
मुंबई: वो शहर जो कभी नहीं सोता
मुंबई — जिसे दुनिया कभी बॉम्बे के नाम से जानती थी, एक ऐसा नाम जिसे इस शहर ने तीन सदियों से भी अधिक समय तक गर्व और औपनिवेशिक द्विधा के साथ ढोया — भारत का सबसे अधिक आबादी वाला शहर है, इसकी निर्विवाद वित्तीय राजधानी है, और एक ऐसे वैश्विक मनोरंजन उद्योग की धड़कती नब्ज़ है जो अरबों लोगों तक अपनी पहुँच रखता है। भारत के पश्चिमी कोंकण तट पर एक संकरी प्रायद्वीप पर फैली मुंबई में लगभग दो से इक्कीस करोड़ लोगों की महानगरीय आबादी बसती है, जो इसे धरती के सबसे बड़े शहरी समूहों में से एक बनाती है। यह असाधारण विरोधाभासों का शहर है: अरबों डॉलर की गगनचुंबी इमारतें टिन की छतों वाली झुग्गियों पर अपनी छाया डालती हैं, बॉलीवुड की चकाचौंध उन लाखों लोगों के रोज़मर्रा के संघर्ष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती है जो खुले रेलवे स्टेशनों पर सोने को मजबूर हैं, और यहाँ का बंदरगाह पुर्तगालियों, अंग्रेज़ों और पूरे हिंद महासागर जगत के व्यापारियों के जहाज़ों का गवाह रहा है। दुनिया में शायद ही कोई और शहर इतने नाटकीय बदलाव से गुज़रा हो — मछुआरा समुदायों की बस्तियों वाले दलदली द्वीपों के एक समूह से लेकर इक्कीसवीं सदी के सबसे प्रमुख महानगरों में से एक बनने तक — और शायद ही कोई शहर आधुनिक शहरी जीवन के उस उथल-पुथल भरे, रचनात्मक और अक्सर दिल तोड़ने वाले अनुभव को इतनी पूर्णता से समेटता हो।
मुंबई को समझना खुद भारत को समझना है: लगातार बनी रहने वाली असमानता के बावजूद अद्भुत नवाचार की क्षमता, सांप्रदायिक हिंसा के समय-समय पर भड़कने वाले विस्फोटों के बावजूद आत्मसात करने की अपूर्व प्रतिभा, और ऐसी संरचनात्मक विफलताओं के बावजूद असाधारण उद्यमशीलता की ऊर्जा जो करोड़ों आम नागरिकों के लिए रोज़ाना की ज़िंदगी को एक कठिन परीक्षा बना देती हैं। मुंबई एक साथ इन सब चीज़ों का मेल है, और इसी जटिलता की वजह से — न कि उसके बावजूद — यह शहर दुनिया भर के लोगों की कल्पना पर इतनी गहरी पकड़ बनाए रखता है।
भूगोल: सात द्वीप और एक प्रायद्वीप का निर्माण
मुंबई का भौतिक भूगोल अपने आप में मानवीय महत्वाकांक्षा की उस कहानी का बयान है जो एक अनिच्छुक प्राकृतिक परिदृश्य पर थोपी गई। आज यह शहर एक ऐसे प्रायद्वीप पर बसा है जो दक्षिण की ओर अरब सागर में निकला हुआ है, लेकिन यह प्रायद्वीप हमेशा से एक ही भूखंड नहीं था। हज़ारों सालों तक, जो क्षेत्र आज मुंबई का घनी आबादी वाला शहरी केंद्र है, वह सात अलग-अलग दलदली द्वीपों से मिलकर बना था — ये द्वीप ज्वारीय खाड़ियों, मैंग्रोव दलदलों और उथले मुहानों से एक-दूसरे से अलग थे। ये द्वीप — कोलाबा, माज़गाँव, ओल्ड वुमन्स आइलैंड (जिसे लिटिल कोलाबा भी कहते हैं), डोंगरी, माहिम, परेल और माटुंगा-सायन — उस भूगोल की मूल पहचान थे जो आगे चलकर दुनिया के सबसे महान शहरों में से एक बनने वाला था।
ये द्वीप मानसून की वजह से मौसमी बाढ़ की चपेट में रहते थे, और यहाँ की मिट्टी खेती-बाड़ी के लिए काफी हद तक नाकाबिल थी। लेकिन जो चीज़ इनके पास थी, वह अथाह रणनीतिक और व्यावसायिक महत्व की थी: इनके पूर्वी किनारे पर एक गहरा प्राकृतिक बंदरगाह, जो खुले अरब सागर के तूफ़ानों से सुरक्षित था और इतना गहरा था कि उस युग के सबसे बड़े जहाज़ यहाँ लंगर डाल सकते थे। यही बंदरगाह — और केवल यही बंदरगाह — था जिसने पहले पुर्तगालियों को, फिर अंग्रेज़ों को, और अंततः ब्रिटिश साम्राज्य की पूरी व्यापारिक मशीनरी को भारत के पश्चिमी तट पर बसे इन अजीब से द्वीपों की ओर खींचा।
सात द्वीपों को एक एकीकृत प्रायद्वीप में बदलने का काम दो सदियों में धीरे-धीरे पूरा हुआ — समुद्र से ज़मीन वापस लेने और द्वीपों को आपस में और उत्तर की ओर मुख्यभूमि से जोड़ने वाले पुलों के निर्माण के ज़रिए। अठारहवीं सदी के अंत में पूरा हुआ हॉर्नबी वेलार्ड पुल इन्हीं महत्वाकांक्षी इंजीनियरिंग कार्यों में से एक था, जिसने प्रभावी रूप से द्वीपों के बीच समुद्र के एक बड़े हिस्से को पाटकर ज़मीन तैयार की। उन्नीसवीं सदी के अंत तक यह प्रक्रिया काफी हद तक पूरी हो चुकी थी, और सातों द्वीप मिलकर उस एकल लंबे भूखंड का रूप ले चुके थे जो आधुनिक मुंबई का केंद्र बनता है। आज भी शहर समुद्र में विस्तार करता जा रहा है — महत्वाकांक्षी भूमि पुनः प्राप्ति परियोजनाएँ आवास, बुनियादी ढाँचे और व्यावसायिक विकास के लिए नई ज़मीन तैयार कर रही हैं।
समुद्र मुंबई के स्वभाव और उसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी के केंद्र में है। शहर तीन तरफ से पानी से घिरा हुआ है — पश्चिम और दक्षिण में अरब सागर, और पूर्व में ठाणे क्रीक — और मुंबई में जीने का अनुभव समुद्र के अनुभव से अलग नहीं किया जा सकता: मरीन ड्राइव पर पानी पर पड़ती सुबह की रोशनी, कोली बस्तियों से आती नमक और मछली की गंध, कार्टर रोड की समुद्री दीवार से टकराती मानसूनी लहरें, और बंदरगाह में आते-जाते जहाज़ों की वह लगातार आवाजाही जिसने सदियों से इस शहर की व्यापारिक ज़िंदगी को बनाए रखा है।
कोली समुदाय: द्वीपों के मूल निवासी
पुर्तगालियों के आने से बहुत पहले, अंग्रेज़ों द्वारा बॉम्बे को एक व्यापारिक साम्राज्य में तब्दील किए जाने से बहुत पहले, जो द्वीप आज मुंबई बनाते हैं, वहाँ कोली समुदाय रहता था — एक मछुआरा समाज, जिसकी इन तटों पर मौजूदगी का प्रमाण एक हज़ार साल से भी पुराने ग्रंथों और शिलालेखों में मिलता है। कोली लोग उन सबसे पुराने समुदायों में से हैं जो लगातार आज की मुंबई में बसे रहे हैं, और वे आज भी इस शहर में मौजूद हैं — ऐसी मछुआरा बस्तियों में रहते हुए जो किसी तरह शहरीकरण और रियल एस्टेट विकास के बेरहम दबाव में भी टिकी रही हैं।
कोली बस्तियाँ — यानी कोलीवाड़े, जैसा कि उनकी बस्तियों को कहा जाता है — आज भी पूरे शहर में जगह-जगह मिलती हैं: वर्सोवा में, माहिम में, खार दांडा में, वर्ली में, कोलाबा में। इन बस्तियों में अब भी हर सुबह लकड़ी की नावें समुद्र तट पर खींची जाती हैं, मछुआरे अब भी अपने जाल धूप में सुखाने के लिए बिछाते हैं, और ज़िंदगी की रफ़्तार अब भी दफ्तरी घड़ियों और वित्तीय कैलेंडरों के बजाय ज्वार-भाटे और समुद्र के मौसमों से तय होती है — चाहे उनके इर्द-गिर्द कितना भी बड़ा शहर खड़ा हो गया हो। कोली लोग खुद को मुंबई के असली मालिक मानते हैं, और इस दावे में दम है। मुंबई शब्द, जिसे शहर ने आधिकारिक तौर पर 1995 में अपनाया, मुंबादेवी से लिया गया है — कोली मछुआरा समुदाय की कुलदेवी, जिनका मंदिर आज भी शहर के बीचोंबीच खड़ा है।
मुंबई का कोली अनुभव कई मायनों में तेज़ी से विकसित होते शहरों में हाशिये पर धकेले गए समुदायों के व्यापक अनुभव की एक झलक है: एक ऐसा समाज जिसकी किसी जगह में गहरी ऐतिहासिक जड़ें हों, लेकिन जिसे धीरे-धीरे उसके किनारों पर धकेल दिया जाए क्योंकि ज़्यादा ताक़तवर हित समुद्र तट और बेशकीमती ज़मीन पर कब्ज़ा जमा लेते हैं — उनकी आजीविका प्रदूषण और अत्यधिक मछली पकड़े जाने से खतरे में पड़ जाती है, और उनकी पहचान एक ऐसे शहर में धीरे-धीरे अदृश्य होती जाती है जिसका आधिकारिक आख्यान औपनिवेशिक वास्तुकला, बॉलीवुड की चमक-दमक और कॉर्पोरेट वित्त पर केंद्रित है।
