय यथार्थ और मनोवैज्ञानिक अस्पष्टता की एक ऐसी गुणवत्ता हासिल की जो चित्रकला में पूरी तरह नई थी।

The Virgin of the Rocks, जो कुछ अलग-अलग चरित्र और गुणवत्ता वाले दो संस्करणों में मौजूद है — एक अब पेरिस के Louvre में और एक लंदन की National Gallery में — उनकी परिपक्व चित्रकारी की सबसे पूर्णतः साकार उपलब्धियों में से एक है। इस रचना में कुँवारी मरियम, शिशु ईसा, शिशु John the Baptist और एक घुटने टेके हुए देवदूत को असाधारण विचित्रता और सौंदर्य के परिवेश में एक साथ लाया गया है — एक ऐसी गुफा जो गहरे, जल-तराशे पत्थर की है और जिसमें ऐसे छिद्र हैं जिनसे एक रहस्यमय, छनी हुई रोशनी में नहाए हुए दूर के परिदृश्य की झलक मिलती है। आकृतियों को एक त्रिकोणीय समूह में व्यवस्थित किया गया है जो उल्लेखनीय स्थिरता और औपचारिक सुंदरता हासिल करता है और साथ ही इशारों और नज़रों के ज़रिए भक्तिभाव और कथानक के जटिल संबंधों का जाल भी बुनता है। देवदूत का चेहरा, ख़ासकर Louvre वाले संस्करण में, उन सबसे अधिक मन को छू लेने वाली सुंदर चीज़ों में से एक है जो Leonardo ने कभी चित्रित की — उसकी कोमल दीप्तिमान आकृतियाँ गहरी छाया से इस तरह उभरती हैं जिनमें एक अलौकिक उपस्थिति का भाव है जिसे कोई भी शब्द पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकते।

Mona Lisa दुनिया की सबसे मशहूर पेंटिंग बन चुकी है, और इसकी शोहरत कुछ मायनों में इसे साफ़ नज़र से देखने में रुकावट बन गई है, क्योंकि यह दर्शक के अनुभव में इतनी पुरानी टिप्पणियों, नकलों और पैरोडी की परतों में इस कदर ढकी-छुपी पहुँचती है कि असली चित्रित कृति तक पहुँचना मुश्किल हो जाता है। फिर भी पेंटिंग को ताज़ी नज़र से देखने के प्रयास का फल मिलता है, क्योंकि यह जो हासिल करती है वह आज भी सच में चौंकाने वाला है। तीन-चौथाई मुद्रा में दिखाई गई यह महिला, जो एक ऐसे परिदृश्य के सामने बैठी है जो उसके दोनों ओर धुंधली दूरी में समाता चला जाता है, का भाव किसी एक निश्चित और परिभाषित भावनात्मक अवस्था में नहीं ठहरता। उसके होंठों और आँखों के कोनों को इतने सूक्ष्म और इतने सुविचारित sfumato के साथ चित्रित किया गया है कि भाव इस बात पर निर्भर करता है कि दर्शक की नज़र चेहरे पर किस तरह घूमती है — एक मुस्कान के आरंभ के संकेत और किसी और अधिक दूर तथा विचारमग्न भाव के संकेत के बीच बदलती रहती है। यह अस्पष्टता कोई तकनीकी दुर्घटना नहीं है और न ही समय के साथ पेंटिंग के खराब होने का नतीजा; यह एक जानबूझकर की गई और अत्यंत परिष्कृत कलात्मक रणनीति है — आंतरिक जीवन की गतिशीलता को चित्रित करने का एक तरीका जिसे Leonardo से पहले किसी भी चित्रकार ने आज़माने की कोशिश तक नहीं की थी।

आकृति के पीछे दिखने वाला परिदृश्य उतना ही अभिनव है और बारीकी से देखने पर उतना ही पुरस्कृत करने वाला है। बैठी हुई आकृति के दोनों ओर दिखने वाले परिदृश्य के दो हिस्से थोड़े अलग-अलग दृष्टिकोणों से चित्रित किए गए हैं — दाईं ओर का क्षितिज बाईं ओर के क्षितिज से कुछ ऊँचा प्रतीत होता है, जो एक सूक्ष्म स्थानिक असंगति है और देखते समय एक अस्पष्ट-सी बेचैनी का एहसास पैदा करती है। दूर के पहाड़, पानी और धुंध को असाधारण परिष्कार की वायुमंडलीय परिप्रेक्ष्य (atmospheric perspective) के साथ उकेरा गया है — दूर की आकृतियाँ धीरे-धीरे और अधिक नीली, धुंधली और अस्पष्ट होती जाती हैं, जिससे विशाल स्थानिक गहराई का एक विश्वसनीय आभास बनता है। यह परिदृश्य किसी वास्तविक स्थान का भौगोलिक रूप से पहचाने जाने योग्य दृश्य नहीं है, बल्कि एक निर्मित काल्पनिक संसार है जिसकी अपनी आंतरिक संगति और अपना एक विशिष्ट भावनात्मक वातावरण है।

एक छोटी सफेद नेवली थामे हुए युवा स्त्री का उनका चित्र, जिसे "Lady with an Ermine" के नाम से जाना जाता है और जिसे आमतौर पर Ludovico Sforza की प्रेमिका Cecilia Gallerani का चित्र माना जाता है, कला के इतिहास में सर्वाधिक मनोवैज्ञानिक गहराई वाले चित्रों में से एक है। इसमें बैठी आकृति को एक रुके हुए पल में दिखाया गया है — वह अपना सिर घुमा रही है और अपना ध्यान स्थानांतरित कर रही है, मानो चित्र के बाहर से आ रही किसी उत्तेजना पर प्रतिक्रिया दे रही हो। उसके भाव में सजगता और बुद्धिमत्ता की जो गुणवत्ता है, किसी विशिष्ट क्षण में किसी विशेष और क्षणिक मनःस्थिति में एक खास व्यक्तित्व को पकड़ने का जो अहसास है — वह इससे पहले के किसी भी चित्रकारी में हासिल नहीं किया गया था। उसकी गोद में बैठी नेवली, जो पुनर्जागरण (Renaissance) की प्रतीकात्मकता में पवित्रता और Ludovico के व्यक्तिगत प्रतीकों से जुड़ी मानी जाती है, इस रचना में एक सक्रिय उपस्थिति के रूप में भाग लेती है — वह अपना सिर उसी दिशा में घुमाती है जिसमें स्वयं आकृति ने घुमाया है, और इस तरह उसे और बल देती है, जिससे पारस्परिक ध्यान की एक गतिशीलता बनती है जो पूरी पेंटिंग की सतह को जीवंत कर देती है।

उनकी धार्मिक पेंटिंग्स में भी वही असाधारण मनोवैज्ञानिक चरित्र-चित्रण और तकनीकी परिष्कार के गुण दिखते हैं जो उनके चित्रों को विशिष्ट बनाते हैं। "Saint Anne with the Virgin and Child" में पवित्र परिवार की तीन पीढ़ियों को एक सघन त्रिभुजाकार समूह में सजाया गया है और पीछे शानदार आल्प्स जैसे पर्वतीय परिदृश्य को दर्शाया गया है। यह पेंटिंग बहु-आकृति रचनाओं के निर्माण में Leonardo की सर्वाधिक महत्वाकांक्षा को दर्शाती है, जिसमें हर तत्व मनोवैज्ञानिक जुड़ाव और औपचारिक सामंजस्य के सूत्रों द्वारा हर दूसरे तत्व से संबंधित है। अधूरी रह गई "Saint Jerome in the Wilderness" भी, हालाँकि कभी पूरी नहीं हुई, वृद्ध संत के शरीर के साहसिक और मूर्तिकलात्मक चित्रण और पथरीले परिदृश्य की वायुमंडलीय प्रस्तुति के ज़रिए Leonardo की कलात्मक कल्पना की असाधारण व्यापकता को उजागर करती है।

उनकी अंतिम महान पेंटिंग "Saint John the Baptist" कई मायनों में उनकी सबसे विचित्र और सबसे अधिक विचलित करने वाली कृति है। Baptist की आकृति को अकेले एक गहरे अंधेरे पृष्ठभूमि के सामने दिखाया गया है — बिना जंगल के सामान्य प्रतीकों के और बिना उनकी मसीह के अग्रदूत की भूमिका के किसी संकेत के। वे एक हाथ से ऊपर की ओर इशारा कर रहे हैं जबकि उनके चेहरे पर एक मुस्कान खेल रही है जो Mona Lisa जैसी ही रहस्यमयी गुणवत्ता लिए हुए है। अभेद्य अंधकार से उभरती प्रकाशमान आकृति का अत्यधिक विरोधाभास, अस्पष्ट भाव और किसी अदृश्य अनंत की ओर इशारे का संयोजन, एक रहस्यमय उपस्थिति का ऐसा प्रभाव उत्पन्न करता है जो सदियों से दर्शकों को मोहित करता रहा है और कभी-कभी उन्हें विचलित भी करता रहा है।

शरीर-रचना विज्ञान और मानव शरीर

मानव शरीर की संरचना और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर Leonardo की जो खोजें थीं, वे विज्ञान के समूचे इतिहास के सबसे असाधारण अध्यायों में से एक हैं, और चित्रकला के दायरे से बाहर उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण और सबसे पूर्णतः साकार बौद्धिक उपलब्धि शायद यही थी। शारीरिक रूप से कठिन और अक्सर सामाजिक दृष्टि से अनिश्चित परिस्थितियों में काम करते हुए उन्होंने मानव शवों की जाँच और विच्छेदन उस पैमाने पर किया जो अपने युग में किसी गैर-चिकित्सक के लिए अभूतपूर्व था। इस प्रक्रिया में उन्होंने शारीरिक रचना के जो चित्र बनाए, वे उनकी मृत्यु के एक शताब्दी से भी अधिक समय तक सटीकता, व्यापकता और स्पष्टता में बेजोड़ बने रहे, और आज भी वैज्ञानिक अन्वेषण तथा उच्चतम कलात्मक कौशल के एक साथ प्रतीक के रूप में विस्मय और प्रशंसा के पात्र हैं।

शारीरिक अध्ययन के प्रति उनकी शुरुआती प्रेरणा वही थी जो उनके युग के कई अन्य प्रगतिशील कलाकारों की थी: उनका मानना था कि जो चित्रकार मानव शरीर की आंतरिक संरचना को नहीं समझता, वह उसके बाहरी स्वरूप को पूरी सच्चाई के साथ चित्रित नहीं कर सकता, क्योंकि जीवित शरीर की सतह के रूप हर बिंदु पर त्वचा के नीचे की हड्डियों और मांसपेशियों से निर्धारित होते हैं। किसी भुजा का आकार, धड़ का रूप, घुटने की स्थिति, कंधे की गति — ये सभी दृश्यमान बाहरी रूप विशिष्ट आंतरिक संरचनाओं की ही उपज हैं, और जो चित्रकार इन्हें केवल बाहरी अवलोकन के आधार पर उकेरता, वह अनिवार्य रूप से ऐसी गलतियाँ करता जो अंतर्निहित शारीरिक रचना के प्रति उसकी अज्ञानता को उजागर कर देतीं। यह विश्वास, हालाँकि उनकी पीढ़ी के अन्य विचारशील कलाकारों में भी था, Leonardo को शारीरिक ज्ञान की तलाश में उस तीव्रता और व्यवस्थित कठोरता के साथ आगे ले गया जो किसी भी व्यावसायिक कलात्मक आवश्यकता से कहीं परे थी।

उन्होंने अस्पतालों और धर्मार्थ संस्थाओं के माध्यम से मानव शवों तक पहुँच प्राप्त की, जिनमें सबसे उल्लेखनीय थे Florence का Santa Maria Nuova अस्पताल और Rome का Santo Spirito अस्पताल, जहाँ लावारिस गरीबों के और कभी-कभी फाँसी पाए अपराधियों के शव उन लोगों को उपलब्ध कराए जाते थे जिनके पास उनकी जाँच के लिए वैध कारण हों। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने अपने जीवनकाल में बीस से तीस के बीच पूरे मानव शवों का विच्छेदन किया, इसके अलावा विशिष्ट शारीरिक प्रश्नों पर केंद्रित अनेक आंशिक विच्छेदन भी किए, और उन्होंने अपने मानव अध्ययन की पूर्ति घोड़ों, बैलों, भालुओं, कुत्तों और पक्षियों के सावधानीपूर्वक विच्छेदन से की, सभी प्राणी शरीरों में समान अंतर्निहित सिद्धांतों को उजागर करने के एक साधन के रूप में तुलनात्मक शरीर रचना विज्ञान को अपनाते हुए। जिन परिस्थितियों में यह कार्य करना पड़ता था, वे अत्यंत अप्रिय थीं। शव तेज़ी से सड़ते थे, विशेष रूप से गर्म मौसम में, और Leonardo ने अपनी नोटबुक में इस सड़न के बीच काम करने की कठिनाइयों का उल्लेख किया है। उन्हें तेज़ी से काम करना पड़ता था और जैसी परिस्थितियाँ होती थीं, उसके अनुसार एक ताज़े शव से दूसरे ताज़े शव पर जाना पड़ता था।

शारीरिक रचना के चित्रण के प्रति उनका दृष्टिकोण वैज्ञानिक चित्रण के इतिहास में एक क्रांतिकारी नवाचार था। पहले के शारीरिक चित्रकारों की तरह किसी एक निश्चित दृष्टिकोण से संरचना को दर्शाने के बजाय, Leonardo ने कई ऐसी तकनीकें विकसित कीं जो उन्हें त्रि-आयामी संरचनात्मक जानकारी को अभूतपूर्व पूर्णता और स्पष्टता के साथ प्रस्तुत करने में सक्षम बनाती थीं। वे नियमित रूप से एक ही पृष्ठ पर या आसपास के पृष्ठों पर किसी एक संरचना को कई कोणों से दिखाते थे, ताकि पाठक उस संरचना की एक समग्र त्रि-आयामी समझ बना सके। उन्होंने संरचनाओं को अनुप्रस्थ काट में दिखाने की तकनीक विकसित की — शरीर या किसी अंग को इस प्रकार काटकर कि आंतरिक स्थानिक संबंध उजागर हो सकें, जो किसी बाहरी दृष्टिकोण से दिखाई नहीं देते। उन्होंने विस्फोटित दृश्यों का उपयोग करके यह दर्शाया कि जटिल संरचनाएँ अपने घटक भागों से किस प्रकार बनी होती हैं — घटकों को अंतरिक्ष में अलग-अलग खींचकर, ताकि उनके व्यक्तिगत रूप स्पष्ट रूप से दिखें, और फिर उन्हें उनके सही शारीरिक संबंधों में जोड़कर दिखाया। ये सभी तकनीकें, जिन्हें उन्होंने मूलतः शारीरिक चित्रण के उद्देश्य से आविष्कृत किया था, अब न केवल चिकित्सा और वैज्ञानिक चित्रण में, बल्कि इंजीनियरिंग ड्राइंग और हर प्रकार के जटिल उत्पादों के तकनीकी दस्तावेज़ीकरण में भी मानक प्रचलन बन चुकी हैं।

मानव कंकाल के उनके अध्ययन व्यवस्थित पूर्णता के आदर्श उदाहरण थे। उन्होंने हड्डियों की अलग-अलग और परस्पर संयोजित अवस्था में जाँच की, कंकाल को एक यांत्रिक प्रणाली के रूप में समझा जिसमें अलग-अलग हड्डियाँ विभिन्न प्रकार के उत्तोलकों की भाँति कार्य करती थीं — जोड़ों पर टिकी हुईं, जो आलंब का काम करते थे, और उनकी सतहों के विशिष्ट बिंदुओं से जुड़ी मांसपेशीय शक्तियों द्वारा संचालित होती थीं। उन्होंने जोड़ों का सावधानीपूर्वक अध्ययन किया — उपास्थि, स्नायु, जोड़-आवरण और सायनोवियल गुहाओं की उस सूक्ष्मता से जाँच की जो किसी भी पूर्ववर्ती अन्वेषक के अभिलेखों से कहीं आगे थी। वे यह समझते थे कि जोड़ की सतहों की आकृति प्रत्येक जोड़ पर संभव गति की सीमा और प्रकार को किस प्रकार निर्धारित करती है, और उन्होंने कंधे और घुटने जैसे जटिल जोड़ों की यांत्रिकी का विश्लेषण इतनी परिपक्वता से किया जो आधुनिक जैवयांत्रिकी विश्लेषण की अग्रदूत थी।

उनके हृदय-वाहिका संबंधी अध्ययन कई मायनों में उनकी शारीरिक जाँच-पड़ताल में सबसे दूरदर्शी थे। उन्होंने हृदय का असाधारण सावधानी से विच्छेदन और परीक्षण किया तथा उसके कक्षों, वाल्वों, आंतरिक संरचना और उससे जुड़ी प्रमुख रक्त-वाहिकाओं के विस्तृत चित्र बनाए। हृदय-चक्र के दौरान हृदय के वाल्व किस प्रकार कार्य करते हैं, यह समझने के लिए उन्होंने शारीरिक रचना के इतिहास में सबसे सर्जनात्मक प्रयोगों में से एक किया — महाधमनी-मूल और उससे जुड़े वाल्व-पत्रकों के काँच के मॉडल बनाए और उनमें पानी तथा बीज-सामग्री पंप करके प्रवाह के तरीकों और हृदय-चक्र के विभिन्न चरणों में वाल्व के व्यवहार का अवलोकन किया। इन प्रयोगों से वे हृदय वाल्वों के खुलने और बंद होने की क्रियाविधि के बारे में सारतः सही निष्कर्षों पर पहुँचे — ऐसी अंतर्दृष्टियाँ जिन्हें शरीरक्रिया विज्ञानी सदियों बाद औपचारिक रूप से स्थापित कर पाए। इसके अलावा, उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि हृदय मूलतः एक पेशीय पंप है जिसके संकुचन शरीर की वाहिकाओं में रक्त को प्रवाहित करते हैं — एक ऐसा मत जो उनके समय की प्रचलित गैलेनिक सिद्धांत को चुनौती देता था।

इंजीनियरिंग और आविष्कार

Leonardo की नोटबुक्स में भरे हुए इंजीनियरिंग के नक्शे और डिज़ाइन शायद उनकी असाधारण रचनात्मक प्रतिभा का सबसे चौंकाने वाला और सबसे ज़्यादा चर्चा में रहने वाला प्रमाण हैं। उनके हज़ारों पन्नों में बचे हुए नोट्स में उड़ने वाली मशीनों, पानी के अंदर गोताखोरी के उपकरणों, बख़्तरबंद लड़ाकू वाहनों, तेज़ रफ़्तार हथियारों, हाइड्रॉलिक मशीनरी, नहर खोदने के उपकरणों, कपड़ा बनाने के यंत्रों, छपाई में सुधार, संगीत वाद्ययंत्रों में नई खोजों और दर्जनों अन्य यांत्रिक उपकरणों के डिज़ाइन शामिल हैं — जो व्यावहारिक से लेकर काल्पनिक तक हर स्तर पर फैले हुए हैं। इनमें से कुछ डिज़ाइन ठोस यांत्रिक सिद्धांतों और उस समय उपलब्ध सामग्रियों पर आधारित वास्तविक इंजीनियरिंग प्रस्ताव थे। कुछ भविष्य की तकनीकी दिशा की ऐसी शानदार अनुभूतियाँ थीं जिन्हें उस युग में उपलब्ध किसी भी औज़ार, सामग्री या निर्माण क्षमता से साकार नहीं किया जा सकता था। और कुछ विशुद्ध रूप से यांत्रिक संभावनाओं की सट्टेबाज़ी भरी कल्पनाएँ थीं, जिन्हें शायद Leonardo ने खुद भी कभी साकार होते देखने की उम्मीद नहीं रखी थी।

उड़ने वाली मशीनों के उनके डिज़ाइन उनकी इंजीनियरिंग कल्पनाओं में सबसे मशहूर और सबसे अधिक चर्चित हैं, और ये एक ही तकनीकी समस्या के साथ उनके सबसे लंबे और सबसे निरंतर जुड़ाव को दर्शाते हैं। वे अपने शुरुआती वर्षों से ही मानव उड़ान की संभावना से मंत्रमुग्ध थे और दशकों तक अपने बौद्धिक जीवन में बार-बार इस विषय पर लौटते रहे — इसे कई कोणों से परखते हुए और जैसे-जैसे पक्षियों की उड़ान और वायुमंडलीय व्यवहार की उनकी समझ गहरी होती गई, अपनी सोच को परिष्कृत करते रहे। उनका मुख्य तरीक़ा था ऑर्निथॉप्टर — एक ऐसी मशीन जो किसी मानव संचालक की मांसपेशियों की शक्ति से चलने वाले फड़फड़ाते पंखों के ज़रिए उड़ती, ठीक उसी तंत्र की नकल में जिसे वे पक्षियों की उड़ान का आधार मानते थे। उन्होंने अलग-अलग यांत्रिक जटिलता वाले ऑर्निथॉप्टरों के कई संस्करण बनाए और यह अध्ययन किया कि पंखों की सतह को हल्की सामग्रियों से कैसे बनाया जाए ताकि वह इतनी बड़ी संरचना बन सके जो ज़रूरी उठान पैदा करे और साथ ही इतनी हल्की भी रहे कि एक इंसान उसे उठा सके।

उन्होंने एक बिल्कुल अलग प्रकृति का एक उपकरण भी डिज़ाइन किया, जिसमें एक बड़ी पेचदार स्क्रू की सतह एक ऊर्ध्वाधर धुरी के चारों ओर तेज़ी से घूमती थी। उनकी कल्पना थी कि यह हवा में बरमे की तरह घुसकर उसी तरह ऊपर उठ सकती है जैसे एक पेंच लकड़ी में घुसता है। इस उपकरण को अक्सर हेलिकॉप्टर की पूर्वकल्पना के रूप में वर्णित किया जाता है और यह वाकई एक मौलिक अवधारणा है जो दर्शाती है कि Leonardo प्रकृति में देखे गए उड़ान के तरीकों से बिल्कुल अलग तंत्रों की कल्पना करने में कितने सक्षम थे। क्या यह वास्तव में काम करता — यह एक अलग सवाल है; स्क्रू को घुमाने और साथ ही मशीन के ढाँचे को विपरीत दिशा में घूमने से रोकने की यांत्रिक समस्याएँ ऐसी थीं जिनका Leonardo के डिज़ाइन में कोई समाधान नहीं था।