पुर्तगाली काल: बोम बाहिया और पहली यूरोपीय उपस्थिति
मुंबई का यूरोपीय इतिहास 1534 में शुरू होता है, जब गोवा के गवर्नर की कमान में पुर्तगाली सेनाओं ने गुजरात सल्तनत के सुल्तान बहादुर शाह के साथ एक संधि की, जिसके तहत वे सात द्वीप जिन्हें पुर्तगाली बोम बाहिया — यानी अच्छी खाड़ी — कहते थे, पुर्तगाली अधिकार में आ गए। पुर्तगालियों ने तुरंत बंदरगाह की रणनीतिक अहमियत को पहचाना और द्वीपों पर एक किला और व्यापारिक बस्ती स्थापित की। वे अपने साथ रोमन कैथोलिक धर्म लेकर आए, और उन्होंने कई गिरजाघर बनवाए जो आज भी शहर में मौजूद हैं; साथ ही उन्होंने द्वीपों के भौगोलिक और जनसांख्यिकीय परिदृश्य को नया रूप देने की प्रक्रिया भी शुरू की।
पुर्तगाली नाम बोम बाहिया को बाद में अंग्रेज़ी बोलने वालों ने बिगाड़कर बॉम्बे कर दिया — यही वह नाम था जिससे यह शहर साढ़े तीन सदियों से भी ज़्यादा समय तक अंग्रेज़ी बोलने वाली दुनिया में जाना जाता रहा। बॉम्बे में पुर्तगाली शासन लगभग 130 साल तक चला, जिस दौरान ये द्वीप मुख्य रूप से उस पुर्तगाली व्यापारिक साम्राज्य में एक पड़ाव की तरह काम करते रहे जो ब्राज़ील से गोवा होते हुए मकाऊ तक फैला हुआ था। पुर्तगाली कभी भी बंदरगाह की पूरी संभावनाओं को विकसित नहीं कर पाए — आंशिक रूप से इसलिए कि बीमारी का खतरा हमेशा बना रहता था, मलेरिया इन निचले द्वीपों पर स्थानिक रूप से फैला हुआ था — और आंशिक रूप से इसलिए कि उनका ध्यान और संसाधन गोवा और दमण में उनके अधिक स्थापित अड्डों पर केंद्रित थे।
पुर्तगालियों ने जो छोड़ा वह स्थायी था: भूमि अनुदान का एक ढाँचा, एक ईसाई समुदाय, कई गिरजाघर जिनमें बांद्रा का सेंट एंड्रयू चर्च (जो आज भी खड़ा है) शामिल है, और स्थानीय स्थान-नाम का वह भाषाई रूपांतरण जिसने इसे 'बॉम्बे' बनाया — वही बॉम्बे जो अंग्रेज़ों को विरासत में मिला। पुर्तगाली प्रभाव की झलक बांद्रा के मोहल्ले में भी देखी जा सकती है, जहाँ आज भी एक विशिष्ट कैथोलिक चरित्र बना हुआ है — गिरजाघरों और क्रॉसों की भरमार है, और ईस्ट इंडियन कैथोलिकों का एक समुदाय यहाँ बसा है जो अपनी वंश-परंपरा को पुर्तगाली युग से जोड़ता है।
अंग्रेज़ों का आगमन: Charles II, Catherine of Braganza, और ईस्ट इंडिया कंपनी
मुंबई के इतिहास का सबसे निर्णायक क्षण किसी विजय के ज़रिए नहीं, बल्कि एक विवाह के ज़रिए आया। सन् 1661 में इंग्लैंड के राजा Charles II ने पुर्तगाल की राजकुमारी Catherine of Braganza से विवाह किया, और इस विवाह की शर्तों के तहत — पुर्तगाली राजघराने ने इस गठजोड़ को पक्का करने के लिए जो दहेज दिया — बॉम्बे के सात द्वीप अंग्रेज़ी राजमुकुट को सौंप दिए गए। शहरी सभ्यता के इतिहास में यह संपत्ति का सबसे निर्णायक हस्तांतरणों में से एक था। पुर्तगाली इन द्वीपों को छोड़ने में खास तौर पर अनिच्छुक नहीं थे: बॉम्बे उनकी सबसे क़ीमती संपत्तियों में नहीं गिना जाता था, और इंग्लैंड के साथ गठबंधन उनके लिए भारत के पश्चिमी तट पर स्थित इस मलेरिया-ग्रस्त द्वीप-समूह से कहीं अधिक मूल्यवान था।
अंग्रेज़ी राजमुकुट को एक ऐसी संपत्ति हासिल हो गई थी जिसे विकसित करने में वह बहुत सक्षम नहीं था। सन् 1668 में राजा Charles II ने ये द्वीप ईस्ट इंडिया कंपनी को दस पाउंड सोने केささやかी वार्षिक किराए पर पट्टे पर दे दिए — एक ऐसा सौदा जिसने इतिहास के सबसे नाटकीय शहरी कायापलट में से एक की नींव रख दी। ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन में बॉम्बे, मलेरिया-ग्रस्त द्वीपों के एक बेकार से समूह से एशिया के सबसे महान व्यापारिक बंदरगाहों में से एक बन गया।
बॉम्बे का कायापलट गवर्नर Gerald Aungier के कार्यकाल में सही मायनों में शुरू हुआ, जिन्होंने 1672 से 1677 के बीच इस बस्ती के गवर्नर के रूप में काम किया। Aungier एक दूरदर्शी प्रशासक थे जो यह समझते थे कि बॉम्बे को विकसित करने की कुंजी कुशल व्यापारियों और दस्तकारों की एक विविध आबादी को यहाँ बसाने में है। उन्होंने पूरे क्षेत्र के समुदायों को बॉम्बे में बसने का खुला निमंत्रण दिया और उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता, क़ानूनी संरक्षण और व्यापारिक अवसर प्रदान किए। उनकी इस खुलेपन की नीति ने बॉम्बे के बाद के विकास की नींव रखी, जो आगे चलकर एशिया के सबसे महानगरीय शहरों में से एक बना।
Aungier के निमंत्रण पर आने वाले समुदायों में सबसे निर्णायक साबित हुए पारसी — फ़ारस से आए पारसी धर्म के शरणार्थी जो सदियों पहले अपने वतन के इस्लामीकरण से बचकर गुजरात में बस गए थे। मुग़ल साम्राज्य के दबाव में और नए व्यापारिक अवसरों की तलाश में, पारसी समुदाय सत्रहवीं सदी के अंत और अठारहवीं सदी के दौरान बड़ी तादाद में बॉम्बे की ओर पलायन करने लगा। आगे चलकर उन्होंने शहर के व्यापारिक और औद्योगिक विकास में जो भूमिका निभाई, वह उनकी जनसंख्या के अनुपात में बिल्कुल असंगत रूप से विशाल थी।
Aungier के निमंत्रण पर गुजराती हिंदू और मुस्लिम व्यापारी भी आए, जो अपने साथ हिंद महासागर के व्यापार मार्गों में सदियों से अर्जित व्यापारिक दक्षता लेकर आए। बेने इज़राइल यहूदी, जो भारत के सबसे पुराने यहूदी समुदायों में से एक हैं और जिनकी उपमहाद्वीप में जड़ें दो हज़ार से भी अधिक वर्ष पुरानी हैं, उन्हें भी बॉम्बे में एक घर मिला। इस सुविचारित सामुदायिक मिश्रण से उभरा शहर अपने शुरुआती वर्षों से ही धार्मिक एकरूपता के बजाय व्यापारिक व्यावहारिकता से परिभाषित जगह था — यही वह विशेषता थी जिसने अपने पूरे बाद के इतिहास में शहर के सामाजिक ताने-बाने को टिकाए भी रखा और कुछ विनाशकारी क्षणों में उस पर दबाव भी डाला।
पारसी योगदान: बॉम्बे का निर्माण
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के संरक्षण में और उसके बाद भारत में ब्रिटिश सत्ता के विस्तार के दौरान बंबई आने वाले तमाम प्रवासी समुदायों में, पारसियों ने शायद सबसे असाधारण और स्थायी योगदान इस शहर के व्यापारिक और भौतिक ढाँचे को दिया। सत्रहवीं और अठारहवीं सदी में गुजरात से आकर बसे पारसियों ने व्यापार, जहाज़-निर्माण और अंततः उद्योग में खुद को पूरी तरह झोंक दिया — और ऐसा उन्होंने व्यावसायिक कुशलता और नागरिक प्रतिबद्धता के एक उल्लेखनीय संगम के साथ किया।