उनके सैन्य इंजीनियरिंग के डिज़ाइन व्यापक और तकनीकी रूप से परिष्कृत थे — ये हथियारों और किलेबंदी के यांत्रिक सिद्धांतों में उनकी वास्तविक रुचि और उन राजकुमारों तथा शासकों की व्यावहारिक ज़रूरतों दोनों को दर्शाते हैं जिन्होंने उन्हें सैन्य इंजीनियर के रूप में नियुक्त किया था। उन्होंने ऐसे बख़्तरबंद वाहन डिज़ाइन किए जिनका सामान्य विवरण आज के टैंकों जैसा लगता है — बड़े गाड़ी-नुमा चबूतरे जो झुकी हुई बख़्तरबंद प्लेटों से घिरे थे और जिनसे चारों दिशाओं में हथियार बाहर निकले हुए थे, और जो अंदर बैठे आदमियों द्वारा पहियों से जुड़े क्रैंक घुमाने से चलते थे। उन्होंने असाधारण शक्ति और मारक दूरी वाले बड़े क्रॉसबो डिज़ाइन किए, बहु-नाल वाली बंदूकें जो भरे हुए नालों के एक सिलेंडर को घुमाकर एक के बाद एक तेज़ गोलियाँ दागने में सक्षम थीं, तोपों में इस्तेमाल के लिए विस्फोटक गोले, और दुश्मन की किलेबंदी को तोड़ने या हमले से बचाव के लिए तरह-तरह के उपकरण। उन्होंने उस युग की बढ़ती ताकतवर तोपखाने का सामना कर सकने वाली किलेबंदियों के डिज़ाइन पर भी गंभीरता से ध्यान दिया और ऐसे प्रस्ताव विकसित किए जिनमें कम ऊँचाई वाली मिट्टी की दीवारें झुकी हुई सतहों के साथ होती थीं जो तोप के गोले को नष्ट होने की बजाय सोख लेती थीं।

उनकी हाइड्रॉलिक इंजीनियरिंग शायद उनके तकनीकी कार्य का सबसे निरंतर व्यावहारिक क्षेत्र थी, इस अर्थ में कि उनके कम से कम कुछ डिज़ाइन उनके जीवनकाल में वास्तव में लागू किए गए थे या उन व्यावहारिक परियोजनाओं में सीधे योगदान दिया था जो कार्यान्वित हुईं। उन्होंने नहर खोदने वाली मशीनें डिज़ाइन कीं जो केवल हाथ से काम करने की तुलना में मिट्टी और पत्थर में रास्ते खोदने में अधिक कुशल थीं। उन्होंने पानी के पहिए, पंप, स्लूस गेट और अन्य हाइड्रॉलिक नियंत्रण उपकरण डिज़ाइन किए। उन्होंने लोम्बार्ड मैदान और अन्य स्थानों पर व्यावहारिक नहर और सिंचाई परियोजनाओं पर काम किया। उन्होंने एक प्रस्ताव विकसित किया — जिस पर गंभीरता से विचार किया गया, भले ही अंततः उसे कभी अमल में नहीं लाया गया — कि Florence के पास Arno नदी का मार्ग बदल दिया जाए ताकि शहर को समुद्र से एक नौगम्य जल-संपर्क मिल सके, जो एक ऐसी परियोजना होती जिसने Tuscany के व्यापारिक भूगोल को पूरी तरह बदल दिया होता।

औद्योगिक मशीनरी के लिए उनके डिज़ाइन यांत्रिक लाभ, गति रूपांतरण, तथा घूर्णन गति को रैखिक गति में और इसके विपरीत बदलने के सिद्धांतों की एक व्यवस्थित समझ दर्शाते हैं। उन्होंने कपड़ा निर्माण के लिए बेहतर करघे, स्वचालित पीसने वाली मशीनें, यांत्रिक आरी, और अन्य श्रम-बचत उपकरण डिज़ाइन किए जो उस औद्योगिक मशीनरी की पूर्व-कल्पना थे जो कई सदियों बाद तक व्यावहारिक महत्व नहीं पाती। उन्होंने मापने के उपकरणों के डिज़ाइन के बारे में भी गहराई से सोचा और बेहतर कंपास, हवा और पानी की गति मापने वाले उपकरण, तथा सर्वेक्षण और नेविगेशन में उपयोग होने वाले यंत्रों के प्रस्ताव विकसित किए।

प्रकृति और भौतिक संसार

प्राकृतिक संसार के साथ Leonardo का संबंध एक कलाकार या इंजीनियर के रूप में उनकी व्यावसायिक आवश्यकताओं से कहीं आगे था और यह उनके पूरे जीवन की सबसे गहरी और सबसे सुसंगत प्रतिबद्धताओं में से एक था। Tuscany की ग्रामीण भूमि में उनकी बचपन की शुरुआती खोजों से लेकर बाढ़ में पानी की विनाशकारी शक्ति पर उनकी देर से की गई जाँच तक, उन्होंने अपने लंबे करियर में प्राकृतिक संसार की तमाम विविधता और जटिलता के साथ एक तीव्र, जुनूनी और अनिवार्य रूप से अटूट जुड़ाव बनाए रखा।

पौधों के जीवन पर उनके अध्ययन उनके वैज्ञानिक कार्य के कम चर्चित, लेकिन कई मायनों में सबसे प्रभावशाली क्षेत्रों में से एक हैं। उन्होंने पौधों को सीधे और उसी तीव्र ध्यान के साथ देखा जो वे मानव आकृति को देते थे, और उन्होंने प्रत्यक्ष अवलोकन से सावधानीपूर्वक रेखाचित्र बनाए जो अलग-अलग प्रजातियों की विशिष्ट दृश्य-प्रकृति को उस सटीकता और जीवंत विशिष्टता के बोध के साथ उकेरते थे जो उन्हें उनके युग के वनस्पति विज्ञान और चिकित्सा ग्रंथों में प्रचलित योजनाबद्ध, परंपरागत पौधों के चित्रणों से स्पष्ट रूप से अलग करती थी। फूलों, पत्तियों, तनों और जड़ों के उनके रेखाचित्र उनके द्वारा जाँची गई प्रत्येक प्रजाति की विशिष्ट संरचनात्मक व्यवस्था की गहरी समझ दर्शाते हैं, साथ ही प्राकृतिक पौधों के रूप के सौंदर्य गुणों के प्रति एक संवेदनशीलता भी जो इन अध्ययनों को वैज्ञानिक दृष्टि से जानकारीपूर्ण होने के साथ-साथ सुंदर भी बनाती थी।

वे जीवित जीवों के रूपों को नियंत्रित करने वाली गणितीय नियमितताओं में गहरी रुचि रखते थे। उन्होंने पौधों के तनों पर पत्तियों की सर्पिल व्यवस्था देखी और पहचाना कि पत्तियाँ तने के चारों ओर ऐसे क्रमों में लगी होती हैं जो यह सुनिश्चित करते हैं कि किसी भी पत्ती पर उसके ऊपर की पत्तियों की छाया कम से कम पड़े, और उन्होंने इन क्रमों को नियंत्रित करने वाले गणितीय नियमों को समझने का प्रयास किया। उन्होंने पेड़ों की शाखाओं की संरचना का वर्णन करने वाला एक अनुभवजन्य नियम तैयार किया — यह देखते हुए कि किसी भी विभाजन-बिंदु पर शाखाओं का संयुक्त अनुप्रस्थ-काट क्षेत्रफल उस मूल शाखा के अनुप्रस्थ-काट क्षेत्रफल के लगभग बराबर होता है जिससे वे विभाजित होती हैं — और उन्होंने इस अवलोकन को पेड़ की हाइड्रॉलिक प्रणाली की कार्यात्मक आवश्यकताओं से जोड़ा। उन्होंने मधुमक्खी के छत्ते की षट्भुजीय कोशिकाओं का अध्ययन किया और उन गणितीय कारणों की जाँच की कि यह विशेष ज्यामिति स्थान को भरने और कोशिका की दीवारों के लिए न्यूनतम सामग्री का उपयोग करने के उद्देश्य से इतनी कुशल क्यों है।

पक्षियों की उड़ान एक ऐसा विषय था जिसकी उन्होंने अपने जीवन के अधिकांश समय तक निरंतर और गहन जांच-पड़ताल की। इसके पीछे मुख्य प्रेरणा एक उड़ने वाली मशीन बनाने की उनकी महत्वाकांक्षा थी, लेकिन उन्होंने इस विषय को इतनी गहराई से खोजा जो किसी भी तात्कालिक व्यावहारिक उद्देश्य से कहीं आगे जाता था। वे घंटों पक्षियों को उड़ते हुए देखते रहते, इस बात का बड़ी सूक्ष्मता से अवलोकन करते कि वे अपने पंखों का उपयोग कैसे करते हैं, अपनी दिशा और गति को कैसे नियंत्रित करते हैं, और बिना लगातार प्रयास किए ऊंचाई बनाए रखने के लिए हवा की धाराओं और थर्मल का कैसे फायदा उठाते हैं। उन्होंने पक्षियों के पंखों की शारीरिक संरचना का विस्तृत अध्ययन किया — पंखों, हड्डियों और पंख की मांसपेशियों की बनावट की जांच की, और यह समझने की कोशिश की कि हर तत्व पूरे पंख की वायुगतिकीय कार्यप्रणाली में किस प्रकार योगदान देता है। उन्होंने अलग-अलग तेज़ी और दिशाओं वाली हवाओं में पक्षियों के व्यवहार का निरीक्षण किया और दर्ज किया कि बदलती परिस्थितियों में नियंत्रण बनाए रखने के लिए वे अपने पंखों की स्थिति और शरीर के रुख को कैसे बदलते हैं।

वायुमंडलीय घटनाओं की उनकी जांच भी उतनी ही व्यापक थी। उन्होंने बादलों के निर्माण, तूफानों के विकास, बिजली के व्यवहार, कोहरे और धुंध के प्रकाशीय गुणों तथा विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों में हवा के पैटर्न का अध्ययन किया। उन्होंने आकाश के नीले रंग की सही भौतिक व्याख्या निकाली — यह समझते हुए कि यह हवा या आकाश का कोई अंतर्निहित गुण नहीं है, बल्कि वायुमंडल में मौजूद छोटे कणों और बूंदों द्वारा सूर्यप्रकाश के प्रकीर्णन से उत्पन्न एक प्रभाव है। यह अंतर्दृष्टि उस औपचारिक भौतिक व्याख्या की पूर्वसूचना देती है जो Lord Rayleigh ने उन्नीसवीं सदी में विकसित की। वे यह भी समझते थे कि चंद्रमा परावर्तित सूर्यप्रकाश से चमकता है, और उन्होंने earthshine की सही व्याख्या भी की — यानी चंद्रमा के उस भाग की हल्की रोशनी जो सीधे सूर्य की रोशनी से नहीं जगमगाती, वह दरअसल पृथ्वी की प्रकाशित सतह से परावर्तन का परिणाम है।

अंतिम वर्ष और फ्रांस

मिलान में Ludovico Sforza की सत्ता का पतन — जो फ्रांसीसी राजा Louis XII के सैन्य हस्तक्षेप के कारण हुआ — Leonardo के कार्यजीवन के सबसे स्थिर और उत्पादक दौर का अंत था। इसके बाद एक ऐसा चरण शुरू हुआ जिसमें अधिक भटकाव, कम स्थायी संरक्षण और कुछ मायनों में अधिक तीव्र तथा केंद्रित रचनात्मक गतिविधि रही। वे मिलान छोड़कर अगले कई वर्षों तक विभिन्न इतालवी शहरों और दरबारों के बीच आते-जाते रहे, हमेशा उस संयोजन की तलाश में जो उन्हें अपनी विशाल जांच-पड़ताल और कलात्मक परियोजनाओं को जारी रखने देता — आर्थिक सहयोग, बौद्धिक स्वतंत्रता और व्यावहारिक सुविधाएं। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में वे फ्रांस में राजा Francis I के दरबार में बस गए, और इस अंतिम अध्याय में उन्हें वह सम्मान, सुख-सुविधा और सराहना मिली जो उनके इतालवी वर्षों में अक्सर दुर्लभ रही थी।

मिलान के पतन के बाद उन्होंने कुछ समय वेनिस में बिताया, जो तुर्की के खतरे के जवाब में सैन्य इंजीनियरिंग परियोजनाओं पर विचार कर रहा था, इसके बाद वे फ्लोरेंस लौटे जहां का राजनीतिक माहौल उनकी जवानी के दिनों से नाटकीय रूप से बदल चुका था। Medici को निष्कासित किया जा चुका था, गणतंत्र विभिन्न स्वरूपों में बहाल हो चुका था, और सांस्कृतिक वातावरण उनके शुरुआती वर्षों के उस आत्मविश्वासपूर्ण, Medici-प्रायोजित मानवतावाद से अलग था। फिर भी इस दौर में उन्हें फ्लोरेंस में काम के अवसर और बौद्धिक प्रेरणा दोनों मिले, और यह लगभग निश्चित है कि फ्लोरेंस वापसी के दौरान ही उन्होंने Mona Lisa पर काम शुरू किया — एक ऐसी परियोजना जो उन्हें वर्षों तक रुक-रुककर व्यस्त रखती रही और जिसे उन्होंने शायद कभी पूरी तरह नहीं छोड़ा।

उन्होंने अपने फ्लोरेंटाइन काल के दौरान अपने करियर के सबसे महत्वाकांक्षी और अंततः सबसे निराशाजनक कमीशनों में से एक को भी स्वीकार किया — फ्लोरेंटाइन सरकार के परिषद कक्ष के लिए एक बड़े पैमाने की युद्ध पेंटिंग, जो Anghiari की लड़ाई में फ्लोरेंस की एक प्रसिद्ध सैन्य जीत को दर्शाने के लिए बनाई जानी थी। इस परियोजना के लिए उन्होंने जो प्रारंभिक कार्य किया — जिसमें केंद्रीय घुड़सवार संघर्ष का एक विस्तृत कार्टून भी शामिल था, जिसे समकालीन लोगों ने अपनी ऊर्जा, मनोवैज्ञानिक तीव्रता और गतिशील शक्ति में अभूतपूर्व पाया — उसने उन सभी पर गहरी छाप छोड़ी जिन्होंने इसे देखा, जिनमें युवा Michelangelo भी शामिल थे, जो उसी समय उसी कक्ष के लिए एक प्रतिस्पर्धी युद्ध पेंटिंग पर काम कर रहे थे। लेकिन वास्तविक भित्तिचित्र पेंटिंग एक बार फिर Leonardo की तकनीक के प्रति प्रयोगात्मक रवैये का शिकार हो गई, और यह काम अंततः अधूरा छोड़ दिया गया — पीछे केवल प्रारंभिक रेखाचित्र और उत्साहजनक समकालीन विवरण रह गए, जो यह सुझाते हैं कि पूरी हुई कृति कैसी रही होती।

इस काल के दौरान एक सैन्य इंजीनियर के रूप में Cesare Borgia की सेवा ने उन्हें उस युग के सबसे निर्मम और दृढ़ निश्चयी राजनीतिक खिलाड़ियों में से एक के संपर्क में लाया — एक ऐसा युग जिसमें निर्ममता और दृढ़ संकल्प की कोई कमी नहीं थी — और इस सेवा ने एक व्यावहारिक उपोत्पाद के रूप में पुनर्जागरण के कुछ सबसे उत्कृष्ट मानचित्र-कार्य को जन्म दिया। Borgia की सैन्य योजना के उद्देश्य से तैयार किया गया Imola शहर का उनका विस्तृत बर्ड्स-आई-व्यू नक्शा, मानचित्रकारी परिशुद्धता और प्रतिनिधित्व की सूझबूझ का एक उत्कृष्ट नमूना है, जो अपनी ज्यामितीय सटीकता और व्यवस्थित सर्वेक्षण पद्धति में आधुनिक हवाई मानचित्रण की पूर्वसूचना देता है।

फ्रांसीसियों द्वारा मिलान पर पुनः नियंत्रण स्थापित करने के बाद वे वहाँ लौट आए और कई और वर्ष वहाँ बिताने के बाद अंततः रोम पहुँचे, जहाँ उन्होंने तत्कालीन पोप के भाई Giuliano de Medici के संरक्षण में एक कम संतोषजनक वातावरण में काम किया। रोम का काल कई मायनों में निराशाजनक रहा, और Leonardo को शहर का कलात्मक और बौद्धिक परिवेश उतना अनुकूल नहीं लगा जितनी उन्हें उम्मीद थी — आंशिक रूप से इसलिए कि वे अब अपने युग के मानकों के अनुसार एक वृद्ध व्यक्ति थे, और आंशिक रूप से इसलिए कि उस समय रोम पर Michelangelo और Raphael की अत्यंत प्रभावशाली उपस्थिति हावी थी, जो दोनों ही अपनी शक्ति के चरम पर थे और शहर के कलात्मक ध्यान का केंद्र बने हुए थे।

फ्रांस के राजा Francis I का निमंत्रण — जो युवा, सुसंस्कृत, उत्साह से यूनानी संस्कृति के प्रेमी और इतालवी कला व संस्कृति के प्रति गहरे समर्पित थे — Leonardo के लिए वह चीज़ लेकर आया जिसकी तलाश उन्हें लंबे समय से थी: उनकी अद्वितीय प्रतिष्ठा की पहचान, न केवल एक कुशल चित्रकार या शिल्पकार के रूप में, बल्कि एक सर्वव्यापी बुद्धि के रूप में जो उनकी असाधारण प्रतिभाओं की पूर्ण श्रृंखला के अनुरूप सम्मान और भौतिक समर्थन की हकदार थी। वे अपने समर्पित शिष्य और साथी Francesco Melzi के साथ फ्रांस की यात्रा पर निकले, अपनी सबसे महत्वपूर्ण पेंटिंग और नोटबुक साथ लेकर, और Loire नदी के किनारे Amboise में शाही निवास के पास स्थित एक आरामदायक मनोर हाउस — Chateau of Cloux, जिसे अब Clos Luce के नाम से जाना जाता है — में बस गए।

Francis नियमित रूप से उनसे मिलने आते थे और कथित तौर पर इस वृद्ध महारथी के साथ कई घंटे बातचीत में बिताते थे, क्योंकि उन्हें Leonardo में एक ऐसा साथी मिला था जिसकी बौद्धिक विस्तृतता और कल्पनाशक्ति उनकी अपनी प्रभावशाली बुद्धिमत्ता को चुनौती देती और प्रेरित करती थी। Leonardo को राजा के प्रथम चित्रकार, इंजीनियर और वास्तुकार की मानद उपाधि दी गई तथा उन्हें एक उदार वार्षिक भत्ता मिला, जिसने उनके लंबे करियर में पहली बार उन्हें वित्तीय सुरक्षा प्रदान की। वे अपनी नोटबुक पर काम करते रहे और ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने फ्रांसीसी दरबार के लिए कुछ तकनीकी परियोजनाएँ भी हाथ में लीं, जिनमें एक आदर्श नई शाही नगरी के डिज़ाइन और Loire घाटी क्षेत्र में नहर सुधार के प्रस्ताव शामिल थे।

फ्रांस में अपने अंतिम वर्षों के दौरान उनका स्वास्थ्य बिगड़ता गया, और Cloux में रहने के दौरान किसी समय उन्हें एक स्ट्रोक हुआ जिसने उनके दाहिने हिस्से को आंशिक रूप से लकवाग्रस्त कर दिया। चूँकि वे बाएं हाथ से काम करते थे, इसलिए यह उन्हें लिखने और चित्र बनाने से पूरी तरह नहीं रोक सका। उन्हें एहसास था कि उनका समय तेज़ी से बीत रहा है और जो विशाल बौद्धिक परियोजनाएँ उन्होंने अपने लिए तय की थीं, वे अधूरी रह जाएंगी। उनकी बाद की कुछ नोटबुक प्रविष्टियों में एक आतुरता और कुछ हद तक निराशाजनक संक्षेपण का भाव है, जैसे वे मौका जाने से पहले अपने निष्कर्षों को दर्ज कर लेना चाहते हों। वे Cloux में ही चल बसे — अपने फ्रांसीसी घराने से घिरे हुए और Melzi को अपने पास लिए हुए — अपने मध्य-षष्ठदशक के किसी वर्ष के देर वसंत में। यह कहानी कि राजा उनकी臨终 के समय उनका सिर थामे उपस्थित थे, लगभग निश्चित रूप से एक बाद में गढ़ी गई दंतकथा है, न कि ऐतिहासिक सत्य — लेकिन यह इस सच्चाई को ज़रूर दर्शाती है कि Francis अपने इस असाधारण अतिथि को किस असामान्य सम्मान की दृष्टि से देखते थे।

दर्शन और विश्वदृष्टि

Leonardo को एक बौद्धिक और ऐतिहासिक व्यक्तित्व के रूप में पूरी तरह समझने के लिए यह ज़रूरी है कि हम उनकी उपलब्धियों की सूची से आगे जाएँ और उन दार्शनिक प्रतिबद्धताओं तथा मन के उन मूलभूत झुकावों को समझने की कोशिश करें, जिन्होंने उनकी असाधारण रूप से विविध गतिविधियों को एकसूत्र में पिरोकर एक सुसंगत बौद्धिक जीवन का रूप दिया। उनकी नोटबुकें, जो उनके विचारों का सबसे अंतरंग और प्रत्यक्ष अभिलेख हैं, इस तरह की समझ के लिए सबसे समृद्ध स्रोत हैं। ये नोटबुकें ज्ञान, प्रकृति और बौद्धिक अन्वेषण के उचित आचरण के बारे में एक विशिष्ट और कई मायनों में उल्लेखनीय रूप से मौलिक विचारों को सामने रखती हैं।