जहाज़-निर्माताओं के वाडिया परिवार ने अठारहवीं सदी के अंत और उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में बंबई के बंदरगाह पर ब्रिटिश रॉयल नेवी के बेड़े का एक बड़ा हिस्सा तैयार किया — उस दौर में जब हिंद महासागर एक ब्रिटिश झील बनता जा रहा था और नौसैनिक शक्ति साम्राज्यवादी वर्चस्व की बुनियाद थी। बंबई के बंदरगाहों पर बने जहाज़ अपनी गुणवत्ता के लिए मशहूर थे: पश्चिमी घाट का सागवान, जिसे नदी और सड़क मार्ग से बंबई लाया जा सकता था, अंग्रेज़ी बंदरगाहों में इस्तेमाल होने वाले ओक की लकड़ी से कहीं बेहतर था, और बंबई के जहाज़-निर्माताओं की कारीगरी को हर जगह सराहा जाता था। HMS Trincomalee, जिसे 1817 में बंबई के बंदरगाह से लॉन्च किया गया था, आज भी तैरती है और दुनिया के सबसे पुराने जीवित युद्धपोतों में से एक है।
टाटा परिवार, जो संभवतः सभी पारसी राजवंशों में सबसे प्रसिद्ध है, आगे चलकर भारत के सबसे महान औद्योगिक साम्राज्यों में से एक खड़ा करेगा: Jamshedji Tata ने इस्पात नगरी जमशेदपुर की स्थापना की, बंगलोर में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस की नींव रखी और 1903 में बंबई में ताज महल पैलेस होटल खोला — एक ऐसी इमारत जो शहर के सबसे प्रतिष्ठित प्रतीकों में से एक बन गई और दुखद रूप से, 2008 के आतंकवादी हमलों का एक स्थल भी। पारसी समुदाय ने स्कूल, अस्पताल, पुस्तकालय और विशिष्ट टावर्स ऑफ साइलेंस भी बनवाए, जहाँ जोरोस्ट्रियन परंपरा के अनुसार उनके मृतकों को प्रकृति और मांसाहारी पक्षियों के हवाले छोड़ा जाता है — यह प्रथा आज भी मालाबार हिल के डूंगरवाड़ी जंगल में जारी है।
बंबई में पारसियों का योगदान केवल भौतिक नहीं था, बल्कि बौद्धिक और राजनीतिक भी था। एक पारसी, Dadabhai Naoroji, 1892 में ब्रिटिश संसद के लिए चुने जाने वाले पहले भारतीय बने, जो फ़िन्सबरी सेंट्रल से लिबरल सांसद के रूप में प्रतिनिधित्व करते थे। उनका प्रसिद्ध "ड्रेन थ्योरी" — यह तर्क कि ब्रिटिश शासन भारत की संपदा को व्यवस्थित रूप से भारत से ब्रिटेन की ओर खींच रहा था — भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की बुनियादी बौद्धिक देनों में से एक बन गया। एक अन्य प्रमुख पारसी Pherozeshah Mehta, इंडियन नेशनल कांग्रेस के संस्थापक नेताओं में से एक थे और बंबई के राजनीतिक जीवन में एक अत्यंत प्रभावशाली व्यक्तित्व थे।
कपास का व्यापार और शेयर मेनिया: उछाल और गिरावट
अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के शुरुआती दौर के अधिकांश समय में बंबई का व्यापारिक जीवन चीन के व्यापार के इर्द-गिर्द घूमता था — बंगाल और मध्य भारत में उगाया गया अफ़ीम बंबई से कैंटन भेजा जाता था, जिससे ईस्ट इंडिया कंपनी और उससे जुड़े व्यापारियों को भारी मुनाफ़ा होता था। लेकिन बंबई के व्यापारिक इतिहास को एक ऐसी घटना ने बदलकर रख दिया जो दुनिया के दूसरे छोर पर घटी: अमेरिकी गृहयुद्ध, जो 1861 में शुरू हुआ।
गृहयुद्ध के फूटते ही लंकाशायर और बाकी ब्रिटेन की कपड़ा मिलों को अमेरिकी कपास की आपूर्ति कट गई। विकल्प की तलाश में बेचैन ब्रिटिश उद्योगपतियों ने भारत की ओर रुख किया, और दक्कन के पठार में उगाए जाने वाले भारतीय कपास के निर्यात का स्वाभाविक केंद्र बंबई था। भारतीय कपास की माँग ज़बरदस्त थी, उसके दाम अभूतपूर्व ऊँचाई पर थे, और बंबई एक सट्टेबाज़ी के उन्माद में डूब गया जिसे उस ज़माने के लोग शेयर मेनिया कहते थे। नई-नई कंपनियाँ उतारी गईं, बैंक खुले, रातोंरात दौलतें बनीं और बंबई में ज़मीन के दाम उस स्तर तक पहुँच गए जो उस वक्त अकल्पनीय लगते थे।
यह बुलबुला फूटा, जैसा कि सभी वित्तीय बुलबुले फूटते हैं — जब 1865 में अमेरिकी गृहयुद्ध समाप्त हुआ और अमेरिकी कपास फिर से बाज़ार में आ गई, उन कीमतों पर जिनसे भारतीय कपास मुकाबला नहीं कर सकती थी। यह पतन भयावह था: बैंक डूब गए, कंपनियाँ बंद हो गईं, और वर्षों में जमा की गई दौलत महीनों में राख हो गई। शेयर मेनिया के पीछे एक ऐसा शहर छूट गया जो शारीरिक रूप से बदल चुका था — नए मोहल्ले बन चुके थे, नया बुनियादी ढाँचा बिछाया जा चुका था, और एल्फिंस्टन लैंड एंड प्रेस कंपनी — जो इस तेज़ी की प्रमुख सूत्रधारों में से एक थी — ने समुद्र तट के महत्त्वपूर्ण हिस्सों को पाटकर ज़मीन बना ली थी, जो आगे चलकर दक्षिण बम्बई के व्यावसायिक इलाके बने। इसने यह सबक भी छोड़ा कि किसी एक जिंस पर निर्भर अर्थव्यवस्थाएँ कितनी अस्थिर होती हैं — एक सबक जिसे बम्बई को उसके बाद डेढ़ सदी में कई बार दोहराना पड़ा।
शेयर मेनिया ने जो चीज़ स्थायी रूप से बदल दी, वह थी बम्बई के औद्योगिक आधार का स्वरूप। गृहयुद्ध के दौरान और उसके बाद स्थापित हुई कपड़ा मिलों ने बम्बई में एक नया औद्योगिक मज़दूर वर्ग तैयार किया, जो अगली एक सदी में एशिया के सबसे राजनीतिक रूप से प्रभावशाली शहरी मज़दूर वर्गों में से एक बन गया। मिल युग के चरम पर — जो मोटे तौर पर 1870 के दशक से 1980 के दशक तक फैला था — मध्य मुंबई के लालबाग, परेल और भायखला जैसे इलाकों में सौ से अधिक कपड़ा मिलें थीं, जिनमें कई लाख मज़दूर काम करते थे। इन मज़दूरों और उनके परिवारों ने बम्बई की चॉल संस्कृति को जन्म दिया: घनी, बहुमंज़िला किरायेदार आवास की वह परंपरा जो मज़दूर वर्ग के मुंबई का विशिष्ट आवासीय परिदृश्य बन गई और जो आज भी शहर की सामाजिक बनावट के केंद्र में है।
निर्मित परिवेश: विक्टोरियाई बम्बई और उसकी स्थापत्य विरासत
कपास और व्यापार से अर्जित समृद्धि को उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में एक असाधारण महत्त्वाकांक्षी निर्माण कार्यक्रम के ज़रिए अभिव्यक्त किया गया, जिसने बम्बई का चेहरा बदल दिया। ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन, साम्राज्य के राजस्व से समृद्ध और स्थायित्व व सभ्यता की छवि पेश करने के लिए उत्सुक, ने मध्य बम्बई में भव्य सार्वजनिक इमारतों की एक शृंखला बनवाई। ये इमारतें मध्यकालीन यूरोप की गॉथिक स्थापत्य शैली से प्रेरित थीं और इनमें मुग़ल तथा अन्य भारतीय स्थापत्य परंपराओं के तत्त्व भी समाहित किए गए थे। परिणाम एक विशिष्ट मिश्रित शैली के रूप में सामने आया — विक्टोरियन गॉथिक और इंडो-सेरासेनिक — जो मुंबई के फोर्ट इलाके को उसका अनूठा और तुरंत पहचाने जाने योग्य स्वरूप देती है।
इस विक्टोरियन निर्माण कार्यक्रम की धुरी वह स्टेशन है जिसे बम्बई के लोग आज भी आमतौर पर VT या विक्टोरिया टर्मिनस कहते हैं, हालाँकि 1996 से इसका आधिकारिक नाम छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस है, जिसे आमतौर पर CST कहा जाता है। ब्रिटिश वास्तुकार Frederick William Stevens द्वारा डिज़ाइन किया गया और 1887 में पूर्ण हुआ, CST एशिया की सबसे असाधारण इमारतों में से एक है — नुकीले मेहराबों, रंगीन काँच, पत्थर पर उकेरे गए जानवरों और आकृतियों, एक केंद्रीय गुंबद जो आसपास की इमारतों से काफी ऊँचा उठता है, और सजावटी विवरणों की उस भरमार का एक ऐसा संगम, जो उस समय ब्रिटिश स्थापत्य में प्रभावी गॉथिक रिवाइवल आंदोलन और पश्चिमी भारत की जटिल पत्थर-तराशी परंपराओं दोनों को दर्शाता है। 2004 में CST को UNESCO विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया, और यह भारतीय उपमहाद्वीप की उन चंद इमारतों में शामिल हो गया जिन्हें उनके उत्कृष्ट सार्वभौमिक मूल्य के लिए मान्यता दी गई है।