Leonardo के बौद्धिक जीवन की नींव में अनुभववाद के प्रति एक ऐसी गहरी और सुसंगत प्रतिबद्धता थी जिसने उनके द्वारा जांचे गए हर विषय के प्रति उनके दृष्टिकोण के हर पहलू को आकार दिया। वे प्रचलित प्राधिकार से अविश्वास रखते थे — चाहे वह प्राधिकार प्राचीन दार्शनिकों और वैज्ञानिकों के लेखों में निहित हो या समकालीन विद्वानों द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों में। उन्होंने ग्रंथों से सीखने को पूरी तरह नकारा नहीं और उन्होंने अपने पूरे जीवनकाल में लिखित स्रोतों का उपयोग किया, लेकिन उनका दृढ़ मत था कि प्राकृतिक जगत के बारे में ज्ञान का प्राथमिक और सबसे विश्वसनीय स्रोत उस जगत का प्रत्यक्ष अवलोकन है। जब किसी अत्यंत पूजनीय प्राधिकार का मत उनके अपने सावधानीपूर्वक किए गए अवलोकनों से टकराता था, तो वे उस मत को अस्वीकार करने में संकोच नहीं करते थे। उनका यह प्रसिद्ध कथन कि अनुभव उनकी गुरु और शिक्षक है, इस अनुभववादी प्रतिबद्धता को उसके सबसे सीधे और साहसिक रूप में अभिव्यक्त करता है, और Galen की त्रुटियों को अपनी शारीरिक विच्छेदन के आधार पर सुधारने की उनकी तत्परता ने इसे व्यवहार में प्रमाणित किया।

हालाँकि उनका अनुभववाद उस व्यक्ति का सरल या भोला अनुभववाद नहीं था जो बिना सैद्धांतिक चिंतन के केवल अवलोकन संचित करता रहे। वे समझते थे कि अकेला अवलोकन वास्तविक ज्ञान के लिए पर्याप्त नहीं है, कि इंद्रियों के कच्चे आँकड़ों को व्यवस्थित, व्याख्यायित और तर्कसंगत विश्लेषण के अधीन करना होगा तभी सच्ची समझ प्राप्त होगी। वे गणित की शक्ति में गहरी आस्था रखते थे — उनका मानना था कि गणित वह भाषा है जिसमें प्रकृति की गहरतम नियमितताएँ व्यक्त होती हैं और जिसके माध्यम से उनकी सबसे विश्वसनीय ढंग से जाँच और संप्रेषण किया जा सकता है। अपने पूरे जीवनकाल में उन्होंने अपने अध्ययन की गई घटनाओं के गणितीय विवरण और माप विकसित करने के लिए कठोर परिश्रम किया — यहाँ तक कि तब भी जब उनकी गणितीय तैयारी उन समस्याओं के सबसे कठोर समाधान के लिए अपर्याप्त थी जिन्हें वे सुलझाने का प्रयास कर रहे थे। उन्होंने बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया कि प्रकृति का वह अध्ययन जिसे गणितीय भाषा में व्यक्त न किया जा सके, वह वास्तविक विज्ञान नहीं बल्कि महज़ सतही अनुभवों का संग्रह मात्र है।

उनके पास प्रकृति की एक गहरी समग्र और एकीकृत दृष्टि थी, जो सभी प्राकृतिक घटनाओं को एक ही अंतर्निहित व्यवस्था की अभिव्यक्ति के रूप में देखती थी — जो अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग तरीकों से प्रकट होती है। वे बार-बार उस बात से चकित होते थे जिसे हम प्राकृतिक दुनिया के विभिन्न पहलुओं के बीच गहरी संरचनात्मक समानताएँ कह सकते हैं: ऊपर से देखने पर नदियों के शाखाओं वाले स्वरूप और नीचे से देखने पर पेड़ों की शाखाओं के स्वरूप के बीच की समानता; शरीर की नसों में रक्त के स्पंदनशील प्रवाह और समुद्र में ज्वार-भाटे के बीच का साम्य; पृथ्वी की परतदार संरचना और मानव शरीर की परतदार संरचना के बीच की समानता — जिसमें त्वचा, वसा, माँसपेशियों और हड्डियों के एक के बाद एक आवरण होते हैं। Leonardo के लिए ये समानताएँ महज सजावटी टिप्पणियाँ नहीं थीं, बल्कि ये प्राकृतिक सिद्धांतों की अंतर्निहित एकता की ओर संकेत करने वाले सुराग थे — इस बात का प्रमाण कि वही मूलभूत नियम पूरी प्राकृतिक दुनिया में अलग-अलग पैमानों पर और अलग-अलग पदार्थों में काम करते हैं।

धर्म और तत्त्वमीमांसा पर उनके विचार अपने युग के खतरनाक बौद्धिक माहौल को देखते हुए स्वाभाविक रूप से सतर्क थे, और उन्होंने इन्हें इतनी सावधानी से व्यक्त किया कि विद्वान उनके सटीक स्वरूप को लेकर आपस में असहमत रहे हैं। वे किसी भी आधुनिक अर्थ में नास्तिक नहीं थे, और यह स्पष्ट है कि जिस प्राकृतिक दुनिया का वे इतनी गहरी लगन से अध्ययन करते थे, उसे वे किसी न किसी अर्थ में एक दैवीय सृष्टि मानते थे — एक ऐसी बुद्धि की कृति जो उनसे कहीं अधिक महान थी, और जिसके हाथों की कारीगरी प्राकृतिक दुनिया की संरचना और व्यवस्था के हर विवरण में दिखाई देती थी। साथ ही, प्राकृतिक व्याख्या के प्रति उनकी प्रतिबद्धता, यह आग्रह कि प्राकृतिक घटनाओं के कारण प्राकृतिक हैं और प्राकृतिक साधनों से खोजे जा सकते हैं, धर्मग्रंथों की कालगणना से कहीं अधिक विशाल भूवैज्ञानिक कालखंडों को स्वीकार करने की उनकी तत्परता, और दुनिया को भक्तिपूर्ण चिंतन की बजाय तर्कसंगत जाँच-पड़ताल की वस्तु के रूप में देखने का उनका सामान्य रुझान — इन सबने उन्हें अपने युग की परंपरागत धार्मिक सोच के साथ एक असहज और कभी-कभी तनावपूर्ण संबंध में रखा।

उनकी नैतिक संवेदनशीलता असाधारण थी और कुछ मायनों में दूरदर्शी भी — उन्होंने नैतिक चिंता के दायरे को मानव समुदाय से परे तक विस्तारित किया, जो अपने समय और स्थान के लिए वास्तव में अपवादस्वरूप था। कहा जाता है कि वे अपने जीवन के अधिकांश समय शाकाहारी रहे और नैतिक आधार पर भोजन के लिए जानवरों की हत्या में भाग लेने से इनकार करते थे; यह भी प्रसिद्ध था कि वे बाज़ार में पिंजरे में बंद पक्षियों को केवल इसलिए खरीदते थे ताकि उन्हें आज़ाद कर सकें। उन्होंने अपने लेखों में हिंसा और विनाश के प्रति एक गहरी घृणा व्यक्त की, हालाँकि उन्होंने अपने पूरे जीवन में हथियारों और किलेबंदी की रचना करना जारी रखा — एक ऐसा विरोधाभास जिसे उन्होंने सुलझाने की बजाय उसके साथ जीना पसंद किया। उनसे परिचित लोगों के विवरणों के अनुसार, वे व्यक्तिगत रूप से उदार, प्रसन्नचित्त और एक ऐसी सामाजिक ऊष्मा और आकर्षण से संपन्न थे जो उन्हें दरबारों और कार्यशालाओं दोनों में समान रूप से स्वागतयोग्य बनाती थी।

अपनी प्रसिद्धि और अपनी उपलब्धियों की पहचान के प्रति उनका रवैया जटिल और कुछ हद तक अंतर्विरोधी था। वे स्पष्ट रूप से पहचान की तलाश करते थे और शक्तिशाली लोगों का संरक्षण पाने के लिए काफी रणनीतिक कुशलता से काम लेते थे, फिर भी अपनी निजी डायरियों में उन्होंने खोखली शोहरत और उस सतही प्रतिष्ठा के प्रति तिरस्कार व्यक्त किया जो वास्तविक उपलब्धि का स्थान ले लेती है। जो लोग समझ की वास्तविकता से ऊपर विद्वत्ता की दिखावट को महत्त्व देते थे, उन पर वे गहरी व्यंग्यात्मक टिप्पणी करने में सक्षम थे। अपने निजी चिंतन में वे अपनी असफलताओं और कुंठाओं के बारे में हैरान करने वाली ईमानदारी भी दिखाते थे — जिसमें वे परियोजनाएँ शुरू करके अधूरी छोड़ देने की उनकी प्रवृत्ति और उन व्यापक वैज्ञानिक ग्रंथों को पूर्ण प्रकाशित रूप में न दे पाने की उनकी अक्षमता शामिल थी, जिन्हें वे लिखना चाहते थे।

विरासत और ऐतिहासिक प्रभाव

Leonardo da Vinci की विरासत मानवीय गतिविधि के इतने सारे क्षेत्रों में फैली हुई है और उसने परवर्ती सांस्कृतिक, वैज्ञानिक एवं तकनीकी इतिहास के इतने पहलुओं को आकार दिया है कि इसे संपूर्ण रूप से समेटने की कोई भी कोशिश या तो अतिसरलीकरण का शिकार हो जाती है या फिर अनावश्यक रूप से विस्तृत हो जाती है। उन्होंने चित्रकला के इतिहास को इतनी गहराई से प्रभावित किया कि यूरोपीय चित्र-परंपरा का समूचा परवर्ती विकास उनकी नवीन खोजों की छाप लिए हुए है। उन्होंने ऐसे वैज्ञानिक और तकनीकी आविष्कारों की कल्पना पहले ही कर ली थी जो व्यवहार में उनकी मृत्यु के कई शताब्दियों बाद जाकर साकार हो सके। उन्होंने कलाकार को एक सार्वभौमिक बुद्धिजीवी के रूप में स्थापित करने का एक ऐसा आदर्श प्रस्तुत किया जिसने अपने युग से लेकर आज तक रचनात्मक लोगों की आत्म-समझ को नए सिरे से परिभाषित किया। और आधुनिक दुनिया में वे एक असाधारण शक्ति और गहरी अनुगूँज वाले सांस्कृतिक प्रतीक बन गए हैं — व्यापक प्रतिभा के उस आदर्श का मूर्त रूप, जो इस संभावना को दर्शाता है कि एक अकेला मानवीय मन अपनी पूर्ण क्षमता से काम करते हुए मानवीय बौद्धिक प्रयास के संपूर्ण आयाम में सार्थक अंतर्दृष्टि और वास्तविक दक्षता हासिल कर सकता है।