इस दौर की अन्य उल्लेखनीय इमारतों में राजाबाई क्लॉक टॉवर शामिल है, जो चर्चगेट स्ट्रीट पर मुंबई विश्वविद्यालय के परिसर के ऊपर उठती है और वेनिस के कैम्पनाइल से प्रेरित थी; बॉम्बे हाई कोर्ट, जो एक भव्य गॉथिक संरचना है; और वे इमारतें जो मध्य मुंबई के विशाल खुले मैदान, ओवल मैदान के किनारे खड़ी हैं — जो दुनिया के सबसे सघन रूप से बसे शहरों में से एक में आज भी एक दुर्लभ खुली जगह है। मैदान के एक ओर विक्टोरियन गॉथिक इमारतें और दूसरी ओर 1930 और 1940 के दशक की आर्ट डेको अपार्टमेंट इमारतें — इस संयोजन को 2018 में असाधारण सार्वभौमिक मूल्य के रूप में मान्यता दी गई, जब मुंबई के विक्टोरियन गॉथिक और आर्ट डेको एन्सेम्बल्स को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में अंकित किया गया — और इस तरह मुंबई को दो विश्व धरोहर स्थलों की दुर्लभ विशिष्टता प्राप्त हुई।
गेटवे ऑफ इंडिया, जो शायद मुंबई की सबसे प्रतिष्ठित छवि है, विक्टोरियन काल में नहीं बल्कि बीसवीं सदी के शुरुआती दौर में बनाया गया था। 1924 में पूरा हुआ यह गेटवे इंडो-सारासेनिक शैली में बनाया गया था, जो 1911 में राजा जॉर्ज पंचम और रानी मेरी की भारत यात्रा की स्मृति में निर्मित है। यह अपोलो बंदर के समुद्र तट पर बंदरगाह की ओर मुख किए खड़ा है, और दशकों तक यह समुद्र के रास्ते बंबई आने वाले आगंतुकों के लिए औपचारिक आगमन स्थल के रूप में जाना जाता रहा। गेटवे ऑफ इंडिया आधुनिक भारतीय चेतना में सबसे यादगार तरीके से 28 फरवरी 1948 को अंकित हुआ, जब भारत छोड़ने वाले अंतिम ब्रिटिश सैनिकों ने इसके नीचे से मार्च किया और बंदरगाह में खड़े जहाजों पर सवार हुए — जो ब्रिटिश शासन के अंत और भारत गणराज्य के स्वतंत्र अस्तित्व की शुरुआत का प्रतीक था।
बंबई में स्वतंत्रता आंदोलन
बंबई केवल ब्रिटिश भारत की व्यावसायिक राजधानी नहीं थी, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में से एक भी थी। शहर का शिक्षित मध्यवर्ग, जो व्यापार से समृद्ध था और ब्रिटिश भारत द्वारा स्थापित संस्थाओं में पला-बढ़ा था, उसने अनेक ऐसे बौद्धिक और राजनीतिक नेता दिए जिन्होंने ब्रिटिश शासन को चुनौती दी। 1885 में बंबई में स्थापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का स्थापना अधिवेशन भी इसी शहर में हुआ, और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बंबई कांग्रेस आंदोलन के केंद्र में बनी रही।
लोकमान्य तिलक के नाम से जाने जाने वाले बाल गंगाधर तिलक उन पहले भारतीय नेताओं में से थे जिन्होंने बंबई में जन-राजनीति को नई पहचान दी। तिलक ने वार्षिक गणेश चतुर्थी उत्सव को एक निजी धार्मिक आयोजन से बदलकर एक विशाल सार्वजनिक उत्सव में तब्दील कर दिया, जिसने सभी वर्गों और जातियों के हिंदुओं को एकजुट किया और ब्रिटिश दमन के दौर में राजनीतिक संगठन को एक आवरण प्रदान किया। मराठी में प्रकाशित उनका अखबार केसरी हजारों पाठकों तक पहुँचता था और एक उग्र राष्ट्रवाद की आवाज़ बनता था, जो गोपाल कृष्ण गोखले जैसे कांग्रेस नेताओं की अपेक्षाकृत उदार राजनीति से बिल्कुल अलग था।
1918-1919 का इन्फ्लुएंजा महामारी — तथाकथित स्पैनिश फ्लू — ने बंबई को बेहद कड़ी चोट पहुँचाई, जिसमें अनुमानतः सत्रह हजार निवासियों की जान गई — और यह उस शहर में हुआ जो पहले से ही भीड़भाड़ और अपर्याप्त सार्वजनिक स्वास्थ्य ढाँचे से जूझ रहा था। इस महामारी ने मजदूर वर्ग की आबादी पर विनाशकारी असर डाला, जिनके पास सुरक्षित जगहों पर जाने के साधन नहीं थे, जबकि कई संपन्न निवासी वहाँ से निकल गए।
महात्मा गांधी, हालाँकि उनका नाम सबसे अधिक गुजरात और दिल्ली से जोड़ा जाता है, लेकिन अपने पूरे राजनीतिक जीवन में वे बंबई से गहरे रूप से जुड़े रहे। उनके शुरुआती राजनीतिक भाषण इसी शहर में दिए गए थे, और बंबई में कांग्रेस के अधिवेशनों ने स्वतंत्रता आंदोलन को महत्वपूर्ण मंच प्रदान किए। भारत छोड़ो आंदोलन अगस्त 1942 में बंबई से शुरू हुआ, जब गांधी ने अपना ऐतिहासिक भाषण देकर अंग्रेजों से भारत छोड़ने का आह्वान किया। इसके बाद सविनय अवज्ञा की जो लहर पूरे देश में फैली, वह बंबई के गोवालिया टैंक मैदान से उठी थी, जिसे अब उस ऐतिहासिक पल की याद में अगस्त क्रांति मैदान के नाम से जाना जाता है।
स्वतंत्रता, नाम परिवर्तन और मराठी अस्मिता
जब अगस्त 1947 में आज़ादी मिली, तो बॉम्बे नए गणराज्य भारत का हिस्सा बन गया और पहले उसे केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया गया, फिर 1950 में उसे बॉम्बे राज्य में शामिल कर लिया गया। आज़ादी के बाद के दशकों में शहर की रफ़्तार से बढ़त जारी रही और यह पूरे भारत से आए प्रवासियों को अपनी ओर खींचता रहा — महाराष्ट्र और गुजरात के सूखाग्रस्त ज़िलों से, उत्तर प्रदेश और बिहार के शहरों से, गोवा और कर्नाटक के मछुआरा समुदायों से — सब भारत की व्यावसायिक राजधानी में आर्थिक अवसर की उम्मीद लेकर आए थे।
शहर की इस बढ़त ने अलग-अलग समुदायों के बीच पहले से चले आ रहे तनाव को और गहरा कर दिया — ख़ासतौर पर उन मराठी भाषी लोगों के बीच, जो महाराष्ट्र को अपनी मातृभूमि मानते थे, और उन तमाम प्रवासी समुदायों के बीच, जो बॉम्बे के बड़े व्यावसायिक और पेशेवर क्षेत्रों पर हावी हो चुके थे। शिव सेना, जिसकी स्थापना 1966 में कार्टूनिस्ट से नेता बने Bal Thackeray ने की थी, मराठी अस्मिता की राजनीतिक आवाज़ बनकर उभरी। यह पार्टी आक्रामक सांस्कृतिक राजनीति के साथ-साथ सड़कों पर हिंसा के इस्तेमाल के लिए भी तैयार रहती थी, जिसने इसे आधुनिक भारतीय इतिहास की सबसे विवादास्पद राजनीतिक ताक़तों में से एक बना दिया।
शहर की भौगोलिक पहचान पर शिव सेना की सबसे स्थायी छाप 1995 में पड़ी, जब पार्टी भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन करके महाराष्ट्र की सत्ता में आई और बॉम्बे का नाम बदलकर मुंबई कर दिया गया। यह नया नाम मुंबादेवी को श्रद्धांजलि था — कोली मछुआरा समुदाय की कुलदेवी — और इसके ज़रिए शहर की मराठी पहचान को भी सम्मान दिया गया। यह नामांतरण विवादों से घिरा रहा: बहुत से निवासियों के लिए, ख़ासकर उनके लिए जो शहर को बॉम्बे कहते हुए बड़े हुए थे और उस नाम को एक महानगरीय, समावेशी शहरी परंपरा से जोड़ते थे, यह बदलाव क्षेत्रवादी राजनीति का एक अनचाहा थोपा हुआ फ़ैसला था। दूसरों के लिए यह एक औपनिवेशिक नाम की बहुत पहले होनी चाहिए थी — ऐसी अस्वीकृति और शहर की मूल पहचान की पुष्टि थी। शहर को मुंबई कहें या बॉम्बे — यह बहस अपने आप में उन बड़े सवालों का प्रतीक बन गई, जो अपनेपन, पहचान, और एक ऐसे शहर में भाषा व संस्कृति की राजनीति से जुड़े हैं, जिसकी सबसे बड़ी ताक़त हमेशा से उसकी विविधता रही है।
बॉलीवुड: दुनिया का सपनों का कारखाना
मुंबई की वैश्विक पहचान को परिभाषित करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है बॉलीवुड — हिंदी भाषा का फ़िल्म उद्योग, जिसका घर यही शहर है और जो साल-दर-साल दुनिया की सबसे ज़्यादा देखी जाने वाली फ़िल्मों में से कुछ बनाता है। बॉलीवुड नाम — बॉम्बे और हॉलीवुड को मिलाकर बना एक मिश्रित शब्द — 1970 के दशक में चलन में आया, लेकिन भारतीय फ़िल्म उद्योग का मुंबई से नाता इससे कहीं पुराना है। पहली भारतीय मोशन पिक्चर, Dadasaheb Phalke की हरिश्चंद्र, 1913 में बॉम्बे में बनी थी, और तब से यह शहर भारतीय सिनेमा का केंद्र बना हुआ है।
आज मुंबई का फ़िल्म उद्योग हर साल लगभग 250 से 300 हिंदी फ़ीचर फ़िल्में बनाता है, इसके अलावा क्षेत्रीय भाषाओं और अन्य प्रारूपों में बड़ी संख्या में फ़िल्में अलग से बनती हैं। अनुमान है कि मुंबई में बनी हिंदी फ़िल्में अकेले भारत में हर दिन लगभग एक करोड़ चालीस लाख लोग देखते हैं, और इस उद्योग की पहुँच दक्षिण एशिया से कहीं आगे तक है: मध्य पूर्व, मध्य एशिया, पश्चिम अफ़्रीका और यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा तथा ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले दक्षिण एशियाई प्रवासी समुदायों के बीच बॉलीवुड फ़िल्में बेहद लोकप्रिय हैं। यह उद्योग अकेले मुंबई में चालीस लाख से ज़्यादा लोगों को रोज़गार देता है — जिनमें अभिनेता, निर्देशक और निर्माता ही नहीं, बल्कि तकनीशियनों, सेट डिज़ाइनरों, पोशाक बनाने वालों, खानपान की व्यवस्था करने वालों और दिहाड़ी मज़दूरों की वह विशाल फ़ौज भी शामिल है, जिनकी मेहनत से हर फ़िल्म संभव होती है।
फ़िल्म सिटी, जो मुंबई के उत्तरी हिस्से में गोरेगाँव उपनगर में स्थापित एक विशाल स्टूडियो परिसर है, बॉलीवुड के फ़िल्म निर्माण उद्योग का असली केंद्र है। इस विशाल परिसर में खुले सेट, इनडोर शूटिंग स्टेज, साउंड रिकॉर्डिंग सुविधाएँ और प्रयोगशालाएँ मौजूद हैं, और यहाँ चौबीसों घंटे वे सपने बुने जाते हैं जिन्हें दुनिया भर के करोड़ों दर्शक परदे पर देखते हैं। किसी कामकाजी दिन फ़िल्म सिटी में टहलते हुए आपको एक साथ एक मुग़ल महल की नकल, एक आधुनिक मुंबई का अपार्टमेंट, एक स्विस पहाड़ी गाँव और उत्तर भारत का एक देहाती गाँव — यानी एक पूरे देश का भूगोल और उसकी कल्पनाओं की दुनिया — मुंबई के उपनगर के कुछ सौ एकड़ में सिमटी हुई मिल जाएगी।
बॉलीवुड ने जो फ़िल्मी सितारों की संस्कृति पैदा की है, वह एक असाधारण सामाजिक ताकत का नज़ारा है। बॉलीवुड के सितारे दुनिया के सबसे पहचाने जाने वाले लोगों में शुमार हैं — Amitabh Bachchan, Shah Rukh Khan, Deepika Padukone और मुट्ठी भर अन्य महानायकों के प्रति जो दीवानगी है, वह कहीं-कहीं धार्मिक हस्तियों को मिलने वाली श्रद्धा से कम नहीं। बड़े सितारे जिन बंगलों और अपार्टमेंट इमारतों में रहते हैं — जो मुख्यतः पश्चिमी मुंबई के जुहू और बांद्रा इलाकों में हैं — वे उन प्रशंसकों के लिए तीर्थस्थान बन चुके हैं जो भारत के कोने-कोने से और दुनिया भर में बसी दक्षिण एशियाई बिरादरियों से अपने चहेतों की एक झलक पाने की उम्मीद में उनके घरों के बाहर खड़े रहते हैं।
बॉलीवुड का सामाजिक असर सिर्फ़ मनोरंजन तक सीमित नहीं है। यह उद्योग भारतीय समाज का आईना भी रहा है और बदलाव का ज़रिया भी — लिंग, जाति, धर्म और राष्ट्रीय पहचान के प्रति नज़रियों को दर्शाता भी है और कभी-कभी उन्हें आकार भी देता है। मुस्लिम किरदारों के चित्रण, हिंदू धार्मिक जीवन की झलकियाँ, जाति और समुदाय की सीमाओं को लाँघती प्रेम कहानियाँ — इन सब ने गर्म बहसें छेड़ी हैं और कई बार सेंसरशिप की माँग भी उठी है। लेकिन भारत जैसे विविधताओं से भरे देश से हिंदी में — जो इसके दर्शकों के एक हिस्से की ही मातृभाषा है, मगर बहुत बड़ी तादाद के लिए एक सम्पर्क भाषा है — बात करने की बॉलीवुड की ताकत अपने आप में एक उल्लेखनीय उपलब्धि है।
धारावी: शहर के भीतर एक शहर
मुंबई के नक्शे पर धारावी एक अपेक्षाकृत छोटे इलाके के रूप में नज़र आती है — करीब 2.1 वर्ग किलोमीटर — जो शहर के पश्चिमी और पूर्वी किनारों से गुज़रने वाली दो रेलवे लाइनों के बीच दबी हुई है। लेकिन इस छोटे से दायरे में सात लाख से दस लाख के बीच लोग बसते हैं, जो धारावी को धरती के सबसे घनी आबादी वाले इलाकों में से एक और दुनिया की सबसे उल्लेखनीय अनौपचारिक शहरी बस्तियों में से एक बनाता है। धारावी को एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती कहा जाता है, हालाँकि यह संज्ञा विवादित है और इस पर निर्भर करती है कि 'झुग्गी' को कैसे परिभाषित किया जाए — लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि यह दुनिया के किसी भी बड़े शहर की सबसे बड़ी और आर्थिक दृष्टि से सबसे महत्त्वपूर्ण अनौपचारिक बस्तियों में से एक है।
धारावी को जो चीज़ असाधारण बनाती है वह उसकी गरीबी नहीं है — हालाँकि गरीबी यहाँ ज़रूर है — बल्कि उसकी अद्भुत आर्थिक जीवंतता है। धारावी में करीब पंद्रह हज़ार एकल-कमरे वाले कारखाने और छोटी कार्यशालाएँ हैं जो तमाम तरह के औद्योगिक कामों में लगी हैं: चमड़े की रँगाई और सामान बनाना, प्लास्टिक और धातु की रिसाइक्लिंग, कपड़ों का उत्पादन, मिट्टी के बर्तन बनाना, खाद्य प्रसंस्करण, साबुन बनाना और दर्जनों अन्य व्यवसाय। धारावी की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का सालाना उत्पादन लगभग एक अरब अमेरिकी डॉलर आँका गया है — एक ऐसा आँकड़ा जो, अगर धारावी एक स्वतंत्र आर्थिक इकाई होती, तो उसे अपने आप में एक उल्लेखनीय छोटी अर्थव्यवस्था का दर्जा दिलाता।
रीसाइक्लिंग का क्षेत्र खास तौर पर उल्लेखनीय है। धारावी मुंबई के प्लास्टिक कचरे का अनुमानित साठ प्रतिशत हिस्सा प्रोसेस करता है, जहाँ मज़दूर उस प्लास्टिक को छाँटते, साफ करते और दोबारा प्रोसेस करते हैं, जो अन्यथा लैंडफिल या समुद्र में जा मिलती। धारावी का यह अनौपचारिक रीसाइक्लिंग उद्योग शहर के लिए एक ऐसी पर्यावरणीय सेवा अंजाम देता है जिसकी कीमत आँकना मुमकिन नहीं, और यह नगर निगम को व्यावहारिक रूप से बिना किसी लागत के मिलती है — साथ ही भारत के गरीब राज्यों से आए हज़ारों प्रवासी मज़दूरों को रोज़गार भी देती है।
धारावी की बस्ती जाति, मूल क्षेत्र और व्यापार की रेखाओं पर संगठित है, जहाँ अलग-अलग मोहल्लों में अलग-अलग समुदायों और अलग-अलग उद्योगों का दबदबा है। चमड़ा उद्योग में तमिल मुस्लिम समुदाय की प्रमुख भूमिका है, रीसाइक्लिंग क्षेत्र में उत्तर प्रदेश से आए प्रवासी काम करते हैं, और कुम्हार वाड़ा — पॉटर्स टाउन — वह मोहल्ला है जहाँ गुजरात के सौराष्ट्र से आए परिवार कई पीढ़ियों से मिट्टी के बर्तन बनाते आ रहे हैं। यह व्यवस्था किसी बाहरी नज़रिए से भले ही अव्यवस्थित लगे, लेकिन दरअसल यह एक बेहद कामयाब प्रणाली है जो लेन-देन की लागत को कम से कम रखती है और छोटे कारोबारों को प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था में टिके रहने के लिए ज़रूरी घने सामाजिक नेटवर्क मुहैया कराती है।