चित्रकला पर उनका प्रभाव तत्काल, गहरा और कुछ मायनों में अपरिमेय था। Sfumato की तकनीक — यानी किनारों को मुलायम बनाना और रेखाओं को वायुमंडलीय क्रमिकता में घुला देना — को उन कलाकारों ने अपने-अपने विशिष्ट तरीके से आगे बढ़ाया जो सीधे उनके साथ काम कर चुके थे या जिन्होंने उनकी कृतियों का गहन अध्ययन किया था। इनमें सबसे प्रमुख थे उनके शिष्य Giovanni Antonio Boltraffio और Marco d'Oggiono, लेकिन उनके सामान्य कलात्मक परिवेश में स्वतंत्र रूप से काम कर रहे सर्वोच्च श्रेणी के कलाकार भी इससे प्रभावित हुए। युवा Raphael, जिन्होंने फ्लोरेंस में अपने प्रवास के दौरान Leonardo की कृतियों से साक्षात्कार किया और उनसे गहरे प्रभावित हुए, उन्होंने अपनी परिपक्व शैली में वे तत्व शामिल किए जिनके प्रणेता Leonardo थे — जैसे आकृतियों का पिरामिडाकार समूहन, भाव-भंगिमा और अभिव्यक्ति के माध्यम से सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक चित्रण, और परिदृश्य की पृष्ठभूमि का वायुमंडलीय संयोजन। यहाँ तक कि Michelangelo, जिनका कलात्मक स्वभाव कई मायनों में Leonardo के बिल्कुल विपरीत था और जो कथित तौर पर Leonardo को व्यक्तिगत रूप से नापसंद करते थे, वे भी अपने इस समकालीन और प्रतिद्वंद्वी के प्रभाव से अछूते नहीं रहे — यह प्रभाव उनकी आकृति-चित्रण के कुछ पहलुओं में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

इतालवी प्रायद्वीप से परे Leonardo के प्रभाव का प्रसार मुख्य रूप से Mona Lisa के माध्यम से हुआ, जिसे Leonardo फ्रांस ले गए थे और जो अंततः फ्रांसीसी राजशाही संग्रह का हिस्सा बनी और बाद में Louvre में संरक्षित राष्ट्रीय संग्रह में शामिल हो गई। इस चित्र की असाधारण ख्याति सदियों में धीरे-धीरे बढ़ती रही, और पेरिस आकर इसे देखने वाले पूरे यूरोप के कलाकारों ने इसका अध्ययन किया। Giorgio Vasari से लेकर — जो सोलहवीं शताब्दी के थे — उन्नीसवीं सदी के उन महान कला समीक्षकों तक, जिन्होंने इसमें शाश्वत स्त्री-रहस्य का मूर्त रूप देखा, क्रमिक पीढ़ियों के सबसे प्रभावशाली कला समीक्षकों और लेखकों की टिप्पणियों ने उस असाधारण सांस्कृतिक आभा को निर्मित करने में योगदान दिया जो आज इस चित्र के इर्द-गिर्द मौजूद है।

उनकी वैज्ञानिक विरासत एक अधिक विरोधाभासी तस्वीर प्रस्तुत करती है, क्योंकि इसके पीछे एक बुनियादी तथ्य है — उनकी नोटबुकें न तो उनके जीवनकाल में प्रकाशित हुईं और न ही उनकी मृत्यु के कई पीढ़ियों बाद तक। नोटबुकें Francesco Melzi को विरासत में मिलीं, जिन्होंने उन्हें सावधानी से संरक्षित तो किया, लेकिन अपनी मृत्यु से पहले उन्हें व्यवस्थित या प्रकाशित करने में सफल नहीं हो सके। इसके बाद ये कई हाथों से होती हुई आंशिक रूप से बिखर गईं और धीरे-धीरे पूरे यूरोप के पुस्तकालयों तथा निजी संग्राहकों द्वारा अधिग्रहित की जाती रहीं। इन नोटबुकों को खोजने, एकत्र करने, अध्ययन करने और प्रकाशित करने की प्रक्रिया कई शताब्दियों तक धीमी और असमान गति से चलती रही, और केवल उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में ही विद्वान इनकी सामग्री का इतना व्यापक अवलोकन कर पाए कि Leonardo की वैज्ञानिक उपलब्धियों की सीमा और महत्व का सटीक मूल्यांकन किया जा सके।

चूँकि वैज्ञानिक क्रांति के दौर में ये नोटबुक्स वैज्ञानिक समुदाय की नज़रों से लगभग ओझल रहीं, इसलिए Leonardo द्वारा बाद की वैज्ञानिक खोजों की पूर्वकल्पना का उन खोजों पर कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ा। सोलहवीं से अठारहवीं सदी के बीच जिन वैज्ञानिकों ने प्रकृति के बारे में यूरोपीय समझ को बदल कर रख दिया — Copernicus, Kepler, Galileo, Harvey, Newton और उनके अनेक समकालीन तथा परवर्ती — उनमें से किसी को भी Leonardo के नोट्स तक पहुँच नहीं थी, और न ही वे उनसे प्रत्यक्ष रूप से प्रेरित हो सकते थे। Leonardo ने अपने स्वयं के अवलोकन और तर्क-शक्ति के ज़रिए जिन निष्कर्षों तक पहुँच हासिल की थी, उन्हीं निष्कर्षों तक बाद के इन वैज्ञानिकों को भी स्वतंत्र रूप से पहुँचना पड़ा, जो अपनी खुद की जाँच-पड़ताल के ज़रिए समान या समकक्ष नतीजों पर पहुँचे।

उन्नीसवीं सदी ने Leonardo को विशेष उत्साह और एक विशेष व्याख्यात्मक दृष्टिकोण के साथ फिर से खोजा, जो तब से उनकी लोकप्रिय छवि को आकार देता चला आ रहा है। रोमांटिक आंदोलन, जो व्यक्तिगत प्रतिभा का, सामान्य मानवीय सीमाओं को लाँघने वाली सृजनात्मक शक्ति का, और उस त्रासद व्यक्तित्व का उत्सव मनाता था जिसकी दूरदर्शी प्रतिभा को एक ऐसी दुनिया ने नाकाम कर दिया जो उसे अपनाने के लिए तैयार नहीं थी — उसे Leonardo में एक लगभग आदर्श अनुकरणीय व्यक्तित्व मिला। उनकी वैज्ञानिक नोटबुक्स की खोज और प्रकाशन ने इस छवि को और पुख्ता किया, यह उजागर करते हुए कि उनका मन उड़ान के बारे में, भूविज्ञान के बारे में, मानव शरीर के बारे में, और जल-विज्ञान के बारे में उन बातों को समझ चुका था, जिन्हें दुनिया उनकी मृत्यु के सदियों बाद तक सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं कर पाई। उस अनदेखे पैगंबर की, अपने समय से पहले जन्मे प्रतिभाशाली इंसान की यह कथा अपने विवरणों में पूरी तरह सटीक नहीं है, क्योंकि Leonardo को वास्तव में उनके अपने युग में एक असाधारण व्यक्तित्व के रूप में बेहद व्यापक मान्यता मिली थी — लेकिन यह कथा उनकी जाँच-पड़ताल की गहराई और उनके समकालीनों की उसे आगे ले जाने और उस पर निर्माण करने की क्षमता के बीच के संबंध की कोई एक असली बात ज़रूर पकड़ती है।

बीसवीं सदी में और इक्कीसवीं सदी में भी, Leonardo कला और विज्ञान के इतिहास में सबसे अधिक अध्ययन किए जाने वाले व्यक्तित्वों में से एक बन गए हैं, और उनके जीवन, कार्य तथा विरासत को समर्पित विद्वत्तापूर्ण साहित्य अब तक विशाल रूप ले चुका है। X-ray फ़ोटोग्राफ़ी, इन्फ्रारेड रिफ्लेक्टोग्राफ़ी और अन्य वैज्ञानिक इमेजिंग विधियों का उपयोग करके उनकी पेंटिंग्स की तकनीकी जाँच ने उनकी चित्रकारी प्रक्रिया, उनकी रचना-संबंधी सोच और उनके संशोधनों के ऐसे पहलुओं को उजागर किया है जो पहले अदृश्य थे। प्रौद्योगिकी के इतिहासकारों द्वारा उनके इंजीनियरिंग डिज़ाइनों के व्यवस्थित अध्ययन ने इस बात का अधिक सटीक मूल्यांकन संभव किया है कि उनके कौन से आविष्कार व्यावहारिक रूप से संभव थे और कौन से उनके युग की क्षमताओं से परे थे। उनकी नोटबुक्स के आलोचनात्मक संस्करण, जो विद्वत्तापूर्ण टिप्पणी और अनुवादों के साथ पूर्ण पाठ प्रस्तुत करते हैं, ने उनकी वैज्ञानिक और कलात्मक सोच को दुनिया भर के पाठकों के लिए सुलभ बना दिया है।

उनके शारीरिक-रचना संबंधी चित्र, जब अंततः व्यापक विद्वत्तापूर्ण संस्करणों में प्रकाशित हुए, तो उन्हें तुरंत और सर्वसम्मति से असाधारण और अतुलनीय उपलब्धि की कृतियों के रूप में स्वीकार किया गया — ये वैज्ञानिक सटीकता को कलात्मक सौंदर्य के साथ इस तरह जोड़ते हैं जिसका विज्ञान या कला के समूचे इतिहास में कोई समानांतर नहीं है। इन्हें दुनिया के महान कला संग्रहालयों में प्रदर्शित किया गया है और मेडिकल स्कूलों में पढ़ा गया है। इनका उपयोग एक साथ चिकित्सा के इतिहास और कला के इतिहास को चित्रित करने के लिए किया गया है। इन्होंने कलाकारों, वैज्ञानिकों, चिकित्सकों और इंजीनियरों को प्रेरित किया है, और इन्हें अनगिनत प्रकाशनों में पुनः प्रस्तुत किया गया है जो पेशेवर वैज्ञानिकों से लेकर स्कूली बच्चों तक की विविध पाठक-वर्ग को संबोधित करते हैं।

Leonardo के इर्द-गिर्द जो सांस्कृतिक उद्योग पनपा है, वह अब अत्यंत विशाल हो चुका है और इसके घटने के कोई संकेत नहीं हैं। वे हर भाषा में लिखी गई जीवनियों के विषय हैं, उपन्यासों और फ़िल्मों के नायक हैं, और उन प्रदर्शनियों की प्रेरणा हैं जो साल-दर-साल बड़े-बड़े संग्रहालयों को भर देती हैं। उनकी सबसे प्रसिद्ध छवियों को इतनी अरबों बार, इतनी अलग-अलग वस्तुओं पर और इतने अलग-अलग संदर्भों में पुनः प्रस्तुत किया गया है कि वे वैश्विक लोकप्रिय संस्कृति की साझा दृश्य-भाषा का हिस्सा बन गई हैं। Mona Lisa डाक टिकटों से लेकर कॉफ़ी मगों तक, उच्च-स्तरीय कला प्रतिष्ठानों से लेकर सस्ते स्मृति-चिह्नों तक — हर चीज़ पर नज़र आती है। Vitruvian Man शायद कला और विज्ञान की एकता का, और मानव को ब्रह्मांड के लघु-रूप के रूप में समझने की पुनर्जागरण-कालीन आकांक्षा का, सबसे सार्वभौमिक रूप से पहचाना जाने वाला प्रतीक बन गया है।