धारावी हाल के वर्षों में तीव्र अंतरराष्ट्रीय ध्यान और विवाद का केंद्र रहा है — आंशिक रूप से Danny Boyle की 2008 की फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर की वैश्विक पहुँच की वजह से, जिसमें इसे एक पृष्ठभूमि के रूप में इस्तेमाल किया गया था, और आंशिक रूप से इसके पुनर्विकास की जारी योजनाओं के कारण। महाराष्ट्र सरकार वर्षों से धारावी के पुनर्विकास की योजनाओं पर काम कर रही है, जिसके तहत इसकी अनौपचारिक बस्तियों की जगह औपचारिक ऊँची इमारतें और व्यावसायिक परियोजनाएँ बनाई जाएँगी। पुनर्विकास के समर्थकों का तर्क है कि इससे निवासियों को बेहतर आवास और सुविधाएँ मिलेंगी। आलोचक, जिनमें धारावी के कई निवासी भी शामिल हैं, का कहना है कि पुनर्विकास की योजनाएँ समुदाय के सामाजिक ताने-बाने और आर्थिक पारिस्थितिकी तंत्र को तबाह कर देंगी, निवासियों को उनकी आजीविका से दूर विस्थापित कर देंगी, और अंततः रियल एस्टेट डेवलपर्स को उन लोगों के मुकाबले कहीं ज़्यादा फायदा पहुँचाएँगी जिन्होंने धारावी में अपनी ज़िंदगी बसाई है। यह विवाद अभी भी अनसुलझा है, और धारावी दशकों से जिस तरह काम करता आया है, वैसे ही आज भी करता है — एक शहर के भीतर एक शहर, जो खुद एक ऐसे शहर के हाशिये पर दौलत पैदा करता है, जो अपने आप में दुनिया के सबसे बड़े दौलत पैदा करने वालों में से एक है।
1992-1993 के सांप्रदायिक दंगे
मुंबई के स्वतंत्रता के बाद के इतिहास की सबसे भयावह सांप्रदायिक हिंसा दिसंबर 1992 और जनवरी 1993 में हुई, जो 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में हिंदू राष्ट्रवादी भीड़ द्वारा बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने के बाद भड़की। इस मस्जिद को जिस स्थान पर खड़ा किया गया था, उसे हिंदू भगवान राम की जन्मभूमि मानते हैं। मस्जिद के विध्वंस ने पूरे भारत में दंगों की आग सुलगा दी, लेकिन बंबई में हिंसा सबसे तीव्र और लंबे समय तक चलने वाली हिंसाओं में से एक थी।
दंगे दो लहरों में आए। दिसंबर 1992 में आई पहली लहर लगभग पाँच दिनों तक चली और इसका स्वरूप मुख्यतः मुस्लिम-विरोधी था, जिसमें हिंदू भीड़ ने मुस्लिम मोहल्लों, कारोबारों और इबादतगाहों पर हमले किए। जनवरी 1993 में आई दूसरी लहर लगभग पंद्रह दिनों तक चली और इसमें दोनों समुदायों ने एक-दूसरे के खिलाफ बेहद क्रूर हिंसा को अंजाम दिया। जब तक हिंसा पर काबू पाया गया, तब तक लगभग नौ सौ लोगों की जानें जा चुकी थीं, हज़ारों और घायल हो चुके थे, और दसियों हज़ार लोग अपने घर छोड़कर भाग चुके थे। संपत्ति का नुकसान व्यापक था, और शहर के ताने-बाने को पहुँची मनोवैज्ञानिक चोट — बंबई की उस छवि को जो एक महानगरीय, सहिष्णु और व्यापारिक सोच वाले शहर की थी, जहाँ अलग-अलग समुदायों के लोग अपेक्षाकृत शांति से साथ रहते और काम करते थे — गहरी और स्थायी थी।
महाराष्ट्र सरकार द्वारा दंगों की जांच के लिए गठित श्रीकृष्ण आयोग ने 1998 में एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें हुई हिंसा और उसे भड़काने तथा जारी रखने में विभिन्न पक्षों की भूमिका को बेहद बारीकी से दर्ज किया गया था। आयोग के निष्कर्षों में शिव सेना और पुलिस, दोनों को दोषी पाया गया — शिव सेना का पार्टी संगठन मुस्लिम बस्तियों पर हमलों को दिशा देने में केंद्रीय भूमिका निभा रहा था, जबकि पुलिस ने कई मामलों में मुस्लिम निवासियों की रक्षा करने में विफलता दिखाई या उन पर हो रहे हमलों में सक्रिय रूप से सहयोग किया। यह रिपोर्ट महाराष्ट्र के राजनीतिक प्रतिष्ठान के लिए बेहद असहज करने वाली थी और इसकी सिफारिशों को काफी हद तक लागू नहीं किया गया।
1992-1993 के दंगों ने बंबई को बुनियादी तौर पर बदल दिया। शहर के मोहल्ले, जो हमेशा से सांप्रदायिक दृष्टि से कुछ हद तक मिले-जुले रहे थे, हिंसा के बाद और अधिक अलग-थलग हो गए, क्योंकि अल्पसंख्यक समुदायों के लोग उन इलाकों में जाकर बसने लगे जहाँ वे अपने लोगों के बीच खुद को सुरक्षित महसूस करते थे। दंगों के बाद मुंबई की आवासीय संरचना पहले की तुलना में कहीं अधिक सांप्रदायिक रूप से विभाजित हो गई, और यह अलगाव तब से बना रहा है और कई मायनों में बीते दशकों में और गहरा हुआ है।
1993 के बंबई बम विस्फोट
सांप्रदायिक दंगों की हिंसा अभी ठंडी भी नहीं पड़ी थी कि बंबई एक और भीषण हिंसा की चपेट में आ गया — लेकिन इस बार उसका स्वरूप बिल्कुल अलग था। 12 मार्च 1993 को एक सुनियोजित तरीके से लगभग दो घंटे के भीतर पूरे शहर में बारह बम धमाके हुए, जिनमें 257 लोगों की मौत हो गई और 700 से अधिक घायल हो गए। यह उस समय तक भारतीय इतिहास का सबसे भीषण आतंकवादी हमला था, जिसने शहर और पूरे देश की नींव हिला दी।
इन बम धमाकों की योजना D-कंपनी के नाम से जाने जाने वाले संगठित अपराध नेटवर्क के सरगना दाऊद इब्राहिम ने Tiger Memon सहित अपने सहयोगियों के साथ मिलकर बनाई थी। इन हमलों को व्यापक रूप से पिछले कुछ महीनों के सांप्रदायिक दंगों में मुसलमानों के खिलाफ हुई हिंसा का बदला माना गया, हालांकि हमलावरों के पाकिस्तान स्थित खुफिया नेटवर्कों से जुड़े तार इस हमले के राजनीतिक पहलुओं को काफी जटिल बना देते थे। निशाने पर बंबई स्टॉक एक्सचेंज, एयर इंडिया बिल्डिंग, हवाई अड्डे के पास स्थित सेंटॉर होटल, ज़वेरी बाज़ार ज्वेलरी मार्केट और शहर भर में कई अन्य स्थान थे।
इन बम धमाकों ने शहर के मानस पर गहरे घाव छोड़े और पूंजी तथा पेशेवर एवं व्यापारिक परिवारों के दूसरे भारतीय शहरों की ओर पलायन को और तेज कर दिया — यह सिलसिला सांप्रदायिक दंगों के दौरान ही शुरू हो चुका था। इसके साथ ही, बंबई के हिंदू बहुमत और उसके बड़े मुस्लिम अल्पसंख्यक वर्ग के बीच पहले से तनावपूर्ण संबंध और भी बिगड़ गए, क्योंकि पिछले कुछ महीनों में छाई मुस्लिम पीड़ितता की कहानी में अब मुस्लिम आतंकवाद की कहानी भी जुड़ गई। इस इतिहास की जटिलता — जिसमें दोनों समुदाय पीड़ित भी थे और अपराधी भी — को एक साथ समझ पाना मुश्किल था, और आने वाले वर्षों का राजनीतिक दबाव लगातार ऐसे सरलीकरणों की ओर धकेलता रहा जो दलगत हितों की पूर्ति करते थे।
26/11 के हमले: मुंबई की सबसे काली रात
26 नवंबर 2008 की शाम को पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के दस बंदूकधारी दक्षिण मुंबई में गेटवे ऑफ इंडिया के पास समुद्र के रास्ते हवा भरी नावों में आए और एक सुनियोजित आतंकवादी हमले को अंजाम देने के लिए पूरे शहर में फैल गए। अगले तीन दिनों तक, जब तक 29 नवंबर को आखिरी हमलावर या तो मारा नहीं गया या पकड़ा नहीं गया, इन हमलों में 175 लोगों की जान गई — जिनमें 20 सुरक्षाकर्मी, 26 विदेशी नागरिक और सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे गए नौ हमलावर शामिल थे। 300 से अधिक लोग घायल हुए।
इन हमलों ने शहर की कुछ सबसे प्रतिष्ठित और भीड़-भाड़ वाली जगहों को निशाना बनाया। बंदूकधारियों ने छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस पर गोलीबारी की, जिसमें रेलवे स्टेशन के भीड़ भरे हॉल में 58 लोग मारे गए। कुछ अन्य हमलावरों ने कोलाबा इलाके में स्थित लियोपोल्ड कैफे पर हमला किया, जो पर्यटकों और मुंबई के युवाओं का एक लोकप्रिय अड्डा था। नरीमन हाउस, जो चाबड यहूदी संस्था का केंद्र था, पर कब्ज़ा कर लिया गया और वहाँ मौजूद लोगों को बंधक बना लिया गया; रब्बी और उनकी पत्नी समेत छह बंधकों की हत्या कर दी गई। दो लग्ज़री होटलों — ओबेरॉय ट्राइडेंट और ताज महल पैलेस एंड टावर — पर एक साथ हमला किया गया, जहाँ बंदूकधारियों ने बंधक बनाए, आग लगाई, और दो दिनों से भी अधिक समय तक सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ करते रहे।
ताज महल पैलेस होटल की घेराबंदी — जिसे टाटा परिवार ने एक सदी से भी पहले भारतीय आधुनिकता और आकांक्षा के प्रतीक के रूप में बनवाया था — इन हमलों का सबसे लंबा और नाटकीय अध्याय रहा। होटल में आग भड़की, लड़ाई एक मंज़िल से दूसरी मंज़िल तक चलती रही, और दुनिया ने लाइव टेलीविज़न पर देखा कि भारत की एक सबसे मशहूर इमारत हिंसा की आग में कैसे जल रही है। जब यह सब खत्म हुआ, तब तक होटल में करीब तीस लोग मारे जा चुके थे और इमारत को भारी नुकसान पहुँच चुका था।
एकमात्र जीवित हमलावर Ajmal Amir Kasab को पकड़ा गया, उस पर मुकदमा चला, हत्या और भारत के विरुद्ध युद्ध छेड़ने का दोषी पाया गया, और 2012 में उसे फाँसी दे दी गई। इन हमलों ने भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव को और गहरा कर दिया। पाकिस्तान ने हमलों में किसी राजकीय संलिप्तता से इनकार किया, हालाँकि यह स्वीकार किया कि हमलावर पाकिस्तानी नागरिक थे। भारतीय जाँचकर्ताओं द्वारा जुटाए गए और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साझा किए गए सबूतों से यह स्पष्ट हो गया कि हमलों की योजना पाकिस्तान से बनाई और संचालित की गई थी, और पाकिस्तानी खुफिया तंत्र के कुछ तत्व इस योजना से वाकिफ थे या उसमें शामिल थे।
26/11 के हमलों ने मुंबई और पूरे भारत की सुरक्षा व्यवस्था की तस्वीर बदल दी। अब शहर के हर बड़े होटल, रेलवे स्टेशन, शॉपिंग मॉल और सार्वजनिक इमारत के प्रवेश द्वार पर मेटल डिटेक्टर और सुरक्षा गार्ड तैनात रहते हैं। इन हमलों ने ताज महल पैलेस होटल को एक जज़्बे का प्रतीक भी बना दिया: होटल को बड़ी सावधानी से फिर से बनाया गया और उन समारोहों के साथ दोबारा खोला गया, जिनमें इस त्रासदी की पीड़ा और शहर की आगे बढ़ते रहने की दृढ़ इच्छाशक्ति — दोनों को बराबर जगह दी गई।
आधुनिक मुंबई: बुनियादी ढाँचा, असमानता, और शहर का भविष्य
मुंबई के अधिकांश निवासियों के लिए यहाँ की रोज़मर्रा की ज़िंदगी ताज महल पैलेस होटल की भव्यता या बॉलीवुड की चकाचौंध से नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे अधिक दबाव में और सबसे कम वित्त-पोषित शहरी बुनियादी ढाँचों की कड़वी हकीकत से तय होती है। उपनगरीय रेलवे प्रणाली, जो उत्तर के फैले हुए उपनगरों को दक्षिण मुंबई के व्यावसायिक इलाकों से जोड़ती है, हर रोज़ सत्तर लाख से अधिक यात्रियों को ढोती है — जो इसे यात्री घनत्व के लिहाज़ से दुनिया का सबसे व्यस्त शहरी रेल नेटवर्क बनाता है। ये ट्रेनें तीन अलग-अलग लाइनों — वेस्टर्न, सेंट्रल और हार्बर लाइन — पर चलती हैं, और पीक ऑवर के दौरान दो से तीन मिनट की आवृत्ति पर दौड़ती हैं। इनमें भीड़ का वह घनत्व होता है जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है: यात्री खुले दरवाज़ों से लटके रहते हैं, ऐसी जगहों में खुद को ठूँस लेते हैं जो शारीरिक रूप से असंभव लगती हैं, और एक घंटे या उससे भी अधिक समय की यात्रा उन हालात में तय करते हैं जिन्हें दुनिया के अधिकतर बड़े शहरों में एक असहनीय आपात स्थिति माना जाता।
मानसून, जो हर साल जून में आता है और सितंबर तक रहता है, शहर को बार-बार संकट की स्थिति में धकेल देता है। मुंबई में सालाना लगभग 2,400 मिलीमीटर बारिश होती है, जिसका अधिकांश हिस्सा इन्हीं चार महीनों में केंद्रित रहता है, और शहर का जल निकासी ढाँचा — जिसका बड़ा हिस्सा उन्नीसवीं सदी में बना था और दो करोड़ की आबादी वाले इस महानगर के लिए बुरी तरह नाकाफी है — आसमान से बरसने वाले पानी की इतनी बड़ी मात्रा को संभाल पाने में असमर्थ है। बड़ी बाढ़ें, जिनमें पूरे के पूरे मोहल्ले डूब जाते हैं, ट्रेनें थम जाती हैं और लोगों की जानें जाती हैं, कोई असाधारण घटनाएँ नहीं बल्कि हर साल की बात बन चुकी हैं। जुलाई 2005 की बाढ़, जिसमें महज चौबीस घंटों में 944 मिलीमीटर बारिश हुई थी — किसी बड़े शहर में एक दिन में सर्वाधिक वर्षा का विश्व रिकॉर्ड — में एक हजार से अधिक लोग मारे गए और अरबों डॉलर का नुकसान हुआ, जिसने शहर की बाढ़ प्रबंधन व्यवस्था की भयावह विफलता को उजागर कर दिया।
आवास शायद मुंबई के सामने खड़ी सबसे गंभीर चुनौती है। यह शहर दुनिया के सबसे महंगे रियल एस्टेट बाजारों में से एक है: मालाबार हिल या वर्ली जैसे संभ्रांत इलाकों में एक छोटा-सा अपार्टमेंट लंदन या न्यूयॉर्क में तुलनीय संपत्ति से भी ज्यादा महंगा पड़ सकता है, जबकि मुंबई के अधिकांश निवासियों को — अनुमान बताते हैं कि पचास प्रतिशत से अधिक आबादी झुग्गियों या अनधिकृत बस्तियों में रहती है — औपचारिक आवास बाजार तक कोई पहुँच ही नहीं है। अमीरों के ऊंचे अपार्टमेंट टावरों और गरीबों की टीन की छत वाली बस्तियों के बीच की खाई महज दृश्यात्मक नहीं है, बल्कि यह एक ही शहर में रहने वाले अलग-अलग तबकों के लोगों की कानूनी, आर्थिक और सामाजिक हैसियत में एक बुनियादी असमानता को दर्शाती है।
बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स, जिसे 1990 के दशक से शहर के बीचोबीच पड़ी पूर्व नमक-पान भूमि पर विकसित किया गया, दक्षिण मुंबई की भीड़भरी सीमाओं से बाहर एक नया व्यावसायिक क्षेत्र बनाकर मुंबई की स्थानिक बाधाओं से निपटने का एक प्रयास है। बीकेसी, जैसा इसे सर्वत्र जाना जाता है, अब भारत के कई सबसे बड़े बैंकों, वित्तीय संस्थाओं और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुख्यालयों का ठिकाना बन चुका है, साथ ही कई विदेशी वाणिज्य दूतावासों के दफ्तर भी यहाँ हैं जो दक्षिण मुंबई से स्थानांतरित हो चुके हैं। इसका विकास पुराने व्यावसायिक इलाकों को भीड़ से मुक्त करने में केवल आंशिक रूप से सफल रहा है, लेकिन यह उन्नीसवीं सदी में फोर्ट इलाके के मूल विकास के बाद से मुंबई के व्यावसायिक भूगोल में सबसे महत्वपूर्ण इजाफे का प्रतिनिधित्व करता है।