यह असाधारण सांस्कृतिक व्यापकता, अपने सर्वश्रेष्ठ और सबसे गंभीर रूप में, इस बात की एक वास्तविक और व्यापक स्वीकृति है कि Leonardo ने जो हासिल किया वह कितना महत्त्वपूर्ण था, और उनके जीवन में जिन मूल्यों तथा पद्धतियों का साकार रूप मिला वे आज भी कितनी प्रासंगिक हैं। उन्होंने मानव-संस्कृति के इतिहास में किसी भी अन्य व्यक्ति की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली और संपूर्ण रूप से यह दिखाया कि जब पूरी तरह से संलग्न मानव-मन सावधान अवलोकन, कठोर विश्लेषण, सृजनात्मक कल्पना, तकनीकी दक्षता और समझने की सच्ची लगन के संयुक्त संसाधनों को अपने आसपास की दुनिया पर केंद्रित करता है, तो वह क्या-क्या हासिल कर सकता है। उन्होंने दिखाया कि कला और विज्ञान के बीच, व्यावहारिक शिल्प और सैद्धांतिक अन्वेषण के बीच, सुंदर वस्तुओं के निर्माण और प्राकृतिक सत्य की खोज के बीच की सीमाएँ वास्तविकता की अंतर्निहित विशेषताएँ नहीं हैं, बल्कि ऐसे आकस्मिक ऐतिहासिक निर्माण हैं जिन्हें पर्याप्त रूप से व्यापक और पर्याप्त रूप से प्रतिबद्ध मन द्वारा विघटित किया जा सकता है।

उनकी विरासत अंततः एक आमंत्रण और एक चुनौती है। यह हमें उस दुनिया को उससे कहीं अधिक सावधानी और जिज्ञासा के साथ देखने के लिए आमंत्रित करती है, जितनी हम शायद आमतौर पर लेकर चलते हैं। यह हमें चुनौती देती है कि हम ज्ञान के विभिन्न प्रकारों और निर्माण के विभिन्न तरीकों के बीच की उन कृत्रिम विभाजन-रेखाओं को मिटाएँ जो हमें विरासत में मिली हैं, और इसके बजाय एक ऐसी समझ की आकांक्षा रखें जो उस दुनिया की तरह ही संपूर्ण और एकीकृत हो जिसे वह समझने का प्रयास करती है। उस आमंत्रण को स्वीकार करके और उस चुनौती पर खरे उतरकर, हर पीढ़ी नए सिरे से यह जानती है कि Leonardo da Vinci का नाम मानव मन की सर्वोच्च संभावनाओं का प्रतीक क्यों बन गया है, और क्यों, एक छोटे से Tuscan पहाड़ी कस्बे में उनके जन्म के पाँच सदियों से भी अधिक समय बाद, उनका कार्य और उनका उदाहरण दुनिया भर में आश्चर्य, प्रशंसा और समझने की इच्छा को प्रेरित करता रहता है।

उनके द्वारा छोड़ी गई चित्रकारियाँ — संख्या में कम, लेकिन ध्यान देने पर जितनी गहराई पुरस्कृत करती हैं वह अनंत है — दशकों में दर्पण-लिपि में लिखे उनके चिंतन और उनके असाधारण रेखाचित्रों से भरी नोटबुक, और उनके जीवन की वे कहानियाँ जो हर भाषा और हर माध्यम में बार-बार सुनाई गई हैं: ये सब मिलकर उन सबसे समृद्ध और सबसे स्थायी विरासतों में से एक बनाते हैं जो किसी भी व्यक्ति ने उस सभ्यता को दी है जिसका वह हिस्सा था। Leonardo का अध्ययन करना दर्ज इतिहास के सबसे संपूर्ण रूप से साकार मानव जीवनों में से एक से साक्षात्कार करना है — एक ऐसा जीवन जिसमें देखने, सोचने, महसूस करने और बनाने की क्षमताओं को इस हद तक विकसित किया गया जो इस बात की स्थायी याद दिलाता है कि हमारी प्रजाति अपने सबसे असाधारण रूप में क्या करने में सक्षम है। वे सभी सदियों, सारी विद्वत्ता और सारी किंवदंती के पार भी, एक गहरे और पहचाने जाने योग्य रूप से मानवीय व्यक्तित्व बने हुए हैं — अधूरी परियोजनाओं और अनिश्चित संरक्षण से निराश, अपनी औपचारिक शिक्षा की कमियों को लेकर असुरक्षित, ऐसी इच्छाओं और जुनूनों से प्रेरित जिन्हें उन्होंने कभी-कभी अपने निजी नोट्स में उल्लेखनीय स्पष्टता के साथ व्यक्त किया, और अपने पूरे दीर्घ जीवन में दुनिया के प्रति इतनी तीव्र और इतनी व्यापक जिज्ञासा से संपन्न कि वह आज भी हर उस व्यक्ति से सीधे और शक्तिशाली ढंग से बात करती है जिसने कभी दुनिया को ध्यान से देखा हो और यह समझना चाहा हो कि यह कैसे काम करती है।

द लास्ट सपर: तकनीक और अर्थ

Leonardo की पेंटिंग द लास्ट सपर, जो मिलान के Santa Maria delle Grazie के भोजन कक्ष की दीवार पर लगभग 1495 से 1498 के बीच बनाई गई थी, मानव इतिहास में सबसे अधिक विश्लेषण की गई पेंटिंग्स में से एक है और पश्चिमी कला के इतिहास में तकनीकी दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक को प्रस्तुत करती है। यह कृति John के सुसमाचार के उस क्षण को दर्शाती है जब यीशु फसह के भोज में यह घोषणा करते हैं कि उनके बारह शिष्यों में से एक उनके साथ विश्वासघात करेगा, और बारह प्रेरितों की प्रतिक्रियाएँ — उनके हाव-भाव, चेहरे के भाव और समूह बनाने का तरीका — दृश्य रूप में उकेरा गया मानव मनोविज्ञान का एक असाधारण रूप से जटिल अध्ययन है।

जिस तकनीकी निर्णय ने इस कृति को इतना प्रसिद्ध बनाया, उसी ने इसे इतना नाजुक भी बना दिया। सच्चे फ्रेस्को के लिए चित्रकार को गीले प्लास्टर पर तेज़ी से रंग लगाना पड़ता है — यह तरीका Michelangelo जैसे चित्रकारों की गति और सहज प्रवृत्ति के अनुकूल था, लेकिन Leonardo के उस ध्यानमग्न, बार-बार संशोधन करने वाले स्वभाव से मेल नहीं खाता था। इसके बजाय उन्होंने सूखे प्लास्टर की सतह पर टेम्पेरा और तेल का उपयोग किया, जिसके लिए पिच, जेस्सो और मैस्टिक से बनी एक प्रतीत होने वाली आधार परत तैयार की गई थी। इस प्रयोगात्मक तकनीक ने उन्हें अपनी सुविधा से संशोधन और परिष्करण की स्वतंत्रता तो दी, लेकिन यह घातक रूप से अस्थिर साबित हुई। Leonardo के अपने जीवनकाल में ही इसकी सतह खराब होने लगी थी, और सत्रहवीं सदी तक यह इतनी बुरी तरह जर्जर हो चुकी थी कि रचना के निचले मध्य भाग में एक दरवाज़ा काट दिया गया, जिससे केंद्रीय आकृति के पैर नष्ट हो गए।

बाद की पुनर्स्थापनाओं — जिनमें कम से कम छह प्रमुख पुनर्स्थापना अभियान हुए — ने पुनः रंगाई की परतें जोड़ दीं, जिसने समस्या को सुलझाने की बजाय और जटिल बना दिया। सबसे हालिया पुनर्स्थापना, जो बीस वर्षों की सावधानीपूर्वक मेहनत के बाद 1999 में पूरी हुई, ने पुरानी पुनर्स्थापनाओं की जमा हुई परतों को हटाकर Leonardo के मूल काम के जो अवशेष बचे हैं उन्हें उजागर किया — जिसे अब से बेहतर तो टुकड़ों-टुकड़ों में ही माना जाता है। आज हम जो देखते हैं वह Leonardo के मूल इरादों, उनके बाद के संशोधनों और परवर्ती हाथों के हस्तक्षेपों का एक पालिम्पसेस्ट है, जो एक सील्ड कमरे में सावधानीपूर्वक नियंत्रित नमी की परिस्थितियों में संरक्षित है — जहाँ दर्शक केवल छोटे समूहों में और थोड़े समय के लिए प्रवेश कर सकते हैं।

अपनी भौतिक नाज़ुकता के बावजूद, इस रचना का प्रभाव अत्यंत व्यापक रहा है। आकृतियों को तीन-तीन के समूहों में व्यवस्थित करना, दर्शक को दृश्य में एक भागीदार के रूप में स्थापित करने वाले नाटकीय मंच की रचना के लिए दरवाज़े और खिड़कियों के परिप्रेक्ष्य का नाटकीय उपयोग, और प्रेरितों की प्रतिक्रियाओं का मनोवैज्ञानिक विभेदन — जिसमें प्रत्येक को Leonardo के मानव भाव-भंगिमाओं के जीवनभर के अवलोकन अध्ययन को दर्शाते हुए व्यक्तिगत रूप दिया गया है — इन सबने विशाल आकृति चित्रकारी की ऐसी परंपराएँ स्थापित कीं जो सदियों तक यूरोपीय कला पर हावी रहीं।

मोना लिसा: इतिहास और व्याख्या

मोना लिसा, जो अब पेरिस के Louvre में है और संभवतः दुनिया की सबसे प्रसिद्ध पेंटिंग है, शायद 1503 के आसपास बनाई जाने लगी थी और हो सकता है कि Leonardo की 1519 में मृत्यु तक कई वर्षों तक रुक-रुककर इस पर काम होता रहा हो। इसमें बैठी महिला की पहचान सदियों से बहस का विषय रही है; सबसे व्यापक रूप से स्वीकृत पहचान यह है कि वे Lisa Gherardini हैं, जो Francesco del Giocondo नामक एक फ्लोरेंटाइन व्यापारी की पत्नी थीं — यही कारण है कि पेंटिंग का इतालवी नाम La Gioconda और फ्रेंच नाम La Joconde है।

इस पेंटिंग की तकनीकी नवाचारें उतनी ही महत्वपूर्ण थीं जितनी इसकी आगे चलकर मिलने वाली प्रसिद्धि। स्फुमातो तकनीक — प्रकाश और छाया के बीच की वह मुलायम, धुंधली क्रमिकता जो पहले के पुनर्जागरण चित्रकारी की कठोर रेखाओं को समाप्त कर देती है — मोना लिसा में Leonardo की किसी भी पूर्व कृति की तुलना में कहीं अधिक परिष्कृत रूप में प्रयोग की गई है। चित्र में बैठी महिला के पीछे के परिदृश्य में वायुमंडलीय परिप्रेक्ष्य, जिसमें नीले-धूसर पहाड़ धुंध में दूर होते जाते हैं, उनकी जीवित रचनाओं में इस तकनीक का सबसे परिपक्व उपयोग दर्शाता है। अर्ध-लंबाई वाला यह प्रारूप, जिसमें बैठी महिला दर्शक की ओर तीन-चौथाई मुड़ी है और उसके हाथ अग्रभूमि में तहे हुए हैं, चित्रांकन का एक ऐसा आदर्श ढाँचा बन गया जिसे इतने व्यापक रूप से अपनाया गया कि आज यह एक परंपरा के रूप में लगभग अदृश्य हो चुका है।