मुंबई महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण दशकों से एक व्यापक महानगरीय क्षेत्र की योजनाएँ बनाता आ रहा है, जो शहर की निरंतर बढ़ती आबादी को उत्तर दिशा में और बंदरगाह के पार मुख्य भूमि तक विस्तार देकर समायोजित करेगा। नवी मुंबई जैसी नई उपग्रह नगरियों का निर्माण, जिनकी परिकल्पना 1970 के दशक में द्वीप पर जैविक रूप से विकसित हुए शहर के एक नियोजित विकल्प के रूप में की गई थी, लाखों निवासियों को आवास मुहैया कराने में सफल रही है। प्रस्तावित मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक, जो मुंबई को नवी मुंबई से जोड़ने वाला बीस किलोमीटर से अधिक लंबा एक समुद्री पुल है, हाल के वर्षों में पूरा हो गया है और बंदरगाह के आर-पार संपर्क को बदल देने का वादा करता है।
अपनी तमाम चुनौतियों के बावजूद, मुंबई भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ने वाले प्रमुख प्रवेश द्वार के रूप में काम करती रही है। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज, जिसकी स्थापना 1875 में हुई थी, एशिया के सबसे पुराने शेयर बाजारों में से एक है और मुंबई में ही स्थित नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के साथ मिलकर भारतीय अर्थव्यवस्था के वित्तीय तंत्रिका तंत्र की भूमिका निभाता है। शहर का बंदरगाह, भले ही बंदरगाह के उस पार मुख्य भूमि पर न्हावा शेवा में नए कंटेनर टर्मिनलों के उभरने से इसे चुनौती मिली है, दक्षिण एशिया के सबसे व्यस्त बंदरगाहों में से एक बना हुआ है। भारतीय रिजर्व बैंक, देश का केंद्रीय बैंक, अपना मुख्यालय मुंबई में ही रखता है, और भारत के अधिकांश प्रमुख वाणिज्यिक बैंक भी यहीं स्थित हैं।
बांद्रा-वर्ली सी लिंक और नया शहरी बुनियादी ढाँचा
बांद्रा-वर्ली सी लिंक, जो 2009 में बनकर तैयार हुआ, इक्कीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में आकार ले रहे नए मुंबई के सबसे प्रमुख प्रतीकों में से एक है। यह केबल-स्टेड पुल माहिम खाड़ी के पार लगभग 5.6 किलोमीटर तक फैला हुआ है और पश्चिमी उपनगर बांद्रा को वर्ली स्थित द्वीप शहर से जोड़ता है। इसने पश्चिमी तटीय गलियारे पर यात्रा के समय को बदल कर रख दिया है और गेटवे ऑफ इंडिया की तरह ही मुंबई की पहचान का एक अभिन्न हिस्सा बन गया है। पुल के सुंदर टॉवर बांद्रा के वॉटरफ्रंट से और वर्ली व प्रभादेवी के अपार्टमेंट की छतों से साफ दिखाई देते हैं, और यह उन फोटोग्राफरों की पसंदीदा जगह बन गया है जो तेज़ी से बदलते इस शहर का नया चेहरा कैमरे में क़ैद करना चाहते हैं।
सी लिंक उस व्यापक बुनियादी ढाँचे में निवेश का हिस्सा है जो पिछले दो दशकों में मुंबई में तेज़ी से बढ़ा है — इसमें मेट्रो रेल नेटवर्क का विस्तार, तटीय सड़कों का निर्माण, अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का उन्नयन और मुंबई इंटीग्रेटेड रोड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट का विकास शामिल है, जिसका लक्ष्य द्वीप शहर की सड़क क्षमता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाना है। इन निवेशों से कुछ निवासियों की आवाजाही में वास्तविक सुधार आया है, हालाँकि आलोचकों का कहना है कि इनका फ़ायदा मुख्य रूप से कार रखने वाले मध्यम और उच्च-मध्यम वर्ग को मिलता है, जबकि शहर के मज़दूर वर्ग को सेवा देने वाली भीड़भाड़ से भरी उपनगरीय रेलवे प्रणाली की हालत सुधारने में ये योजनाएँ बहुत कम कारगर रही हैं।
खाना-पीना, संस्कृति और मुंबई की आत्मा
मुंबई का कोई भी विवरण उसकी असाधारण खान-पान संस्कृति का ज़िक्र किए बिना अधूरा है, जो शहर के जीवन के हर दूसरे पहलू की तरह ही विविध और जीवंत है। मुंबई का स्ट्रीट फूड खाने के शौकीनों के बीच बेहद मशहूर है: वड़ा पाव — मसालेदार आलू की बड़ी को ब्रेड रोल में चटनी के साथ परोसा जाने वाला यह स्नैक — शहर का सबसे खास नाश्ता है, जो हज़ारों ठेलों पर बिकता है और हर वर्ग और तबके के मुंबईकर इसे चाव से खाते हैं। भेल पूरी — मुरमुरे, सब्ज़ियों और इमली की चटनी का चटपटा मिश्रण — एक और ख़ालिस मुंबई स्ट्रीट फूड है, जो ख़ासतौर पर चौपाटी बीच पर शाम की भीड़ से जुड़ा है। शहर के ईरानी कैफे, जो उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी की शुरुआत में ईरान से आए पारसी प्रवासियों ने स्थापित किए थे, एक अलग ही तरह के मेन्यू के लिए जाने जाते हैं — चाय, बन मस्का और अंडे के व्यंजन — जो अब मुंबई की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बन चुके हैं। हालाँकि कई मूल ईरानी कैफे बंद हो चुके हैं, क्योंकि उनके बुज़ुर्ग मालिक बिना किसी उत्तराधिकारी के गुज़र गए।
मुंबई की आत्मा — जिसे सटीक शब्दों में बयान करना मुश्किल है, लेकिन जिसे शहर में थोड़ा वक़्त गुज़ारने वाला हर शख़्स महसूस कर लेता है — हिम्मत, जोश, महत्वाकांक्षा और दुनिया के हर थपेड़े को झेल लेने की एक बेबाक तैयारी से मिलकर बनी है। मुसीबतों के बाद उठ खड़े होने के लिए मुंबईकरों की ख़ूब साख है: 1993 के बम धमाकों के बाद शहर कुछ ही दिनों में सामान्य हो गया, 2006 के ट्रेन बम धमाकों के बाद कुछ ही घंटों में, और 2008 के आतंकी हमलों के बाद कुछ ही हफ्तों में। यह जीवट उदासीनता नहीं है, बल्कि उस व्यावहारिक ज़रूरत का नतीजा है जो उस शहर में जीने से आती है जहाँ लाखों लोगों के पास लंबे समय तक ग़म में डूबे रहने की कोई गुंजाइश नहीं — ट्रेन पकड़नी है, ग्राहक को सेवा देनी है, बच्चे को खाना खिलाना है।
मुंबई एक ऐसा शहर है जो एक खास किस्म की मजबूती और अनुकूलनशीलता की माँग करता है और उसका पुरस्कार भी देता है। यहाँ रहना आसान नहीं है, और यह शहर ऐसा होने का नाटक भी नहीं करता। लेकिन इसके बदले में यह कुछ ऐसा देता है जो भारत का कोई दूसरा शहर और दुनिया के बहुत कम शहर दे सकते हैं: किसी विशाल चीज़ के केंद्र में होने का एहसास, यह अनुभूति कि इतिहास, व्यापार और मानवीय रचनात्मकता की धाराएँ इन्हीं गलियों से बहती हैं, और यह यकीन कि इस शहर में, अगर आप पर्याप्त मेहनत करें और किस्मत साथ दे, तो कुछ भी मुमकिन है। वह वादा — जो अधूरा पूरा होता है, जो सबको बराबर उपलब्ध नहीं है, और जो जाति, वर्ग और सांप्रदायिक पहचान की हकीकतों से लगातार उलझा रहता है — साढ़े तीन सदियों से लोगों को मुंबई की ओर खींचता आया है, और आज भी खींचता है।
स्रोत
https://www.countryreports.org https://mumbaicity.gov.in/en/history/ https://indianculture.gov.in/unesco/creative-cities-network/mumbai https://www.mcgm.gov.in/irj/go/km/docs/documents/HomePage%20Data/Film%20Industry%20in%20Mumbai.pdf https://www.unesco.org/en/creative-cities/mumbai https://borgenproject.org/indian-slum-economy/ https://www.weforum.org/stories/2016/10/the-thriving-economy-of-one-of-asias-biggest-slums/ https://www.hrw.org/reports/1996/India1.htm https://clarionindia.net/1993-bombay-riots-politics-of-hate/ https://blog.realestate.cornell.edu/2018/03/20/dharavi/ https://citiesoffilm.org/mumbai/

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