वह प्रसिद्ध रहस्यमयी मुस्कान, जो सोलहवीं शताब्दी में Vasari द्वारा इसकी प्रशंसा किए जाने के बाद से लेखकों और मनोवैज्ञानिकों को अपनी ओर आकर्षित करती रही है, Leonardo के व्यक्तिगत मनोविज्ञान से लेकर परिधीय दृष्टि के प्रकाशिकी भौतिकी तक हर दृष्टिकोण से विश्लेषित की जा चुकी है। सबसे तकनीकी रूप से उन्नत हालिया विश्लेषण यह सुझाव देता है कि यह मुस्कान इस प्रकार बनाई गई है कि जब दर्शक की आँखें चेहरे के अलग-अलग हिस्सों पर केंद्रित होती हैं तो यह अलग-अलग दिखती है — जब आँखें नेत्रों पर टिकती हैं, तो होंठ मुस्कुराते प्रतीत होते हैं; जब सीधे होंठों पर केंद्रित होती हैं, तो मुस्कान मानो फीकी पड़ जाती है। केंद्रीय और परिधीय दृष्टि के अंतर का यह उपयोग, यदि सोच-समझकर किया गया था, तो दृश्य बोध की असाधारण गहरी समझ को दर्शाता है।

इस पेंटिंग की वर्तमान प्रसिद्धि इसकी आंतरिक गुणवत्ता से अधिक इसकी चोरी और वापसी की घटना की देन है। जब 1911 में Vincenzo Peruggia नामक एक इतालवी राष्ट्रवादी ने इसे Louvre से चुराया — जो रात भर संग्रहालय में छिपा रहा, दीवार से पेंटिंग उतारी, और उसे अपने कोट के नीचे छुपाकर बाहर निकल गया — तो इसके परिणामस्वरूप मिली प्रचार-सुर्खियों ने इसे एक ऐसे दर्जे पर पहुँचा दिया जो किसी भी संग्रहालय-प्रचार से संभव नहीं होता। पेंटिंग 1913 में वापस मिली जब Peruggia ने इसे Florence के एक कला व्यापारी को बेचने की कोशिश की, और Louvre में इसकी वापसी ने इसे एक सांस्कृतिक धरोहर में बदल दिया।

फ्लोरेंस और दूसरा काल

Milan में उनका समय Ludovico Sforza के पतन और 1499 की फ्रांसीसी आक्रमण के साथ समाप्त होने के बाद, Leonardo ने कई वर्ष अपेक्षाकृत अस्थिर परिस्थितियों में बिताए, जिनमें भी महत्वपूर्ण कार्य हुए। उन्होंने 1502 में Cesare Borgia के अधीन एक सैन्य अभियंता के रूप में संक्षिप्त सेवा की, मध्य इटली में किलेबंदियों और भू-भागों का सर्वेक्षण करते हुए यात्रा की, और इसी दौरान उनकी मुलाकात युवा Niccolò Machiavelli से हुई, जो Borgia के दरबार में एक राजनयिक मिशन पर थे। पुनर्जागरण इटली के दो सबसे तीक्ष्ण विश्लेषणात्मक मस्तिष्कों की यह मुलाकात — एक प्रकृति के विज्ञान से सरोकार रखने वाला, दूसरा राजनीति के विज्ञान से — का कोई प्रत्यक्ष अभिलेख तो नहीं बचा, लेकिन इसने इतिहासकारों को सदा से मोहित किया है।

1503 के आसपास Florence वापस लौटने पर उनका सामना Michelangelo से हुआ, जो उनसे तेईस वर्ष छोटे थे और पहले से ही एक दुर्जेय प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित थे। दोनों कलाकारों को Palazzo della Vecchia के काउंसिल हॉल की आमने-सामने की दीवारों पर बड़े युद्ध-दृश्य चित्रित करने का आयोग मिला — Leonardo को Battle of Anghiari और Michelangelo को Battle of Cascina चित्रित करना था। दोनों में से कोई भी कृति पूरी नहीं हुई; Leonardo की, ठीक The Last Supper की तरह, एक प्रयोगात्मक तकनीकी विफलता साबित हुई, और Michelangelo ने अपनी परियोजना अधूरी छोड़ Pope Julius II के लिए Rome चले गए। दोनों कृतियों के प्रारंभिक कार्टून दशकों तक फ्लोरेंटाइन कलाकारों द्वारा बड़ी तल्लीनता से अध्ययन किए जाते रहे और आज केवल प्रतिलिपियों के माध्यम से ही जाने जाते हैं।

यह फ्लोरेंटाइन काल ही था जब Leonardo ने मोना लिसा पर काम शुरू किया और अपने शारीरिक रचना (एनाटॉमी) के अध्ययन को आगे बढ़ाते रहे, जो 1508 से 1513 के आसपास के वर्षों में अपनी सबसे गहरी और व्यवस्थित अवस्था में पहुँचे। Pavia में एनाटॉमी के प्रोफेसर Marcantonio della Torre के साथ उनके सहयोग ने उन्हें शवों का व्यवस्थित विच्छेदन करने और त्रि-आयामी शारीरिक संरचनाओं को दर्शाने के लिए आरेखीय परंपराएँ विकसित करने का अवसर दिया, जो आज भी चिकित्सा चित्रण में प्रयोग होती हैं।

Leonardo की वैज्ञानिक पद्धति और उसका ऐतिहासिक महत्त्व

प्रकृति की जाँच-पड़ताल के प्रति Leonardo का नज़रिया कुछ मायनों में आश्चर्यजनक रूप से आधुनिक था, तो कुछ मायनों में वह अपने समय की मान्यताओं में गहरी जड़ें जमाए हुए था। प्रत्यक्ष अवलोकन पर उनका जोर, सामान्य सिद्धांतों से निकाले गए प्रस्तावों को परखने के लिए प्रयोग का उपयोग, और जटिल त्रि-आयामी घटनाओं के विश्लेषण व संप्रेषण के लिए दृश्य प्रस्तुतीकरण को एक साधन के रूप में विकसित करना — ये सब उस वैज्ञानिक पद्धति के पहलुओं की आगाही करते हैं जो सत्रहवीं शताब्दी में जाकर ही व्यवस्थित रूप ले पाई।

फिर भी Leonardo आधुनिक अर्थों में कोई आदि-वैज्ञानिक नहीं थे। उनके पास न तो जाँच-पड़ताल का कोई सुव्यवस्थित कार्यक्रम था, न ही साथी अन्वेषकों का कोई समुदाय जिनसे वे अपनी विधियाँ और परिणाम साझा करते, और न ही प्रकाशन के प्रति कोई प्रतिबद्धता जो उनकी खोजों को ज्ञान के संचयी भंडार में योगदान देने देती। उनकी नोटबुकें उनके जीवनकाल में निजी बनी रहीं और बाद की शताब्दियों तक अगम्य, जिससे उनकी खोजें विज्ञान के विकास को प्रभावित नहीं कर सकीं, भले ही उन्होंने बाद के परिणामों की पहले ही भविष्यवाणी कर दी हो। कैमरा ऑब्स्क्यूरा की उनकी पुनर्खोज, ध्वनि और प्रकाश की तरंग प्रकृति की उनकी समझ, प्लेट टेक्टोनिक्स और जीवाश्म विज्ञान के पहलुओं की उनकी अगाही, और द्रव यांत्रिकी में उनके योगदान — ये सब वैज्ञानिक परंपरा के लिए उस समय तक खो गए जब तक कि दूसरों ने उन्हें स्वतंत्र रूप से फिर से आविष्कृत नहीं किया।

नोटबुकें खुद — 13,000 से अधिक पृष्ठ जो Milan, Windsor, Paris, Madrid और अन्य जगहों के पुस्तकालयों में बिखरे हुए हैं — एक विशेष प्रकार का बौद्धिक दस्तावेज़ प्रस्तुत करती हैं: एक ऐसे मन का कार्यशील अभिलेख जिसने प्रश्न करना बंद करने से इनकार कर दिया। वे अवलोकन और अटकलों के बीच, व्यावहारिक इंजीनियरिंग समस्याओं और ब्रह्मांड संबंधी अनुमानों के बीच, सर्जन की स्केलपेल की सूक्ष्म मोटर नियंत्रण और दार्शनिक की परिकल्पना की अटकलभरी पहुँच के बीच सहजता से आगे-पीछे होती हैं। ये अपने तरीके से सबसे असाधारण बौद्धिक स्मारकों में से एक हैं जो किसी व्यक्ति ने छोड़े हों, लेकिन Leonardo के जीवनकाल में और उसके बाद उनकी अगम्यता ने उन्हें एक योगदान की बजाय महज़ एक स्मारक बना दिया।

संबंध और निजी जीवन

Leonardo ने कभी विवाह नहीं किया, और उपलब्ध साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि उनके प्राथमिक भावनात्मक लगाव उन युवकों से थे जो उनके शिष्य और सहायक के रूप में कार्य करते थे। Gian Giacomo Caprotti da Oreno के साथ उनके संबंध — जो Salaì (छोटा शैतान) के नाम से जाने जाते थे, जो लगभग 1490 में दस वर्ष की आयु में Leonardo के घर में शिक्षार्थी के रूप में आए और लगभग तीस वर्षों तक उनके साथ रहे — व्यापक और कभी-कभी पक्षपातपूर्ण अटकलों का विषय रहे हैं। Leonardo की नोटबुकें Salaì की शुरुआती शरारतों — चोरी करना, झूठ बोलना, चीज़ें तोड़ना — का वर्णन एक खीझभरे स्नेह के साथ करती हैं जो वास्तविक निराशा और वास्तविक लगाव दोनों का आभास कराता है। Salaì कई चित्रों और रेखाचित्रों में मॉडल के रूप में दिखते हैं, और Leonardo ने अपनी वसीयत में उन्हें धन और संपत्ति छोड़ी।

उनके दूसरे दीर्घकालिक साथी Francesco Melzi थे, जो Milan के पास एक परिवार के युवा रईस थे, जो लगभग 1506 में Leonardo के घर में शामिल हुए और Leonardo की मृत्यु तक उनके साथ रहे, और उनके साथ फ्रांस भी गए। Melzi संभवतः Salaì की तुलना में Leonardo के अधिक बौद्धिक रूप से अनुकूल थे; उन्होंने सचिव और प्रतिलिपिकार के रूप में कार्य किया, उनके पास कलात्मक प्रशिक्षण था, और Leonardo की मृत्यु के बाद वे नोटबुकों के संरक्षक और प्राथमिक संरक्षणकर्ता बने। Melzi की देखभाल और उनके उत्तराधिकारियों को नोटबुकों की उनकी वसीयत के माध्यम से ही वे बच पाईं।

Leonardo की कामुकता पर Giorgio Vasari की रचना "Lives of the Artists" से ही चर्चा होती आई है, जो इस विषय पर काफी सतर्कता से लिखी गई थी, और बीसवीं सदी के बाद से यह विद्वानों और आम लोगों दोनों के बीच गहरी दिलचस्पी का विषय बन चुकी है। Florence में चौबीस वर्ष की आयु में उन पर तीन अन्य पुरुषों के साथ मिलकर न्यायाधीशों को भेजी गई एक गुमनाम शिकायत में समलैंगिक संबंध का आरोप लगाया गया था। अंततः साक्ष्य या गवाहों के अभाव में यह आरोप खारिज कर दिया गया, लेकिन इस घटना को कई विद्वानों ने संकेतात्मक माना है। उनके भावनात्मक और यौन जीवन का व्यापक प्रश्न, प्रत्यक्ष प्रमाणों की अनुपस्थिति में, अनुमान और व्याख्या का विषय बना हुआ है।